बुद्धू और बदमाश शार्ली एब्‍डो की कहानी

ब्रिटेन आतंकवाद के खिलाफ और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को कम करने वालों की कोशिश के खिलाफ लड़ाई में फ्रांस के लोगों के साथ है।
डेविड कैमरन, प्रधानमंत्री, ब्रिटेन

ये केवल फ्रांस के लोगों पर हमला नहीं है, ये कुछ बुनियादी मूल्यों पर हमला है, जिनको हम देश में सुरक्षित रखते हैं। मसलन – बोलने की आजादी, अभिव्यक्ति की आजादी और प्रेस की आजादी।
जोश अर्नेस्ट, प्रवक्ता, व्हाइट हाउस

हमला सीधे तौर पर अभिव्यक्ति की आजादी पर हमला है। यह मात्र लोगों पर हमला नहीं बल्कि प्रेस की आजादी पर हमला है, जो कि आजाद लोकतंत्रीय संस्कृति का मूल तत्व है।
एंजेला मॉर्केल, जर्मन चांसलर

♦ रोहित ध्‍यानी

भिव्यक्ति की आजादी सिर्फ धार्मिक कट्टरपंथियों के कारण संकट में नहीं है। सरकार, सेना, पूंजीपति और कई बार मीडिया के कारण भी संकट में है। पेरिस की घटना से हम किन सवालों से मुख्य रूप से टकरा रहे हैं? आखिर धर्म के नाम पर हम इस तरह के हमलो से कैसे निपटें? क्या धर्म का अनादर कर या अभिव्यक्ति की सीमा तय कर? क्या आज का हमारा दौर धर्म के लिए आलोचना की जगह बनाने में नाकाम रहा है?

फ्रांस के पेरिस में एक पत्रिका के दफ्तर पर आतंकियों ने हमला कर 10 पत्रकारों समेत दो पुलिसवालों की हत्या कर देने वाले हादसे से सबक लेने का वक्त आ गया है। संसार में कभी इतना बड़ा हमला पत्रकारों पर नहीं हुआ। ये एक ऐसा हादसा है, जिससे पेरिस ही नहीं, समूचा यूरोप सदमे में है। फ्रांस के मीडियाकर्मी सदमे में हैं। इसके उलट एक खबर ये भी आयी है कि फ्रांसीसी पत्रिका शार्ली एब्दो अगले हफ्ते अपने समय पर फिर निकलेगी। बुधवार यानी 14 जनवरी को। पत्रिका को शार्ली एब्दो के मुख्यालय के सामने रखा जाएगा, जो फिलहाल हमले के बाद बंद है।

फ्रांस में 2017 में चुनाव होने हैं और ये भी कयास लगने शुरू हो गये हैं कि फ्रांस में क्‍या अब नये तरीके का वोट बैंक तलाशने की रणनीति शुरू हुई है? समूचे यूरोप को अगर देखें, तो सब से ज्‍यादा तकरीबन 50 लाख मुस्लिम फ्रांस में ही हैं। साथ ही फ्रांस को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए भी जाना जाता है। फ्रांस में मुस्लिम आप्रवासी की बढ़ती तादाद को लेकर हमेशा मुद्दा राजनीतिक गलियारों में गरमाया हुआ रहता है। इसी दौर में मिशेल थॉमस की एक किताब ‘सबमिशन’ का भी विमोचन होना है, जिसमें सीधा सीधा इस अफवाह को जन्‍म देने की कोशिश की गयी है कि 2022 तक फ्रांस एक मुस्लिम देश बन चुका होगा, जहां सबसे ज्‍यादा आबादी मुस्लिम की ही होगी और फ्रांस का राष्ट्रपति भी कोई मुस्लिम ही होगा। इस किताब का विमोचन अगले हफ्ते होगा।

फ्रांसीसी व्यंग्य पत्रिका ‘शार्ली एब्डो’ पर हुए हमले की दुनिया के ज्यादातर देशों ने निंदा की। ज्यादातर धर्म के धर्मगुरुओ ने खुले तौर में निंदा की है और सोशल मीडिया में लोगों ने एकजुट होकर ये भी बता दिया कि ऐसा हमला कभी भी बरदाश्‍त नहीं किया जाएगा, जो सीधा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए खतरा हो।

‘शार्ली एब्डो’ हमला एक ऐसा हमला है, जो उन लोगों के द्वारा किया गया है, जो कार्टून बरदाश्‍त नहीं कर सकते और शायद करना नहीं चाहते। कार्टून एक कार्टूनिस्ट का जरिया (नजरिया) है, जो सीधे-सीधे अपना संवाद कार्टून के जरिये दुनिया तक पहुंचना चाहता है।

हर बुधवार को आने वाली ‘शार्ली एब्डो’ ने समाज में हलचल ही पैदा की है। वो हमेशा से आतंकवादी संगठनों के निशाने पर रहा है। जब 2011 में हजरत मुहम्मद को गेस्ट एडिटर के रूप में पेश किया गया, तब पूरी दुनिया में हंगामा बरपा हुआ। शार्ली एब्डो का जैसा अतीत रहा है, उसमें पत्रिका के पत्रकारों ने किसी को नहीं बख्‍शा। अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर जब पत्रिका ने सीधे मुस्लिम कट्टरपंथियों को निशाना बना शुरू किया, तो वो कट्टरपंथी संगठनों की हिट लिस्ट में आ गयी। 2011 में उनके ऑफिस में पेट्रोल बम से हमला भी हुआ और खिड़की के शीशे को भी तोड़े गये। 2006 में भी शार्ली एब्डो ने अपने कवर पेज पर हजरत मुहम्मद का कार्टून छापकर मुसीबत मोल ली थी। कवर पेज पर हजरत मुहम्मद का कार्टून ये कहते हुए छापा गया था की वो कट्टर लोगों से अब परेशान हो चले हैं और सिरफिरों का प्यार झेलना कोई आसान काम नहीं रहा।

‘शार्ली एब्डो’ का इतिहास

फ्रांस में कार्टून पत्रिका का दौर काफी पुराना रहा है। 1960 में गॉर्जेस बेर्नियर, कावांना और फ्रेड अरिस्टिडेस ने हाराकिरी पत्रिका की शुरुआत की थी। चाकू घोंपकर खुदकुशी कर लेने वाले को जापानी भाषा में हाराकिरी कहते हैं। व्यंग्य करना पत्रिका की फितरत रही है या ये भी कहा जा सकता है कि इस दौर में कुछ लोग आधुनिक तकनीक का प्रयोग करना चाह रहे थे, उसी दौर में किसी पाठक ने पत्रिका को शिकायत पत्र में “बुद्धू और बदमाश” लिखा। हाराकिरी पत्रिका ने इसको अपना टैग लाइन बना दिया, “बुद्धू और बदमाश”। फिर क्या था, आने वाले सालों में व्यंग्य कार्टून के जरिये राजनीति से लेकर धर्म पर कार्टूनिस्ट टिप्पणी भी की जाने लगी। 1961 में भावना आहत करने के लिए पत्रिका पर प्रतिबंध लगा दिया गया। कुछ लोगों ने 1966 में इसको दुबारा शुरू किया और फिर 1969 में हाराकिरी पत्रिका का नाम बदल कर ‘हाराकिरी हेब्दो’ कर दिया गया और फिर से इसको प्रकाशित किया जाने लगा। 1970 में जब फ्रांस के पूर्व महानायक फ्रांसीसी राष्ट्रपति चार्ल्स द गॉल की एक अग्निकांड में दुखद मौत हो गयी, तो पत्रिका ने इस दुखद घटना के मीडिया कवरेज को कार्टून के जरिये मजाक बना दिया। इसके तुरंत बाद नाराज होकर फ्रांस के गृह मंत्रालय ने पत्रिका पर प्रतिबंध लगा दिया। 1970 की पाबंदी से बचने के लिए इसका नाम ‘शार्ली एब्डो’ रखा गया। ‘शार्ली’ दरअसल एक कार्टून करैक्टर है और फ्रांस की भाषा ‘एब्डो’ का मतलब होता है सप्ताह। यानी सप्ताह में एक बार निकलने वाली पत्रिका। 1981 में ग्राहकों की कमी के बाद पत्रिका को बंद भी करना पड़ा और 1992 में जब दोबारा पुराने लोगों ने पत्रिका शुरू की तो नाम वही रखा, ‘शार्ली एब्डो’, जो आज तक जारी है।

‘शार्ली एब्डो’ पर हुआ ताजा हमला कोई पहला हमला नहीं था। मगर यहां ये भी समझना जरूरी हो जाता है कि इससे पहले इतना बड़ा हमला कभी पेरिस में हुआ नहीं, जिसमें सीधे-सीधे दस कार्टूनिस्ट पत्रकारों की हत्या कर दी जाती है। क्या धार्मिक कट्टरपंथियों की ताकतें इस दुनिया के अंदर एक नयी सत्ता के अंदर तब्दील होती चली जा रही है? आज के इस दौर में पत्रकारों की हत्या कोई नयी बात नहीं है। बीते वर्ष इस्लामिक स्टेट ऑफ इराक एंड सीरिया (ISIS) ने भी बहुत से पत्रकारों की हत्या कर दी थी।

फ्रांस के राष्ट्रपति फ्रांस्वां ओलांद ने चेतावनी दी है कि फ्रांस पर चरमपंथी खतरा अभी खत्म नहीं हुआ है। उन्होंने लोगों से सतर्कता बरतने के लिए कहा है।

फ्रांस एक खुली सोच वाला देश है मगर धर्मनिरपेक्ष होते हुए भी हिजाब पहनने पर रोक है, क्योंकि इससे शरीर छुपता है। ये रोक सुरक्षा के लिहाज से लगायी गयी है। सुरक्षा के लिहाज से यहां सिख समुदाय की पगड़ी पर भी सवाल उठाये गये हैं। पेरिस पर्यटन के लिहाज से संसार भर में विख्यात शहर है, जहां हर पल फैशन बदलना दिनचर्या का हिस्साभर है। फ्रांस का समाज समलैंगिक रिश्तो के पक्ष में है। साथ ही फ्रांस सरकार की फौज इराक में ISIS से लड़ाई में सीधा सीधा लोहा भी ले रही है। तरीबन दो हजार युवा फ्रांसीसी फौज इराक में आज भी मौजूद है।

2012 में शार्ली एब्डो व्यंग्य पत्रिका ने हजरत मुहम्मद पर कार्टून की पूरी सीरीज प्रकाशित कर दी। फ्रांस के विदेश मंत्री ने जब इसकी आलोचना की, तो संपादक ने ये तर्क दिया कि जब हम सबका कार्टून बनाते हैं तो पैगंबर का क्यों नहीं और जब हम कार्टून बनाते हैं, तो इसको लेकर एक समुदाय इतना उत्तेजित क्यों हो जाता है? हम हर हफ्ते किसी न किसी का कार्टून बनाते ही हैं। दरअसल पैगंबर का कार्टून फ्रांस के लोगों के लिए उतना बड़ा मुद्दा नहीं था, जितना मुस्लिम कट्टरपंथियों के लिए था।

यहां से एक सवाल ये भी खड़ा होता है कि वाकई अगर कार्टून तीखा हो तो सत्ता उसके खिलाफ खड़ी हो जाती है। इराक और सीरिया में जो जेहादी लड़ने गये, उसमें सब से ज्‍यादा तादाद फ्रांस से ही है। क्या फ्रांस में गृहयुद्ध जैसे हालात पैदा हो गये हैं, क्योंकि फ्रांस में कभी इतना बड़ा हमला इससे पहले नहीं हुआ?

Rohit Dhyani
(रोहित ध्‍यानी। पत्रकार और इकोनॉमिस्ट। समय-समय पर अंतरराष्‍ट्रीय और राजनीतिक लेखन। समय मिलने पर उत्तराखंड चले जाते हैं और वहां की कहानियां जुटाते हैं। उनसे dhyani.rohit@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)

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