Category: देश

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एक अंधा कुआं है “मेड इन इंडिया”

यह टिप्‍पणी जयपुर से डॉ दुर्गाप्रसाद अग्रवाल ने अपनी फेसबुक वॉल पर साझा की थी। इसमें आयी बातें और तथ्‍य उन्‍हें कहीं मिले, तो इसे जरूरी समझ कर उन्‍होंने अग्रसारित कर दिया। हम भी...

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जिंदगी बादे फना तुझको मिलेगी हसरत!

फैजाबाद/अयोध्या। पिछले कई सालों से अयोध्या फिल्म सोसाइटी द्वारा आयोजित फिल्म फेस्टिवल का समापन हो गया। गौरतलब है कि अवध की गंगा-जमानी तहजीब को समर्पित इस फेस्टिवल में सिनेमा के माध्यम से समाज और...

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बच्‍चे एक दिन यमलोक पर धावा बोलेंगे…

प्रकाश के रे ♦ आज से सौ साल पहले वह कलकत्ता से पानी के जहाज में बैठ कर एक अनजान सफर पर निकली थी। उस सफर में उसके साथ कोई अपना न था। वह अकेली थी। वह गर्भवती थी। ‘द क्लाइड’ नाम के उस जहाज पर जो उसके हमसफर थे, उन्हें भी मंजिल का पता न था।

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इतिहास कोई फास्‍ट फूड नहीं है राजदीप सरदेसाई!

प्रकाश के रे ♦ राजदीप सरकारों को पीड़ितों को मरहम लगाने का सुझाव देते हैं। वे कहते हैं कि मोदी को अहमदाबाद के पीड़ितों के पास जाना चाहिए, उमर अब्दुल्ला को कश्मीरी पंडितों के पास जाना चाहिए, राहुल गांधी को सिख समुदाय के पास जाना चाहिए और अखिलेश सिंह को मुजफ्फरनगर के पीड़ितों से मिलना चाहिए। अगर कोई ललित निबंध होता तो मैं इन सुझावों पर ध्यान नहीं देता। लेकिन जब एक ऐसा वरिष्ठ पत्रकार अगर करता है, तो उसे गंभीरता से परखना चाहिए। सांप्रदायिकता एक विचारधारा है और उसके घोषित लक्ष्य होते हैं। कई बार राजनीतिक स्वार्थों की पूर्ति के लिए इसे एक हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। पंजाब से कश्मीर तक यही हुआ है। कश्मीर का जो हाल बनाया गया है, उसमें वहां के हर तबके को मोहरा बनाया गया है। इस हाल के लिए दोनों मुल्कों की सरकारें सबसे बड़ी दोषी हैं।

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जो अपराधी नहीं होंगे, मारे जाएंगे! #Shahid

अविनाश ♦ बेसब्र इंतजार के बाद कल शाहिद को देखना मेरे लिए बहुत ही मर्मांतक अनुभव था। सधे, सुलझे हुए तरीके से, गैर-लोकप्रिय सिनेमाई व्‍याकरण को गढ़ते हुए आपने शाहिद की कहानी कही। धुंध भरे जिंदगी के कैनवास पर एक उदास पेंटिंग की तरह पूरी फिल्‍म देह की शिराओं को सिहराती रही। मुस्लिम बस्‍ती में बाढ़ की तरह आये अचानक दंगे का विद्रूप जैसा आपने पहले ही दृश्‍य में दिखाया है, वह रोंगटे खड़े कर देने वाला है। हम जब एक मरे हुए जानवर को सड़क पर आवारा पड़ा देखते हैं, तो उबकाई से भर जाते हैं। जिंदा जलते हुए किसी को देखना कितना दहशतनाक होता होगा – यह हमारी कल्‍पनाओं के बाहर का जीवनानुभव है। इस देश में अल्‍पसंख्‍यक नहीं होने की सुखद अनुभूति के साथ हम अपने मामूली संघर्षों से आरामदेह रोजमर्रा बटोरने वाले लोग हैं।

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दीप नारायण जी की कहानी में अब भी बचे हैं गांधी

आशीष रंजन ♦ गांधी की जन्म तिथि के मौके पर रामचंद्र गुहा ने एक साक्षात्कार में कहा कि वह देश की राजनीतिक स्थिति से बहुत निराश नहीं हैं। वह अलग अलग जगह हो रहे आंदोलनों को लेकर आशावान हैं और देश की परिस्थिति बदलने की राह उसमें देखते हैं। उन्होंने मेधा पाटकर और एडीआर के कामों की चर्चा की और इस तरह के आंदोलनों पर अपनी आस्था व्यक्त की। मुझे लगा कि मेरे मन में जो बातें थीं, उन्होंने कह डाली। मेधा पाटकर और उनके बहादुर साथियों के नेतृत्व में नर्मदा बचाओ आंदोलन के संघर्ष को देखें या फिर मजदूर किसान शक्ति संगठन के अरुणा राय, निखिल डे और शंकर सिंह के नेतृत्व में चले पारदर्शिता और जवाबदेही का आंदोलन को लें या कुडाकुलम के संघर्ष को लें या फिर अर्थशास्त्री ज्‍यां द्रेज द्वारा लगातार गरीबों के पक्ष में चल रहे काम को लें, तो सचमुच यह एहसास होता है कि गांधी की विरासत देश में फैले छोटे-बड़े आंदोलनों में रच बस रही रही है।

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हम सिपाहियों को हत्‍यारा बना कर जंगल भेज रहे हैं

हिमांशु कुमार ♦ इसी साल की सत्रह मई को सरकारी सुरक्षा बलों ने बीज की पूजा कर रहे आदिवासियों पर गोलियां दाग दीं। इससे आठ आदिवासी वहीं मर गये। इनमें तीन बच्चे भी थे। जगह थी, छत्तीसगढ़ का बीजापुर जिला। गांव का नाम एड्समेटटा। पुलिस और सरकारी सुरक्षा बल आदिवासियों को गोली से उड़ा कर आराम से वापिस चले गये। घायल आदिवासियों को कोई मदद नहीं पहुंचायी गयी। मांओं ने अपने घायल बच्चों को खुद ढोकर अस्पताल तक पहुंचाया।

कुछ चिंता मोदी के भ्रष्‍टाचार विरोधी प्रहसन की भी करें! 0

कुछ चिंता मोदी के भ्रष्‍टाचार विरोधी प्रहसन की भी करें!

आशुतोष कुमार ♦ लालू के जेल जाने से फेसबुक पर मोदीमंडली में भी खुशी की लहर है। होनी भी चाहिए। लेकिन मोदीमंडली को खुशी के साथ चिंता भी होनी चाहिए। आखिर इसी सीबीआई का प्रेत मोदी के सर पर भी मंडला रहा है। लेकिन एक प्रेत तो अभी मोदी की गोद में ही बैठा है। मोदी के प्यारे जलसंसाधन मंत्री बाबू बोकारिया। पिछले जून में ही अदालत द्वारा उन्हें 54 करोड़ के अवैध खनन का दोषी ठहराया जा चुका है। चूंकि यह सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले के जरा पहले हो गया था, इसलिए तकनीकी रूप से वे विधानसभा के सदस्य और मंत्री बने रह सकते हैं। कांग्रेस को भ्रष्टाचार का एकमात्र स्रोत बताने वाले मोदी ने इस तकनीकी सुविधा का लाभ उठा कर उन्हें अपने पद पर बनाये रखा है।

आदिवासियों को जंगल से बाहर करना चाहती है सरकार 0

आदिवासियों को जंगल से बाहर करना चाहती है सरकार

ग्लैडसन डुंगडुंग ♦ जब देश आजाद हुआ तो स्थिति और बद से बदत्तर हो गयी। 1952 में ही राष्‍ट्रीय वन नीति लायी गयी, जिसमें आदिवासियों को जंगल उजाड़ने हेतु दोषी ठहराया गया। 1972 में वन्यजीवन के सुरक्षा के नाम पर कानून बनायी गयी और लाखों लोगों को जंगल से हटा दिया गया। वर्ष 1976 में राष्‍ट्रीय कृलांत आयोग ने तो यहां तक कहा कि आदिवासी ही जंगलों को बर्बाद करते हैं, इसलिए अगर जंगल बचाना है तो आदिवासियों को जंगलों से बाहर निकालना जरूरी है। सन 1980 में तो हद यह रहा कि सरकार ‘वन संरक्षण अधिनियम’ लागू किया, जिसमें जंगल का एक पत्ता तोड़ने को भी अपराध की श्रेणी में रखा गया। इस तरह से जंगल को आदिवासियों से छीन लिया गया।

देश को नमो युग में जाने से रोकें, दस्‍तखत करें 3

देश को नमो युग में जाने से रोकें, दस्‍तखत करें

As India heads towards another general election soon we, the undersigned, would like to warn the people of India about the rising danger of bigotry, communal divide, organised violence on and hatred for sections...