साइबर बुलींग प्रताड़ना का नया कल्‍चर है

♦ मोनिका लेंविस्‍की

पके सामने एक ऐसी औरत खड़ी है, जो सार्वजनिक तौर पर दस साल से ख़ामोश रही। ज़ाहिर है, वो ख़ामोशी टूट रही है, और ये हाल में ही शुरू हुआ है। तब से कुछ महीने बीत चुके हैं, जब मैंने पहली बार सार्वजनिक रूप से कुछ बोला। फ़ोर्ब्स थर्टी अंडर थर्टी सम्मेलन में। 30 साल से कम उम्र के 1500 प्रतिभाशाली लोगों के सामने। अंदाज़ा लगाइए कि 1998 में इनमें से सबसे बड़े लोग भी बमुश्किल 14 साल के रहे होंगे, और सबसे छोटे तो बस चार बरस के। मैंने मज़ाक में उनसे कहा कि आपमें कुछ ने तो मेरा नाम सुना भी होगा, तो सिर्फ़ रैप गानों में। जी हां, मैं रैप गानों में बकायदा मौजूद हूं। लगभग 40 रैप गानों में।

पर जिस रात मैंनें वो भाषण दिया, एक अचरच भरी बात हुई। 41 साल की उमर में मेरे करीब आने की कोशिश की 27 साल के एक लडके ने। बाप रे! है न? वो बहुत अच्छा था और मैं काफ़ी खुश महसूस कर रही थी, मगर मैंने बात वहीं खत्म कर दी। पर पता है उसने मुझसे क्या कहा? कि वो मुझे फिर से 22 जैसा महसूस करवाएगा।

मैंने उस रात बाद में सोचा, कि शायद मैं ऐसी अकेली 40 साल की व्यक्ति हूं, जो फिर से कभी 22 की नहीं होना चाहती।

22 साल की उम्र में, मुझे अपने बॉस से प्यार हो गया, और 24 की उम्र में, मैंने उसके भयानक नतीज़े झेले। क्या यहां बैठे लोगों में से वो शख्स हाथ उठाएंगे, जिनसे 22 की उम्र में कोई ग़लती नहीं हुई या ऐसा कुछ, जिसका उन्हें पछतावा नहीं है? बिलकुल। मैंने ठीक सोचा था कि ऐसा कोई नहीं होगा। तो मेरी ही तरह, 22 साल में, आपमें कुछ लोग गलत मोड़ों पर मुड़े होंगे और गलत लोगों के प्यार में पडे होंगे, हो सकता अपने बॉस के प्यार में। लेकिन मेरी तरह शायद आपके बॉस अमरीका के राष्ट्रपति नहीं रहे होंगे।

सच है कि ज़िंदगी अजूबों से भरी पड़ी है। एक दिन भी ऐसा नहीं जाता जब मुझे अपनी ग़लती याद नहीं करायी जाती, और मुझे अपनी ग़लती का भरपूर पश्चाताप भी है।

1998 में पहले मैं ऐसे रोमांस के भंवर में फ़ंसी, जिसका अंत होना ही नहीं था, और फिर ऐसे भयानक राजनीतिक, कानूनी और मीडिया के भंवर में फ़ंसी, जैसा मैंने कभी न देखा था न सोचा था।

याद कीजिए, कि 1998 से सिर्फ़ कुछ साल पहले तक ही, समाचार सिर्फ़ तीन जगहों से मिलते थे: अखबार या मैगज़ीन पढ़ कर, रेडियो सुन कर, या टीवी देख कर। बस। मगर मेरे भाग्य में कुछ और था। इस स्कैंडल की ख़बर आप तक डिजिटल क्रांति के जरिये आयी। इसका अर्थ ये था कि हम जानकारी पा सकते थे। जब हम चाहें, जहां हम चाहें, और जब जनवरी 1998 में ये ख़बर निकली, तो वो ऑनलाइन निकली। पहली बार ऐसा हुआ कि पारंपरिक मीडिया को इंटरनेट ने पछाड़ दिया था। एक बड़ी ख़बर को ले कर। एक क्लिक, जो सारी दुनिया में गूंज उठी थी। निजी तौर पर मेरे लिए। इसका मतलब था कि रातोंरात मैं पूरी तरह से गुमनाम व्यक्ति से सारी दुनिया में बदनाम व्यक्ति में बदल गयी। मैं पहली शिकार थी, अपनी सारी प्रतिष्ठा सारे विश्व में एक क्षण में गंवा देने की इस नयी बीमारी की। फ़ैसला सुनाने की इस दौड़ को टेक्नॉलजी ने और हवा दी। वर्चुअल पथराव करने वालों की तो मानो भीड़ इकट्ठा हो गयी थी। हालांकि तब तक सोशल मीडिया का ज़माना नहीं आया था, मगर तब भी लोग ऑनलाइन कमेंट कर सकते थे, ईमेल में जानकारी और भद्दे कमेंट भेज सकते थे। समाचार मीडिया ने मेरी तस्वीरों को हर जगह चिपका डाला अखबार और ऑनलाइन बैनर विज्ञापन बेचने के लिए, और लोगों को टीवी से चिपकाने के लिए।

आपको मेरी कोई ख़ास तस्वीर याद आती है, वो बेरेट टोपी पहनी हुई? देखिए, मैं अपनी ग़लती मानती हूं। ख़ासकर उस टोपी को पहनने की। मगर जो छीछालेदर मेरी की गयी, इस ख़बर की नहीं, बल्कि व्यक्तिगत तौर पर मेरी, वो सच में ऐतिहासिक थी। मेरी ब्रांडिग कर दी गयी – बदचलन, आवारा, वेश्या, स्लट, बेवकूफ़, और, ज़ाहिर है, “उस टाइप की औरत”। बहुत लोगों ने मुझे देखा, मगर बहुत कम ने मुझे जाना। और मैं समझ सकती हूं : बहुत आसान है ये भूलना कि “उस टाइप की औरत” का एक वजूद था, उसकी भी आत्मा थी, और एक ज़माने में वो ऐसी टूटी हुई बिखरी हुई नहीं थी।

जब 17 साल पहले मेरे साथ ये हुआ, इसके लिए कोई नाम नहीं था। अब हम इसे साइबर-बुलींग और ऑनलाइन उत्‍पीड़न कहते हैं।

आज मैं आपके साथ अपने कुछ अनुभव बांटना चाहती हूं, और उन अनुभवो की रोशनी में अपने कल्चर पर कुछ टिप्पणियां करना चाहती हूं, और बताना चाहती हूं कि मैं कितनी आशा रखती हूं कि इसके जरिये ऐसा बदलाव आएगा, जिससे कुछ और लोगों के जीवन में कुछ परेशानी कम होगी।

1998 में, मैंने अपनी प्रतिष्ठा और आत्म-सम्मान खो दिया। मेरा लगभग सब कुछ लुट गया था और मैंने अपनी जीवन भी लगभग खो ही दिया था। मैं आपके लिए एक दृश्य रचती हूं। सितंबर 1998 है। मैं बिना किसी खिड़की वाले दफ़्तरनुमा कमरे में बैठी हूं, इंडिपेंडेट काउंसल के ऑफ़िस में, बजबजाती हुई ट्यूबलाइटों की रोशनी में मैं अपनी ही आवाज़ सुन रही हूं, उन फ़ोन कॉल से आती मेरी आवाज़ जो गुप्त रूप से टेप किये गये थे, मेरे एक तथाकथित दोस्त के द्वारा – लगभग एक साल पहले। मैं वो सुन रही हूं क्योंकि कानूनन मुझे उन्हें सुनना ही पड़ेगा। निजी रूप से 20 घंटे लंबे उन टेपों की वैधता सुनिश्चित करने के लिए। पिछले आठ महीनों से इन टेपों में जमा सामग्री मेरे ऊपर तलवार की तरह उल्टी लटक रही थी।

मतलब, कौन याद रख सकता है कि एक साल पहले उसने क्या कहा था? सहमी हुई और बेइज्‍ज़त, मैं सुन रही हूं, सुन रही हूं उस दिन की आपाधापी; सुन रही हूं खुद को, राष्ट्रपति के प्रति अपने प्यार का इज़हार करते हुए, और फिर अपने दिल टूटने का जिक्र करते हुए; कभी कभी तेज-तर्रार, कभी बस नासमझी भरी, कभी खराब बर्ताव करती, कभी असभ्य; सुन रही हूं, अंदर तक, गहरे भीतर तक शर्मिंदा, अपने सबसे खराब स्वरूप का सामना करती, ऐसा रूप जिसे मैं पहचान तक नहीं पाती।

कुछ दिन बाद, संसद में स्टार रिपोर्ट पेश होती है, और वो सारे टेप, वो चुरायी गयी बातचीत, उसमें शामिल हैं। ये डरावना है कि लोग उन सब बातों को पढ़ सकते हैं, और कुछ हफ़्तों बाद, वो ऑडियो टेप टीवी पर सुनाये जाते हैं, और उस में ज्यादातार हिस्सा ऑनलाइन रिलीज़ होता है।

पब्लिक में होने वाला अपमान दर्दनाक था। जीवन ढोया नहीं जाता था। और 1998 में ऐसे किस्से हर दिन नहीं होते थे, और ऐसे किस्से का अर्थ है चोरी से – लोगों के निजी वार्तालाप और निजी क्रियाकलापों की और फ़ोटो की, और फ़िर उन्हें सार्वजनिक करने से – बिना इजाज़त के सार्वजनिक करने से – बिना किसी संदर्भ के सार्वजनिक करने से – और बिना किसी संवेदना के सार्वजनिक करने से।

12 साल आगे चलते है 2010 में, और एक नया सोशल मीडिया जन्म ले चुका है। दुर्भाग्य से, मेरे साथ जो हुआ, वो आम बात हो चुकी है, भले ही किसी ने कोई ग़लती की हो या नहीं, भले ही ये पब्लिक फ़िगर हो या आम आदमी। कुछ लोगों के लिए इसके नतीज़े बहुत ही ज्यादा बुरे साबित हुए हैं।

मैं अपनी मां से फ़ोन पर बात कर रही थी। सितंबर 2010 में। हम उस ख़बर का ज़िक्र कर रहे थे, रुट्गर यूनिवर्सिटी के फ़र्स्ट ईयर के युवा छात्र, टाइलर क्लेमेंटी के बारे में। प्यारा, संवेदनशील और रचनात्मक टाइलर का एक ऐसा वीडियो उसके रूममेट ने बना लिया, जिसमें वो एक और आदमी के साथ अंतरंग होता दिखता था। जब ऑनलाइन दुनिया को इस वाकये की ख़बर लगी, तो भद्दी बेइज्‍ज़ती और साइबर-बुलींग का विस्फ़ोट हो गया। कुछ दिन बाद, टाइलर ने जार्ज वाशिंगटन पुल से छलांग लगा कर जान दे दी। वो महज़ 18 साल का था। मेरी मां अपना आपा खो बैठी थीं टाइलर और उसके परिवार के बारे में सोच कर। और असहनीय दुःख से भर गयी थीं, और पहलेपहल मुझे ये समझ नहीं आया लेकिन धीरे धीरे मैंने महसूस किया कि वो 1998 को फिर से जी रही थीं, वो समय जब वो हर रात मेरे सिरहाने बैठ कर बिताती थीं, वो समय जब वो मुझे बाथरूम का दरवाज़ा बंद नहीं करने देती थीं और वो समय जब मेरे माता-पिता को हरदम डर लगता था कि इतनी बदनामी मेरी जान ले कर रहेगी, सचमुच।

आज, बहुत सारे माता-पिता को ये मौका ही नहीं मिल पाता है कि वो अपने बच्चों को बचा पाएं। बहुत लोगों को अपने बच्चों की परेशानी का पता तब लगता है, जब बहुत देर हो चुकी होती है। टाइलर की दुखद, बेमतलब मौत मेरे लिए बहुत बड़ा क्षण बनी। उस घटना ने मेरे अनुभवों को एक नया संदर्भ दिया, और मैंने अपने आसपास फ़ैले शोषण और ज़ोर-ज़बरदस्‍ती को महसूस किया, और नये सिरे से देखना शुरू किया।

1998 में हमारे पास ये जानने का कोई तरीका नहीं था कि ये नयी तकनीक जिसे हम इंटरनेट कहते थे, हमें कहां ले जाएगी? तब से, इंटरनेट ने लोगों को नये तरीकों से जोड़ा है, बिछड़े भाई-बहनों को मिलवाया है, जानें बचायी हैं, आंदोलन शुरू करवाये हैं, मगर जो अंधेरा, साइबर-बुलींग, और स्लट बता कर की गयी शर्मिंदगी मैंने देखी, वो कई गुना बढ़ी है। हर दिन, ऑनलाइन, खास तौर पर कम उम्र के लोग, जो कि इससे निपटने के लिए तैयार तक नहीं हैं, इतने शोषित और प्रताड़ित होते हैं कि वो अगले दिन तक जीना भी नहीं चाहते, और कुछ तो, सच में, जीते भी नहीं। और ये ऑनलाइन नहीं, असली दुनिया में होता है। यूके की एक संस्था, जो कि कई तरह से युवाओं की मदद करती है, चाइल्डलाइन ने पिछले साल एक तथ्य जारी किया था: 2012 से 2013 के बीच, 87 प्रतिशत बढ़त देखी गयी है साइबर-बुलींग से जुड़े ईमेल और फ़ोन कॉल में। नीदरलैंड में की गयी एक जांच में पहली बार ये पता लगा कि साइबर-बुलींग खुद्कुशी की बड़ी वजह बन रहा है, ऑफ़लाइन बुलींग के मुकाबले।

हालांकि इसमें अचरच की बात नहीं है, लेकिन मुझे ये जान कर बड़ा झटका लगा कि एक और जांच ने पता लगाया कि प्रताड़ित किये जाने की भावना को लोग ज्यादा महसूस कर रहे हैं। बजाय खुशी के, और बजाय गुस्से के। दूसरों के प्रति निष्ठुरता कोई नयी बात नहीं है, मगर ऑनलाइन, तकनीकी तरीकों से किये जाने पर ये कई गुना बढ़ जाती है, बेकाबू हो जाती है, और हर समय होती रहती है। पहले तो शर्मिंदगी सिर्फ़ आस-पास, परिवार, गांव, स्कूल या नजदीकी समाज तक सीमित थी, मगर अब ये ऑनलाइन भी होती है।लाखों लोग, बिना जान-पहचान के, आपको अपने शब्दों से छलनी करते हैं, और ये बहुत पीड़ादायी होता है, और इसकी कोई बाउंडरी नहीं है कि कितने लोग आपको देख सकते हैं, और आप पर सार्वजनिक रूप से कमेंट कर सकते हैं। बहुत निजी तौर चुकानी होती है सार्वजनिक शर्मिंदगी की, और इंटरनेट के चलते चुकायी गयी कीमत कई गुना बढ़ चुकी है।

लगभग पिछले दो दशकों से, हम धीरे धीरे शर्मिंदगी और सार्वजनिक बेइज्‍ज़ती के बीज बोते आ रहे हैं अपनी संस्कृति की ज़मीन में ऑनलाइन और ऑफ़लाइन दोनों तरह से। गप्प-गॉसिप वेबसाइट, पापारात्ज़ी कैमरा, रियलटी टीवी, राजनीति, समाचार मीडिया और कभी कभी हैकर भी, इस प्रताड़ना का हिस्सा बनते हैं। संवेदन हीनता की इजाज़त सी मिल गयी है ऑनलाइन दुनिया में… जिससे दादागिरी, निजता के हनन, और साइबर-बुलींग को बढ़ावा मिल रहा है। इससे कुछ ऐसा पैदा हुआ है, जिसे प्रोफ़ेसर निकोलस मिल्स प्रताड़ना के कल्चर का नाम देते हैं। पिछले छह महीनों के कुछ बड़े उदाहरण ले कर देखिए।

स्नैप-चैट, एक ऑनलाइन सर्विस है, जो ज्यादातर युवा इस्तेमाल करते हैं, और जो संदेशों को मिटाने का दावा करती है। कुछ ही क्षणॊं में। आप समझ सकते है कि किस तरह के संदेश वहां चलते होंगे। एक तीसरी कंपनी जो स्नैप-चैटर के यूज़र को मैसेज सेव करने देती थी, हैक की गयी और एक लाख निजी बातचीत और फ़ोटो और वीडियो ऑनलाइन लीक हो गये और अब वो सदा सदा के लिए सार्वजनिक हो गये हैं।

जेनिफ़र लारेंस और कई और फ़िल्म कलाकारों का आई-क्लाउड हैक हो गया, और उनके निजी, नग्न फ़ोटो सारे इंटरनेट पर पब्लिक हो गये। बिना उनकी इजाजत के। एक गप्‍प-गॉसिप वेबसाइट पर 50 लाख बार हिट हुआ सिर्फ़ इस एक ख़बर के लिए।

और सोनी पिक्चर की हैकिंग?

जिन दस्तावेजों को सबसे अधिक देख गया, वो निजी ईमेल था जिनमें सबसे ज्यादा शर्मिंदा करने की क्षमता थी। मगर प्रताड़ना के इस कल्चर में, सार्वजनिक शर्मिंदगी से प्राइस-टैग भी जुड़े हैं और ये प्राइस-टैग पीड़ित द्वारा चुकायी गयी कीमत को नहीं नापते, जो टाइलर और कई और लोगों को, खासकर, औरतों और अल्प-संख्यकों को चुकानी पड़ती है। और एलजीबीटीक्यू लोगों ने चुकायी है, मगर ये प्राइस-टैग बखूबी नापता है इससे पैदा होने वाले मुनाफ़े को।

दूसरों पर किया गया हमला जैसे कच्चा माल है, हमला जो क्रूरता और दक्षता से होता है, और पैकेज कर के मुनाफ़े में बेचा जाता है। एक बाज़ार विकसित हुआ है, जहां सार्वजनिक शर्मिंदगी बिकती है और प्रताड़ना एक इंडस्ट्री बन गयी है।

और पैसा बनता कैसे है? क्लिक्स से। जितनी शर्मिंदगी, उतने क्लिक्स। जितने क्लिक्स, उतने विज्ञापनी डॉलर। हम खतरनाक भंवरजाल में हैं। जितना ही हम इस तरह की चीजों को क्लिक करेंगे, उतना ही संवेदनशील हम होंगे, उन ख़बरों के पीछे छुपे इंसानों के प्रति, और जितने हम संवेदनहीन होंगे, उतना ही हम क्लिक करेंगे। और पूरे समय, कोई इससे पैसा कमा रहा होगा, किसी और के दुख, परेशानी और उत्‍पीड़न के जरिये। हर क्लिक के जरिये हम एक विकल्प चुनते हैं। जितना ही हम अपने क्लचर को सार्वजनिक शर्मिंदगी से भरेंगे, उतना ही स्वीकार्य ये होती जाएगी, और उतनी ही साइबर-बुलींग हम देखेंगे, उतनी ही हैकिंग, और धमकीगर्दी। और ऑनलाइन उत्‍पीड़न। क्यों? क्योंकि इन सबकी जड़ों में शर्मिंदगी है। ये बर्ताव उस कल्चर का लक्षण है, जो हमने रचा है।

थोड़ा सोच कर देखिए। बर्ताव में बदलाव शुरू होता है बदलते मूलों से। हमने ये होते देखा है रेसिज्‍म, होमोफ़ोबिया, और ऐसे ही कई और चीज़ों में, आज और इतिहास में। और हमारे नज़रियों में बदलाव आया है – सम-लैंगिक शादियों को ले कर। ज्यादा से ज्यादा लोगों को बराबरी मिली है। जब हम निरंतरता को तवज्जो देने लगते हैं, ज्यादा से ज्यादा लोग कूड़े को रिसाइकिल करने लगते हैं। तो जहां तक हमारे कल्चर के प्रताड़ना वाले हिस्से का सवाल है, हमें एक सांस्कृतिक आंदोलन की ज़रूरत है। सार्वजनिक शर्मिंदगी का ये खूनी खेल बंद करना ही पड़ेगा।

समय आ गया है, इंटरनेट के कल्चर में हस्तक्षेप करने का। शुरुआत किसी छोटी चीज़ से होगी, और ये आसान नहीं होगा। हमें संवेदनशीलता और सहानुभूति की ओर वापस जाना होगा। ऑनलाइन दुनिया में, सहानुभूति और संवेदना की गहरी कमी है, लगभग अकाल है।

शोधकर्ता ब्रेन ब्राउन का कहना है, “प्रताड़ना सहानुभूति के सामने नहीं ठहर सकती।”

मैंने अपने जीवन में कुछ बहुत खराब अंधेरे से पटे दिन देखे हैं और ये मेरे परिवार, दोस्तों और साथियों की सहानुभूति और संवेदना ही थी, और कभी कभी, अजनबियों की भी – कि मैं बच सकी। एक इंसान से आती सहानुभूति भी बड़ा फ़र्क ला सकती है। माइनॉरिटी इन्फ़्लुएंस की थियरी, सामाजिक मनोविज्ञानी सेर्गे मोस्कोविसी द्वारा दी गयी है, जो कहती है कि बहुत कम संख्या में ही सही, जब लंबे समय तक कुछ चले, तो बड़ा फ़र्क आ सकता है। ऑनलाइन दुनिया में, हम इस माइनॉरिटी इन्फ़्लुएंस को ला सकते हैं बग़ावत कर के।

बग़ावत करने का मतलब है चुपचाप खड़े नहीं रह जाना। हम किसी के लिए सकारात्मक कमेंट कर सकते हैं, साइबर बुलींग होती देख कर शिकायत दर्ज कर सकते हैं। मेरा यकीन मानिए, सकारात्मक कमेंट से नकारात्मकता ख़त्‍म होती है। हम एक बग़ावत का कल्चर भी ला सकते हैं, उन संस्थाओं को सहारा दे कर जो इन मुद्दो पर काम कर रही हैं। जैसे कि यूएस की टाइलर क्लेमेंटी फ़ाउंडेशन यूके में एंटी-बुलींग प्रोजेक्‍ट है। आस्ट्रेलिया में, प्रोजेक्ट रोकिट है।

हम अपने फ़्रीडम ऑफ़ एक्‍सप्रेशन के बारे में अत्यधिक सचेत हो कर बात करते हैं, मगर हमें ये भी बात करनी होगी कि फ़्रीडम ऑफ़ एक्‍सप्रेशन के प्रति हमारे कर्तव्‍य क्या हैं। हम सब चाहते हैं कि हमें सुना जाए, मगर उद्देश्य से बोलने में और ध्यान आकर्षित करने के लिए बोलने में फ़र्क है।

इंटरनेट अभिव्यक्ति का सुपर हाई-वे है, मगर ऑनलाइन, दूसरों के प्रति संवेदनशील होने से हम सबका भला होगा, और एक बेहतर, सुरक्षित दुनिया कायम होगी। हमें ऑनलाइन बर्ताव में सहानुभूति लानी होगी, समाचारों को संवेदना के साथ कनज्‍यूम करना होगा, और सोच-समझ कर क्लिक करना होगा। फ़र्ज़ कीजिए कि आप किसी और के हेड-लाइन में एक मील चल रहे हैं।

मैं दिल की बात कह कर जाना चाहूंगी… पिछले नौ महीनों में, मुझसे जो प्रश्न सबसे ज्यादा पूछे गये हैं, वो है, “क्‍यों?” अब क्‍यों? अब मैं अपना सर इतने साल के बाद क्‍यों उठा रही हूं? इन प्रश्नों में निहित बातों को आप समझ सकते हैं। और मेरे जवाब का राजनीति से कोई लेना देना नहीं है। मेरा एक ही जवाब है, और वो है कि – अब समय आ गया है। समय आ गया है कि मैं अपने अतीत से छुप छुप कर भागना बंद करूं : अपमानित हो कर जीने का समय खत्‍म हो गया है; और समय आ गया है कि मैं अपनी कहानी पर वापस अपना अधिकार पाऊं और ये सिर्फ़ मेरे अकेले के बारे में नहीं है। कोई भी जो शर्म और सार्वजनिक रूप से उत्पीड़ित है, ये एक बात जान ले : कि वो उस से लड़ सकता है और आगे बढ़ सकता है। मुझे पता है कि ये बहुत मुश्किल है। बहुत दर्द भरा, आसान बिल्कुल भी नहीं, और लंबा सफ़र। मगर आप अपनी कहानी को एक अलग अंत दे सकते हैं। अपने प्रति सहानुभूति और संवेदना रख के। हम सब संवेदना के पात्र हैं, और ऑनलाइन और ऑफ़लाइन, संवेदनशील दुनिया में रहने के हकदार हैं।

मेरी बात सुनने के लिए धन्यवाद।

[पूरा व्‍याख्‍यान टेड टॉक पर यहां सुनें: The Price of Shame]

अनुवादक के बारे में : स्वप्निल कांत दीक्षित। आईआईटी से स्नातक होने के बाद, कोर्पोरेट सेक्टर में दो साल काम किया। फिर साथियों के साथ जागृति यात्रा की शुरुआत की। यह एक वार्षिक रेल यात्रा है, और 400 युवाओं को देश में होने वाले बेहतरीन सामाजिक एवं व्यावसायिक उद्यमों से अवगत कराती है। इसका उद्देश्य युवाओं में उद्यमिता की भावना को जगाना, और उद्यम-जनित-विकास की एक लहर को भारत में चालू करना है। इस यात्रा में ये युवक जगह-जगह से नये सृजन के लिए उत्‍साह बटोरते चलते हैं। यात्रा की एक झलक यहां देखें। स्वप्निल उन युवकों में से हैं, जो बनी-बनायी लीक पर चलने में यकीन नहीं रखते। बर्कले युनिवर्सिटी से मैनेजमेंट की डिग्री लेने के बाद फिलहाल कैलीफोर्निया में नौकरी।

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