आप सुरेंद्र उर्फ बांबे सहगल को जानते हैं?

♦ सैयद एस तौहीद

किसी ने नहीं सोचा होगा कि वकालत की डिग्री रखने वाले सुरेंद्रनाथ उर्फ सुरेंद्र हिंदी सिनेमा के बड़े स्टार बनेंगे। लेकिन ऊपर वाला उनमें एक अलग मिजाज देख रहा था। अभिनय व गायकी के दम पर फिल्मों में चले आये। तीस दशक के उत्तरार्ध की फिल्म दक्कन की रानी से शुरू हुआ करियर पचास तक बुलंद रहा। महबूब खान की मनमोहन ने उनको शोहरत की बुलंदियों तक पहुंचाया। अनिल बिश्वास ने आपसे अनेक फिल्मों में गंवा कर गायकी में पहचान बना दी। अनिल दा के साथ साथ नौशाद अली, खेमचंद प्रकाश, सचिन देव बर्मन एवं राम गांगुली सरीखा संगीतकारों ने आपसे सेवाएं लीं। अनमोल घड़ी में आपको मल्लिका तरन्नुम नूरजहां के साथ ’आवाज दे कहां’ गाने का अवसर मिला। अनमोल घड़ी का संगीत बेहद लोकप्रिय हुआ, जिसके बाद सुरेंद्र ने बहुत सी फिल्मों में गाया। खेमचंद प्रकाश के धुनों से सजी भारथरी ने उनको काफी शोहरत अता की। पहले स्वतंत्रता संग्राम पर बनी एक फिल्म में सुरैया के साथ गाया ‘तेरी नजर में’ भी हिट रहा। भारत भूषण अभिनीत बैजू बावरा में तानसेन की भूमिका सुरेंद्र के अदाकारी का ऊंचा मुकाम रही। यादगार मुगल-ए आजम में भी तानसेन की भूमिका उन्‍होंने अदा की थी।

एक जमाने में जब सितारा होने के लिए गायकी होना जरूरी था। यह तीस का दशक था, जब कुंदन लाल सहगल की टक्कर में मेहबूब खान सुरेंद्र को लेकर आये। स्टूडियो ईरा की मुश्किलों चलते समकालीन होकर भी अनिल बिश्वास सहगल के लिए संगीत नहीं दे सके। चालीस के दशक में हिंदी सिनेमा का एक बड़ा तबका कलकत्ता चला गया था। सहगल भी कलकत्ता रुख कर गये। बांबे में सहगल की कमी को पूरा करने की जरूरत थी। इस कमी को सुरेंद्र ने पूरा किया। शुरुआत में किस्मत ने साथ भी दिया। महबूब खान ने कुछ बेहतरीन फिल्में दीं, जिसमें मनमोहन काबिले जिक्र थी। कहानी में उनका किरदार देवदास से काफी प्रभावित था। यहां वे मशहूर अदाकारा बीब्बो के साथ नजर आये। इन दोनों का गाया गीत ‘तुम्हीं ने मुझको प्रेम सिखाया’ ने खूब शोहरत बटोरी। संगीत था अशोक घोष का लेकिन सहायक अनिल बिश्वास को क्रेडिट मिला। यह बांबे बनाम कलकत्ता अथवा सहगल बनाम सुरेंद्र नहीं होकर बांबे में न्यू थियेटर्स कलकत्ता के सहगल का विकल्प बनाना था। बांबे की कंपनी सागर मूवीटोन से जुड़े सुरेंद्र की आवाज सहगल से बहुत मेल खाती थी, इसलिए उनको बांबे सहगल भी कहा गया।

दक्कन की रानी का हिट गीत ‘बिरहा की आग लगी मोरे मन में’ सुरेंद्र का पहला गीत था। सहगल शैली से प्रभावित यह गायन अमर गीत ‘बलम आये बसो मेरे मन में’ से प्रभावित था। लेकिन सुरेंद्र की गायकी पर सहगल का प्रभाव बहुत कम अरसे के लिए बना रहा। महबूब खान की ‘मनमोहन’ का ‘तुम्हीं ने मुझको प्रेम सिखाया’ से उनकी एक अलहदा पहचान निखर कर आयी। ताज्जुब नहीं कि सहगल की छाया से दूर सुरेंद्र ने गायकी एवं अदाकारी में मुकम्मल पहचान बनायी। बंबई में बनी जागीरदार से लेकर ग्रामोफोन सिंगर, फिर जीवन साथी एवं अलीबाबा की सफलता में सुरेंद्र का महत्वपूर्ण रोल रहा। चालीस दशक की हिट म्युजिकल्स की चर्चा उनके उल्लेख के बिना हो नहीं सकेगी। बंटवारे बाद अनमोल घड़ी एवं लाल हवेली की युगल साथी नूरजहां पाकिस्तान रुख कर गयीं। मल्लिका-ए-तरन्नुम के साथ काम करने का उन्‍हें फिर से अवसर नहीं मिला। इसके बाद उन्‍होंने सोलो गाना शुरू कर दिया, जिसमें ‘तेरी याद का दीपक’ खासा हिट हुआ। मेहबूब खान, अनिल बिश्वास, सुरेंद्र की एक सफल टीम उभर कर आयी। तकरीबन सत्तर के करीब फिल्मों में बतौर अभिनेता नजर आने वाले सुरेंद्र ने सैकड़ो गीत गाये। अनिल दा ने सबसे ज्यादा अवसर दिया। इस तरह गायन व अदाकारी दोनों में शोहरत हासिल की। कभी गायकी करने वाले सुरेंद्र बाद में चरित्र किरदारों में ढल गये। उन्‍होंने मुगले आजम से लेकर वक्त एवं एन इवनिंग इन पेरिस, फिर मिलन तथा हरियाली एवं रास्ता सरीखा फिल्मों में चरित्र किरादर निभाये।

जीवन के आखिरी वसंत में उन्‍होंने एक विज्ञापन एजेंसी की स्थापना करते हुए विज्ञापनों के निर्माण में लग गये। साहेबजादे जीत एवं कैलाश ने पिता की इस विरासत को आगे भी जारी रखा। मिले सुर मेरा तुम्हारा इनकी एक मशहूर उपलब्धि रही।

पंजाब के बटला गांव से ताल्लुक रखने वाले सुरेंद्र को महबूब खान की खोज कहना चाहिए क्योंकि वे ही उन्‍हें तलाश लाये थे। उन्‍होंने सहगल के जमाने में एक पहचान बनाने का मुश्किल काम कर दिखाया। संगीतकारों में अनिल बिश्वास ने उन्‍हें सबसे अधिक प्रोत्साहन दिया। सुरेंद्र की गायकी की मिसाल देखिए: ‘तेरा जहां आबाद… क्यूं याद आ रहे गुजरे जमाने… अब कौन मेरा… क्यूं मन ढूंढे प्रेमनदी का किनारा… भंवरा मधुबन में मत जा रे… मुझको जीने का बहाना मिल गया… काहे अकेला डोलत बादल मोहे भी संग ले जा… फिर तेरी याद का दीपक एवं दिन रात मेरे दीवाने में। अमीर बाई कर्नाटकी के साथ गाया युग्ल ‘आईने में एक चांद सी सूरत नजर आयी’ याद आता है। उनके बेहतरीन युगल गानों में… जले क्यों न परवाना एवं क्यूं उसने दिल दिया (शमशाद बेगम)… बुलबुल को मिला फूल (गीता दत्त)… प्रेम नगर की ओर चलें एवं हम और तुम यह ख़ुशी (खुर्शीद) तथा तेरी नजर में (सुरैया) हमेशा याद किये जाते हैं। मशहूर बैजू बावरा में आपको तानसेन का किरदार जरूर मिला, लेकिन एक भी गाना नसीब नहीं हुआ। एक टीवी इंटरव्यू में इस बारे में सुरेंद्र ने कहा कि उन्‍होंने स्वयं को कभी एक शास्त्रीय गायक तसव्वुर नहीं किया। मुग़ल–ए-आजम एवं बैजू बावरा में उन्‍होंके तानसेन को पंडित पालुस्कर एवं बड़े गुलाम अली खान ने आवाज दी थी। इस तरह के अनुभवों ने उनको गायकी को अलविदा कह कर केवल अभिनय को अपना लेने को कहा।

चरित्र किरदार के रूप में उन्‍होंने उस जमाने की बहुत सी सामाजिक फिल्मों में काम किया। सुरेंद्र की आवाज के दीवानों ने उन्हें फिर से सुन पाने की उम्मीद खो दी थी। लेकिन साठ के दशक की फिल्म पति–पत्नी में मन्ना दा के साथ गाना गाकर उन्‍होंने सबको चौंका दिया। लेकिन वो एक अस्त होते सूर्य की अंतिम किरण थी। इसके उपरांत जब तक सक्रिय रहे, केवल चरित्र किरादारो में नजर आये। संगीत का प्रारूप समय के साथ बदल रहा था। स्वभाव से सज्जन सुरेंद्र ने भी संगीत से मोह त्याग दिया। पचास दशक के मध्य में रिलीज गवैया के बाद उन्‍होंने गायन को खैरबाद कह दिया, जिसका गीत ‘तेरे याद का दीपक जलता है’ काफी मशहूर हुआ। आज की पीढ़ी को गुजरे जामने के बहुत से फनकारों बारे में पता नहीं। वे सुरेंद्र को नहीं जानते। यह उनका ही अल्प ज्ञान नहीं बल्कि गुजरे जमाने से एक व्यापक कटाव देखने को मिल रहा।

Saiyad S Tauheed
(सैयद एस तौहीद। जामिया मिल्लिया से स्नातक। सिनेमा केंद्रित पब्लिक फोरम की लोकप्रिय साईट से लेखन की शुरुआत। आजकल सिनेमा व संस्कृति विशेषकर हिंदी फिल्मों पर लेखन। उनसे passion4pearl@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)

You may also like...

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *