मदरसों की अपनी कम्युनल पॉलीटिक्स है

बिहार में मुस्लिम राजनीति पर सेमिनार

♦ अरुण नारायण

बिहार में मुस्लिम राजनीति को लेकर हमने अपने फेसबुक पर एक चर्चा छेड़ी कि गैर मुस्लिम उनकी राजनीति को लेकर क्या सोचते हैं? इस पर जो प्रतिक्रिया आयी, वे तीन तरह की थीं – पहली प्रतिक्रिया थी कि मुसलमान एक नहीं हैं, इस कारण उनकी यह दुर्दशा है। दूसरी तरह की प्रतिक्रिया में यह बात कही गयी कि मुसलमान एक नहीं हो सकते, वे अलग-अलग समूहों में बंटे है, उनका बुद्धिजीवी तपका खुदगर्ज है, जिसके कारण उनकी यह दशा हुई है। तीसरी तरह की प्रतिक्रिया में एक ने लिखा कि मुझे इसमें आने की जरूरत क्या है? पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता इर्शादुल हक ने जगजीवन राम संसदीय अध्ययन एवं शोध संस्थान में आयोजित संगोष्ठी ‘बिहार में मुस्लिम राजनीति’ में बोलते हुए अपने इस सर्वे का हवाला दिया।

इर्शादुल हक ने कहा कि ये उक्त प्रतिक्रियाएं स्वतः बहुत कुछ स्पष्ट कर देती हैं कि मुस्लिम राजनीति को लेकर हमारे समाज की सोच क्या है? वर्ष 2014 के चुनाव की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि जिस तरह से सांप्रदायिक शक्तियां इस जनादेश के फलस्वरूप सत्तासीन हुई हैं, वह भयावह खतरे से भरे भविष्य का संकेत है। देर-सबेर इसका परिणाम देश को भुगतना ही होगा। महाराष्ट्र में राज ठाकरे खत्म हो गये, लेकिन वहां भाजपा और मजरिम से इस्तेहादी मुजियमी जैसे हिंदुत्व और इस्लाम के अंदर से दो तरह की सांप्रदायिक शक्तियों का प्रभाव बढ़ा है। उन्होंने कहा कि मजलिसे इस्तेहादी मुस्लिम बिहार और उत्तर प्रदेश में अपने आधार के विस्तार में लगी है, यह निश्चय ही आने वाले भविष्य की एक बहुत बड़ी चुनौती है। इर्शादुल हक ने माना कि पावर में आने के बाद मुस्लिम समुदाय का नेतृत्वकारी तबका हमेशा अपने मूल सरोकार से भटका है। यह अकारण नहीं कि सशक्तीकरण नेता का हुआ, उन्हें पावर मिल गये, पैसे मिल गये, लेकिन कौम का कोई भला नहीं हुआ। उन्होंने नीतीश सरकार की चर्चा की। कहा उनकी सरकार कमजोर थी, भाजपा की मदद से बनी थी इसलिए उनके मंत्रिमंडल में बहुत कम मुसलमान नजर आते हैं लेकिन जब उन्होंने पंचायत चुनाव में अत्यंत पिछड़े वर्गो के लिए आरक्षण को कार्यान्वित किया, तो इसका सबसे ज्यादा फायदा मुस्लिम समाज को पहुंचा। उनके अंदर एक बड़ी लीडरशिप मुखिया व सरपंच के रूप में उभरी। उन्होंने कहा कि छोटे ओवैसी इसलिए हिंदुओं के विरुद्ध बोलते हैं, ताकि उन्हें मुसलमानों का एकमुश्त वोट मिल जाए।

इर्शादुल ने मुस्लिम राजनीति में हिस्सेदारी के सवाल पर अलग-अलग दौर में हुए संगठनात्मक प्रयासों के पीछे छिपी नीतियों को खास तौर से अपने वक्तव्य में उभारा। 1990 के दशक की चर्चा करते हुए उन्होंने बतलाया कि एक प्रयोग इस दशक में अली अनवर, एजाज अहमद आदि नेताओं के नेतृत्व में हुआ, जिसमें हाशिये की मुस्लिम आबादी का सवाल मुख्य था, लेकिन वह प्रयोग किसी वजह से विफल हो गया। इसका असर यह जरूर हुआ कि अली अनवर साहब सांसद हो गये, लेकिन मुसलमानों की हैसियत क्या हुई? फारबिसगंज जैसी जघन्‍यतम घटना होती है, लेकिन अंसारियों की आवाज मुखर करने वाले इस पर मौन रहते हैं।

इर्शादुल ने कहा कि यह बड़ा खतरा है और विडंबनापूर्ण स्थिति भी कि आप सत्ता का हिस्सा होते हैं, तो लाचार होते है और सत्ता से बाहर होते हैं तो शहंशाह होते है। इर्शादुल ने 1940 के दशक की बिहार की मुस्लिम राजनीति और उसमें अब्दुल कयूम अंसारी के योगदान को फोकस करते हुए बतलाया कि उन्होंने बिहार के डेहरी ऑन सोन जैसे इलाके में 1925-30 की अवधि में जब मोमिन कांफ्रेंस किया, तो मुसलमानों द्वारा उन्हें तिरस्कार और अपमान मिला। वे दर-दर भटके, लेकिन 1946 के चुनाव में यही संगठन 6 सीटें हासिल करता है, लेकिन वह कांग्रेस में शामिल हो जाते हैं। दरअसल इसके अंत की शुरुआत भी यहीं से शुरू हो गयी। वे बाइलॉज में अपनी पहचान को खत्म करने की घोषणा करते हैं, मोमीन मुस्लिम लीग का ओकूपाय था, अपनी पहचान को बचाये रखने के लिए यह अस्तित्व में आयी थी। मोमिन शब्द के साथ इसके साथ ही बहुत बड़ी धोखेबाजी हुई।

इर्शादुल ने कहा कि अब्दुल कयूम कोई प्रोफेट नहीं, जिनकी कोई बात मान ली जाए। उन्होंने कहा कि 1955 की पिछड़े वर्ग के आयोग के कालेलकर कमिटी में अब्दुल कयूम अंसारी भी शामिल नहीं थे। लेकिन मुंगेरी लाल कमीशन में जब कयूम साहब होते हैं, तो मोमीन जुलाहा हो जाता है।

इर्शादुल ने कहा कि अब्दुल कयूम कोई प्रोफेट नहीं, जिनकी कोई बात मान ली जाए। उन्होंने कहा कि 1955 की पिछड़े वर्ग के आयोग के कालेलकर कमिटी में अब्दुल कयूम अंसारी भी शामिल थे, लेकिन वहां भी मोमिन शब्द कहीं नहीं है। उन्होंने कहा कि मुंगेरी लाल कमीशन में जब कयूम साहब होते हैं, तो मोमीन जुलाहा हो जाता है।

इर्शादुल ने हिंदू और मुस्लिम, दोनो कौमों में बढ़ती सांप्रदायिकता, मुस्लिम समाज में नेतृत्वकारी वर्ग की खुदगर्जी और बिहार में विभिन्न दशकों में विकसित हुए सामाजिक राजनीतिक पेचोंखम को अपने वक्तव्य में खासतौर से रेखांकित किया।

Patna Semina 1

गांधीवादी विद्वान और गांधी संग्रहालय के सचिव रजी अहमद ने तल्‍ख सवालातों से भरे तीखे तेवर में मुस्लिम राजनीति और इस समुदाय के प्रति हिंदुत्ववादियों के द्वारा पाक विभाजन व अन्य चीजों के लिए जवाबदेह ठहराये जाने की मानसिकता पर गहरा चोट किया। रजी अहमद ने नरेंद्र मोदी पर प्रतीकरात्मक निशाना साधते हुए कहा कि जहां राजधर्म समझाने की सलाह दी जाती हो, वहां ओवैसी तो पैदा होंगे ही। उन्होंने स्पष्ट कहा कि वोट देता हूं, लेकिन आरक्षण के खिलाफ हूं, उन्होंने प्रश्न उठाये कि रिजर्वेशन की जिन लोगों ने पौलीटिक्स की है, उसका फायदा किसको मिला? रजी अहमद ने विभाजन की चर्चा करते हुए कहा कि उसके लिए जितना जवाबदेह जिन्ना हैं, उतना ही नेहरू, पटेल और आंबेडकर भी हैं। रजी अहमद ने बिहार आंदोलन और कर्पूरी ठाकुर के योगदान की भी चर्चा की। कहा कि कर्पूरी ठाकुर के समय में माइनोरिटी कमीशन बनाया गया, लेकिन सच तो यह था कि वाइस चेयरमैन को भी कोई पावर नहीं थी। उसका मैं भी एक सदस्य था। तकी साहब ने इसके लिए कर्पूरी जी को खरी-खोटी सुनायी तो उन्होंने कहा चेयरमैन बना दिया। इस पर तकी साहब ने जवाब दिया एहसान किया? हमने तुमको सीएम बना दिया। इस पर कर्पूरी जी चुप हो गये। रजी अहमद ने कहा कि देश में जिस तरह की विषमता है, समय रहते उसका हल नहीं निकाला गया तो इस देश में सैकड़ो ओवैसी पैदा होंगे।

सांसद अली अनवर ने विषय के शीर्षक पर सवाल खड़ा करते हुए कहा कि उन्‍वान ठीक नहीं। मुसलमान बिहार ही नहीं पूरे मुल्क और वैश्विक राजनीति में कहां खड़े हैं, यह सवाल आज हमारे सामने नुकीले ढंग से खड़ा है। उन्होंने ओवैसी पर निशाना साधते हुए कहा कि ओवैसी ब्रदर पूरे मुल्क को पुराना हैदराबाद सिटी समझते हैं, उनकी इस तरह की बातें समाज को बांटने वाली है, उसको एहतीयात बरतनी चाहिए। अली अनवर ने सवाल खड़े किये कि मुसलमानों को अपनी कोई अलग राजनीति बनानी चाहिए या नहीं? और कहा कि मेरी अपनी समझ में मुसलमानों को कोई पार्टी नहीं बनानी चाहिए। दलित पार्टी बना सकते हैं। जो कमजोर है, पसमांदा हैं वे पार्टी बनाएं तो दूसरे धर्मों के ऐसे ही लोगों के साथ, तब यह एक सार्थक उद्देश्य को पूरा कर सकती है। उन्होंने कहा कि गैर हिंदुओं में एक-एक जातिआधरित पार्टिया हैं। उन्होंने कहा कि अगर अति पिछड़े हिंदुओं में यह समझदारी बन जाए, उनका मुसलमानों के साथ एक बराबरी का रिश्ता कायम हो जाए, तो वे पार्टी बना सकते हैं। उन्होंने कहा कि आज की एक त्रासदी यह भी है कि जब तक आप पार्टी नहीं बनाते, कोई बात सुनता नहीं। अली अनवर ने अब्दुल कयूम अंसारी के योगदान की चर्चा की। कहा कुछ तो सोचा होगा उन्होंने, तभी मोमीन फ्रंट को भंग किया होगा। अली अनवर ने कहा कि मुंगेरी लाल कमीशन बनाने में अब्दुल कयूम अंसारी का बहुत बड़ा रौल रहा। उन्होंने मोमिनों को एनेक्स्चर 2 में रखा और उनसे कमजोर कई बिरादरियों मसलन मंसूरी आदि को एनेक्स्चर 1 में रखवाया। धर्मांतरण की चर्चा करते हुए अली अनवर ने कहा कि गरीब आदमी जल्दी धर्मांतरण नहीं करता और न ही जल्दी दल बदलता है। उन्होंने कहा कि हिंदू और मुस्लिम दोनों की संप्रदायिकता एक दूसरे की पूरक है।

प्रोफेसर मुहम्‍मद सज्जाद ने कहा, मुस्लिम समाज की राजनीति और उससे जुड़े बहुत सारे पूर्वग्रहों व सरलीकरणों के धुंधलके को खंगाला। उन्होंने संगोष्ठी में पैदा हुए सवाल कि तोगड़िया है, तो ओवैसी पैदा होगा – इस सवाल के मुठभेड़ से ही अपनी बातें आगे बढ़ाये। उन्‍होंने कहा कि इसी तरह के तर्को को नरेंद्र मोदी ने 2002 में आगे बढ़ाया था, जो कहीं से भी उचित नहीं। खुद की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि हम फारवर्ड क्लास से आते हैं, जाहिर है इस वजह से भी हाशिये की आबादी के प्रति हममें एक तरह का जातीय पूर्वग्रह काम करता है। मनोवैज्ञानिक पीड़ा क्या होती है, यह बात मैंने बिहार से बाहर रहकर बिहारियों के प्रति गैर बिहारियों द्वारा बरती जा रही व्यावहारिकता में झेली है। मुहम्मद सज्‍जाद ने भी विभाजन का जिक्र करते हुए उसके लिए मुसलमानों को दोषी बनाये जाने की मानसिकता पर चोट की। उन्होंने कहा कि टाटा इंस्टीच्यूट के कुछ साथियों ने ओवैसी को अपने यहां बुलाया। इसमें उनका तर्क हिंदू सांप्रदायिकता के विरुद्ध गोलबंदी से जुड़ा था। प्रोफेसर सज्जाद ने कहा कि इस तरह सांप्रदायिकता को आप खत्म नहीं कर सकते।

प्रोफेसर सज्जाद ने सवाल उठाया कि जाति आधारित मुस्लिम पाटियां आखिर इस जातिगत खाने से बाहर कब निकलेंगी? सामाजिक न्याय की राजनीति की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि सत्ता में आते ही पावर मिलते ही इन पाटियों ने कई सारे सवालों को नजरंदाज किया। उनको यह अंदाजा ही नहीं था कि इस वर्ग के अंदर एक मिडल क्लास पैदा हुआ है, जिसे ज्यादा दिन तक छलावे में नहीं रखा जा सकता़। वे यह भूल ही गये कि इस नये मध्यवर्ग को बिजली, स्वास्थ्य और पानी भी चाहिए। प्रोफेसर सज्जाद ने राजदीप सरदेसाई की लोकसभा चुनाव पर लिखी पुस्तक चर्चा की। कहा कि इसमें इस संदर्भ में बहुत सारी इन-साइड्स की बात है। झूठा या सच्चा, लोगों को उसमें उम्मीद तो दिखा? सामाजिक न्याय की सियासत करने वाले गर्वनेंस को क्यों भूल गये। प्रोफेसर सज्जाद ने उत्तर प्रदेश की वर्तमान सियासी राजनीति पर टिप्पणी करते हुए कहा कि हमने सत्ता दी दद्दा को, दद्दा ने दे दी लल्ला को और लल्ला ने मुल्ला को। उन्होंने कहा कि उत्तरप्रदेश में अखिलेश बहुत खराब प्रशासन चला रहे हैं। उन्होंने कहा कि आज किसी भी रियासत करने वाली पार्टी को गुड गवर्नेस और विकास की बात करनी ही होगी। सोशल डाइनेमिक्स को समझे बगैर आज राजनीति संभव नहीं है। उन्होंने कहा कि मध्य प्रदेश में पसमादा आंदोलन ने बहुत सारे शैक्षिक संस्थान, कॉलेज खोले, उनके बीच कौशल विकास के काम किये। मदरसे की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि मदरसे की भी अपनी एक कम्युनल पौलीटिक्स है। यह राजनीति तभी हो रही है, जब हर वर्ग के अंदर से एक मध्य वर्ग पैदा हुए हैं।

प्रोफेसर अशोक अंशुमन ने कहा कि जब भी मुस्लिम हित की बात होती है, तो पोजीशन पॉलिटिक्स के अलावा और कोई बात नहीं होती है।

समाजशास्त्री प्रोफेसर एमएन कर्ण ने अपने अध्यक्षीय भाषण में कहा कि जब भी मुसलमानों की बात होती है, हम एक खास मानसिकता से बात करते हैं, जिसमें मुसलमान की असली समस्या पर ध्यान नहीं जाता है। संगोष्ठी में महेंद्र सुमन, मनोज कुमार श्रीवास्तव, आनंदवर्द्धन सिन्हा, हेमंत आदि कई लोग उपस्थित थे। इस अवसर पर संस्थान के निदेशक श्रीकांत ने अतिथियों का स्वागत किया एवं धन्यवाद ज्ञापन डॉ सरोज कुमार द्विवेदी ने किया।


अरुण नारायण। युवा सांस्‍कृतिक पत्रकार। कवि। बिहार विधान परिषद की प्रकाशन शाखा में नौकरी। जातीय जनसंहारों के लिए जाने वाले जहानाबाद के निवासी। पटना में रहते हैं। उनसे arunnarayanonly@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।

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