रूह से रूह तक का सफर #TheFrozenRose

➧ सैयद एस तौहीद

इंसान दुनिया में जिस किसी को मोहब्‍बत में जान से ज्यादा अजीज बना लेता है, परवरदिगार उसे उस जैसा बना दिया करता है। खुदा की दूसरी दुनिया के बाशिंदों को इंतजार करने वाली रूहें कहना चाहिए। इंसान की भी आखिरी ख्वाहिश शायद यह रहती होगी कि मर कर वहीँ जाएगा, जहां उसके अजीज सबकुछ छोड़ चले गये। आज के बाजारू जहान में लोग मरने के बाद जान-पहचान अथवा अजीज लोगों का सामना करने से डरने लगे हैं। लेकिन जिस्म फानी मिट जाने बाद रूह वहीँ जाएगी। खुदा सबकी सुनेगा व सबका इंसाफ करेगा। रूहानी मोहब्‍बत से जुड़े धागे फना होकर जुड़ जाएंगे। मरने के बाद परवरदिगार दोनों को फिर से मिला देगा। खुदा किसी को बहुत जल्द अपने पास बुला कर गुजर चुके लोगों के आखिरी जहान में भेज देता है। रुक्याह के अब्बू जंग पर से वापस नहीं आये। मासूम बच्ची यह कबूल नहीं कर सकी कि उसके पिता अब कभी नहीं वापस आएंगे। पिता व पुत्री के सुंदर रिश्ते पर आधारित The Frozen Rose रूहानी मोहब्‍बत की बेमिसाल कहानी कहती है। मर कर रूहों को एक होने का रुला देने वाला किस्सा बयान करती है। जंग पर गये सिपाही अक्सर घरों का मुंह देख नहीं पाते। उनके बाद परिवार वालों की जिंदगी एक कठिन सफर की रहगुजर हो जाती है। रुक्याह को अपने अब्बू की वापसी का पूरा भरोसा है। जंग पर जाने वाले सिपाहियों से भरी रेलगाडी जब कभी बस्ती से होकर गुजरती, वहां `के बच्चे उनके लिए फूलों के गुच्छे लेकर आते। फूल से खुबसूरत बच्चे इन फूलों को कुछ रूपये के बदले फौजयों को बेच देते थे। फूलवाले बच्चों की कतार में रुक्याह सबसे आखिर में खड़ी रहा करती है। रेलगाड़ी आने पर यह बच्चे अपने अपने गुच्छों के साथ इंतजार में वहीँ रहते। रेल रुकती तो खिड़कियों पर सिपाही आते। फूलों के गुच्छे उनका स्वागत कर रहे होते। फूलवाले बच्चे उन्हें रंग-बिरंगे फूल दे दिया करते। जितनी देर तक बाकी बच्चे वहां से चले नहीं जाते, रुक्याह अपनी जगह पर खड़ी रहती। इन फौजियों में उसे अपने पिता की तलाश रहा करती थी। उसके अब्बू एक दिन वापस आएंगे, इसी उम्मीद पर अरसे से फूल के गुच्छे लेकर वह आती रही। वो जंग पर जा रहे सिपाहियों को फूल जरूर देती लेकिन उसके बदले रुपये नहीं लेती। कुछ मीठा लेकर ही जहेनसीब हो जाया करती।

कहा जाता था कि जो कोई सिपाही रुक्याह से फूल लेता, उसे जंग में शहीद होना नसीब होता। जंग पर जा रहे इन लोगों में जब उसे अब्बू नजर नहीं आते तो आखिर में किसी एक को फूल भेंट दे दिया करती। उससे मिले फूलों के सामने खरीदे फूल मायने नहीं रखते थे। वो जमीन फेंक दिये जाते। जंग पर जा रहे इन मतवालों से उस प्यारी लड़की से एक प्रेरक नाता था। वो चाहती थी कि उसके अब्बू भी जंग पर बार-बार जाएं लेकिन वो अब जिंदा नहीं थे। वो इस कड़वी हकीकत को दो बरस बाद भी कुबूल नहीं कर पाती है। इसलिए अब भी गुच्छे लेकर रेलगाड़ी आने के वक्त पर चली आती। उसका दिल अपने प्यारे अब्बू से एकात्म हो चुका है। अम्मी के बताने पर भी उसका दिल उस तरफ से मुड़ता नहीं है। एक मर्तबा वो आधी रात को फूल लेकर रेलगाड़ी के इंतजार में जाने की जिद करने लगती। अम्मी को जब खबर लगती है और वह उसे समझाती है कि उसके अब्बू जंग में शहीद हो गये। खुदा की दूसरी दुनिया में चले गये। अब उनकी कभी वापसी नहीं होगी। अम्मी की बातों ने मासूम की आखों में आंसू भर दिये। मां के मजबूर दिल को बिटिया की जिद माननी पड़ती है। बर्फबारी होने वाली है, इसलिए सिर्फ आधे घंटे तक बाहर रहने का वक्त दिया जाता है। वो घर की खिड़की से बिटिया को देख रही है। बदकिस्मती से अम्मी की आंख लग जाती है। इस बीच काफी वक्त गुजर जाता है। बाहर में बहुत तेज बर्फबारी हो रही है। मां को होश आता है। बिटिया की लिए पटरियों की तरफ बेदम दौड़ पड़ती है। करीब पहुंच कर कुछ ऐसा देखती है, जिसे एक मां जीते जी कभी देखना तसव्वुर नहीं करेगी। गुलाब सी नाजुक व खूबसूरत रुक्याह अब्बू की याद में शहीद हो चुकी है। हमेशा के लिए अब्बू के पास चली गयी है। बर्फ की चादर में लिपटा एक गुलाब दुनिया से कूच कर गया है। खुदा ने दो लोगों को हमेशा के लिए मिला दिया है। मगर किस तरह? परवरदिगार अब किसी को वक्त से पहले न बुलाये शायद।

Saiyad S Tauheed
(सैयद एस तौहीद। जामिया मिल्लिया से स्नातक। सिनेमा केंद्रित पब्लिक फोरम की लोकप्रिय साईट से लेखन की शुरुआत। आजकल सिनेमा व संस्कृति विशेषकर हिंदी फिल्मों पर लेखन। उनसे passion4pearl@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)

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