चले गये “कलारिन के छछान छाड़ू” चेतराम!

♦ मुन्‍ना वसुधा नंद पांडेय

नया साल एक बहुत ही दुखद खबर के साथ शुरू हुआ है। बेमिसाल और बाकमाल अभिनेता चेतराम यादव का नौ जनवरी की सुबह देहांत हो गया। नया थिएटर के वरिष्ठ अभिनेता चेतराम, भूलवाराम यादव के पुत्र थे। चरनदास चोर में उन्होंने सिपाही, चोर, प्रहरी इत्यादि कई भूमिकाएं निभायी थी। मंच पर उनकी स्‍फूर्ति लाजवाब थी। ‘आगरा बाजार’ में लड्डू वाले ‘जिस लाहौर…’ में तांगेवाला, ‘राजरक्त’ में जय सिंह, ‘देख रहे नैन’ में विराट के भाई, ‘कामदेव का सपना…’ में बाटम, ‘जमादारिन’ में जमादारिन इत्यादि कई भूमिकाएं निभायी थीं। अभिनेता के तौर पर नया थिएटर में उन्होंने गोविंदराम निर्मलकर की भूमिकाएं की लेकिन उसे एक अलग अंदाज दिया। पिता भूलवाराम यादव से गायन की प्रतिभा भी विरासत में मिली थी। अभी अभिनय और रंगमंच को लेकर उनमें ऊर्जा और जोश बरकरार था लेकिन काल के ग्रास ने बासठ साल की उम्र में ही भारतीय रंगमंच से अभिनेता को छीन लिया। चेतराम को श्रद्धांजलि: अमितेश, रंग समीक्षक

मिलना छ्छान से

मुझे ठीक ठीक याद है कि दिसंबर की सर्दियां जोरों पर थी और दिल्ली विश्वविद्यालय के श्रीगुरु तेग बहादुर खालसा कॉलेज में हबीब तनवीर के नया थिएटर का ‘चरणदास चोर’ होना था। समय से आधे घंटे पहले ही मैं वहां हाजिर हो गया था। इस प्रस्तुति को देखने की मंशा इसलिए भी थी कि हबीब साहब बीमार होने के बावजूद आये हुए थे। मुझे उनका इंटरव्यू लेना था। नाटक हुआ, हबीब साहब और जावेद मलिक सर से बातें भी हुईं और फिर बारी आयी कलाकार चोर बने चेतराम की। चेतराम से परिचय पुराना (रामजस कॉलेज के समय से ‘जिन लाहौर नई वेख्या’ और ‘आगरा बाजार’ वाला) था, पर आत्मीयता के बीज यहीं से पड़ने शुरू हुए। फिर अगले दिन मिरांडा हाउस में ‘राजरक्त’ की प्रस्तुति और तैयारी के मध्य चेतराम से काफी गुफ्तगू होती रही। चेतराम से बातचीत इसलिए भी जरूरी थी, क्योंकि उन दिनों मैं हबीब साहब के ही एक कम प्रदर्शित किंतु ख्यात नाटक ‘बहादुर कलारिन’ पर एमफिल का लघु शोध प्रबंध लिख रहा था। चेतराम ने ही अपने शुरुआती दिनों में ‘बहादुर कलारिन’ में बहादुर (फिदाबाई) के बेटे छछान छाडू की भूमिका निभायी थी। बहरहाल, चेतराम से बन रहे इस संबंध ने यहीं तक अपना असर नहीं रखा बल्कि यह नींव थी एक आत्मीयता के बनते जाने की, जिसके आगे और भी सुफल आने बाकी थे। चेतराम से लगातार भोपाल, लखनऊ, मुंबई के पृथ्वी थिएटर फेस्टिवल, दिल्ली की विभिन्न जगहों, सभागारों, थिएटर उत्सवों आदि में मुलाकातें होती रही। नया थिएटर अपना लगता ही था, अब और अपना लगने लगा था। चेतराम से मिलने-जुलने के बीच हबीब साहब गुजर चुके थे और नया थिएटर नगीन तनवीर और रामचंद्र सिंह के नेतृत्व में पुनः ढांचागत आकार लेने की ओर अग्रसर था। इसी समय नया थिएटर प्रबंधन से इस वरिष्ठ कलाकार ने किसी बात पर नाता तोड़ लिया और अपने गांव रिंगनी चले गये।

एक कहानी इधर भी

Chetram Yadav with Munna Kumar Pandey
चेतराम यादव के साथ लेखक मुन्‍ना वसुधा नंद पांडेय

लेकिन मंच का कीड़ा किसी कलाकार को कहां जीने देता है। उन्हीं दिनों तहलका में नया थिएटर पर एक लेख छपा, जिसमें चेतराम का जिक्र था। मुझे भी चेतराम से बतियाये लगभग एक साल हो गया था। चेतराम से बात हुई तो पता चला कि उनकी हालत भी थिएटर छोड़कर कुछ ठीक नहीं है। मैंने तब अपने कॉलेज में ड्रामा सोसाइटी का काम नया-नया देखना शुरू ही किया था। सत्यवती कॉलेज (प्रातः) में सभागार तो शानदार है, पर तब वहां सुबह के छात्र अभ्यास नहीं किया करते थे। डॉ शम्सुल इस्लाम और डॉ कविता राजन के सहयोग से मैंने वहां ‘चरनदास चोर’ करने का प्लान बनाया और चेतराम यादव को बीसेक दिनों के लिए दिल्ली बुला लिया। नाटक हुआ, नाटक में नाटक हुआ (इसकी कहानी फिर कभी), पर शो हुआ जबरदस्त। चेतराम यादव की कॉलेज में प्रसिद्धि का आलम यह हुआ कि कॉलेज के आर्ट एंड कल्चर के संयोजक डॉ मुकेश मानस ने एक कलाकार से बातचीत कार्यक्रम रख दिया। सत्यवती कॉलेज (प्रातः) की ड्रामा सोसाइटी आज जिस मंच का उपयोग बेहिचक कर रही है, उस पर सबसे पहले चेतराम द्वारा निर्देशित नाटक ‘चरनदास चोर’ ही खेला गया था।

जिद्दी, मुंहफट पर बेमिसाल कलाकार

रेणु ने सिरचन को सिरजा ‘ठेस’ कहानी में। हबीब साहब ने चेतराम को गढ़ा। नया थिएटर का कोई भी सदस्य ऐसा नहीं है, जो इस बात को नहीं स्वीकारे कि चेतराम जिद्दी, बेलौस, मुंहफट, अलां-फलां पता नहीं क्या-क्या थे। पर इतना है कि सभी एक मन से इस बात को भी मानते थे कि चेतराम बाहर के लफड़े/मतभेद भूल कर मंच पर जादू करता है। वह भुलवाराम, गोविंद राम निर्मलकर आदि की कमी को आजकल पूरा कर रहा है। सितंबर 2011 के दिल्ली में मेरे घर पर बिताये बीसेक दिनों में इस जिद्दी और पता नहीं क्या-क्या कहे जाने वाले कलाकार को मैंने और नजदीक से जाना। एक हाफ रम की बोतल और सेर भर भात दाल के साथ चेतराम ने नया थिएटर और अपने घर-परिवार के तमाम किस्से कहे। बीड़ियों के कई बंडल उन कहानियों के साथ, उस संगत के साथ ढेर हुए। चेतराम में जिद के अलावा जो अधिक कमाल की बात थी कि उस आदमी में गजब का आत्मविश्वास था। मुझे याद है हबीब साहब के बाद नया थिएटर प्रबंधन से नाराजगी के दौर में उन्होंने मुझसे कहा, “देख मुन्ना तू छोटा भाई है। मैंने हबीब साहब के कारण अपनी पहचान बनायी, मेरे बाप ने पहचान बनायी। लेकिन आत्मसम्मान की कीमत पर मैं नहीं जियूंगा और देखना यही थिएटर मुझे बुलाएगा एक दिन। क्योंकि वह जानते हैं, मैं अच्छा कलाकार हूं मेरी गायकी भी अच्छी है। लोग मुझे पहचानते हैं।” मैं चुपचाप सुनता रहा। चेतराम सो गये, नया थिएटर चलता रहा। शराब के चढ़ने के बावजूद मुझे याद है कि चेतराम यादव ने हबीब साहब के लिए कभी कुछ ऐसा वैसा नहीं कहा। लेकिन यही बात मैं बाकी सदस्यों के लिए नहीं कह सकता।

उस दौर में 20 दिन मेरे ही घर पर चेतराम से उनके कलाकार जीवन और हबीब साहब पर खूब बातें हुई। सहमति असहमति का लंबा दौर भी गुजरा। मानव संग्रहालय भोपाल में सुरता हबीब में ‘चरनदास चोर’ होना था और शो के ऐन पहले अमितेश, मैं और चेतराम मोटरसाईकल दुर्घटना से बड़ी मुश्किल से बचे थे। यह बात केवल हम तीनों ही जानते हैं कि जिस शो को लोगों की इतनी वाहवाही मिली, उसके दूसरे बेल के बजने तक मुख्य अभिनेता कहां था और किस हालत का शिकार होने वाला था – किसी को नहीं पता था। बहरहाल, आज चेतराम हमारे बीच नहीं हैं, उनकी यादें हैं। मिरांडा, खालसा, कमानी, श्रीराम सेंटर, बाल भवन, जेएनयू, मुंबई, भोपाल आदि और दिल्ली के रंगकेंद्रों पर चेतराम की संगत है।

ओह! तुम बहुत याद आओगे कलारिन के छछान छाड़ू

चोर चरनदास, हिरमा, राजरक्त के जयसिंह, जमादारिन के जमादारिन, जिस लाहौर… के तांगेवाला, आगरा बाजार का लड्डू वाला, कामदेव का बाटम और क्या कहूं… तुम जैसे भी जहां भी रहे तुम्हारी बचपने वाली जिद और ओल्ड मोंक की दीवानगी याद रहेगी। यूरोप और पश्चिमी देशों में शो के बाद की अपनी करामात को थोड़ा शरमाते हुए बताते चेतराम झेंप जाते थे। आज तुम चले गये दोस्त, अब तुम मध्य भारत से दिल्ली की ओर रवाना होने से पहले मुझसे नहीं कह सकोगे कि सुन! ओल्ड मोंक फुल चाहिए आते ही, वरना स्टेज पर नहीं चढ़ूंगा। याद से आ जाना। ऋचा, अमितेश को भी ले आना। तुमसे लड़ाई हुई, प्यार हुआ, झिड़कियां पायीं, झिड़कियां दी। सलाम दोस्त। तुम्हारी याद दिल में हमेशा रहेगी।

[आलेख-तस्‍वीर: रंग-विमर्श से कॉपी-पेस्‍ट]

Munna Vasudha Nand Pandey
मुन्‍ना वसुधा नंद पांडेय। भोजपुरी सिनेमा के गंभीर अध्‍येता। भिखारी ठाकुर के नाटकों का संस्कृतिमूलक अध्ययन विषय पर शोध। फिलहाल सत्‍यवती कॉलेज, दिल्‍ली में प्राध्‍यापक। जन्‍नत टॉकीज नाम का ब्‍लॉग। उनसे makpandeydu@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।

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