Category: विश्‍वविद्यालय

शरद पूर्णिमा की शाम महिषासुर की शहादत का शोक मनेगा 19

शरद पूर्णिमा की शाम महिषासुर की शहादत का शोक मनेगा

डेस्‍क ♦ पोस्टर के एक अंश में अका‍दमिक पत्रिका ‘फारवर्ड प्रेस’ में प्रकाशित झारखंड के वरिष्ठ नेता व पूर्व मुख्‍यमंत्री शिबू सोरेन से बातचीत दी गयी है। शिबू सोरेन ने महिषासुर को अपना पूर्वज बताते हुए कहा है कि मुझे ‘असुर होने पर गर्व है’। पोस्‍टर के माध्‍यम से कहा गया है कि ‘फारवर्ड प्रेस’ के अक्‍टूबर, 2012 अंक में प्रकाशित आवरण कथा में आदिवासी मामलों के विख्‍यात अध्‍येता अश्विनी कुमार पंकज ने दशहरा को असुर राजा महिषासुर और उसके अनुयायियों के आर्यों द्वारा वध और सामूहिक नरसंहार का अनुष्ठान बताया है, इसलिए भारत के बहुजनों को दुर्गा की पूजा का विरोध करना चाहिए। संगठन ने कहा है कि विजयादशमी को राष्ट्रीय शर्म दिन के रूप में घोषित करने के लिए आंदोलन किया जाएगा।

एक अच्‍छी चीज के पीछे खा म खा क्‍यों पड़ गये हैं आपलोग? 9

एक अच्‍छी चीज के पीछे खा म खा क्‍यों पड़ गये हैं आपलोग?

जय कौशल ♦ जब ‘बिग बॉस’, ‘राखी का स्वयंवर’ ‘द खान सिस्टर्स’ और ‘इमोशनल अत्याचार’ जैसे रीयलिटी शो आते हैं, तब हमारे आलोचनात्मक विवेक को क्या हो जाता है? ‘दबंग’ जैसी वास्तव में नौटंकी फिल्म को राष्ट्रीय पुरस्कार दे दिया गया, जिसकी किसी सकारात्मक बदलाव में भूमिका नहीं है, तब हममें से कितनों से इसकी आलोचना की थी? सचिन तेंदुलकर, जो खेल के स्तर पर निस्‍संदेह हमारे राष्ट्रीय गौरव हैं, पर मैंने तो आज तक उन्हें किसी सामाजिक-राजनीतिक मुद्दे पर टिप्पणी करते नहीं सुना, किंतु हम उनके राज्यसभा-सदस्य नामित होने पर गर्व से भर उठते हैं। रेखा, जो निस्‍सदेह बड़ी कलाकार रही हैं, पर उनकी सामाजिक बदलाव में पर्दे से बाहर क्या भूमिका है – शून्य। हम उनके राज्यसभा आने पर भी तालियां पीटते हैं। आखिर आमिर खान से इतनी समस्या क्यों?

मुझे सुनें, मैं आपके लिए सुर में गाने की कोशिश करूंगा! 4

मुझे सुनें, मैं आपके लिए सुर में गाने की कोशिश करूंगा!

तैमूर रहमान ♦ मैं यह भी कहना चाहूंगा, अगर मैं सुर में न गाऊं तो क्या आप खड़े होकर चल देंगे! मैं कहता हूं कि मुझे सुनें, मैं आपके लिए गाऊंगा, मेरी कोशिश होगी कि मैं सुर के साथ गा सकूं। मैं संगीत के माध्यम से कहानी कहना चाहता हूं। यह कहानी हमारे संघर्ष की कहानी है। यह बेसुरा है, गड्डमड्ड है, शोर से भरा है, बिखरा है, क्योंकि हमारी इस दुनिया के संदर्भ में हमारी कहानी भी ऎसी ही है। मैं बस इतना भरोसा दिलाना चाहता हूं, यह हमारी कहानी है, यह दिल से निकलती है। पाकिस्तान में कम्युनिस्टों के बीच में हुई टूट का हिंदुस्तान की टूटों से लेना-देना नहीं है। पकिस्तान में बस दो ही पार्टियां हैं जो अपने को कम्युनिस्ट पार्टी कहती हैं, कम्युनिस्ट पार्टी और कम्युनिस्ट मजदूर किसान पार्टी, और हम दोनों में घनिष्ठ संबंध हैं।

इतिहास बनाने वाले हंस नहीं पाते, हंसी उनके लिए बाधा है 11

इतिहास बनाने वाले हंस नहीं पाते, हंसी उनके लिए बाधा है

अपूर्वानंद ♦ त्रिथा ने युवावस्था के कच्चे उत्साह में अपना लाल आंचल लहरा कर कहा कि मैं भी लाल हूं। उस पूरे माहौल में स्वीकार किये जाने का यह आग्रह कैसे ग्रहण किया गया, मालूम नहीं। फिर वे गाने लगीं। लेकिन जो गा रही थीं, वह कोई जन गीत नहीं था, न क्रांतिकारी संगीत ही। वह शास्त्रीय रागों की उनकी आवाज और पाश्चात्य वाद्य-यंत्रों के मेल से की गयी अदाकारी थी। आवाज में दम था तो आशंकित श्रोता-वर्ग पर उन्होंने असर छोड़ा। लेकिन तीसरा गीत ‘गणपति’ जैसे ही उन्होंने शुरू किया, जन-समूह में बेचैनी की लहर दौड़ने लगी। ‘वापस जाओ’, ‘गो बैक’ कह कर उन्हें दुरदुराया जाने लगा। तुरत ही मंच पर आयोजक पहुंच गये और त्रिथा को उन्होंने गाना बंद कर देने को कहा। यह सामूहिक सहमति से कलाभिव्यक्ति की हत्‍या की एक घटना थी।

क्रांतिकारी व्‍यवहार का विकल्‍प महज लफ्फाजी नहीं हो सकती 6

क्रांतिकारी व्‍यवहार का विकल्‍प महज लफ्फाजी नहीं हो सकती

रेयाज उल हक ♦ हिरावल ने जो गीत पेश किये, उनमें बहुत सोच-समझ कर गोरख के गीत से नक्सलबाड़ी, श्रीकाकुलम, मार्क्स, लेनिन, माओ, भोजपुर आदि के संदर्भ हटा दिये गये थे। यह पहला मौका नहीं था, जब इन पंक्तियों को गीत में नहीं गाया गया… जबकि ये पंक्तियां ही गीत की वास्तविक राजनीति को पेश करती हैं। वैसे भी यह गीत बिहार-उत्तर प्रदेश की संघर्षरत जनता के बीच रचा गया था और गोरख ने इसे इस रूप में लिख कर बाकी इलाकों में बेहद लोकप्रियता दी थी। हिरावल ने वीरेन डंगवाल की जो कविता गाकर पेश की, वह अपनी मूल बनावट में निजी पूंजी और इससे पैदा हुए व्यापक संबंधों-संदर्भों को चुनौती देना तो दूर, खुद को इन संबंधों और संदर्भों के आधार पर ही विकसित करती है।

पाक के हालात समझेंगे, तो “लाल बैंड” भी समझ में आएगा 8

पाक के हालात समझेंगे, तो “लाल बैंड” भी समझ में आएगा

प्रकाश के रे ♦ जेएनयू के उस खुले मैदान और वहां आये लोगों के हिसाब से, फिर बैंड के संगीत की जरूरत के मुताबिक, जिस तरह के साजो-सामान की जरूरत थी, उसका खर्चा ही अकेले लाख रुपये से कहीं अधिक होता है। इसमें साउंड-सिस्टम, टेंट-दरी, रौशनी आदि शामिल हैं। आप खर्च में खाने-पीने, आने-जाने, प्रचार आदि को भी जोड़ सकते हैं। शुभम का फीस की बात कहना बिना किसी आधार का है और इसे उन्हें ठीक कर लेना चाहिए। रही बात, कॉमरेडों की पैसे को लेकर चिंतित होने की बात, तो मैं बस यही कहना चाहता हूं कि यह चिंता नहीं होती, बल्कि एक आयोजन करने का रोमांच होता है, उलझने होती हैं, मजा होता है, परेशानी होती है, संतोष का कोना होता है।

मजहबी दहशतगर्द अवाम के साथ नहीं, सामराज के साथ हैं! 7

मजहबी दहशतगर्द अवाम के साथ नहीं, सामराज के साथ हैं!

आशुतोष कुमार ♦ बैंड ने ‘उम्मीदे सहर’ से ले कर ‘जागो जागो सर्वहारा’ तक अपने सभी मशहूर नंबर पेश किये। स्टीरियो की जबरदस्त धमक और गिटार की गूंज के बीच ‘नाल फरीदा’ भी आया और ‘दहशतगर्दी मुर्दाबाद’ भी। इस गाने के पहले तैमूर ने साफ-साफ कहा भी कि पाकिस्तान की सारी तरक्कीपसंद अवाम अच्छी तरह जानती है कि मजहबी दहशतगर्द सामराज के पिट्ठू और लट्टू हैं। उन की आपसी लड़ाई एक धोखा है। असली लड़ाई अवाम और सामराज के बीच है। मजहबी दहशतगर्द अवाम के साथ नहीं, सामराज के साथ हैं। लेकिन कुछ वामपंथी भी अपने भोले जोश में इन्हें सामराज-दुश्मन माने बैठे हैं और हमारी बहस उनसे भी है। तैमूर की आशंका सच निकली। अनेक कट्टर क्रांतिकारी अब इसी गाने के लिए उन की लानत-मलामत कर रहे हैं।

एक आभिजात्‍य सनक में बदलता जा रहा है तैमूर का “लाल” 8

एक आभिजात्‍य सनक में बदलता जा रहा है तैमूर का “लाल”

शहराम अजहर ♦ 2008 में जब बैंड बना था, तो यह साफ था कि हम इसे उत्पीड़ित, शोषित और समाज के दबे-कुचले तबकों के अधिकारों से सरोकार रखने वाले मसलों पर जागरुकता पैदा करने के लिए एक मंच के बतौर इस्तेमाल करेंगे। यह व्यापक दर्शकों तक पैगाम ले जाने का एक मौका था। हम संगीत उद्योग में प्रभुत्व के लिए होड़ नहीं कर रहे थे, हम इस तहरीक से नौजवानों को प्रेरित करने की कोशिश कर रहे थे। हमें जो ताकत प्रेरित कर रही थी वह इनकलाब थी, न कि निजी मशहूरियत। लाल का एक तिजारती शोर-शराबे में बदल जाने ने इसके सबसे प्रतिबद्ध नौजवान बुद्धिजीवियों को यह सवाल करने पर मजबूर किया है और उनका यह पूछना जायज ही है कि : कहां है वह इनकलाबी तहरीक, जिसे हम खड़ी करना चाहते थे?

सुर न हो, तो सिर्फ शब्‍द से काम नहीं चलता लाल बाश्‍शाओ! 10

सुर न हो, तो सिर्फ शब्‍द से काम नहीं चलता लाल बाश्‍शाओ!

शुभम श्री ♦ हैचेट और पेंगविन अगर हॉब्सबाम और मार्क्स को बेच रहे हैं तो उनका चरित्र नहीं बदल जाता। लाल एक मशहूर बैंड है पर वो उसी तरह प्रोफेशनल है जैसे बाकी के बैंड्स। बस उसका कंटेट अलग है। सिर्फ इसलिए कि लाल फैज को गा रहा था, हम उनके खराब गाने की तारीफ तो नहीं कर सकते। फैब इंडिया के ब्रांड एंबैसेडर्स के इस कैंपस में जहां आज भी लोग अंग्रेजी की भारी-भरकम रीडिंग्स को समझने में संघर्ष करते हैं, मुक्तिबोध और गोरख को गाया जाना बहुत बड़ा सुकून है। लेकिन उस सुकून देने वालों का क्या आदर हुआ, सबने देखा। हिरावल को ढंग से इंट्रोड्यूस करना तो दूर, एक बुके तक नहीं दिया गया। क्या जसम की इकाई होने के कारण वह घर की मुर्गी दाल बराबर है?

उठो मेरी दुनिया, गरीबों को जगा दो! #TaimurRahman 12

उठो मेरी दुनिया, गरीबों को जगा दो! #TaimurRahman

तैमूर रहमान ♦ मेरा नौजवान कॉलेज ग्रेजुएट वाला ‘आत्म’, जिसे असली दुनिया का कोई अनुभव नहीं था, जिसने रोजी-रोटी के लिए या किसी आंदोलन के लिए कभी काम नहीं किया था, जिसे मेहनतकश तबके की असली राजनीति का कोई अनुभव नहीं था, वह मुझे, इस 36 साला व्यक्ति को एक छद्म-बुर्जुआ बुद्धिजीवी समझता जो यह सब कुछ अपने को आगे बढ़ाने और लोकप्रिय बनाने के लिए कर रहा है। इसीलिए मैं समझ सकता हूं कि क्यों कुछ अनुभवहीन नौजवान कॉमरेड आज मेरे बारे में ऐसा ही सोचते हैं। लेकिन मेरा भरोसा है कि वह दिन आएगा, जब उन्हें भी अपने आज के जवान और आदर्शवादी निर्णयों पर पुनर्विचार करना होगा।