इस शहर में हर शख़्स परेशान सा क्यों है?

➧ विजय कुमार

सीने में जलन आंखों में तूफान सा क्यों है?
इस शहर में हर शख़्स परेशान सा क्यों है?

पिछले दिनों मुंबई के बांद्रा–कुर्ला कॉम्पलेक्स में एक भव्य इमारत में किसी कार्यक्रम के सिलसिले में जाने का अवसर मिला। जी हां, उत्तर आधुनिक समय के शिल्प की एक भव्य इमारत। चारों तरफ केवल कांच की दीवारें। भीतर एक बंद और स्वायत्त समय। कहने को इमारत के भीतर से कांच के उस पार की बाहर की दुनिया भी दिखती हुई पर अंदर के तंत्र और व्यवस्था की शर्तों पर। इमारत के भीतर चुस्त-दुरुस्त, नपे-तुले, तत्पर, गतिशील, स्मृतिहीन कर्मचारी। जैसे कि ‘ग्लास टैंक’ में कैद, तैरती हुई, हांफती हुई आकर्षक मछलियां। उस इमारत से बाहर निकला, तो एक अजीब सी अशांत मन:स्थिति थी। बाद में देर तक इस अति आधुनिक इलाके में घूमता रहा और वहां इसी तरह की इन स्मृतिहीन बहुत सारी इमारतों को देखता रहा। उत्तर पूंजीवादी समय में नवविकसित स्थान की सघनता, स्वायत्तता, विखंडित देश-काल, और फिर ऐसे विखंडनों की एक समग्र एकरूपता। एक भयावह एकरूपता। Homogeneous and homogenizing, divertingly packaged yet curiously incomprehensible... वे इमारतें जो प्रतीत होता हैं कि बहुत खुली खुली हैं और भीतर का अपना सब कुछ दिखाती सी भी लगती हैं, पर साथ ही अपनी समग्रता में निरंतर कुछ घेर लेने, आक्रामक ढंग से कुछ आवृत्त कर लेने का प्रयत्न करती हुई भी। वहां भीतर सब कुछ बंटा हुआ, नियोजित, समन्वित और बंदी था। ‘सुपरफीशियल’ सा था। आपसे संपूर्ण समर्पण की मांग करता हुआ प्रतीत होता था। उन इमारतों में उन सबके लिए प्रवेश निषिद्ध था, जो अलमस्ती और बेहपरवाही में टहलते हैं। और एक बार जब आप उन इमारतों में घुस भी गये तो बिना वहां की व्यस्था की अनुमति और सहायता के वहां से निकलना और बाहर की दुनिया में आपका लौटना असंभव था। खुलेपन, उदारता, सजगता, आच्छादन और वर्जना का एक अजीब सा विभ्रमित कर देने वाला संसार। यह नव निर्मित संरचना थी, जो अनेक प्रकार से हमारी इयत्ता, हमारे होश और हमारी स्मृति को अपने कब्जे़ में कर लेती थी और हमसे हमारे आत्म के पूर्णतया विसर्जन की मांग करती थी।

vijay kumar
विजय कुमार। कवि आलोचक एवं संपादक। कविता की संगत इनकी प्रमुख आलोचना पुस्तक है। ‘अंधेरे समय में विचार’ नामक पुस्तक भी खासी चर्चित। सदी के अंत में कविता (उद्भावना कविता विशेषांक) इनकी संपादित पुस्तक है।

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