अकादमिक जवाब मत दो, अपना जवाब दो!

➧ अभिषेक गोस्वामी

र्ष 1995, मार्च का महीना। सुबह नौ बजे। मैं जयपुर में धूलेश्वर गार्डन के पिछवाड़े, एक घर के दरवाजे के बाहर खड़ा हूं। दरवाजे पर सूत की एक डोरी लटक रही है। मैं उसे खींच देता हूं। भीतर से घंटी बजने की आवाज़ आती है। घंटी की यह आवाज़ वैसी नहीं है, जैसी मंदिरों में पीतल वाली घंटियों की होती है। कौतूहलवश मैं डोरी को एक बार और खींच देता हूं। प्रत्युत्तर में इस बार भीतर से एक आवाज़ आती है – ‘कौन? ‘अभिषेक गोस्वामी। साबिर ने भेजा है।’ ‘दरवाजे को थोड़ा ज़ोर से अपनी तरफ खींचो। खुल जाएगा। आ जाओ भीतर।’ दरवाजा खोलने के लिए सुझाये गये उपाय के मुताबिक दरवाजा खोलकर मैं घर के भीतर पहुंच जाता हूं और देखता हूं कि मेरे सामने सुनहरे सफ़ेद बालों वाली एक महिला बैठी हैं। उनकी आंखों पर नज़र का चश्मा लगा हुआ है, जिसकी डंडियों से एक डोरी लटक रही है।

यह महिला कोई और नहीं, श्रीलता जी हैं, जो इस वक्त अंग्रेज़ी का अखबार पढ़ रही हैं। अखबार के पन्ने पलटते हुए वे मुझे सामने सोफ़े पर बैठने का इशारा करती हैं और मैं बैठ जाता हूं। वे अखबार पलटती रहती हैं और बातचीत कुछ इस तरह जारी रहती है।

श्रीलता जी – तो तुम हो अभिषेक गोस्वामी?
मैं – जी।
श्रीलता जी – साबिर के साथ कब से काम कर रहे हो?
मैं – जी दो साल से।
श्रीलता जी – कितने नाटक किये हैं अब तक?
मैं – जी छह।
श्रीलता जी – क्यों जाना चाहते हो एन एस डी?
मैं – थिएटर सीखने के लिए।
श्रीलता जी – थिएटर ही क्यों करना चाहते हो?
मैं – अच्छा लगता है। इसलिए।
श्रीलता जी – यह तो साबिर का जवाब है। अपना जवाब दो। थिएटर ही क्यों करना चाहते हो?
मैं – थिएटर दुनिया को बदलने का सशक्त माध्यम है। इसलिए।
श्रीलता जी – यह तो अकादमिक जवाब है। अपना जवाब दो।

मैं निरुत्तर हो जाता हूं और अपना जवाब सोचने का नाटक करने लग जाता हूं। कुछ पलों के लिए खामोशी छा जाती है, जो श्रीलता जी के एक और सवाल से टूटती है।

श्रीलता जी – एन एस डी करने के बाद भी करोगे थिएटर?
मैं – जी। तब भी करूंगा। वापस यहीं आकर।
श्रीलता जी – क्यूं? मुंबई क्यूं नहीं जाओगे? फिल्म स्टार बनने? तुमने अब तक एक भी जवाब अपना खुद का नहीं दिया।
मैं – जी… वो।
श्रीलता जी – अच्छा अगर एन एस डी में नहीं हुआ तब भी करोगे थिएटर?
मैं – जी… वो।

श्रीलता जी हंसने लगती हैं और आखिर में पूछती हैं ‘कहां रहते हो जयपुर में?’

मैं – जी… वो।
श्रीलता जी – अरे भाई, तुम्हारे घर का पता पूछ रही हूं रेफरेंस लेटर के लिए। कहां खो गये?
मैं – जी। तेरह, गायत्री नगर, अजमेर रोड, सोडाला, जयपुर 302006

वह अखबार वहीं सेंटर टेबल पर छोड़ कर भीतर दूसरे कमरे में चली जाती हैं। मैं अपने ठीक ऊपर देखता हूं कि वहां मिट्टी की एक घंटी टंगी है, जो एक सूती डोरी से बंधी हुई है और वह डोरी उस दरवाजे तक जाती है, जिसको अपनी तरफ धकिया कर मैं भीतर आया था।

लगभग पांच से सात मिनट के अंतराल के बाद श्रीलता जी उस दूसरे कमरे से वापस आती हैं। उनके हाथ में एक लेटरहेड है, जिस पर मेरे बारे में कुछ लिखा हुआ है। वे उस कागज़ पर अपने दस्तखत करती हैं और मुझे दे देती हैं। मैं उस कागज़ को लेकर उठ जाता हूं। श्रीलता जी मुझसे पूरी गर्मजोशी से हाथ मिलती हैं और कहती हैं ‘विश यू आल द बेस्ट।’

मैं उस कागज़ को बिना मोड़े बाहर की तरफ चल देता हूं कि पीछे से आवाज़ आती है।

‘दरवाजा बंद कर देना अभिषेक।’


अभिषेक गोस्वामी। रंगकर्मी, लेखक, कवि, कलाकार। जयपुर में रहते हैं। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय की टाई कंपनी से जुड़े रहे। इन दिनों अजीम प्रेमजी फाउंडेशन से जुड़े हैं। अभिषेक से alibaba.tie@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं।

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