एमजे अकबर के अधोपतन को यहां से देखें

मुकेश कुमार

क अच्छा खासा पत्रकार और लेखक सिर्फ सत्ता प्रतिष्ठान का अंग बनने के प्रलोभन में किस तरह प्रतिक्रियावादी हो जाता है, इसकी मिसाल हैं एमजे अकबर। दस जनवरी के टाइम्स ऑफ इंडिया में उनका लेख इसे साबित करता है। उन्होंने इस्लामी पुनरुत्थानवाद को आटोमन और मुगल साम्राज्य से जोड़ कर प्रस्तुत किया है, लेकिन कहीं भी जिक्र नहीं किया है कि तमाम पुनरुत्थानवादी शक्तियां दरअसल ऐसे ही कथित गौरवशाली अतीत को वर्तमान में तब्दील करने की कोशिश करके नफरत और हिंसा का अभियान चलाती हैं।

उनकी पार्टी और विशाल संघ परिवार भी जिस अखंड भारत, राम राज और सोने की चिड़िया की बात करता है, वह भी दरअसल, इसी सोच और भावना से प्रेरित है। आईएस के खलीफत की तरह वह भी पाकिस्तान तथा अफगानिस्तान तक दावा ठोंकता है और उसी हिसाब से विस्तार की कामना करते हुए अपने कार्यकर्ताओं को सक्रिय करता है। यही हाल ईसाईयत का है और अन्य धर्मों तथा संस्कृति को मानने वालों के वर्ग का भी।

अफसोस कि अकबर ये भी देखने में चूक गये कि कट्टरपंथी इस्लाम के उभार में अमेरिका, सऊदी अरब और उनके तमाम मित्र देशों की क्या भूमिका है। उन्हें सबसे पहले कट्टरपंथी विचारों, हथियारों और धन-धान्य से जिन्होंने लैस किया, उन्हें कैसे नजरअंदाज किया जा सकता है। ये पूरा रायता सोवियत संघ को नेस्तनाबूद करने और पेट्रोलियम पदार्थों पर अपना नियंत्रण कायम करने के लिए किया गया। अगर अकबर इस अंतरराष्ट्रीय राजनीति (जिसमें अर्थनीति एवं सामरिक लक्ष्य भी शामिल हैं) पर गौर किया होता, तो इतनी हल्की टिप्पणी नहीं करते, लेकिन वे अब एक दूसरे नजरिये से लैस हैं। हो सकता है ये लेख हमें आपको नहीं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पढ़ाने के लिए लिखा गया हो, ताकि वे प्रसन्न होकर कुछ बख्शीश आदि बख्श दें।

अगर समग्रता में एमजे इसे देखते, तो वे ऐसा तंग नजरिया नहीं अपनाते। यदि उन्होंने ये लेख बीजेपी के प्रवक्ता तौर पर लिखा है, तो उन्हें स्पष्ट रूप से पहले ही कह देना चाहिए था और इस आधार पर उन्हें माफ किया जा सकता था, क्योंकि वे तो पार्टी के कार्यकर्ता की जिम्मेदारी निभा रहे थे। लेकिन बतौर लेखक ये लेख उन्हें संदिग्ध बनाता है, उनकी समझ पर प्रश्नचिन्ह लगाता है।

Barbarians of the faith: They are at the gates of both Peshawar and Paris

Another barbaric chapter of an epic conflict between the presence and promise of modernity, and the bitter, toxic romance of regression was written on January 7 in Paris.
This war, raging across the world, is a confrontation between the lethal adrenalin of faith supremacy and belief that faith equality is the basis of civilised political and social stability. The epicentre of this war is within the Muslim successor states of the Mughal and Ottoman empires; but its destructive reach extends far beyond its immediate habitat.

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