जानें पहली महिला पत्रकार एनी न्‍यूपोर्ट को

➧ अनुपमा

ज अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस है। दुनिया भर में महिलाओं के अधिकार, उनकी चुनौतियों और संभावनाओं पर बात होगी। साथ ही अलग-अलग विधाओं में सक्रिय रही महिला नायकों को याद करते हुए उनके व्यक्तित्व-कृतित्व के विविध पहलुओं को रेखांकित भी किया जाएगा।

राजनीति, कला, संस्कृति, सिनेमा, साहित्य जगत से तो कई महिलाओं का नाम देश और दुनिया के स्तर पर बार-बार आता है और लोग उन्हें जानते भी हैं। लेकिन पत्रकारिता जगत से महिला नायकों का नाम बमुश्किल सामने आ पाता है। आज भी महिलाओं के लिए पत्रकारिता का पेशा दुरूह माना जाता है। हालांकि आज बड़ी संख्या में महिला पत्रकार सक्रिय हैं। लेकिन सोचिए कि जब आज इतनी कठिनाइयां या चुनौतियां महिला पत्रकारों के लिए दिखती हैं, तो उस महिला के सामने कितनी बड़ी चुनौती रही होगी, जिसने बतौर पहली महिला पत्रकार इस पेशे में कदम रखा होगा। आज हम उसी पहली महिला पत्रकार को याद करते हैं। उनका नाम था एनी न्यूपोर्ट रॉयल।

एनी ने न केवल पत्रकारिता के क्षेत्र में महिला होकर पहला कदम रखा बल्कि एक ऐसी नजीर पेश की कि वह आने वाली पीढ़ियों के लिए आदर्श बन गयी। उम्र की जिस दहलीज पर व्यक्ति अपने कामों को समेटना और आराम करना चाहता है, उस उम्र में एनी ने पत्रकारिता जैसे बेहद दुरूह, संघर्षशील और चुनौती भरे क्षेत्र में कदम रखा था। तब महिलाओं के लिए यह पेशा अबूझ पहेली, रहस्य की तरह होने के साथ ही अछूत जैसा भी था। एनी न्यूपोर्ट रॉयल को विश्व की पहली महिला पत्रकार होने का गौरव प्राप्त है।

सन 1831 में एनी ने 62 वर्ष की आयु में “पॉल प्राइ” नामक साप्ताहिक पत्र निकालकर इस क्षेत्र में कदम रखा। हालांकि इस साप्ताहिक पत्र में आसपास के क्षेत्रों की सूचनाएं और रोचक समाचारों के साथ गपशप का पिटारा हुआ करता था, लेकिन इसकी संपादकीय टिप्पणियां इतनी करारी और तेज हुआ करती थीं कि लोग इससे खौफ खाते थे। भारत में यह हिंदी के अखबारों के उदय का समय था। वर्ष 1826 में ‘उद्दंत मार्तंड’ को पहला हिंदी अखबार होने का गौरव प्राप्त है और इसके ठीक पांच साल बाद ही एक महिला अमेरिका में “पॉल प्राइ” नामक खुद का अखबार निकालने का साहस कर रही थी।

यह साप्ताहिक पत्र 3 दिसंबर, 1831 से शुरू होकर 19 नवंबर, 1836 तक चला और फिर कुछ कारणों से बंद हो गया। लेकिन उनकी हिम्मत की दाद देनी होगी कि अपने साप्ताहिक पत्र के बंद हो जाने के बावजूद इस साहसी वृद्धा ने हिम्मत नहीं हारी और ठीक 13 दिन बाद ही ‘हंट्रेस’ (शिकारिनी) नामक एक नये पत्र का प्रकाशन आरंभ कर दिया। यह नया पत्र अपने नाम को सार्थक करता था और पत्रिका बिल्कुल अपने नाम के अनुरूप ही गुणों वाली थी। यह पत्र जुलाई, 1854 तक लगातार प्रकाशित होता रहा। न्यूपोर्ट को अखबार से इतना लगाव था कि ‘हंट्रेस’ पत्र के बंद होने के तीसरे महीने बाद ही यानि सितंबर 1854 में वे दुनिया से रुखसत हो गयीं।

अपने समय में एनी का ताप था। बड़े से बड़े राजनीतिज्ञ उनकी साहस की कद्र करते थे, उनकी ईमानदार पत्रकारिता से खौफ खाते थे। अमेरिकी राष्ट्रपति तक उनकी बातों को मना नहीं कर पाते थे। ठिगनी कद वाली एनी का जलवा अपने जमाने में ऐसा था कि बिना टीवी-इंटरनेट वाले युग में मामूली प्रसार वाली पत्रिका की पत्रकारिता के जरिये ही वह अपने देश समेत दुनिया के कई मुल्कों में चर्चित नाम व व्यक्त्त्वि बन चुकी थी।

एनी अपने अखबार में लेखन, प्रकाशन करने के साथ साथ उसे बेचने का कार्य भी स्वयं करती थी। उनके अखबार का मुख्य केंद्र बिंदु था कांग्रेस का परिसर। एनी को घोटालों का परदाफाश करने और साहसी टिप्पणियों के लिए प्रसिद्धि मिली थी और वे जिस बात का विरोध करती थी, उसे पूरी उग्रता से व्यक्त भी करती थीं। उनकी उग्र संपादकीय टिप्पणियों और साहसिक परदाफाश करनेवाली खबरों के कारण जहां सामान्य जनता में उनके ढेरों समर्थक थे, वहीं उनके विरोधियों की संख्या भी कम नहीं थी। एक बार तो टिप्पणियों से चिढ़कर एनी के विरोधी ने उनको सीढ़ियों से धक्का तक दे दिया था, जिससे उनकी टांग टूट गयी थी। लेकिन एनी ने अपनी स्पष्टवादिता नहीं छोड़ी। एनी का पत्र रविवार को डाक से भी जाता था। एनी जहां मंत्रियों, पादरियों की विरोधी थीं, वहीं सामाजिक जीवन में नैतिकता की पक्षधर और कैथोलिकों के प्रति सहिष्णु थीं। अमेरिका के द्वितीय राष्ट्रपति जॉन क्यूंसी एडम्स (1735-1826) भी एनी के अच्छे मित्र और सहायक थे। वे उनके व्यवहार को विचित्र पागलपन मानते थे। एडम्स के साथ घटी घटना काफी मजेदार और दिलचस्प है। एडम्स अपने भवन के पीछे बहनेवाली नदी में स्नान करते थे और कपड़े उतार कर किनारे रख देते थे। एक दिन नहाने के बाद वो जैसे ही किनारे आनेवाले थे, उन्होंने देखा कोई स्त्री कपड़ों पर बैठी है। बहुत कहने पर भी वह नहीं उठी और एडम्स ने जब उन्हें किसी खास मसले पर एकांतिक साक्षात्कार का वादा किया, तभी हटीं। एनी ऐसी ही जूनूनी, हठी और लगनशील थीं।

एनी ने अपने आखिरी समय आने तक अपनी धारदार पत्रकारिता, संघर्ष के जरिये बनाये सृजनात्मक रास्ते से भले ही अमेरिका समेत दुनिया भर में अपनी पहचान बनाने में सफल रहीं, लेकिन उनका आरंभिक जीवन कठिनाइयों से भरा हुआ था। बचपन से ही वह चुनौतियों से जूझती रहीं। उनका जन्म 11 जून, 1769 को बाल्टिमोर के पास हुआ था। उनके पिता का नाम विलियम न्यूपोर्ट था। उनके पिता की मृत्यु तभी हो गयी थी, जब वो महज पांच साल की थीं। कुछ वर्षों बाद वो मां के साथ स्वीट स्प्रिंग आ गयीं, जहां मां ने कप्तान विलियम रॉयल के घर नौकरानी का काम शुरू कर दिया। रॉयल विद्वान किसान थे और अमेरिका के प्रथम राष्ट्रपति के मित्र थे। उनका एक विशाल पुस्तकालय भी था। तब एनी महज सोलह साल की थीं। वह उन्हें किताबों को पढ़ने की इजाजत के साथ जीवन और समाज के अन्य विषय पर भी बताते थे। बाद में सन 1797 में जब एनी 28 वर्ष की थीं और रॉयल 48 के तो उन्होंने उनसे विवाह कर लिया। वर्ष 1813 में रॉयल की मृत्यु हो गयी और आगामी दस वर्ष एनी के सुख के रहे लेकिन सन 1823 में रॉयल के रिश्तेदारों ने मुकदमा चला कर उनकी सारी संपत्ति हड़प ली, यह कहकर कि यह शादी अवैध थी।

54 साल की उम्र में एनी के पास फूटी कौड़ी भी नहीं थी। एनी के पति ने अमेरिकी क्रांति में भाग लिया था, सो उन्होंने विधवा पेंशन की मांग की। 25 साल बाद उन्हें दो हजार 400 डॉलर मिले, जिसका आधा भाग पति के रिश्तेदारों ने ले लिया। बचे आधे पैसे कर्जदारों और कानूनी फीस में चले गये। अब उनके पास केवल दस हजार डॉलर थे। सन 1820 से 1848 तक उन्होंने देश के प्रमुख क्षेत्रों का दौरा किया। इस दौरान वह अपने एक मित्र को पत्र लिखा करती थीं, जो एक पांडुलिपि में बदल गया और यही पत्र बाद में ‘लेटर्स ऑफ अल्बामा’ के नाम से प्रकाशित हुए। इसके अलावा अपनी सांस्कृतिक, सामाजिक, आर्थिक समझ के आधार पर उन्होंने ‘स्केचेज ऑफ हिस्‍ट्री’, ‘लाइफ एंड मैनर्स इन युनाइटेड स्टेट्स’ जैसी किताबें लिखीं। एक उपन्यास ‘टेनेसीअन’ भी एनी ने लिखा। उन्होंने अपने जीवनकाल में दस किताबें लिखीं। हालांकि यह अलग बात है कि एनी को अपने जमाने में तो वह प्रसिद्धि मिली लेकिन आज वे जिस नायकत्व की हकदार हैं, उन्हें वह नायकत्व खुद पत्रकारिता जगत ही नहीं देता।


अनुपमा। चर्चित पत्रकार। प्रभात खबर में लंबे समय तक जुड़ाव के बाद तहलका की झारखंड संवाददाता बनीं। महिला और मानवाधिकार के सवालों पर लगातार सजग। देशाटन में दिलचस्‍पी। फिलहाल महात्‍मा गांधी अंरर्राष्‍ट्रीय हिंदी विश्‍वविद्यालय से पीएचडी कर रही हैं। उनसे log2anupama@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।

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