Category: विश्‍वविद्यालय

24×7 चिरकुटपंथी : JNU में नये तमाशे पर एक नयी रिपोर्ट 2

24×7 चिरकुटपंथी : JNU में नये तमाशे पर एक नयी रिपोर्ट

झेल कुमारी ♦ मोरल ऑफ द कमेंट्री ये है कि किताबें छपवाने के लिए औरतें भले महिला लेखन की विशेष श्रेणी का प्रयोग करें पर असल में वो इस श्रेणिबद्धता के खिलाफ हैं। “फेमिनिज्म जिस पुरुषविहीन समाज की कल्पना करता है मैं उससे इत्तेफाक नहीं रखती – मनीषा कुलश्रेष्ठ ” [पुरुषविहीन पर तवज्जो दी जाए, स्पिवाक माता की पोथी भी देखी जाए] वैसे भी दोस्तो, मुंह से बोलकर क्रांति करने में तो भारतीय लेखक उस्ताद हैं ही, बस वो क्रांति छपने और प्रकाशन के स्तर पर नहीं होनी चाहिए। बाकी तो मामला फिट रहता है। दूसरा मोरल कि यूनिवर्सिटी प्रोफेसर [वर्तमान, भूतपूर्व और अभूतपूर्व] स्वाभाविक रूप से घमंडी होता है, साहित्य का है तो लेखकों को फूटी आंख पसंद नहीं करता, अगर वो उसकी पार्टी के नहीं हैं तो।

जो हम पर कुर्बान होते हैं, वही इरफान होते हैं! 2

जो हम पर कुर्बान होते हैं, वही इरफान होते हैं!

राहुल तिवारी ♦ सवाल पर सवाल और हर सवाल पर उसी संयम और सहजता के साथ जवाब देख-सुन कर रामायण के राम और रावण के बीच चलने वाले तीर के टकरा कर गिर जाने का वो दृश्य याद आ रहा था, पर यहां राम एक थे और विपक्ष की ओर से आने तीरों की भरमार थी। संजीवनी के नाम पे एक पुड़िया पान मंगाया गया था उनके लिए। रात हो चुकी थी। उनका चश्मा था, जो उतरने का नाम नहीं ले रहा था। हो सकता है रेबैन कारण!! और इसी के साथ एक ऐतिहासिक दिन का अंत हुआ, जिसमें भविष्य के इतिहास पुरुष ने अपना इतिहास हमारे सामने साझा किया … यूं तो लोग उनसे हाथ मिलाने की होड़ लगा रहे थे, पर पता नहीं क्यूं मेरा मन हाथ मिलाने का बिलकुल भी नहीं हुआ और मेरा माथा झुक गया और मैंने उनके पैर छू लिये।

स्‍टारडम कुछ नहीं होता, असल चीज होती है कहानी! 4

स्‍टारडम कुछ नहीं होता, असल चीज होती है कहानी!

महताब आलम ♦ इरफान जेएनयू पहुंच चुके थे। जनता ने उनका जोरदार स्वागत किया। आयोजकों की ओर से औपचारिक स्वागत भी हुआ। तोहफे के तौर पर एक कलम, महान अभिनेता बलराज साहनी जी का एक भाषण, जो जेएनयू के एक कॉनवोकेशन में दिया गया था और रमाशंकर विद्रोही जी का काव्य संकलन, “नई खेती” पेश किया गया। मेरी समझ में इन तीनों में सबसे अहम विद्रोही जी का काव्य संकलन था, जो इरफान को पेश किया गया। जो विद्रोही को सुन चुके हैं, मिल चुके हैं, वो मेरी इस बात को अहम बताने की वजह समझ सकते हैं। हां, एक बात और कि मेरे कहने का मतलब ये बिलकुल नहीं की बलराज साहनी का भाषण कम अहम है। मामला असल में संदर्भों का है।

माय नेम इज़ खान… और मैं हीरो जैसा नहीं दिखता… 0

माय नेम इज़ खान… और मैं हीरो जैसा नहीं दिखता…

निखिल आनंद गिरि ♦ इरफान हीरो जैसा कम और एक हाजिरजवाब युवा ज्यादा लगने की कोशिश कर रहे थे। जेएनयू में पान मिलता नहीं, मगर बाहर से मंगवाकर पान चबाते हुए बात करना शायद माहौल बनाने के लिए बहुत जरूरी था। एकदम बेलौस अंदाज में इरफान ने लगातार कई सवालों के जवाब दिये। जैसे अपने रोमांटिक दिनों के बारे में कि कैसे वो दस-पंद्रह दिनों तक गर्ल्स हॉस्टल में रहने के बाद पकड़े गये और उनके खिलाफ हड़ताल हुई। या कि ‘हासिल’ के खांटी इलाहाबादी कैरेक्टर में ढलने के लिए उन्हें कैसे तजुर्बों से गुजरना पड़ा। हालांकि, राजनीति या सिनेमा पर पूछे गये कई सीरियस सवालों पर अटके भी और हल्के-फुल्के अंदाज में टाल भी गये।

सिनेमा जिंदा कला है, यहां मरी हुई सोच के साथ मत आइए 7

सिनेमा जिंदा कला है, यहां मरी हुई सोच के साथ मत आइए

विनीत कुमार ♦ एक रात मैं होटल में रुका था। मुझे नींद नहीं आ रही थी। मैं वारेन हेस्टिंग्स का सांड निकालकर पढ़ने लगा। पढ़ने के बाद बहुत देर तक रोता रहा। मैं सचमुच उदय प्रकाश की कहानी पर फिल्म करना चाहता हूं। इरफान ने बहुत सम्मान से कहा, वो हिंदी में सबसे ज्यादा उदय प्रकाश को पसंद करते हैं। वो गजब के लेखक हैं। कभी अनुराग कश्यप ने नामवर सिंह की बहुत तारीफ की थी और साझा किया था कि पाश पर बात करने के लिए जब-जब फोन करता, बड़े इत्‍मीनान से नामवरजी सब बताते। कितना ज्ञान और समझ हैं उन्हें … और आज इरफान ने उदय प्रकाश की खुले दिल से तारीफ की। अच्छा लगता है जब हिंदी की लहालोट और छक्का-पंजा की दुनिया के बाहर भी हमारे रचनाकारों, आलोचकों की तारीफ होती है।

लाल अक्‍ल बनाम भगवा अक्‍ल … चंचल मति मोरी! 6

लाल अक्‍ल बनाम भगवा अक्‍ल … चंचल मति मोरी!

अरविंद मोहन ♦ जेएनयू में पिछले दिनों जो बहस चली और जिन मुद्दों पर कक्षा छोड़कर जुलूस-प्रदर्शन हुए, उन्‍हें शर्मनाक ही कहना उचित होगा। जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय में चर्चा का विषय था महिषासुर की जाति और कुल। वहां सक्रिय एक छात्र संगठन इस दैत्य माने गये मिथकीय पात्र को यादवों का पुरखा मान कर उनका शहादत दिवस मनाना चाहता था। खुद को हिंदुत्व का ठेकेदार माननेवाली जमात के लोगों ने इसका विरोध किया और विवाद बढ़ गया। जेएनयू के लिए यह कोई बहुत अटपटी चीज नहीं है। वहां से निकले और अभी उसी नाम की रोटी खानेवाले एक दलित बौद्धिक ने इंग्लिश माई की पूजा कराना और मकाले बाबा को दलित उद्धारक मान कर उनकी जयकार करनी शुरू कर दी है।

देवदास के भीतर आत्‍मा के कितने टुकड़े छटपटा रहे थे! 5

देवदास के भीतर आत्‍मा के कितने टुकड़े छटपटा रहे थे!

प्रकाश के रे ♦ कोई भी पाठ सारे तथ्यों को ज्ञात कर और उल्लिखित कर न कभी तैयार हुआ है और न ही ऐसा कर पाना संभव है। खरे जी ने तथ्य जोड़े और यह संवर्द्धन आगे भी चलता रहेगा। देखने वाली बात तो यह है कि लाहौर, ढाका, बंबई, कलकत्ता या मद्रास – हर जगह देवदास को फिल्म के रूप में बनाना जरूरी समझा जाता है। भूगोल और राजनीति में अलग-अलग मन अपने सांस्कृतिक कोने में एक ही पुकार में पुकारने लगते हैं।

“हमने इतिहास की धूल झाड़ने की कोशिश की है…” 5

“हमने इतिहास की धूल झाड़ने की कोशिश की है…”

फारवर्ड प्रेस ♦ भारत में एक साथ कई संस्‍क़तियां और परंपराएं रही हैं। कबीर, जोतिबा फूले, पेरियार, अम्‍बेडकर, धर्मानन्‍द कोशांबी जैसे लोगों के लेखन ने विजेता शक्तियों के मिथकों, परंपराओं का पुनर्पाठ कर वंचित तबकों के नायकों की तलाश की। एकलव्‍य, शंबूक, बलिराजा आदि अनेक गुमनाम पराजित नायकों की प्राण प्रतिष्ठिा इसी का परिणाम है।

सिनेमा रिसर्च के नाम पर जाहिलों की फैकल्‍टीज सक्रिय है! 11

सिनेमा रिसर्च के नाम पर जाहिलों की फैकल्‍टीज सक्रिय है!

strong>विष्‍णु खरे ♦ देवदास को लेकर आधुनिकता संबंधी आपकी अवधारणा बोगस है और शेरों का इस्तेमाल गलत और बेतुका है। इश्क-ए-नाकामयाब और शराबनोशी के रिश्तों को लेकर सैकड़ों दूसरे मौजूं शेर उर्दू में बिखरे पड़े हैं। खुद गालिब में भी होंगे। क्या आपकी विभिन्न सक्रियताएं इसी स्तर की हैं? यह तो मुझे मालूम था कि सिनेमा पर रिसर्च के नाम पर जाहिलों की फैकल्टीज ही विभिन्न कॉलेजों और यूनिवर्सिटियों में सक्रिय हैं, लेकिन अब राज खुला कि जब “शोध-छात्रों” का यह स्तर है, तो उन्हें बेहतर भी क्यों होना चाहिए?

हिंदुओं के त्‍योहार बहुजन नायकों की हत्‍याओं के जश्‍न हैं 32

हिंदुओं के त्‍योहार बहुजन नायकों की हत्‍याओं के जश्‍न हैं

एआईबीएसएफ ♦ ‘लार्ड मैकाले और महिषासुर : एक पुनर्पाठ’ नाम से आयोजित इस कार्यक्रम को संबांधित करते हुए प्रसिद्ध दलित चिंतक कंवल भारती ने कहा कि पराजितों का भी अपना इतिहास होता है, उसकी नये तरीके से व्‍याख्‍या की जरूररत है। महिषासुर न्‍यायप्रिय और प्रतापी राजा थे, जिनका वध आर्यों ने छल से करवाया था।