धार्मिक घृणा और यौन सनक कला नहीं!

पेरिस में कार्टून-पत्रिका पर हुए हमले की जायज निंदा के बाद का दूसरा नजरिया ये है कि पत्रिका इस्‍लाम विरोध की अपनी मुहिम में लंबे समय से मुब्तिला थी। हमले के फौरन बाद के शोकाकुल क्षण से समय कुछ आगे बढ़ा, तो इस दूसरे नजरिये की आमद भी सोशल मीडिया पर शुरू हो गयी। कुछ प्रतिनिधि टिप्‍पणियां: मॉडरेटर

➧ आशुतोष कुमार [शिक्षक, आलोचक]

जी नहीं, मैं शार्ली नहीं हूं। मैं शार्ली पर हुए कायराना और जघन्य हमले की निंदा में शरीक हूं। मैं शार्ली की आजादी के हक में हूं, लेकिन मैं धार्मिक, जातीय, लैंगिक घृणा और यौन सनक को कला अथवा पत्रकारिता का नाम देने में शरीक नहीं हूं। मैं शार्ली के वजूद के हक में हूं, लेकिन शार्ली के नाम पर दुनिया भर में भड़काये जा रहे इस्लामोफोबिया के उन्माद में हिस्सेदार नहीं हूं। मैं उस माहौल का हिस्सा नहीं हूं, जिसमें संदिग्ध हमलावरों के मजहब का नगाड़ा पीटा जा रहा हो, लेकिन यह न बताया जा रहा हो कि इस्लाम-निंदक शार्ली पर हमले का मुकाबला करते हुए शहीद हुए सिपाही अहमद का मजहब क्या था? मैं कभी नहीं चाहता कि शार्ली पर हमले जैसी घटना दोहरायी जाए, लेकिन मैं यह भी नहीं चाहता कि नाइजीरिया में आये दिन हजारो कत्लेआम होते रहें और यह दुनिया होंठ सीये बैठी रहे, क्योंकि नाइजीरिया फ्रांस नहीं है। मैं शार्ली पर हमले की भर्त्सना करता हूं, लेकिन उन लोगों के साथ अभिव्यक्ति की आजादी का नारा बुलंद नहीं कर सकता, जिन्होंने महात्मा गांधी जैसे शख्स की बोलने और जीने की आजादी छीन लेने वालों को महिमामंडित करने वालों की निंदा नहीं की है।

➧ मो अनस [सामाजिक-राजनीतिक कार्यकर्ता]

सांप्रदायिकता के खिलाफ लड़ाई जिन्होंने सेल्फियों और स्टेटसों तक सीमित रखी, वे पेरिस हमले के बाद मुसलमानों द्वारा पैगंबर के कार्टून का विरोध सह नहीं पा रहे हैं। जिन लोगों ने राम और रहमान का मर्म तक नहीं जाना, वे कह रहे हैं, ‘अब सौहार्द के लिए आवाज हम नहीं उठाएंगे।’ मैं उन लोगों से पूछना चाह रहा हूं कि वे लोग धार्मिक आजादी (संविधान प्रदत्त), निजता का हनन (संविधान प्रदत्त) और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता मे क्‍यों अंतर नहीं कर पा रहे हैं? या फिर उनके भीतर की धार्मिक श्रेष्ठता उनसे यह करवा रही है। जो लोग कहते थे, आपकी अहसमति की रक्षा हम जान देकर करेंगे, वे लोग आखिर मुसलमानों द्वारा अपने पैगंबर के कार्टून न बनाने की अपील को मानने से इनकार क्यों कर देते हैं? क्या उनकी समझ, उनकी अपनी आजादी ही सर्वश्रेष्ठ और सर्वोत्तम है? जब भारतीय मुसलमानों को कट्टर हिंदूवादी सोशल मीडिया पर पेरिस हमलें का जिम्मेदार बना रहे थे, उस कठिन दौर में उन कट्टरपंथियों की लाइन पर क्या इन ‘सौहार्दियों’ का चलना ठीक था? जिन ‘सौहार्दियों’ ने दो दिनों से इस्लाम को आतंक से जोड़ा और इसकी आड़ में मुसलमानों को हर तरह से अपमानित किया, क्या वे लोग खुद के स्टैंड को न्यायोचित करार दे सकते हैं? वे कौन से पैमाने हैं जो भारत जैसे बहुलतावादी देश के धर्मनिरपेक्ष संस्करण को मजबूत बनाये रखेगा? क्या वह पैमाना पेरिस में घटने वाली घटना होगी या कंधमाल और मुजफ्फनगर होगी? जहां हम शामिल नहीं, वहां की सजा भी क्या हमें मिलेगी? क्या हम कुरान और पैगंबर का मार्ग छोड़ दें? यह न्याय तो फासिस्ट किया करते हैं। आप लोग तो खुद को वामपंथी, नास्तिक, लिबरल, सेक्यूलर और न जाने क्या क्या कहते आये हैं। इस एक मामले से आप भारतीय समाज के सौहार्द को तोड़ने का काम करेंगे? किसे डरा रहे हैं? जाहिर सी बात है मुसलमानों को। डराइए। मार दीजिए। मारते ही तो आएं हैं आज तक। हम अपनी धार्मिक पहचान के लिए लड़ेंगे। अहिंसक और चुपचाप। आप हमारी पहचान मिटाने का काम खुलेआम करते रहिए। हमें आपकी जरूरत नहीं है। आप जैसे ‘सौहार्दियों’ की तो कतई नहीं, जो ईद और मोहर्रम के वक्त ‘मेरे गांव में ऐसा होता था, हाय अब ऐसा हो रहा है’ कह कर खुद को सेक्यूलर बनाये रहते हैं।

त्यौहार मना लेना बड़ी बात नहीं है। उन त्यौहारों के अस्तित्व को बचाये रखने के लिए संघर्ष करना और ईमानदारी से लड़ते रहने वाले लोगों को हम अपना कहेंगे। मुझे अफसोस है कि मैंने आपको पहचानने में जल्दी कर दी। काश कुछ और दिन आप धोखा देते रहते।

➧ वसीम अकरम त्‍यागी [युवा पत्रकार]

निंदा अगर पेरिस की घटना की कर रहे हो तो फिर इसकी भी निंदा कीजिए कि क्यों पैगंबर साहब का कार्टून बनाया गया? निंदा इसकी भी कीजिएगा कि क्यों वहां पर हिजाब पर पाबंदी लगाकर मुस्लिम महिलाओं को घरों के अंदर कैद कर दिया गया? अगर हिजाब पर पाबंदी मुस्लिम महिलाएं ही चाहतीं थीं, तो फिर वे अब घरों में कैद क्यों हैं? क्यों वे अब बाजारों में, दफ्तरों में या और दूसरी जगहों पर नजर नहीं आतीं? बेशक पेरिस में जो हुआ है, वह बहुत शर्मनाक और निंदनीय है, मगर उससे पहले यह भी सोचना चाहिए कि इस्लाम में पैगंबर साहब की कोई तस्वीर नहीं है – फिर ये काल्पनिक तस्वीर बनाने वाले क्या संदेश देना चाहते थे? क्या यही दिखाना चाह रहे थे कि दूसरे धर्मों की तरह इस्लाम भी एकेश्वरवाद से भटक कर नबियों के फोटो तस्वीरों और पोस्टरों से घरों को सजाये हुए है? जिस धर्म ने बुतपरस्ती को नकार दिया है, उस धर्म के नबियों के कार्टून बनाने की ही क्या जरूरत है? यह भी तो निंदनीय है! उसी तरह, जिस तरह चार्ली हैब्डो के दफ्तर पर हुआ हमला निंदनीय है? मगर देखने वालों को हमला दिख रहा है, मगर विश्व की एक बड़ी आबादी की आस्था पर की गयी चोट किसी को नजर नहीं आ रही है? चार्ली हैब्डो के उस कार्टून को भारतीय मीडिया के एक बड़े मीडिया समूह आज तक ने अपनी वेबसाइट पर प्रकाशित कर दिया, जो कहीं से भी तर्कसंगत नहीं ठहराया जा सकता। क्या इस मीडिया समूह को अपनी जिम्मेदारियों का तनिक भी एहसास नहीं? इन्हें सोचना होगा कि आज तक कोई सोशल मीडिया नहीं है, जिस पर कुछ भी चिपकाया गया हो। साथ ही यह भी सोचना होगा कि इस देश में विश्व की सबसे बड़ी आबादी मुसलमानों की है, उनकी आस्था पर इस तरह प्रहार न किया जाए? आप किसी ऐसे व्यक्ति का कार्टून बनाने, प्रकाशित करने का अधिकार रखते हैं, जिसकी कोई तस्वीर आपके पास हो? और जिसकी तस्वीर ही नहीं है, उसकी तस्वीर बनाना या कार्टून बनाना कहां तक जायज है? टीआरपी के लिए इतना गिर जाना … लानत है ऐसी भौंडी और कूड़ाछाप पत्रकारिता पर। आज तक को चाहिए कि वह उस कार्टून को बगैर देरी किये अपनी वेबसाईट से हटाये और देश के एक बड़े वर्ग की भावनाओं को सम्मान दे।

और अंत में

Raif Badavi

लंदन पेरिस छोड़िए, यह देखिए अभिव्यक्ति की आजादी का सऊदी मॉडल। ये रईफ बदावी हैं। सऊदी में पैदा होकर भी खुद को स्वतंत्र नागरिक समझ बैठे थे। ब्लागिंग शुरू की, तो खुली बहस की “हिमाकत” करने लगे। 2010 से जेल में हैं और जिस वक्त दुनिया पेरिस में अभिव्यक्ति पर बरसी गोलियों पर गमजदा हो रही थी, रईफ को जेल से निकाल कर एक मस्जिद में कोड़े बरसाये जा रहे थे। सऊदी की जेद्दा अदालत ने “आजादख्याली” के संगीन जुर्म में रईफ को दस साल की सजा, दस लाख रियाल का जुर्माना और एक हजार कोड़े बरसाने का हुक्म दे रखा है।

संजय तिवारी [संपादक: विस्‍फोट डॉट कॉम]

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