नये नये रंगों में ढलती चली गयी हिंदी

➧ अरविंद कुमार

न्‍नीसवीं सदी आधुनिक हिंदी की तैयारी की सदी थी। उस के पहले दशक में इंशा अल्‍लाह ख़ां ने रानी केतकी की कहानी (1803) लिखी (जिसमें हिंदवी छुट किसी और बोली का पुट न मिले)। और अस्‍सी आदि दशक के अंत में रैवरेंड न्‍यूटन ने एक ज़मींदार कहानी (1887) लिखी। इन दोनों के बीच स्‍वामी दयानंद (1821-1883) ने समाज सुधार आंदोलन में हिंदी को माध्‍यम बनाया और भारतेंदु हरिशचंद (1850-1885) ने उसे परंपरा से जुड़ी नयी सांस्‍कृतिक भूमि दी।

बीसवीं सदी ने हिंदी का चतुर्दिक विकास देखा। महात्‍मा गांधी (1869-1948) के नेतृत्‍व में हिंदी राजनीतिक संवाद की भाषा और जनता की पुकार बनी। पत्रकारों ने इसे मांजा, साहित्‍यकारों ने संवारा। उन दिनों सभी भाषाओं में अख़बारों में तार द्वारा और टैलिप्रिंटर पर दुनिया भर के समाचार अंगरेजी में आते थे। इन में होती थी एक नये, और कई बार अपरिचित, विश्‍व की अनजान अनोखी तकनीकी, राजनीतिक, सांस्‍कृतिक शब्‍दावली जिस का अनुवाद तत्‍काल किया जाना होता था ताकि सुबह सबेरे पाठकों तक पहुंच सके। कई दशक तक हज़ारों अनाम पत्रकारों ने इस चुनौती को झेला और हिंदी की शब्‍द संपदा को नया रंगरूप देने का महान काम कर दिखाया। पत्रकारों ने ही हिंदी की वर्तनी को एकरूप करने के प्रयास किये। तीसादि दशक में फ़िल्‍मों को आवाज़ मिली। बोलपट का टाकी मूवी का युग शुरू हुआ। अब फ़िल्‍मों ने हिंदी को देश के कोने कोने में और देश के बाहर भी फैलाया। संसार भर में भारतीयों को जोड़े रखने का काम बीसवीं सदी में सुधारकों, स्‍वतंत्रता सेनानियों, पत्रकारों, साहित्‍यकारों और फिल्‍मकारों ने बड़ी ख़ूबी से किया।

मध्‍ययुगीन भावभूमि में पनपी, अंगरेजी से आक्रांत शासन और शिक्षा प्रणाली से दबी भाषा को बड़ी छलांग लगा कर संसार की आधुनिकतम भाषाओं के समकक्ष आना था। बीसवीं सदी में ही हिंदी वालों ने आधुनिक कोशकारिता में क़दम बढ़ाये। सदी के पूर्वार्ध में हिंदी साहित्‍य सम्‍मेलन और काशी नगरी प्रचारिणी सभा जैसे संस्‍थानों ने हिंदी के विशाल कोश बनवाये। 1947 में स्‍वाधीनता के साथ ही विकास का नया युग आरंभ हुआ। सदी के उत्तरार्ध के क़दम रखते ही 26 जनवरी 1950 को भारत का संविधान लागू हुआ और हिंदी को भारत की राजभाषा का दर्ज़ा प्राप्‍त हुआ। एक दो वर्ष बाद ही ज्ञानमंडल वाराणसी ने बृहत हिंदी कोश प्रकाशित किया, जो तभी से अपने तमाम नये संस्‍करणों के साथ अब तक हिंदी हिज्‍जों का मानक कोश बना हुआ है।

पंडित नेहरू (1889-1964) और मौलाना आज़ाद (1888-1958) ने नयी हिंदी शब्‍दावली के विकास के लिए अनेक तरह के आयोग गठित किये। अनेक कोशकारों को अनुदान दिये गये। इस प्रकार हमारी हिंदी खुले मैदानों की जन सभाओं में, सिनेमाघरों में, विद्यालयों के प्रांगणों में, विश्‍व साहित्‍य से प्रेरित मनों में, अनुवादों में, स्‍वतंत्र रचनाओं में और दफ़्तरों की मेज़ों तक पर बनती संवरती रही।

Arvind Kumar
अरविंद कुमार। पत्रकार और भाषाविज्ञानी। फिल्म पत्रिका माधुरी और सर्वोत्तम (रीडर्स डाइजेस्ट का हिंदी संस्करण) के पहले संपादक। पत्नी कुसुम कुमार के साथ हिंदी के पहले समांतर कोश (थिसॉरस) के निर्माण के लिए मशहूर। द्विभाषी थिसारस (इंग्लिश-हिंदी/हिंदी-इंग्लिश थिसॉरस एंड डिक्शनरी) पेंग्विन से प्रकाशित। उनसे samantarkosh@yahoo.com पर संपर्क करें।

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