वही बोझा ढो रहा हूं, लेकिन दूसरों का! #SamantarKosh

➧ अरविंद कुमार

हम सब समांतर कोश के रचयिता अरविंद कुमार से परिचित हैं। यह कोश जब प्रकाशित हुआ, तो हिंदी में शब्‍द विज्ञान को लेकर नया शोर नयी उम्‍मीदें थीं। हाथोहाथ इसकी इजारों प्रतियां बिक गयी। वहीं अरविंद कुमार अब समांतर कोश की पृष्‍ठभूमि हम सबसे साझा कर रहे हैं। उसका एक अंश पढ़ि‍ए: मॉडरेटर

मैं चालीसवें में प्रवेश कर रहा था। मेरे साथ एक साथ कई बातें हो रही थीं। उम्र बढ़ने का एहसास था। इसी समय मैंने कहीं पढ़ा कि रिटायरमेंट के लिए तैयारी का यही सही समय है। बुढ़ापे में लोग जब अचानक काम से अलग होते हैं, तो गहरा सदमा लगता है। कभी दुनिया भर पर रोब चलाते थे, अब किसी के पास उन से बात करने के लिए समय नहीं होता। वे ‘अपने जमाने’ की बातें करते रहते हैं। भविष्य उन के लिए नहीं रहता। नीचे वाले फ्लैट में रहने वाले सिंधी सज्जन ऊंचे पद से रिटायर हुए। अगले महीने नये घर में जाने वाले थे। लेकिन हुआ यह कि एक बार पुराने दफ्तर गये। मातहतों के पास उनसे बात करने की फुरसत नहीं थी। घर में प्रिय पत्नी को दुःख था कि पहले यह दिन भर बाहर रहते थे, अब दिन भर छाती पर मूंग दलते हैं। खाट पकड़ी तो नये मकान में जाते ही परलोक सिधार गये। अक्‍सर रिटायर्ड बड़े-बूढ़े पार्कों की बेंचों पर बैठ कर बहू-बेटों के निंदा पुराण में व्यस्त रहते हैं। लेखक ने सुझाव दिया था, पचास में प्रवेश से पहले कोई ऐसा शौक या धंधा पाल लो, जो जीवन से सक्रिय संबद्धता बनाये रखे। बात दिल में घर कर गयी।

टाइम्स कार्यालय के मैनेजमैंट विभाग में एक सहायक थे, राम हिंगोरानी। वह कहते यदि दो लाख रुपये जमा हों, तो दो हजार महीना सूद मिल जाता है। और अगर अपना घर का मकान हो, तो उस सूद के सहारे हम आत्मनिर्भर हो सकते हैं।

मैंने 1957 में क्लादे औतां-लारा (Claude Autant-Lara) के निर्देशन में बनी एक फ्रांसीसी फिल्म ‘ला त्रावर्सेइ द’पारी’ देखी। कलात्मक, प्रभावशाली। कहानी बिल्कुल सीधी सादी थी। द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान जर्मनी के आधिपत्य वाले पैरिस में शाम को कर्फ्यू लागू होते होते दो अजनबी मिल जाते हैं। एक है सुप्रसिद्ध चित्रकार (पेंटर – इस शब्द से उस मजदूर को दीवार पोतने वाला श्रमिक समझा था) और दूसरा है बेचारा गरीब मजदूर। चित्रकार हर नये अनुभव के लिए उतावला रहता है। मजदूर जो रात को सूअर का मांस पैरिस के आरपार ढो कर कुछ पैसे कमाने जा रहा है, उसे भी अपने जैसा मजदूर समझ बैठता है। चित्रकार तमाशा देखने के मूड में है और तैयार हो जाता है। यहां से शुरू होता है अनेक रोचक घटनाओं के माध्यम से पहले तो मजदूरी की दर की सौदेबाजी, बाद में चोरी ईमानदारी, संपत्ति के मालिकाने आदि पर संवाद। एक जगह उनका माल जब्त हो जाता है। चित्रकार अपनी चालाकी से छुड़वा लेता है। कहता है, काला बाजार करने वाले का माल तो गया। अब यह तेरा है। इसे बेच कर तू जो कमाएगा, उस से तू अपने जैसों से काम करा सकता है। मजदूर कहता है कि यह उस के धंधे के उसूलों में नहीं है… कुछ देर बाद जर्मन पुलिस उन्हें पकड़ लेती है। पुलिस अफसर चित्रकार का प्रशंसक फैन निकलता है, वह उसे छोड़ देता है। चित्रकार की सिफारिश पर मजदूर भी छूट जाता है। कई साल बाद दोनों मिलते हैं। रेलवे स्टेशन के बाहर। चित्रकार शानदार कार से उतरता है। वही मजदूर अब कुली है और चित्रकार का सामान ढो रहा है। गाड़ी चलने वाली है। दोनों एक दूसरे को पहचानते हैं। चित्रकार के पूछने पर मजदूर बताता है, वही बोझा ढो रहा हूं। गाड़ी चल पड़ी है। चित्रकार कहता है, लेकिन दूसरों का!

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Claude Autant-Lara की फिल्‍म Traversee De Paris का एक दृश्‍य

यही फिल्म का कथ्य था – लोग जिंदगी में कुछ करने निकलते हैं। लेकिन दूसरों का बोझा ढोते-ढोते उम्र बिता देते हैं। जो करने निकलते हैं, वह कहीं बिसर जाता है। हो सके तो लगातार सोचते रहो, कैसे और कब अपने लिए अपनी पसंद का काम करते, अपना बोझा ढोना शुरू कर सको।

1967 प्रसिद्ध निर्देशक वी शांताराम के राजकमल कलामंदिर (स्टूडियो) का रजत जयंती समारोह था। मुझे सपरिवार बुलाया गया था। नीचे मैदान में शांताराम जी की बेटी मधुरा के पति पंडित जसराज के बेटे शार्ङ्धर के निर्देशन में नाटक ‘राजा को चाहिए पसीना’ का मंचन चल रहा था। हम लोग वहीं बैठ गये। शांताराम जी को खबर हुई तो उन्होंने हम सब को अपने खासुल्खास कमरे में बुला भेजा। कक्ष पहली मंजिल पर था। उस तक जाने के लिए बेहद पौश लिफ्ट थी। लाल मखमल के गद्दों वाली दीवारें, टेलीफोन। पल भर में हम वहां पहुंच गये। मैं और मेरा पूरा परिवार।

V Shantaram
वी शांताराम की मशहूर छवि

उस दिन शांताराम जी बहुत खुश थे। चारों ओर हाथ फैलाते वह बोले, ‘यह देखते हो अरविंद, मेरी अपनी कमाई का वैभव। यह सब मेरी माया है। अन्य फिल्म वाले मुझसे भी ज्यादा कमा चुके हैं। लेकिन, मुझमें और आम फिल्म वाले में एक मूल अंतर है। वे कमाने के लिए फिल्म बनाते हैं। मैं अपनी बात कहने के लिए, अपनी पसंद की कला सबके सामने लाने के लिए फिल्म बनाता हूं। मैंने कभी वह फिल्म नहीं बनायी, जो मार्केट की मांग पूरी करने के इरादे से बनी हो। लोगों को मेरा काम पसंद आया तो मुझे पैसा मिला। मैंने वह पैसा संभाल कर रखा। यह सब उसी का फैलाव है।’

जो बात मुझे समझ में आयी, वह यह थी… हर सच्चा कलाकार अपने को अभिव्यक्त करने के लिए काम करता है।

Arvind Kumar
अरविंद कुमार। पत्रकार और भाषाविज्ञानी। फिल्म पत्रिका माधुरी और सर्वोत्तम (रीडर्स डाइजेस्ट का हिंदी संस्करण) के पहले संपादक। पत्नी कुसुम कुमार के साथ हिंदी के पहले समांतर कोश (थिसॉरस) के निर्माण के लिए मशहूर। द्विभाषी थिसारस (इंग्लिश-हिंदी/हिंदी-इंग्लिश थिसॉरस एंड डिक्शनरी) पेंग्विन से प्रकाशित। उनसे samantarkosh@yahoo.com पर संपर्क करें।

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