उलझन से उलझन को जोड़ती गुलजार की अंगूर

♦ सैयद एस तौहीद

शेक्सपियर की रचनाओं पर फिल्में बनाने में विशाल भारद्वाज के प्रेरणास्रोत यकीनन गुलजार थे। गुलजार ने बार्ड की कृति ‘comedy of Errors’ पर ‘अंगूर’ जैसी फिल्म बनायी। समरूपी पहचान के शिकार दो जुड़वाओं की कहानी के साथ मूल रचना को शानदार तरीके से अपनाया गया। परिस्थिति से उपजी जबरदस्त कामेडी। पटकथा की गतिशीलता अदाकारी में भी नजर आती है। हालांकि गीतों की खास जरूरत नहीं लगी फिर भी कथा की लय पर खास असर नहीं पड़ा। कहानी तिलक दंपती (उत्पल दत्त व शम्मी) की जुड़वा संतानों (अशोक) तथा जुड़वा पोशपालक (बहादुर) के दिलचस्प हालातों को बयान करती है। फर्क न बताने की गरज से मां-बाप ने अपने बच्चों का एक नाम रखा। जुड़वाओं को अलग अलग कपड़े में रखने से हालांकि उलझन को तोड़ा जा सकता था। एक बार तिलक दंपती छुट्टी बिताने सफर पर निकलती है। उस दरम्यान वे एक जगह ठहरते हैं। इत्तेफाक से वहां उन्हें बेसहारे जुड़वा बच्चों के बारे में पता चलता है। मंदिर में मिले इन बच्चों को वो अपना बना लेते हैं। इन दोनों का नाम बहादुर रखा जाता है। सफर में आगे तूफान उनके जहाज को घेर लेता है। भीषण तूफान में राजतिलक व उनकी पत्नी एक-एक बच्‍चे को लेकर लेकर बिछ्ड़ जाते हैं। सुविधा के लिए यह समीक्षक इन दो जुड़वा जोडे बच्चों का नाम अशोक एक व अशोक दो तथा बहादुर एक व बहादुर दो रख रहा है। वक्त गुजरा… एक जुड़वा अशोक एक एवं बहादुर एक (संजीव कुमार तथा देवन वर्मा) दीनकपुर निवासी गंगाप्रसाद के जिम्मे पल कर बड़े हुए हैं। गंगाप्रसाद के परिवार में सुधा (मौसमी चटर्जी) एवं तनु (दीप्ति नवल) नाम की दो लड़कियां हैं। गंगाप्रसाद ने बड़ी बेटी सुधा की अशोक एक (संजीव कुमार) से शादी कर दी है। जबकि बहादुर एक (देवन वर्मा) घर में कामकाज करने वाली प्रेमा (अरुणा ईरानी) से विवाहित है। घर की देखरेख में अशोक एवं सुधा अविवाहित तनु के सहायक हैं। सुधा का विवाहित जीवन शक की मार से पीड़ित है। बाहरी लडकी अलका से नाजायज रिश्तों के शक में सुधा पति से बराबर उलझन में रहती है।

कहानी के दूसरे छोर पर हमें राजतिलक (उत्पल दत्त) के जिम्मे पले-बढे अशोक दो (संजीव कुमार) व बहादुर दो (देवन वर्मा) से मिलाया जाता है। बिजनेस का एक लाख रुपये लेकर दोनों दीनकपुर के सफर पर निकले हुए हैं। अशोक दो सामान्य से अधिक स्तर की कल्पनाएं रखने वाला शख्स था। वहीं उसका दोस्त बहादुर दो बिलकुल अपने बिछ्ड़े जुड़वा की तरह अटल वफादार है। हालांकि भांग की लत का शिकार भी है। अशोक दो का मानसिक उन्माद साथ लगे रूपये के कारण थोड़ा ज्यादा बदतरीन हो जाता है। दीनकपुर का स्टेशन मास्टर व स्थानीय टैक्सी चालक अशोक दो व बहादुर दो को गलत रूप से अशोक एक व बहादुर एक मानकर रुपये लूटे जाने का डर मन में बिठा देते हैं। अशोक इन लोगों को किसी गैंग का सदस्य मान बैठा था। दूसरी ओर सुधा ने पति (अशोक एक) को नेकलस लाने की ताकीद दे रखी है। उसने जौहरी छेदीलाल को हार बनाने के लिए ताकीद दे दी है … लेकिन उनका वर्कर मंसूर (यूनुस परवेज) जेवर बनाने में काफी देर कर रहा है। हार मिलने में देरी की वजह से सुधा पति पर हार परायी अलका को थमा देने का इल्जाम लगाती है। हालात को समझदार तनु किसी तरह संभाले हुए है। अशोक दो एक लाख रुपये बचाने के लिए खुद को इंपीरियल होटल के कमरे में बंद कर लेता है। कमरे के बाहर बहादुर (देवन वर्मा) को बिठाकर… प्रीतम आन मिलो गाना गुनगुनाने पर ही दरवाजा खोलने की ताकीद देता है। वहीं दूसरी ओर अशोक एक सुधा के हार बारे में जौहरी से सवाल करता है। छेदीलाल कहता है कि अभी देर लगेगी, क्योंकि हार अभी बनकर तैयार नहीं हुआ है। हार में लगने वाले हीरे का सपलायर रुपये मांग रहा है। अशोक से कहा जाता है कि रुपये पहले अदा कर दे। अशोक भी अडिग है कि हार मिलने पर ही रुपये देगा। हार शाम तक मिलने का वायदा उसे दिया जाता है। देर शाम तक उसे हार नहीं मिलता है।

अशोक दो बिजनेस के सिलसिले में आदमी से मिलकर वापसी के लिए बस स्टाप पर चला जाता है। रास्ते में शहर के बाजार पर रुकता है। यहां पर बहादुर दो भी प्रेमा (अरुणा ईरानी) के लिए खरीददारी कर रहा है। अशोक को वहां देख कर वो अचरज में पड़ जाता है। दोनों एक दूसरे को देखकर उलझन में हैं। दोनों पास आते हैं… अशोक दो को सिगरेट जलाता देख बहादुर एक को हैरानी होती है क्योंकि अशोक एक अब से पहले सिगरेट का नशा करते उसने देखा नहीं है। जुड़वा होने कारण दरअसल वो अशोक दो को अशोक एक मान रहा था। वहीं अशोक एक भी बहादुर को वहां देखकर हैरत में है… क्योंकि तय अनुसार बहादुर को इंपीरियल होटल के कमरे में रखे रुपये की हिफाजत करनी है। दोनों में कुछ देर बात होती है। फिर अपनी अपनी बात लेकर दोनों अलग दिशाओं में चले जाते हैं। अशोक दो बहादुर को वहां देखकर अचंभे व क्रोध में है जबकि बहादुर एक यह मन लेकर लौटता है कि वो घर जाकर प्रेमा को बताएगा कि अशोक को सिगरेट की बुरी लत लग गयी है। प्रेमा बहादुर से सुधा को तमाम बातें कह देने के लिए मना लेती है। अशोक के बारे में सुनकर सुधा को पूरा यकीन हो जाता है कि उसका विवाहित जीवन अधिक दिनों तक टिकने वाला नहीं। बड़ी बहन की उदासी दूर करने के लिए तनु बहादुर एक को अशोक की खोज खबर लाने भेज देती है। तनु नहीं चाहती है कि नयी मुसीबत की वजह से उसका आज का जरूरी कार्यक्रम रुक जाए … वो बहादुर को अलका के घर से तलाश शुरू करने को कहती है। लेकिन यह कोशिश बेकार रह जाती है क्योंकि पत्नी से अनबन के कारण अशोक उस रोज लेट तक आफिस में पड़ा था। उस रोज अलका (पदमा) से उसकी मुलाकात नहीं होती है। बहादुर अलका को अशोक की बाजार वाली हरकत की शिकायत कर देता है। अशोक के बारे में सुनकर वो काफी अचंभित होती है। वो उसे अशोक व सुधा के बीच हुई अनबन की बारे में भी बता देता है। अलका के घर से निराश होने बाद बहादुर छेदीलाल के पास जाता है। वहां हीरे का व्यापारी गणेशीलाल छेदीलाल से अपना बकाया मांग रहा है। छेदीलाल गणेशीलाल को अगली सुबह आने को कह टाल रहा है… तभी बहादुर एक वहां आकर अशोक का सच उगल देता है। यह सुनकर छेदीलाल उसे अशोक के दफ्तर जाने को कहता है। उसे उम्मीद थी कि अशोक आज रात हार लिये बिना जा ही नहीं सकता। उस शाम तनु का जरूरी कंसर्ट है। अशोक व बहादुर को देख कर उसकी खुशी का ठिकाना नहीं रहता। उसे नहीं मालूम कि ये दोनों वो नहीं, जो वह समझ रही है।

कार्यक्रम के समापन के बाद वो उन दोनों को बैकस्टेज में बुलावा भेजती है। अशोक दो के जाने से मना कर देने से बात बढ़ती है। तनु आपा खो कर बेतरतीब बहसें करती है। इसी बीच स्थानीय पुलिस इंस्पेक्टर सिन्हा भी वहां दाखिल होता है। अशोक दो को अशोक एक मानकर पुलिस उसे जीप में बिठाकर सुधा के घर ले जाती है। भ्रम व उलझन का शिकार बहादुर दो भी उनके पीछे चल पड़ता है। पति को वापस देखकर सुधा की जान में जान आती है। सुधा उसे अपने बेडरूम में ले जाती है… अपनी असल पहचान से अशोक दो डरा हुआ है। पीछे आ रहे बहादुर दो को टेक्सी वहां छोड़ जाती है। वो अशोक दो का कोड गीत ‘प्रीतम आन मिलो’ तरकीब याद कर अपने अशोक की पहचान स्थापित करने की कोशिश करता है। लेकिन उसका भ्रम कम नहीं होता क्‍योंकि प्रेमा भी बहादुर दो को अपना बहादुर मानकर किचन में मदद का आग्रह करती है। जबकि ऊपर कमरे में अशोक सुधा से बच निकलने की कोशिश में है। सुधा उसे व्हिस्‍की पिलाने में नाकाम हो जाती है। व्हिस्‍की इसलिए क्योंकि अशोक एक को नशे में एकमात्र शराब का शौक है। अशोक दो बहादुर दो के सवालों से भी घिरता है। बहादुर उसे पकोड़ा खाने से इसलिए मना कर रहा होता है, क्योंकि उसमें भांग मिला है। लेकिन उनमें से सुधा पकोड़ा खा लेती है। वहीं दूसरे छोर पर अशोक एक एवं बहादुर एक जौहरी की दुकान पर सुधा का हार मिलने का इंतजार कर रहे हैं।

अशोक दो की अशोक एक के परिवार के सामने एक नहीं चलती है। मजबूर होकर वह शराब ले लेता है। अब वो शराब के नशे में डूब चुका है। वहीं सुधा पर पकोडे में मिले भांग का असर दिखने लगता है। नशे की हालत में अशोक दो तनु के कमरे की तरफ चला जाता है। थोड़ा पकोड़ा वो तनु को भी खिला देता है। जल्द ही तनु भी बदहोशी की हालत में आ जाती है। नीचे सीढ़ी पर बहादुर दो प्रेमा को नशे में लाकर सुला देता है। फिर भाग कर अशोक दो की खोज में ऊपर चला जाता है। लेकिन अशोक उसे नहीं मिलता। परेशान होकर वो भी भांग टोली में शामिल होने चला जाता है। इसी बीच अशोक एक व बहादुर एक हार लिये बिना वापस घर लौट रहे हैं। छेदीलाल से वायदा लेकर कि अगली सुबह हार घर पर पहुंचा दिया जाएगा। दूसरी तरफ दरवाजे पर होने वाली दस्तक (अशोक एक व बहादुर एक) को बहादुर दो गैंग का आदमी समझ बैठा है। नगर वालों की ऊलजुलूल हरकतों के लिए इसी गैंग को जिम्मेदार मानता है। वो एवं अशोक दो अभी तक यही समझ रहे हैं कि कुछ लोग उनसे उनके रुपये लेने पर तुले हैं। दरवाजे पर खड़े लोगों को भगाने के लिए बहादुर दो हास्यास्पद तरीके से कुत्ते की आवाज निकालने लगता। इस तरह अशोक एक और बहादुर एक को भी भ्रमित रखने में कामयाब रहता है। अशोक एक व बहादुर एक को वहां से भी जाना पड़ता है। थक हार कर दोनों अलका के घर आराम करने चले जाते हैं। अगली सुबह अशोक दो व बहादुर दो बेसुध प्रेमा से कमरे की चाभियां लेने में कामयाब हो जाते हैं। इस तरह वहां से भाग निकल आते हैं। दोनों को भरोसा हो चला है कि पूरा शहर उलजुलूल सा हो है। यहां उनकी जमापूंजी सुरक्षित नहीं रहेगी। वो रुपये लेकर इंपीरियल होटल से निकल जाते हैं। रास्‍ते में उन्हें छेदीलाल का कारीगर मंसूर मिलता है। मंसूर से उन्हें हार घर पर पहुंचा देने की बात कहता है। अलका के घर पर आराम करने गये अशोक एक बहादुर को उसके घर से कपड़ा लाने को कहता है। अपनी पत्नी के बेकार लेकिन परेशान करने वाले शक से डर कर वो उसी वक्त हार लाने के लिए वह जौहरी छेदीलाल पास निकल जाता है। आगे क्या होगा? जब उसे मालूम होगा कि हार पहले ही पहुंचा दिया गया? अशोक दो आगे क्या करेगा? क्या वो हार लेकर बहादुर दो के साथ शहर से चला जाएगा? सुधा पर क्या गुजरेगी जब उसे पता चलेगा कि पति ने बीती रात परायी औरत के साथ गुजारी है? उलझन से उलझन को जोड़ती कहानी एक दिलचस्प मोड़ पर जाकर खत्‍म होती है।

Saiyad S Tauheed
(सैयद एस तौहीद। जामिया मिल्लिया से स्नातक। सिनेमा केंद्रित पब्लिक फोरम की लोकप्रिय साईट से लेखन की शुरुआत। आजकल सिनेमा व संस्कृति विशेषकर हिंदी फिल्मों पर लेखन। उनसे passion4pearl@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)

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