Category: शब्‍द संगत

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नफ़रत में मोहब्बत से ज़्यादा तेज़ी होती है

♦ सआदत हसन मंटो मंटो की इस कहानी का शीर्षक है, नया साल। यह कहानी पढ़ी जितनी भी गयी है, साझा नहीं के बराबर की गयी है। लिहाजा नये साल पर मोहल्‍ला के पाठकों...

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हर मसले को काले-सफेद नजरिये से न देखें

रायपुर साहित्‍य महोत्‍सव विवाद वाया जलेस: गतांक [1, 2, 3] से आगे रायपुर साहित्योत्सव से उपजे सवालों पर जनवादी लेखक संघ का आधिकारिक बयान मुझे संतुलित लगा, जिसमें उत्सव के स्वांग और छलावे की...

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साइबर स्‍पेस पर जनवादी लेखक गूंगे क्‍यों?

♦ जगदीश्‍वर चतुर्वेदी रायपुर साहित्य महोत्‍सव पर जनवादी लेखक संघ का बयान अनेक विलक्षण और संकीर्ण बातों की ओर ध्यान खींचता है। मसलन, बयान में लिखा गया है, छत्तीसगढ़ सरकार का यह आयोजन “लेखकों...

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लेखक अपना ग्‍लानिबोध सार्वजनिक करें

रायपुर साहित्‍य महोत्‍सव विवाद वाया जलेस: गतांक से आगे… खरे साब का जो भी सौभाग्य रहा हो, यह हिंदी के लिए दुर्भाग्यपूर्ण है कि इस भाषा में काम करने वाले संभवनाशाली विचारक भी चीजों...

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जलेस का बयान: रायपुर गये लेखक निर्दोष

12-14 दिसंबर 2014 को मुख्यमंत्री रमण सिंह के नेतृत्व में छत्तीसगढ़ की भाजपा सरकार ने जिस साहित्य-महोत्सव का आयोजन किया, उसे जनवादी लेखक संघ असहमति का सम्मान करने के स्वांग और एक राजनीतिक छलावे...

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आओ सखि, कहें और कह कर मुकर जाएं!

पीयूष द्विवेदी भारत ♦ कह-मुकरी का अस्तित्व भारतेंदु युग की समाप्ति और द्विवेदी युग के आरंभ के साथ लगभग लुप्तप्राय हो गया। इस विधा पर अमीर खुसरो ने सर्वाधिक काम किया। भारतेंदु हरिश्चंद्र ने भी कह-मुकरियों की काफी रचना की। लेकिन भारतेंदु युग के बाद जब द्विवेदी युग आया तो आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के शास्त्रीयता के प्रति झुकाव के कारण तत्कालीन दौर के तकरीबन सभी रचनाकारों ने शास्त्रीय छंदों की राह पकड़ ली। और इस तरह खुसरों की बेटी और भारतेंदु की प्रेमिका कहलाने वाली ‘कह-मुकरी’ जैसी रसपूर्ण और मनोरंजक काव्य-विधा गुम होती गयी।

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बच्‍चे एक दिन यमलोक पर धावा बोलेंगे…

प्रकाश के रे ♦ आज से सौ साल पहले वह कलकत्ता से पानी के जहाज में बैठ कर एक अनजान सफर पर निकली थी। उस सफर में उसके साथ कोई अपना न था। वह अकेली थी। वह गर्भवती थी। ‘द क्लाइड’ नाम के उस जहाज पर जो उसके हमसफर थे, उन्हें भी मंजिल का पता न था।

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कौन लिख जाता है दीवारों पर अपनी असहमति

उदय प्रकाश ♦ मैंने वैशाली के अपने फ्लैट के स्टोर रूम में बहुत सी पुरानी किताबें, ग्रंथ और पांडुलिपियां भर रखी हैं। बीच में, पिछले साल लंबे अर्से के लिए बाहर की यात्राओं में निकल गया था। पत्नी भी अपने मायके और ससुराल में थीं। तो स्टोर रूम में दीमकों का आक्रमण हो गया। कुछ दस्तावेज धूल और कागजी बुरादे में बदल गये।

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मेरी खुद्दारियां थकने लगी हैं #MerajFaizabadi

वसीम अकरम त्यागी ♦ उनकी कलम से निकले ये वो अल्फाज थे, जो अखबारों की सुर्खियां नहीं बन पाते, जिनको कहने की हिम्मत कोई मैराज फैजाबादी जैसा कलंदर ही कर सकता है। आज के दौर में जब इनाम पाने के लिए कवियों और साहित्यकारों की लंबी-लंबी कतार इस तरह लगी रहती है, जैसे अल्‍पसंख्यकों के कत्ल और…

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पहले लड़की से, अब साहस से बलात्‍कार कर रहे हैं

अरुधंती रॉय ♦ तरुण तेजपाल उस इंडिया इंक प्रकाशन घराने के पार्टनरों में से एक थे, जिसने शुरू में मेरे उपन्यास “गॉड ऑफ स्मॉल थिंग्स” को छापा था। मुझसे पत्रकारों ने हालिया घटनाओं पर मेरी प्रतिक्रिया जाननी चाही है। मैं मीडिया के शोर-शराबे से भरे सर्कस के कारण कुछ कहने से हिचकती रही हूं। एक ऐसे इंसान पर हमला करना गैरमुनासिब लगा, जो ढलान पर है, खास कर जब यह साफ साफ लग रहा था कि वह आसानी से नहीं छूटेगा और उसने जो किया है, उसकी सजा उसकी राह में खड़ी है। लेकिन अब मुझे इसका उतना भरोसा नहीं है। अब वकील मैदान में आ खड़े हुए हैं और बड़े राजनीतिक पहिये घूमने लगे हैं। अब मेरा चुप रहना बेकार ही होगा, और इसके बेतुके मतलब निकाले जाएंगे।