मैं हूं अकेली अलबेली, तू सहेली मेरी बन जा

♦ सैयद एस तौहीद

हिंदी सिनेमा का स्वर्णिम युग शक्ति सामंत की फिल्‍मों के बिना पूरा नहीं हो सकता। उनका यह विश्वास था कि ‘कथा’, ‘गीत-संगीत’ और ‘रुमानियत’ का फलसफा किसी फिल्म को हिट कराने में महत्‍वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। स्वर्ण युग की अनेक फिल्‍मों के सफल होने में यह अवधारणा काम कर गयी। शक्ति सामंत ने हमेशा सामाजिक नजरिये के साथ फिल्मों का निर्माण किया। शक्ति सामंत की पकड़ सामाजिक परिवेश में पैदा हुई कहानियों पर बहुत अच्छी तरह थी। यह कहना गलत नहीं होगा कि व्‍ही शांताराम और राज कपूर के नजरिये को शक्ति सामंत ने अपनी फिल्मों के जरिये जारी रखा। उन्‍होंने शक्ति फिल्‍म्‍स के बैनर तले अनेक यादगार फिल्‍मों का निर्माण किया। समाज में महिलाओं की स्थिति को बेहतर बनाने के लिए महिला किरदारों को केंद्र में रखा। अनुराग ऐसी ही फिल्म थी, जिसमें मौसमी चटर्जी थीं।

हिंदी सिनेमा में समर्पण व त्याग की कहानियां कम नहीं बनी, लेकिन शक्ति सामंत की फिल्म ‘अनुराग’ एक अलग तरह की भावुक कहानी थी। फिल्म अंधेपन से पीड़ि‍त लोगों के जीवन में ‘नेत्र दान’ का महत्‍व जाहिर करने में काफी सहयोगी प्रतीत होती है। अंधकार से रोशनी का सफर नये जीवन का सफर होता है। किसी की आंख जब बिल्कुल भी काम के लायक न रहे, उस हालत में किसी दानवीर से मिले दो नयन के आलावा कोई इलाज नहीं होता। जन्म से अंधेपन का शिकार आदमी इलाज की उम्मीद भी खो चुका होता है। जिंदगी बदलने का सपना कहीं पूरा होता नहीं नजर आता। लेकिन कहीं यह सपना पूरा होता हुए दिखे, तो वह ईश्‍वर के तोहफे की तरह लगता है। अनुराग ऐसी ही एक युवती के अंधकार से प्रकाश की ओर यात्रा की कहानी है।

शिल्पकारी व गायिकी को शख्सियत बना लेने वाली शिवानी आंखों से मजबूर है। अनाथ होने के कारण एक आश्रम में रहकर अपने दिन गुजारती है। उसका ज्यादातर समय बच्चों को पढ़ाने में गुजरता है। बच्‍चे और आश्रम के लोग उसे काफी पसंद करते हैं। नेत्रहीनता ने जीवन के प्रति उसके अनुराग को कम होने नहीं दिया है। उसकी शख्सियत में जीवन का एक मुश्किल किंतु मर्मस्पर्शी पहलू कहानी को दिशा देता है। नेत्रहीन युवती के किरदार में मौसमी काफी विश्वसनीय हैं। किरदार जिस समय व स्पेस में जी रहा है, उसमें उसके लिए अनुराग भाव हो जाता है। किरदार में एक आकर्षण का तत्व नैसर्गिक देन की तरह कहानी में रुचि बनाता है।

जीवन से अनुराग रखना क्या होता है? शिवानी की शख्सियत राजेश (विनोद मेहरा) को उसकी दुनिया से जोड़ती है। शहर में रहने वाले इस युवक में नैसर्गिक तत्वों को लेकर अनुराग है। शिवानी का अंधापन उसे उसकी ओर आने से रोक नहीं सका। कह सकते हैं कि उसे मन से मुहब्बत है। शिवानी के प्रति उसका समर्पण दो समानांतर शख्सियतों को पास ले आया। यह दोनों बाहर से अलग दुनिया के भले दिखाई दे रहे हों, लेकिन चित्त की समानता है। शिवानी के बेहतर कल को लेकर राजेश में एक जिम्मेदारी का भाव आता है। उसकी जिंदगी में रोशनी लाने को वह अपना मकसद बनाता है। वहीं शिवानी भी राजेश को लेकर एक अनुराग भाव बना बैठी है। लेकिन वो इस रिश्ते को लेकर थोड़ी असुरक्षित भी है। उसे एहसास है कि राजेश के धनवान पिता उन दोनों की मुहब्बत को स्वीकार नहीं करेंगे।

कहीं न कहीं शिवानी का डर वाजिब था, क्योंकि अमीरचंद (मदन पुरी) संतान की रुचि को महत्व नहीं देते। वो नहीं चाहते कि राजेश किसी नेत्रहीन युवती को अपनाये। शिवानी में अपनी जिंदगी देखने वाला राजेश पिता की तरह नहीं सोचता। वो मां को शिवानी के लिए मना भी लेता है। लेकिन पिता अब भी राजी नहीं। मन से जुड़े दो लोगों को एक साथ लाने की एक पहल अमीरचंद के मित्र मिस्टर राय (अशोक कुमार) की भलमनसाहत में देखी जा सकती है। वो शिवानी के इलाज का खर्च उठाने को राजी हैं। लेकिन किसी से मिले नेत्रदान के बिना वो कहां मुमकिन था?

आश्रम में रहने वाला एक बालक शिवानी के इलाज का एक मर्मस्पर्शी सूत्र बनता है। आश्रम में रहने वाला चंदन (मास्टर सत्यजित) कैंसर की जानलेवा बीमारी से जूझ रहा है। शिवानी और चंदन की जिंदगियां एक दूसरे के मर्म में करीब की हो जाती हैं। साझे दुख में ढली हुई। चंदन की दुनिया में शिवानी की तरह फिक्र करने वाले कम लोग हैं। वहीं शिवानी को चंदन-राजेश-मिस्टर राय में अच्‍छा-भला समाज मिला हुआ है। लेकिन वो चंदन की तरह देख नहीं सकती। चंदन के मन में अपनी दीदी के लिए खास अनुराग था। राजेश-शिवानी को साथ लाने के लिए एक त्याग-समर्पण की जरूरत थी। इलाज न हो पाने के कारण चंदन अल्पायु में ही दुनिया से चला जाता है। एक लाइलाज बीमारी से पीड़ित चंदन में ऐसे लोगों का दर्द झलकता देखा जा सकता है। जाते हुए शिवानी को अपनी आंखें दे गया। मर कर भी किसी अपने में जिंदा रहना इसी को कहते हैं। फिल्म का यह भावुक मोड़ था… दो जिंदगियां बिछड़ कर भी एक दूसरे के साथ थी। अब शिवानी दुनिया देख सकती थी। गुजरे दिनों की ओर मुड़कर वह प्यारे चंदन की खोज में आश्रम आयी… लेकिन अब वो यहां नहीं रहता था। खुदा की दूसरी दुनिया का बाशिंदा हो चुका था। शिवानी को जल्द ही मालूम हो गया कि उसे रोशनी देने वाला, खुशी देने वाला चंदन ही था।

Saiyad S Tauheed
(सैयद एस तौहीद। जामिया मिल्लिया से स्नातक। सिनेमा केंद्रित पब्लिक फोरम की लोकप्रिय साईट से लेखन की शुरुआत। आजकल सिनेमा व संस्कृति विशेषकर हिंदी फिल्मों पर लेखन। उनसे passion4pearl@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)

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