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हमने मोहल्‍ला ब्‍लॉग की शुरुआत 2006 में की थी। यूं ही की गयी एक शुरुआत हिंदी में कल्‍ट कैसे हो जाती है – इसका उदाहरण मोहल्‍ला के रूप में हमारे सामने है। आप भी उस ब्‍लॉग से रूबरू हो सकते हैं http://mohalla.blogspot.com

13 Comments »

  • pushkar said:

    नागपुरी गद्य के सौ साल
    PUSHKAR MAHTO

    2008 में नागपुरी गद्य साहित्य लेखन के सौ साल पूरे हुए। सौ साल की इस साहित्यिक यात्रा में नागपुरी गद्य का विकास तेजी से हुआ और गद्य की विविध् विधओं में प्रभावशाली रचनाएँ सामने आयी। विशेषकर कथा, उपन्यास, आलोचना, नाटक, संस्मरण, यात्रा वृतांत और व्यंग्य लेखन के क्षेत्रा में लेखकों की तीन पीढ़ियों ने अभूतपूर्ण कार्य किया। इसी के साथ पत्रा-पत्रिकाओं की शुरूआत हुई तथा राँची में आकाशवाणी एवं दूरदर्शन केन्द्र की स्थापना होने से नागपुरी गद्य लेखन को गति भी मिली और वह सृजनात्मक, उत्कर्ष तक पहुँचा। नागपुरी गद्य साहित्य के सौ साल के विकास क्रम में सैकड़ों रचनाकार सामने आये। गद्य की विविध् विधओं में विपुल साहित्य प्रकाशित हुआ। दो दर्जन से भी अध्कि पत्रा-पत्रिकाओं का प्रकाशन हुआ। नागपुरी भाषा-साहित्य को गति और वैचारिक दिशा प्रदान करने के लिए झारखंड ही नहीं भारत के अन्य राज्यों में भी साहित्यिक-संगठनों की स्थापना की गयी। झारखंड के सांस्कृतिक आन्दोलन के पफलस्वरूप 1980-82 में राँची विश्व विद्यालय राँची में देश का पहला जनजातीय एवं क्षेत्राीय भाषा विभाग शुरू हुआ।
    पुरानी पत्रा-पत्रिकाएँ, शिलालेख, चिट्टòी-पतरी में पुराना गीत गाता मन में नागपुरी गद्य का नमूना मिलता है। पुराने जमाने का नागपुरी गद्य नहीं मिलता, क्योंकि दूसरे किसी भाषा की साहित्य जैसा नागपुरी का भी ज्यादा हिस्सा पद साहित्य से भरा पड़ा है। गद्य साहित्य में उपन्यास, कहानी निबंध्, संस्मरण, आत्मकथा, रेखाचित्रा, शब्द विचार, भाव चित्रा, आलोचना, समीक्षा, समालोचना, लेख, नाटक, एकांकी, रिपोर्ताज इत्यादि लिखे जाते हैं। नागपुरी गद्य साहित्य की शुरूआत मध्यकाल की अंत-अंत मंे शुरू हुआ। जब ईसाई लोग यहाँ आये। वही लोग बाइबल का प्रकाशन नागपुरी में करवाएँ और र्ध्म प्रचार के लिए सुसमाचार, जो कि गद्य में था, का प्रकाशन कर नागपुरी गद्य लिखने की परम्परा का शुरूआत किया। 1850-60 के बाद मोटा-मोटी गद्य लिखने की शुरूआत हो चुकी थी और 1950 तक यह विस्तृत रूप ले लिया। पहले-पहल ईसाई मिशनरी लोग नागपुरी लिखने के लिये कैथी और रोमन अपनाएँ। बाद में देवनागरी का प्रयोग शुरू किया।
    रेव. पी. इग्नेस ने सन् 1907, 1908, 1909 एवं 1929 में क्रमशः प्रभु यीशु मसीह के सुसमाचार मति, मारकुस, जोहन आउर लुकस के सुसमाचारों को नागपुरी गद्य में प्रकाशित किये। 1915 में जर्मन मिशन ‘विवाह का नियम’ नामक पुस्तक का प्रकाशन नागपुरी गद्य में कराया। रेव. कोनाराड बुकाउट ने सदानी पफोक लाकर स्टोरिज लिखे जिसमें नौ कहानियाँ हैं। 1929 में रोमन मिशन ने नागपुरिया कहानी नागपुरी गद्य में छापी। इसमें भी नौ लोककथाओं को संग्रहित किया गया था। 1931 में रेव. हेनरी फ्रलोर लैंग्वेज हैण्ड बुक में इंग्लिश-सदानी और अंग्रेजी बातचीत को रोमन में लिखा। पादरी और अंग्रेज अफ्रसरों को नागपुरी-सदानी सीखाने हेतु। इसके बाद रेव. अल्Úेड पी. बून 4 – सुसमाचारों और 5 – प्रभु यीशु मसीह 6 – साल भर के प्रत्येक रविवार के चुने हुये सुसमाचार 7 – प्रेरकों के कागज-किताब नागपुरी गद्य में लिखें। ये सारी किताबों का प्रकाशन उन्होंने सन् 1933 से 1941 के बीच कराया।
    सन् 1938 में शुरू हुई झारखंड हिन्दी मासिक पत्रिका ;संपादक – ईश्वरी प्रसाद सिंह, प्रकाशक – साहित्य आश्रम, गुमलाद्ध के किसी एक अंक में द्वारका प्रसाद द्वारा लिखित हिन्दी लेख में पहली बार नागपुरी का मौलिक गद्य का थौड़ा सा हिस्सा छपा था। इसके बाद सन् 1940 में रोमन लिपि में जयपाल सिंह मुंडा द्वारा प्रकाशित आदिवासी सकम में नागपुरी गद्य नियमित रूप से छपते रहे। लेकिन 1941 में जूलियस तिग्गा की लिखा और छपवाया ‘छोटानागपुर केर पुत्राी’ ;निबंध् साहित्यद्ध शायद नागपुरी की पहली मौलिक गद्य की स्वतंत्रा किताब है। इसके बाद ध्नीराम बख्शी द्वारा लिखित और 1947 में छपी ‘जीतिया कहनी’ दूसरी स्वतंत्रा किताब थी। पफरवरी 1947 में ही पहली नागपुरी साप्ताहिक पत्रिका ‘आदिवासी’ ;संपादक – राधकृष्ण, प्रकाशक – बिहार सरकारद्ध और दिसंबर में इग्नेस कुजूर द्वारा निकाला गया साप्ताहिक ‘अबुआ झारखंड’ में नियमित रूप से नागपुरी गद्य का प्रकाशन किया गया। लेकिन 1950 के बाद नागपुरी साहित्य में तेजी आया और अगले तीस-चालीस वर्षों में तो यह एकदम से अपने चरमोत्कर्ष पर पहुँच गया।
    इस तरह हम देखते हैं कि 2008 के अन्त-अन्त तक नागपुरी गद्य साहित्य में एक सुव्यवस्थित आकार एवं विस्तार ले लिया है। वर्त्तमान में अनेक लेखक अपनी उत्कृष्ट लेखन से विभिन्न विधओं में नागपुरी साहित्य को समृ( कर रहे हैं। आकाशवाणी-दूरदर्शन औ अन्य निजी चैनलों पर नागपुरी में समाचार परिचर्चा एवं अन्य कार्यक्रमों का नियमित प्रसारण हो रहा है। सितम्बर 2006 से नागपुरी में एक लोकप्रिय मासिक पत्रिका जोहार सहिया, जून 2007 से एक पाक्षिक समाचार पत्रा जोहार दिसुम खबर तथा जून 2008 से एक त्रौमासिक पत्रिका गोतिया नियमित रूप से प्रकाशित हो रही है। अनेक प्रकाशन संस्थान एवं नागपुरी संस्थान, पिठौरिया, राँची विश्वविद्यालय, राँची एवं झारखंड के अन्य दूसरे विश्वविद्यालय के नागपुरी भाषा विभागों तथा नागपुरी प्रचारिणी सभा जैसी महत्वपूर्ण संस्थान नागपुरी भाषा को उतरोत्तर विकास के लिए उल्लेखनीय कार्य कर रहे हैं।
    निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि सौ वर्षों के नागपुरी गद्य साहित्य का इतिहास अत्यन्त विकसित और समृ( रहा है। लेकिन अभी तक नागपुरी गद्य साहित्य के सौ वर्षों के विकास पर कोई अध्ययन, शोध् अथवा मूल्यांकन नहीं हो पाया है, जिससे नागपुरी गद्य साहित्य के विकास एवं रचना की सृजनात्मक तथा भाषाई चुनौतियों, समस्याओं और संभावनाओं पर भाषा विज्ञान एवं साहित्य की दृष्टि से सम्यक विचार किया जा सके।

  • durgesh said:

    भ्रष्टाचार एवं सरकारी पैसों की बर्बादी का एक नमूना

    please go to this link to read full text

    https://www.facebook.com/note.php?created&&note_id=109591365814617

  • jeetendra jeet said:

    ब्लॉगर्स मीटिंग

    8 दिसंबर 2011 के ‘हिंदुस्तान’ दैनिक में ब्लॉगर्स मीट के बारे में प्रकाशित
    आर्टिकल पढ़कर लगा था कि संसद मार्ग में हिन्दी ब्लॉगर्स मीटिंग होने
    जा रही थी, लेकिन वहाँ जाने पर देखा कि वह हिन्दी ब्लॉगर्स मीटिंग नहीं
    थी l
    वहाँ सभी अंग्रेजी में बोल रहे थे और आयोजक कंपनी अपने
    उत्पाद का प्रचार कर रही थी l
    हमें अविलंब हिन्दी ब्लॉगर्स की एक वृहत मीटिंग बुलानी
    चाहिए, जिसमें ब्लॉगर्स की समस्या, उसका समाधान, ब्लॉग
    लेखन एवं उसके स्तर पर व्यापक बहस हो l
    ब्लॉग लेखन अन्य लेखन की तरह एक संस्कृति है, जिससे
    जनता उसी तरह प्रभावित होती है जिस तरह अन्य रचनाओं से l
    हमें विशाल हिन्दी भाषा – भाषियों की भाषा में,
    उनके हित के लिए कार्य करना है न कि विदेशी भाषा में और न ही व्यापारियों
    जैसा l भारत में अंग्रेजी भाषा का उपयोग स्वार्थपरता के सिवाय कुछ भी नहीं है l
    ब्लॉग लेखन ने हमें अभिव्यक्ति कि स्वतंत्रता दी है l आज हम अपनी
    रचनाओं के प्रकाशन के लिए किसी अन्य के मोहताज नहीं हैं l हम स्वयं प्रकाशित हैं l
    इसे जन कल्याण में लगाना है l

    जीतेन्द्र जीत
    मो. 09717725718
    ई – मेल : jeetendra.jeet.letter@gmail.com
    http:// kamalahindi.blogspot.com

  • Santosh Kumar said:

    महोदय ,.सादर नमस्कार
    मैं नया ब्लागर हूँ ,.जागरण जंक्शन पर लिखता हूँ ,.मूरखमंच नाम से ब्लोगस्पोट पर भी बनाया है ,..आप सभी विद्वानों का उचित मार्गदर्शन और सार्थक आलोचना मेरे लिए बहुत आवश्यक है ,..कृपया मुझे बताएं कि मोहल्ला लाइव से किस तरह से जुड सकता हूँ ,..तकनीक की बहुत कम जानकारी है ,.कृपया उचित मार्गदर्शन करें ..हार्दिक आभार सहित ,.
    संतोष कुमार
    moorakhmanch.blogspot.com
    santo1979.jagranjunction.com

  • shaik mohammad said:

    जयपुर लिटरेरी फेस्टिवल हिदुस्तान के पूंजीपतियों और उनके चाटुकार रसिकजनों (साहित्य, सिनेमा आदि) का बड़ा और दिखावटी आयोजन होता है जिसमें साहित्य और कला के नाम पर जनविरोधी एवं लोक विरोधी मंतव्यों की चालाकी से प्रतिस्थापना की जाती है. सलमान रुश्दी के बहाने अंतर्राष्ट्रीय प्रचार भी इनके व्यवसायी दिमाग की उपज है. मज़े की बात यह है की हिंदी के छुट भैये लोग इस आयोजन में पहुँच कर अपने को धन्य मानते हैं खासकर वे प्रगतिशील जो नगाड़ा बजा बजा कर पूँजीवाद का विरोध करते हैं. यह कैसी विडम्बना है ?

  • N K Upadhyay said:

    pranam
    hindi blog bahut accha laga

  • ashok kumar dubey said:

    hindi blog lekhan ek achhi shuruat hai aur main bhi blog likhne ka prayas kar raha hu dainik jagran akhbar ke pathak panna me kabhi chhapta bhi hai aur jagran blog par bhi abhi panch rajyon ke chunav vishay par kuchh likha hai kripya apne kaments likhe.Aabhar

  • santosh gangele said:

    आज के पत्रकार ..
    ———————–
    आज के पत्रकार सब के बारे में लिखने लगे है.
    जहाँ सच्चाई दिखी, भगने लगे है
    अब कलम का काम तो कम हो गया है.
    मोबाईल, कमरा का जमाना हो गया है.
    हर किसी से इंटरव्यू लेने के लिए समय हो गया है
    जो समय न दे वह दुश्मन हो गया है.
    पत्रकार समाज सेवा व कर्तब्य से पिछ्लने लगे है.
    दिनभर चाय क़ि तलाश करते है. शाम को महफिल में गिलास का जम पकड़ने लगे है.
    आज के पत्रकार सब के बारे में लिखने लगे है.
    जो देते नही नगद या विज्ञापन उसको, भ्रष्ट बेईमान कामचोर कहने लगे है.
    पत्रकारिता एक मिशन था, पत्रकार कानून का रक्षक था ..
    अब होटल, रिक्शा ,हाथ ठेला व ]पेपर बाटने बाला पत्रकार लिखने लगे है.
    संतोष गंगेले ब्यूरो चीफ छतरपुर जिला मध्य प्रदेश

  • अकिल अहमद अंसारी said:

    आज की सबसे ज्वलंत समस्या देश और चारो तरफ फैला भ्रष्टाचार है! इसे हमारे देश में सामाजिक मान्यता मिली हुई है, केवल नेता या सरकारी कर्मचारी ही भ्रष्ट नहीं हैं इसकी सुरुआत तो वहां से होती है जहाँ से हम वोट डालते समय अपने किसी लालच या स्वार्थ में आ जाते हैं ! जब हम अपनी स्वार्थसिद्धि के लिए रिश्वत देतें हैं तब हम खुद के लिए अलग नियम बनाते हैं! लेकिन जब कोई और पैसे ले तो हम उसकी भ्र्स्तना करते हैं! दरअसल नेता, पुलिस या अधिकारी भी हमारी आपकी तरह एक आम इंसान है उसे भी अपनी सुख सुविधा का ख्याल सबसे पहले होता है, वह भी हमारी तरह अन्दर से स्वार्थी कमजोर है! यहाँ मैं भ्रष्टाचार की वकालत नहीं कर रहा सिर्फ इतना बताना चाह रहा हूँ की हमारे यहाँ कहने को लोकतंत्र है दरसल आज भी यहाँ जंगल राज है!
    कमजोर, आम आदमी हर तरफ से दबा है, बाबु आम आदमी को लूटता है, अफसर बाबू को लूटता है और मंत्री अधिकारीयों को सताते हैं!
    न्याय, क़ानून वयवस्था सिर्फ और सिर्फ पूंजीपति वर्ग और रसूखदारों की गुलाम बनी हुई है! यहाँ जो पकड़ा गया वो चोर नहीं तो संत! निचे से ऊपर तक पुरे देश की परिस्थिति पर नजर डालें तो अमीर और अमीर, गरीब और गरीब होता जा रहा है..
    लेकिन हमेशा स्तिथि ऐसी नहीं रहेगी ये सूरत जरूर बदलेगी भले हम रहें न रहें….
    शायद इसीलिए दुष्यंत कुमार ने कहा है..

    हो गयी है पीर पर्वतों सी पिघलनी चाहिए
    हिमालय से अब कोई गंगा निकालनी चाहिए!

    आज ये दीवार कुन पर्दों की तरह हिलने लगी
    शर्त तो ये थी की ये बुनियाद हिलानी चाहिए

    बेवजह हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं
    मेरी कोशिश है की ये सूरत बदलनी चाहिए

    मेरे सीने में नहीं तो तेरे सिने में
    हो आग मगर ये आग जलनी चाहिए !

  • ABHILAKH SINGH said:

    मैं कुछ समय से मोहल्ला लाइव पढ़ रहा हूँ। पढ़ना अच्छा लगता है।
    मैं भी ब्लोग लिखना चाहता हूँ।
    क्या आप मेरी सहायता करना चाहेंगे?

  • Maayank said:

    भारत के सबसे तेज़ खबरिया चैनलों की पोल भी निर्मल बाबा एपिसोड से खुल कर सामने आ रही है. सबसे तेज़ ख़बरें दिखाने का दम भरने वालों ने सबसे तेज़ पाला भी बदल लिया है. वे अब निर्मल बाबा के साक्षात्कार लगातार दिखाने में जुटे हुए हैं और बार बार यह दवा भी कर रहे हैं उनके चैनल पर चलने वाले निर्मल दरबार कार्यक्रम की सच्चाई का उनसे कोई लेना देना नहीं है. यह प्रोग्राम चैनल पर चलाये जाने वाले विज्ञापनों के समान ही था. कितनी हास्यास्पद स्थिति है. दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में विज्ञापन के नाम पर सब कुछ जायज है. भला हो उन छोटे पत्रकारों का जिन्होंने इस बाबा का पर्दाफाश किया. वरना सबसे तेज़ लोग और तेज़ी से विज्ञापनों से पैसा बनाते रहते और आम और बेवकूफ आदमी [इन परिस्थितयों में उन्हें बेवकूफ ही कहा जायेगा] अपनी गाढ़ी कमाई का पैसा लुटाता रहता. सच इस देश में अपनी जिम्मेदारियों से भागने के अनगिनत गलियारे हमारे पास उपलब्ध हैं. क़ानून में उपलब्ध गलियारों का इस्तेमाल करने में हम भारतीयों का कोई सानी नहीं है. हमें तो विश्व के क़ानून का निर्माण करने की जिम्मेदारी सौंपी जानी चाहिए क्योंकि हम क़ानून की कमी निकालने और उसका अपने फायदे के लिए इस्तेमाल करने में महारत रखते हैं.

  • Maayank said:

    मैं एक किसान हूँ –
    देश के हर कोने में मिल जाता हूँ
    और कोने में ही पड़ा रह जाता हूँ,
    जीते जी तो कोई नहीं पूछता मुझे
    पर मरकर मैं सुर्ख़ियों में छा जाता हूँ-
    मीडिया के लिए ब्रेकिंग न्यूज़
    तो विधासभा और संसद में प्रश्न काल बन जाता हूँ
    चार दिनों का ही सही पर मैं एक दम वी.आई.पी बन जाता हूँ,
    लेकिन जल्द ही एक दम बिसरा दिया जाता हूँ,
    कोई मेरी मौत के मुआवजे की राशि खा जाता है
    तो कोई मेरे परिवार को बरगलाता है
    इन्साफ जरूर मिलेगा ऐसा भी बहुत लोग कह जाते हैं
    पर इन वादों के पीछे के इरादे
    मेरा भोला भाला परिवार समझ नहीं पाता है,
    कोई तो कुछ कर ही देगा बस इसी आस में
    वह और भी शोषित होता जाता है,
    सोचा तो यही था कि मरकर मुक्त हो जाऊंगा
    पर अपनों की त्रासदी मरकर भी नहीं होने देती है मुक्त मुझे,
    मैं एक किसान हूँ -
    भूत बनकर हूँ कर रहा भ्रमण – इस निर्मोही संसार में
    कब मिलेगी मुक्ति मुझे, मैं नहीं जानता,
    अब ईश्वर से बस एक ही अर्ज है
    अगले जन्म मैं न रहूँ किसान
    बनूँ तो बनूँ बस कोई धनवान
    नेता, अभिनेता, थानेदार या पत्रकार
    न बनूँ तो बस इस देश का किसान..

  • Maayank said:

    डर्टी पिक्चर ने उनके फ्यूचर को ही आज डर्टी कर दिया है. इसीलिए उन्होंने पहले से ही इस्तीफा दे दिया. वैसे तो यह सब कुछ उनका व्यक्तिगत मामला है की किसे वो जज बनायें या किसे अपने चैम्बर में बुलाएं.

    लेकिन कभी कभी पुराने पाप किस रूप में हमारे सामने आ जाते हैं कुछ कहा नहीं जा सकता. जब दूसरों की सीडी [प्रशांत भूषण सीडी काण्ड] बन रही थी तब उन्हें मजा आ रहा था. लेकिन अब वे दुखी हो गए हैं. पर इसमें ज्यादा दुखी होने की कोई बात है ही नहीं, आज तक कोई भी सीडी सच्ची साबित हुई है क्या????

    हर सीडी काण्ड के बाद खुद सीडी को ही शर्मसार होना पड़ा है, क्योंकि न तो कभी सीडी बनाने वाला आरोपी साबित हो सका और न सीडी में आने वाला. गाज हमेशा से सीडी पर ही गिरी है और वह हमेशा झूठी साबित होती रही है. इन झूठी सीडीयों से क्या डरना आप लोग बिंदास होकर अपनी जिन्दगी जीते रहिये. जब बड़े बड़े कुछ नहीं कर पाए आपका तो ये सीडीयाँ क्या कर लेंगी भला आपका.

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