गाली-मुक्‍त सिनेमा में आ पाएगा पूरा समाज?

सिनेमा समाज की कहानी कहता है और समाज की गलियों में सहज-स्‍वाभाविक रूप से गाली की आवाजाही है। यह अच्‍छा है या बुरा, इस पर बहस करने की जगह यह मानना जरूरी है कि यह सच है। संसद में गालियों पर प्रतिबंध है, लेकिन समाज में नहीं। सांसद अगर किसी ऐसे शब्‍द का उपयोग करते हैं, तो उसे कार्यवाही से हटा दिया जाता है – लेकिन सिनेमा संसद नहीं है। वह समाज को उसी रूप में दिखाने की कोशिश करता है, जो समाज में है। अगर उसे ऐसा करने से रोकेंगे तो हम सच का एक हिस्‍सा सामने आने से रोक देंगे।

समाज में जिस किस्‍म का वर्ग है और उस वर्ग की जिस किस्‍म की पर‍वरिश है, जबान उसकी पैदाइश है। हम किसी जज या शिक्षक के मुंह से गाली की कल्‍पना नहीं कर सकते। लेकिन कोई मवाली अगर गाली-रहित जबान रखता है, तो उसे मवाली की तरह देखने का उत्‍साह भी नहीं दिखा सकते। इसलिए अभिव्‍यक्ति की विधाओं के लिए यह जरूरी है कि उन्‍हें सेंसर से मुक्‍त रखा जाए।

समाज को बेहतर बनाने की कोशिश राजनीतिक और सामाजिक स्‍तर पर होनी चाहिए। समाज की भाषा और रहन-सहन का रिश्‍ता इन्‍हीं कोशिशों से है। समाज जो कचरा पैदा करता है, उस कचरे को साफ करने की जिम्‍मेदारी नगरपालिका की है। नगरपालिका अगर दुरुस्‍त रहेगा, तो समाज का कचरा सड़क पर नजर नहीं आएगा। अभिव्‍यक्ति की तमाम विधाओं की जवाबदेही समाज का हर पहलू दिखाने की है, इसलिए संसर बोर्ड का गाली-मुक्‍त सिनेमा का नया आदेश एक अतिरेकी कदम है।

आइए देखें कि यू और यूए सर्टिफिकेट के लिए जिन गालियों से परहेज करने के लिए कहा गया हैं, वे कौन कौन सी गालियां हैं…

ENGLiSH

➡ Bastard
➡ Son of a bitch
➡ Masturbating
➡ Fuck, fucker or fucking
➡ Mother fucker
➡ Fucking kunt
➡ Cock sucker
➡ Screw
➡ Dick
➡ Asshole
➡ Bitch or fucking bitch
➡ Pussy

हिंदी

➡ हरामजादा
➡ हरामी, हराम का पिल्‍ला, हराम का जना
➡ भड़वा/दल्‍ला
➡ मादरचोद
➡ बहनचोद
➡ भोंसड़ी के
➡ गांडु
➡ चूतिया
➡ कुतिया, रांड, रंडी, रखैल, साली
➡ मारना, लेना, देना, बजाना, फटना
➡ नारी के प्रति हिंसा
➡ खून-खराबा

अभी हाल में सेंसर बोर्ड की नयी टीम बनी है और पहलाज निहलानी इस टीम के लीडर हैं। यानी सेंसर बोर्ड के नये अध्‍यक्ष। पहलाज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रशंसक हैं और लोकसभा चुनाव के वक्‍त उन्‍होंने हर-हर मोदी नारे का इस्‍तेमाल करते हुए एक मशहूर प्रचार-वीडियो भी बनाया था। कहते हैं कि उसी काम के पारिश्रमिक के बतौर उन्‍हें इस पद पर बैठाया गया है। आइए, हम पहलाज निहलानी की ही एक फिल्‍म का यह गाना सुनते हैं, जिसमें डबल-मीनिंग अर्थ तलाशने की भरपूर गुंजाइश निकाली गयी है। उम्‍मीद है यह गीत हमारे दर्शकों को पसंद आएगा।

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