आज खामोश रहे तो कल सन्नाटा छाएगा!

➧ अशोक कुमार पांडेय

हुत पेचीदा समय है यह और इससे मुठभेड़ करने की रणनीति तलाशने से पहले हमें भूमिका के बतौर न सिर्फ इसे समझना होगा बल्कि जिम्मेदारीपूर्वक इसे दूसरों तक पहुंचना और उनके दृष्टिकोण को शांतिपूर्वक समझ कर खुले दिमाग से बहसों में हिस्सेदारी भी करनी होगी। यह काम आज के दौर में खासा मुश्किल है लेकिन उतना ही जरूरी भी। अपने इस प्रस्ताव नोट में हम इसकी एक संक्षिप्त लेकिन ईमानदार कोशिश कर रहे हैं।

शुरुआत इसी से की जाए कि हम इस समय को कैसे देख रहे हैं। जाहिर तौर पर आज की पेचीदगी का सच यह भी है कि हमारा समय असंख्य अंतर्विरोधों और द्वंद्वों से भरा हुआ है। हम देख रहे हैं कि विकास के वैश्विक और देशज माडल एक तरफ हमें अधिक सुसंपन्न, समृद्ध समाज की ओर ले जाने का दावा तो करते हैं लेकिन दूसरी तरफ विकास के नाम पर बनती और गढ़ी जाती संस्कृति की नृशंस परिभाषायें लगातार असमानता का विस्तार कर एक नए ढंग से निर्मित ब्लैक होल में ढकेलती जा रही हैं। विकास के स्वप्न के एवज में एक अधिक प्रगतिशील, लोकतांत्रिक और न्यायसंगत समाज के प्रतिफल का वादा तो उछलता है लेकिन निराशा के साथ कहना पड़ता है कि हमारे सामने उपस्थित वास्तविकताएं इन सर्वथा विपरीत प्रमाण प्रस्तुत कर रही हैं। अजीबोग़रीब ढंग से प्रगतिशील समाजों में उन नए मूल्यों का निर्माण हो रहा है जिनकी उपयोगिता मनुष्य की वैचारिक चेतना और तर्कशीलता के वैज्ञानिक मूल्यों के खिलाफ है और धर्म ऐसे समाजों को निरंतर एक सुविधाजनक औजार उपलब्ध करा रहा है। चूंकि धर्म का अभूतपूर्व ढंग से सत्ता तथा पूंजी से सम्बन्ध गहराता जा रहा है तो उसे वह ताक़त भी मिल रही है कि वह सामाजिक परिष्कार, किसी प्राचीन स्थान और खोये हुए गौरव को तर्कहीनता या कुतर्कों से समाज में स्थापित करने की एक अतार्किक परिभाषा गढ़ सके। और भागते दौड़ते महत्त्वाकांक्षी समाजों में इन नए माडल्स से जितनी अनिश्चितताएं पैदा कर दी हैं उनके चलते पैदा हुईं असुरक्षाओं और भय का चालाकी से उपयोग कर धर्म की सुरक्षा के पैरोकार अपने खूंखार इरादों को समाज में आसानी से लागू कर पा रहे हैं। धर्म के इस प्रभाव के साथ उससे जुड़ी दूसरी प्रगतिविरोधी धारणाएं जैसे स्त्रियों, आदिवासियों, दलितों और अन्य वंचित वर्गों के प्रति वर्चस्वशाली वर्ग का अवहेलनापूर्ण और दमनकारी रवैया भी समाज में हिंसा के नए पुराने रूपों को जन्म दे रहा है और फलने फूलने के लिए खाद पानी उपलब्ध करा रहा है। इसके साथ ही बढती असमानता के साथ तेजी से हाशिये पर जा रहे ग़रीब और वंचित तबके के प्रति भी ऐसा ही रवैया है। विकास की दौड़ में पीछे छूट गये लोग लगातार उसके पैरों तले कुचले जाने को मजबूर हैं। और यह सिर्फ भारत में नहीं बल्कि दुनिया भर में देखा जा सकता है।

शार्ली हेब्दो के पत्रकारों की हत्या का मामला हो, पेशावर में बच्चों की क्रूर हत्या हो, फलस्तीन में कई दशकों से जारी दमन हो, अंधविश्वासों के खिलाफ अलख जगाए नरेंद्र दाभोलकर की हत्या हो, कन्नड़ लेखक अनंतमूर्ति पर पहले हुए हमले और फिर उनकी मृत्यु पर मिठाइयां बांटने का मामला हो, किताबें जलाने की घटनाएं हों या फिर सोशल मीडिया पर लिखने, कार्टून बनाने या विरोध करने पर हुई गिरफ्तारियां या हमलों की घटनाएं हों, अपनी जमीन या अपना पर्यावरण बचाने के लिए उड़ीसा से लेकर कुडनकुलम तक के किसानों या अपने अधिकारों के लिए सड़क पर उतरे जयपुर से उत्तराखंड तक के छात्रों का बर्बर दमन हो, यह सब एक ही फिनामिना के अलग अलग आयाम हैं। आज हालत यह है कि तमिल लेखक पेरूमल को नियोग प्रथा का अपने उपन्यास में चित्रण करने के लिए इस क़दर अपमान और हमला झेलना पड़ता है कि वह लेखन छोड़ने और अपनी मृत्यु की घोषणा करने पर विवश होते हैं। एक लोकतांत्रिक समाज में एक लेखक की, कलाकार की अभिव्यक्ति की आजादी पर ऐसा हमला उसके लोकतांत्रिक होने पर सवाल उठाता है और फासीवाद के आगमन की स्पष्ट सूचना देता है। लेकिन जिस समाज में जनता असुरक्षित हो, जनता की अभिव्यक्ति बाधक हो वहां लेखक या कलाकार की अभिव्यक्ति की आजादी का मसला कोई अलग मसला नहीं हो सकता। दोनों एक दूसरे से नाभिनालबद्ध रूप से जुड़े हुए हैं।

“हिंसा के खिलाफ कला” ऐसे ही माहौल में हिंसा के इन विभिन्न रूपों के खिलाफ कला और साहित्य के माध्यम से वैचारिक प्रतिकार और समाज में सहिष्णुता तथा समानता की चेतना के विकास के लिए कोशिश करने हेतु गठित एक लोकतांत्रिक मंच है। दिल्ली में सोलह अक्टूबर की घटना के बाद जंतर मंतर पर हुई एक बैठक में इसका अनौपचारिक गठन किया गया तथा उसी समय एक प्रस्ताव नोट करने की जिम्मेदारी एक ड्राफ्ट कमिटी को दी गयी। अपने इस संक्षिप्त नोट के साथ यह कमिटी समूह के कार्यभारों से सम्बद्ध कुछ बिंदु यहां प्रस्तुत करना चाहती है।

“हिंसा के खिलाफ कला” एक लोकतांत्रिक मंच होगा जहां “सक्रियता ही सदस्यता है” का सिद्धांत लागू किया जाएगा।
➡ यह साहित्य, संगीत संस्कृति, रंगमंच, कार्टून, पेंटिंग सहित समस्त कलारूपों में सक्रिय लोगों का एक मंच होगा।
➡ यह मंच एक तरफ समाज में व्याप्त हर तरह की हिंसा के खिलाफ पहलकदमियां लेगा तो दूसरी तरफ समाज में ऐसी हिंसक वृत्तियों को पनपाने वाली शिक्षा तथा प्रचार का सामना करने के लिए बच्चों, स्त्रियों, वंचित वर्गों से लेकर बौद्धिक वर्ग तक के बीच काम करने का प्रयास करेगा ताकि समाज में लोकतांत्रिक मूल्यों की स्थापना में सहयोगी भूमिका निभा सके।

हम सभी समानधर्मा कलाकारों तथा आमजनों से यह अपील करते हैं कि हमारे साथ जुड़ें और साथ ही अपनी असहमतियां भी दर्ज कराएं। इस दिशा में अपनी राय खुलकर रखें और देश और दुनिया में एक सहिष्णु, लोकतांत्रिक और समानतापरक समाज व्यवस्था के निर्माण में साहित्य-कला की भूमिका को लेकर अपने विचार हमसे साझा करें।

याद रखें, आज अगर खामोश रहे तो कल सन्नाटा छाएगा!

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