रोने वाले ऊंट की कहानी #Weeping Camel

➧ राहुल सिंह

दुनिया अविश्वसनीय से लगनेवाले किस्सों से इस कदर लबरेज है कि अनजाने अगर उसके पास आप पहुंच जाएं तो साझा करने की हसरत से दिल बेचैन हो उठता है। ‘दि स्टोरी ऑफ विपिंग कैमल’ एक ऐसी ही फिल्म है। इसे देखना कई स्तरों पर समृद्ध करनेवाला अनुभव है। सबसे विलक्षण तो इसकी ‘कथा-भूमि’ है। इस कथा की जन्मभूमि दक्षिण मंगोलिया की गोबी मरुभूमि है। गोबी मरुस्थल इस कहानी की पहली जननी है, यह फिल्म एक जननी ऊंट की है, जिसे मंगोलियाई मूल की निर्देशिका बाइंबसुरेना दावा ने अपने इतालवी सह-निर्देशक लुईगी फालोर्नी के साथ सिनेमाई पर्दे पर उतारा है। म्यूनिख फिल्म स्कूल में अपने ग्रेजुएशन फिल्म के लिए पटकथा तलाशने के क्रम में लुईगी फालोर्नी ही मूलतः इस फिल्म के विचार तक पहुंचे थे। यद्यपि इसके बारे में उनकी सहपाठिन रहीं बाइंबसुरेना ने उन्हें कभी बताया था कि मंगोलिया में अपने बचपन के दिनों में ऊंटों के साथ एक सांगीतिक रिवाज को अंजाम देते हुए उसने देखा था। जब फालोर्नी ने यह तय कर लिया कि इसी विषय पर वे अपनी ग्रेजुएशन फिल्म बनाएंगे तो धन की समस्या आयी। बाइंबसुनेना मंगोलिया छोड़कर जर्मनी में रहने लगीं थीं, तो वहीं दूसरे स्त्रोतों से इस फिल्म के लिए उन्होंने धन जुटाने का काम किया।

फिल्म दक्षिण मंगोलियाई घुमंतू चरवाहों के एक परिवार की है। मंगोलिया, रूस और चीन के बीच फंसा-बसा एक देश है। भौगोलिक दृष्टि से मंगोलिया का यह हिस्सा समुद्र से 5180 फीट की ऊंचाई पर बसा एक पठार है, जहां गर्मियों में तापमान भले तीस डिग्री सेल्सियस के आस-पास रहता हो, पर जाड़े में माइनस पैंतालीस डिग्री तक पहुंच जाता है। एक सौ पचास किमी/घंटा की रफ्तार से चलनेवाली धूल भरी आंधी जहां एक आम बात है। तापमान के ऐसे अतिवादी छोरों पर जीवन के तौर-तरीके सामान्य तो नहीं हो सकते हैं। प्रकृति का सम्मान करते हुए वहां के मूल निवासियों ने जो तौर-तरीके विकसित किये हैं। फिल्म उसके प्रति सम्मान व्यक्त करती है।

गोबी मरुभूमि के जिस इलाके में इस फिल्म के कथा-नायकों-नायिकाओं की रिहाइश है, वहां फिलहाल वसंत है। इसलिए फिल्म में उनकी यायावरी नहीं है, वह एक जगह टिके हुए हैं। पर वे मौसम के हिसाब से अपना आवास बदलनेवाले समुदाय के लोग हैं। ऋतुओं के अतिचारों से निबटने में उनके सबसे बड़े सहायक उनकी भेड़ें और ऊंट हैं और उनके साथ सदियों से गुजारे गये साझे वक्त का अनुभव। इन दो जमा-पूंजियों के बूते वे सदियों से पृथ्वी के उन सीमांतों पर टिके हुए हैं, जहां जीवन सहज नहीं है। यह फिल्म का परिदृश्य है।

फिल्म एक ‘पूर्वज’ के द्वारा सुनायी जा रही लोककथा के साथ खुलती है। इस लोककथा के केंद्र में क्षितिज की ओर ताकते ऊंटों की जन्मसुलभ अदा है। लोककथा यूं है कि ईश्वर ने जब ऊंटों को बनाया, तो उन्हें सिंगों से भी नवाजा। पर एक दिन एक हिरण उसके सिंगों की सुंदरता पर मुग्ध होकर उसके पास आया और कुछ दिनों के लिए सींग उससे मांग ले गया। हिरण उन सिंगों को लगा कर इतराता फिरने लगा और फिर उसे ऊंट को वापस करना जरूरी नहीं समझा। उस दिन से ऊंट हिरण की राह देखता क्षितिज की ओर ताकता रहता है। फिल्म के बीच में फिर वही वृद्ध अपने परपोते को एक लोककथा सुनाता नजर आता है कि ईश्वर जब जीवों को राशि चिह्नों के तौर पर स्थापित कर रहा था, तो ऊंट भी ईश्वर के पास गया कि मुझे भी कोई राशि चिह्न (जोडियक साइन) बना दीजिए। पर ईश्वर ने उसे मना करते हुए बाकी राशि चिह्नों वाले जीवों की विशेषताओं से नवाज दिया। फिल्म का समापन भी ऊंट के रुदन से होता है। इस तरह देखें तो आदि मध्य और अंत के साथ ऊंट फिल्म के केंद्र में है। पर इस ऊंट पर मालिकाना हक तो चरवाहा परिवार का है। फिल्म उस परिवार के जीने के तौर-तरीके को खामोशी से फिल्माती हुई आगे बढ़ती है। उन तौर-तरीकों में निहित अर्थपूर्ण संकेतों को आप समझ सकें तो यह हमारे संसार के बरक्स एक प्रतिसंसार रचती दिखती है। प्रतिसंसार जीवन मूल्यों, जीवन दर्शन के स्तर पर। दरअसल फिल्म में यह बहुत सचेत स्तर पर नहीं फिल्माया गया है, यह खुद-ब-खुद दर्ज हो गया है। ऐसा कहने की वजह यह है कि इस फिल्म के बाबत इनके निर्देशक द्वय के दृष्टिकोणों की बात करें, तो दोनों की प्राथमिकताएं थोड़ी जुदा थीं। बाइंबसुरेना जहां एक लुप्त होते रिवाज को दर्ज करना चाहती थीं, वहीं फालोर्नी उस रिवाज की सादगी और सुंदरता को। पर ऐसा करने के क्रम में वे चीजें भी आ गयीं, जो इसे सादगी और सौंदर्य को रचती हैं या जिनके कारण यह रिवाज लुप्त होने की कगार पर है। हिंदी में अनुषा रिजवी निर्देशित ‘पिपली लाइव’ इस खूबसूरत हादसे की शिकार फिल्मों में से एक है। जिसमें वे दिखलाना तो किसानों की आत्महत्या चाह रहे थे, पर वह मीडिया के आचारशास्त्र को भी संबोधित करनेवाली फिल्म बन गयी।

फिल्म जब चरवाहा समुदाय के रोजमर्रे के जीवन को टुकड़ों में टांक रही होती है, तो उनकी दिनचर्या में शामिल आदतों के उत्स में काम करनेवाले सभ्यतागत अनुभव और विवेक का पता चलता है। मसलन भेड़ों के एक बड़े झुंड को चारा खिलाने का तरीका, भेड़ों के उसी बड़े समूह में जन्मे एक-से दिखनेवाले शिशु भेड़ों को दूध पिलाने का तरीका, ऊंटनियों के गर्भधारण के बाद उनके नथुनों के फूलने से उनके प्रसव के वक्त का अचूक ढंग से अनुमान लगाने का तरीका, ऊन निकालने का तरीका आदि-आदि। यह सभी गतिविधियां और क्रियाएं एक दिन में अर्जित समझदारी का परिचायक नहीं है। उनके तंबुओं में अनवरत जलनेवाले चूल्हे में संरक्षित अग्नि और बच्चे को नहाने के दौरान पानी के किफायती खर्च को देखते हुए आपको रसूल हमजातोव के ‘मेरा दागिस्तान’ में आग और पानी के बारे में लिखे गये बेशकीमती शब्दों का बारहा स्मरण हो आएगा। एक साथ उस समुदाय की चार पीढ़ियों की उपस्थिति, उनके मध्य का श्रम विभाजन आदि मिलकर उस समुदाय के बचे रहने की इबारत प्रस्तुत करते हैं। यह फिल्म परिवार की संयुक्तता को ही रेखांकित नहीं करती है बल्कि मूल्यों के एक समुच्चय को भी प्रस्तावित करती है। उन मूल्यों के पीढ़ीगत स्थानांतरण को भी दिखाती है। लोरी सुनाती हुई मां हो या लोककथा सुनाता परदादा, फिल्म बतलाती है कि लोककथाएं-लोकगीत कैसे स्मृतियों में अपना घर बनाती हैं। लोक कैसे उम्र-दराज होता है, अनुभव और मूल्य कैसे पीढ़ियों में हस्तांतरित होते हैं? फिल्म इन्हें भी दृश्यों के मार्फत चुपचाप दर्ज करती चलती है। इस तरह फिल्म एक साथ दो स्तरों पर तिरती है। एक परिदृश्य या परिवेश के स्तर पर और दूसरे उस परिवेश के एक हिस्से ऊंट के स्तर पर। ज्यादातर मौकों पर इसे अलगाकर देखा जाता रहा है। मतलब ऊंट ही केंद्रीयता अर्जित करता रहा है। पर यह कहानी जितनी ऊंट के रुदन की है, उतनी ही उस परिवेश की भी जो उसके रुदन के मायनों को सुनता-समझता है।

यह आत्म निर्भर समुदाय की उस दुनिया की कहानी है, जो अपनी प्रकृति से, अपनी जमीन से, अपने पशुओं से जुड़ी है, जो पूंजी की आदिम या प्राचीन अवस्था के पास ही ठिठकी खड़ी है। एक ऐसी दुनिया की दास्तान है, जहां पूंजी मुद्राओं के अर्थ में अर्थहीन है। यद्यपि फिल्म में एक दो मौकों पर मुद्रा विनिमय को दिखलाया गया है, उसकी सांकेतिकता के निहितार्थों की चर्चा आगे करेंगे। फिलहाल आते हैं फिल्म की कहानी पर।

कहानी इतनी सी है कि ऊंटों के एक झुंड में इस साल बची आखिरी ऊंटनी के प्रसव की घड़ी आ गयी है। पर शिशु ऊंट प्रसव के दौरान लगभग एक चौथाई बाहर आने के बाद प्रसव द्वार पर अटक-सा गया है, जिसे उस परिवार के एक बुजुर्ग और स्त्री की सहायता से दो दिनों के अथक प्रयत्न से निकाला जाता है। यह उस युवा ऊंटनी का पहला प्रसव था और यह उसके लिए काफी भारी साबित हुआ है। इसका असर उस ऊंटनी पर यह होता है कि वह अपने नवजात शिशु से स्वयं को विरक्त कर लेती है। संयोग से यह नवजात सफेद रंग का है। पूरे समूह में सबसे जुदा। उसका अलग रंग उसे एक अलग सौंदर्य प्रदान करता है। पर समस्या यह है कि उसकी मां ने उसको तज दिया है और मां के दूध के बगैर उसका बचना मुश्किल है। फिल्म का एक बड़ा हिस्सा मां के अस्वीकार और शिशु ऊंट की याचना के तौर-तरीकों को फिल्माती है। शिशु ऊंट का भूख से हिकरना (भूख लगने से गाय जो आवाज निकालती है, फणीश्वरनाथ रेणु ने उसके लिए हिकरना शब्द का प्रयोग किया था।) और अपनी मां के पीछे-पीछे घूमना, उसके थनों तक बार-बार अपने थूथन को ले जाने की कोशिश करना और बार-बार मां के द्वारा अपने पैरों से बरजना, कभी भाग खड़े होना, कभी लावारिस-सा छोड़ कर चल देने की भंगिमाएं इस तटस्थता से फिल्मायी गयी हैं कि बतौर दर्शक मन उस शिशु ऊंट के साथ जुड़ा जाता है। किसी भूख से बिलखते बच्चे सा उसका हिकरना मन को नम करता है। इस उत्सुकता को जगाने के बाद फिल्म आगे बढ़ती है कि आखिर होना क्या है? लामाओं के द्वारा पूजा-पाठ का एक कर्मकांड आयोजित किया जाता है, जो बेनतीजा साबित होता है। अशक्त नवजात की निरीहता दया उपजाती है। तब परिवार के बुजुर्गों के द्वारा सांगीतिक रिवाज के आयोजन की बात की जाती है। इसके लिए एक संगीतकार (वायलिन वादक) की आवश्यकता है, जो वहां से काफी दूर ऐमक सेंटर नाम की जगह में बच्चों को संगीत की शिक्षा देता है। उसे बुलाने के लिए घर के दो बच्चों ड्यूड और उग्ना को भेजा जाता है। इस तरह वे वहां से कुछ दूरी पर उग आये शहरों में दाखिल होते हैं, जहां टीवी है, कंप्यूटर है, बिजली है, मॉल है। आधुनिकता और शहरीकरण का पूरा ताम-झाम है। फिल्म के प्रवाह में यह एक अवरोध-सा लगता है। एक पल के लिए फिल्म की ‘फ्लूइडिटी’ और ‘आर्गेनिक स्टोरी टेलिंग’ की पद्धति खंडित होती-सी दिखती है। पर क्षेपक-सा आ जुड़ा यह पूरा प्रसंग फिल्म के समापन में एक अर्थ को अर्जित कर लेता है। जो अनायास इस फिल्म के संकुचित तंबू को एक सभ्यता विमर्श में तब्दील कर देता है।

ड्यूड और उग्ना जब संगीतकार को निमंत्रित करने के लिए शहर के रास्ते होते हैं, उस दौरान वे अपने परिचित के यहां रेतीली आंधी से बचने के लिए आश्रय लेते हैं। इस दौरान उनके घर में टीवी पर आ रहे कार्टून को उग्ना बहुत तन्मयता से देखता है। उग्ना के लिए एनिमेशन देखना एक अभिभूत करनेवाला अनुभव है। उग्ना की उम्र को देखते हुए यह बेहद स्वाभाविक है। वहां से छूटते ही आगे का सफर तय करता हुआ अपने बड़े भाई ड्यूड से कहता है कि हम अपने घर में टीवी नहीं लगा सकते हैं क्या? बड़ा भाई कहता है इसके लिए हमें अपनी बीस-तीस भेड़ें देनीं होंगी। उग्ना कहता है कि हमारे पास तो काफी भेड़ें हैं। ड्यूड कहता है, पर टीवी को चलाने के लिए बिजली चाहिए। उसे अपने घर तक ले जाने में हमारा सब कुछ बिक जाएगा। शहर पहुंचने पर वे उस संगीतकार को घर आने का न्यौता देते हैं और अपने दादा के रेडियो के लिए आधा दर्जन बैटरियां खरीदते हैं। उस मॉल में उग्ना की बालसुलभ हरकतों को कैमरे ने बहुत अच्छे से दर्ज किया है। टाइल्स की चिकनी सतह पर फिसलते हुए चलना या तराजू के संतुलन को अपनी अंगुलियों से छेड़ देना आदि। पहली निगाह में पूरी फिल्म की संरचना में यह प्रसंग एक चिप्पी-सा लगता है।

संगीतकार न्यौते के एक-दो दिन बाद पहुंचता है। और उस चिर प्रतीक्षित रिवाज की तैयारी की जाती है। मां और उसके शिशु को लाया जाता है। फिर आरंभ होता है, वायलिन वादन। वायलिन वादन के साथ एक अर्थहीन-सी लगनेवाली ध्वनियों का एक रुदन-सरीखा प्रलंबित आलाप है। ‘हू-अ-स’ इन तीन वर्णों की निरर्थक-सी लगनेवाली बारंबरता से लय जैसा कुछ फूटता है। बात गर इस लय की करें, तो यह बिलकुल भी प्रभावशाली नहीं है। पर उस लय के प्रति ऊंट जिस कदर ‘रेस्पांड’ करते हैं। वह हतप्रभ करनेवाला दृश्य है। अपने परिवार के साथ बैठा उग्ना उस संगीत को सुनकर जिस कदर ‘भकुआये’ ढंग से उस पूरे प्रकरण को देख रहा है, वह देखने लायक है। पर वायलिन और निरर्थक-सी जान पड़नेवाली लय की जुगलबंदी का असर उस ऊंटनी पर होता है, जिसने अपने नवजात को त्याग दिया था। ऊंटनी की आंखों से निकलनेवाले आंसुओं की खातिर इस फिल्म को देखा जा सकता है। ऊंटनी के रुदन के साथ ही प्रयोजन की पूर्ति हो जाती है। मानो आंसू एक साथ ऊंटनी के प्रायश्चित और ममत्व दोनों के पर्याय हो गये हों। ‘कथार्सिस’ या विरेचन का इतना सर्जनात्मक प्रयोग मैंने अपने अब तक के जीवन में नहीं देखा है। मानो संगीत के मार्फत ऊंटनी अपनी पीड़ा और दुखों का विरेचन करती हो। इस विलाप के साथ ही वह अपने शिशु को स्वीकार कर लेती है और नवजात अपनी मां के थन में थूथन लगा कर जी भर कर दूध पीता नजर आता है। कायदे से तो फिल्म यहां खत्म हो जानी थी। और ज्यादातर लोगों के लिए खत्म हो भी जाती है। पर इसके बाद भी फिल्म के आखिर में, एक पल दो पल का दृश्य है, जिसमें ड्यूड अपने तंबू की छत पर ऐंटिनावाली छतरी लगा रहा है और उग्ना टीवी के पास खड़ा चैनल पकड़ाने के लिए यथासंभव संकेत दे रहा है। टीवी के पास ही बैटरी रखी है और छत पर ‘सोलर सिस्टम’। समाप्तप्राय हो चुकी फिल्म के आखिर में आया यह पल भर का दृश्य इस फिल्म को मेरी समझ से एक सभ्यता विमर्श में तब्दील कर देता है। और अनायास ऊंट से इतर फिल्म की दूसरी बातें आपस में मिल कर फिल्म के एक नये अर्थ को रचने में जुट जाती हैं।

वह नया अर्थ है, चुनाव का। हम कौन-सी दुनिया अपने लिए चाहते हैं। आत्मनिर्भर घुमंतू समुदायों की समानतामूलक दुनिया या भौतिक सुविधाओं से युक्त असमानतामूलक दुनिया। प्रकृति के साथ साहचर्यवाली दुनिया या प्रकृति पर विजय हासिल करनेवाली दुनिया। वस्तु विनिमय वाली दुनिया या मुद्रा विनिमय वाली दुनिया। आदिम रागों की छांव को अपने में समेटनेवाली दुनिया या आधुनिकता की धूप में नहानेवाली दुनिया। फिल्म में यह दोनों दुनिया कुछ किलोमीटर या कुछ घंटों के फासले पर मौजूद हैं। दोनों दुनिया के अपने-अपने मूल्यों के समुच्चय हैं। किसी दुनिया का चुनाव उसके साथ के मूल्यों के समुच्चय का भी चुनाव है। फिल्म में एक अर्थपूर्ण संवाद है। दादा और पोते के बीच का। फिल्म में चार पीढ़ियां एक साथ हैं। दो पीढ़ी लगभग अपनी जिंदगी जी चुके हैं। तीसरी पीढ़ी उन पिछली दो पीढ़ियों के नक्शे कदम पर चल रही हैं पर उनकी संतति, जो कि चौथी पीढ़ी है, में एक विचलन दिख रहा है। उग्ना टीवी के प्रति आग्रही हो चुका है। अपने पिता से टीवी लगाने की मनुहार कर रहा है। दादा ‘टीवी’ के बारे में अपने पोते को कह रहा है कि उस ‘डेविल’ का क्या करोगे? अपना पूरा दिन ‘कांच की छवियों’ के पीछे खराब करोगे। ऐसा नहीं है कि उनके घर में आधुनिकता का पर्याय समझे जानेवाले ऐसे वैज्ञानिक उपकरणों का अभाव है। उनके पास दूरबीन है, रेडियो है, पर टीवी को लेकर उनके अपने तर्क हैं। हर उत्पाद अपने साथ अपने संस्कार लेकर आता है। उस संस्कार के प्रति आलोचनात्मक हुए बगैर उसका स्वीकार या अस्वीकार संभव नहीं है। इस हिस्से में आकर अपने देश के संदर्भ में अनायास महात्मा गांधी और उनकी स्वराज की अवधारणा का आपको खयाल आये तो यह कतई बेमानी नहीं होगा। फिल्म के समापन में तंबू में टीवी का प्रवेश लगभग तीन पीढ़ियों और उनके पूर्वजों की परंपरा के समापन को ‘सिंबलाइज’ करता है।

इस फिल्म के नेपथ्य में और भी कई रोचक बातें हैं। एक तो इसकी कोई लिखित और सुचिंतित पटकथा नहीं थी। दोनों निर्देशकों की हार्दिक इच्छा बस ऊंट के रुदन की खत्म होती प्रथा को उसकी खूबसूरती और सादगी में कैप्चर करना था। दक्षिण मंगोलिया के जिस हिस्से में फिल्म को शूट किया गया है, वहां ऊंट मार्च के महीने में प्रजनन करते हैं। उसे फिल्माने के लिए जब यह जा रहे थे, तो रास्ते में मिलनेवाली आंधियों की वजह से इनका दल समय से पहुंच नहीं सका। और जब ये पहुंचे तो उस ‘सीजन’ की बीस गर्भिणी ऊंटों में से उन्नीस अपने बच्‍चे जन चुकी थीं। बस एक ही बची थी। और संयोग से उसके साथ वह सब कुछ हो गया, जो यह चाहते थे। यहां तक कि वह बच्चा भी भूरे के बजाय सफेद निकला, जिससे इन्हें उसे समूह में अलग से फिल्माने वाली चुनौती से निजात मिल गयी। इस फिल्म के लिए जिस परिवार को इन्होंने चुना था, वे वास्तव में वैसी जिंदगी जीते आये थे। उन्हें कोई स्क्रिप्ट देने की बजाय इन्होंने उनके साथ रहना शुरू किया और उनके परिवार के बच्चों के साथ मेल-मिलाप की शुरुआती असुविधा के बाद इन्होंने उनके रोजमर्रे के जीवन से अपने जरूरत के हिसाब से चीजें शूट करनी आरंभ की। सच्चे लोग, सच्‍चे लोकेशन और सच्‍चे जीवन को फिल्माने में फीचर फिल्मों वाली चिकनाई नहीं आ पायी है। डाक्यूमेंट्री वाला प्रभाव ज्यादा है। लेकिन इसमें निहित आख्यान के कारण इसे अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर फिल्म समीक्षकों ने ‘नरेटिव डाक्यूमेंट्री’ के जॉनर में रखा है। ‘नेशनल ज्योग्राफिक वर्ल्‍ड फिल्‍म्‍स’ के बैनर तले ‘मूवीज विदाउट बार्डर’ की श्रेणी में यह पहली फिल्म है जो अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर साल 2004 में रिलीज हुई। अंतर्राष्ट्रीय फिल्म समारोहों में इसने जबर्दस्त धूम मचायी। इसने अनेक पुरस्कार बटोरे। एक अर्थपूर्ण फिल्म है, जिसे जरूर देखा जाना चाहिए। इस लिहाज से भी कि हर माटी की अपनी प्रकृति होती है, जिसके अनुरूप ही वनस्पतियां उपजती हैं। वैसे ही हर धरती की अपनी कहानी होती है, जो कहीं और नहीं लिखी जा सकती है। अपने देश में भी प्रादेशिक और मुख्यधारा की फिल्मों में इसकी अपार संभावनाएं हैं। शायद उस दिशा में यह एक प्रेरक साबित हो, इसी उम्मीद में।


राहुल सिंह। युवा आलोचक, कहानीकार। हिंदी की कई साहित्यिक पत्रिकाओं में नियमित लेखन। इन दिनों एएस कॉलेज, देवघर में हिंदी पढ़ाते हैं। राहुल से alochakrahul@gmail.com पर संपर्क करें।

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