दिल्‍ली चुनाव मोदी के लिए वाटरलू होगा?

इस बार दिल्ली में केजरीवाल के लिए जो समर्थन दिख रहा है वह अभूतपूर्व है। निरंकुश शासन के खिलाफ विद्रोह की शुरुआत हो चुकी है। दिल्ली में आम आदमी पार्टी की जीत को लेकर अब मेरे मन में कोई संदेह नहीं रह गया है।
प्रभात रंजन, कथाकार और अनुवादक

➧ अरुण माहेश्‍वरी

क्‍या दिल्ली चुनाव नरेंद्र मोदी का वाटरलू साबित होने जा रहा है? इस बात के कुछ ठोस कारण और लक्षण भी दिखाई देने लगे हैं।

1. भाजपा के लिए दिल्ली के ग्रामीण इलाकों में कोई भविष्य नहीं बचा है। केंद्र सरकार ने भूमि अधिग्रहण के बारे में जो अध्यादेश जारी किया है, वह शहरी क्षेत्रों के निकट की ग्रामीण जनता के खिलाफ सीधे तौर पर युद्ध की घोषणा से कम नहीं है।

2. दिल्ली के बस्ती इलाकों में भाजपा की स्थिति पहले से ही कमजोर रही है और अभी तक उसमें कोई सुधार नहीं आया है। कॉलोनियों को रेगुलराईज करने की दिशा में सिर्फ एक घोषणा भर की गयी है, जिसकी कोई कानूनी वैधता नहीं है। इस मामले में भाजपा के इरादे आज भी हमेशा की तरह संदेह के घेरे में हैं।

3. दिल्ली के अल्प-संख्यकों में अब कोई दुविधा नहीं है। भाजपा और संघ परिवार के नेताओं की धर्म-परिवर्तन और नफ़रत फैलाने की हरकतों तथा गिरजाघरों में आगजनी की घटनाओं ने अल्पसंख्यकों के सभी समुदायों को भाजपा के खिलाफ दूसरे किसी भी समय की तुलना में कहीं ज्यादा एकजुट कर दिया है। संघ परिवार के लोगों की दंगा भड़काने की साजिशों का आम आदमी पार्टी के स्थानीय कार्यकर्ताओं ने जिस बहादुरी से मुकाबला किया, उसने इन समुदायों को और भी जागृत किया है।

4. पेट्रोलियम पदार्थों की अतरराष्ट्रीय दरों में भारी गिरावट के बावजूद रोजमर्रे की जरूरी चीजों के दामों को कम करने में भाजपा सरकार की पूर्ण विफलता ने मध्यवर्ग के तबकों का भाजपा के प्रति मोहभंग किया है।

5. भ्रष्टाचार के मामले में भाजपा पर पहले भी किसी को कोई भरोसा नहीं था। अब भाजपा के परंपरागत नेताओं को हटा कर किरण बेदी के नेतृत्व में चुनाव लड़ने का फ़ैसला करके खुद भाजपा के सर्वोच्च नेतृत्व ने भी खुले आम दिल्ली की भाजपा के प्रति अविश्वास जाहिर कर दिया है।

6. किरण बेदी एक अक्षम पुलिस अधिकारी रही हैं। उन्हें पुलिस सेवा में भी अराजक व्यवहार और निकम्मेपन की वजह से किसी भी उच्च पदस्थ अधिकारी को स्वाभाविक तौर पर मिलने वाले पदक भी नहीं मिल पाये। इसके अलावा, आम आदमी पार्टी के पूरे आंदोलन में उनकी भूमिका एक तोड़क की भूमिका रही। ऐसे विफल व्यक्ति को मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में पेश करके चुनाव में उतरना भाजपा के परंपरागत मतदाताओं के विश्वास को भी हिला देने के लिए काफी है।

7. नरेंद्र मोदी की सभा में उम्मीद से बेहद कम लोगों का आना और अरविंद केजरीवाल की सभाओं में भारी भीड़ का उमड़ना ही वह प्रमुख कारण रहा है, जिसकी वजह से मोदी जी ने दिल्ली में खुद को दाव पर लगाना मुनासिब नहीं समझा। किरण बेदी की खोज भी इसीलिए की गयी है।

इन तमाम चीजों को देखते हुए दिल्ली विधानसभा के आगामी चुनाव के बारे में इस नतीजे पर पहुंचना गलत नहीं होगा कि यह चुनाव नरेंद्र मोदी के लिए वाटरलू साबित होने वाला है।

Arun Maheshwari
(अरुण माहेश्‍वरी। मार्क्‍सवादी आलोचक। राजनीतिक टिप्‍पणीकार और स्‍तंभ लेखक। कई किताबें प्रकाशित, जैसे – साहित्‍य में यथार्थ : सिद्धांत और व्‍यवहार, पाब्‍लो नेरुदा : एक कैदी की खुली दुनिया, आरएसएस और उसकी विचारधारा, पश्चिम बंगाल में मौन क्रांति, नयी आर्थिक नीति कितनी नयी, एक और ब्रह्मांड, सिरहाने ग्राम्‍शी। उनसे arunmaheshwari1951@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)

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