Articles in the शब्द संगत Category
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डेस्क ♦ उत्तराखंड पर्यटन विकास बोर्ड, गेल (इंडिया) लिमिटेड और पेंगुइन बुक्स इंडिया के सहयोग से यात्रा बुक्स और दून लाइब्रेरी एंड रिसर्च सेंटर, ‘दून रीडिंग्सः हिमालय की गूंज’ कार्यक्रम के दूसरे आयोजन में 2, 3 और 4 अप्रैल को देहरादून में करने जा रहा है। पहली बार मई 2008 में इस तरह का आयोजना शुरू हुआ था और उसकी मास अपील शानदार रही थी। इस वर्ष साहित्योत्सव मुख्य रूप से उत्तराखंड पर केंद्रित है। राज्य भर के कवियों के काव्य पाठ और गायकों के गायन के साथ साहित्योत्सव शुरू होगा। लीलाधर जगूड़ी, मंगलेश डबराल, गिरदा, शेखर पाठक, नरेंद्र नेगी, बटरोही, डॉ अतुल शर्मा, जगदीश जोशी सरीखे कुछ जाने-माने उत्तरांचली लेखकों, कवियों और गायकों समेत गीतकार, पटकथा लेखक और एड गुरु प्रसून जोशी देहरादून के इस तीन दिवसीय साहित्योत्सव में शिरकत करेंगे।
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डेस्क ♦ अज्ञेय को उनकी आवाज़ में सुनना एक आह्लादकारी अनुभव था। सात मार्च, रविवार की शाम इंडिया इंटरनेशनल सेंटर के एनेक्सी सभागार में उनकी कविताओं को सुनने के लिए लगभग सौ बुद्धिजीवी, लेखक, कलाकार, संगीतकार, नाट्यकर्मी और पत्रकार जुटे थे। अज्ञेय के श्वेत-श्याम चित्रों एक एक करके पर्दे पर आ रहे थे और पार्श्व से उनकी विनम्र आवाज़ हॉल के अंधेरे में फैल रही थी। उनकी आवाज़ को रिकॉर्ड किया था ओम थानवी ने और चित्र भी उनके निजी अलबम के थे, जिसको मिला कर एक स्टिल वीडियो फिल्म तैयार की गयी थी। अज्ञेय की जन्मशती का यह पहला आयोजन था। इस तरह का आयोजन साल भर तक चलेगा।
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डेस्क ♦ मोहल्ला लाइव पर छपी कथाकार गौरीनाथ की एक प्रतिक्रिया के लिए उन्हें कानूनी नोटिस भेजी गयी है। यह प्रतिक्रिया गौरीनाथ ने खगेंद्र ठाकुर के उस आलेख पर दी थी, जिसमें उन्होंने गौरीनाथ को इशारों इशारों में अवसरवादी कहा था और इस अवसरवादिता के एक उदाहरण के तौर पर उन्होंने बताया था कि पटना पुस्तक मेले में मंच पर आकर गौरीनाथ ने आलोचक नामवर सिंह के पांव छूए। यह आलेख खगेंद्र ठाकुर ने रविवार डॉट कॉम के लिए लिखा था। इसकी प्रतिक्रिया गौरीनाथ ने मोहल्ला लाइव डॉट कॉम को दी। इस प्रतिक्रिया से तिलमिला कर खगेंद्र ठाकुर ने अपने वकील के जरिये गौरीनाथ को कानूनी नोटिस भेजी है और चरित्र हनन का आरोप लगाया है।
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गंगा सहाय मीणा ♦ पूना समझौते से पूर्व दोनों के मतभेद चरम पर थे। पूरे घटनाक्रम को नाटक दर्शकों के समक्ष जीवंत कर देता है। गांधी के अनशन ने अंबेडकर लिए द्वंद्व पैदा कर दिया। एक तरफ दलितों के लिए अधिकारों की लड़ाई का प्रश्न था, दूसरी तरफ गांधी का जीवन। यहां नाट्य-लेखक राजेश कुमार ने एक दिलचस्प प्रसंग सृजित किया है। अंबेडकर की गृहिणी पत्नी रमाबाई उन्हें इस द्वंद्व से मुक्ति दिलाने में मदद करती हैं। रमाबाई कहती हैं, ”सिद्धांत जान लेने के लिए नहीं, जान बचाने के लिए होते हैं… आज तक महात्मा लोगों की जान बचाते आए हैं, आप तो महात्मा की जान बचाने जा रहे हैं।” अंबेडकर का द्वंद्व समाप्त हो जाता है और वे गांधी से मिलने का फैसला करते हैं।
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दुष्यंत ♦ तीन दिन, दुनिया भर के साठ कवि, जिनमें एक तिहाई भारत से, और अनुभव एक कविता सा। जैसे सात साल की प्रांजुला सिंह की कविता हिंदी, अंग्रेजी और स्पेनिश में सुनने को मिली, तो अनुवाद के अनगिन रंग, भाषाओं के स्वाद और वाचन वैविध्य की मधुरता की मनोरम स्मृतियां छोड़ गया यह आयोजन। कविताओं के साथ इस आयोजन में फिल्म और पेंटिग के रंगों ने जुड़ कर इसे खास बना दिया। नार्वे की कवयित्री एवं फिल्ममेकर ओदवे क्लिवये की भारतीय कवियों पर बनायी गयी फिल्में देखना एक रोमांचक और यादगार अनुभव था तो दिल्ली के साधो समूह की कविता फिल्में अपने आप में अद्भुत।
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एक छात्र ♦ क्या किताबें अब सिरहाने की तकिया हो गयी हैं “विभूति नारायण”
जिसका इस्तेमाल वही करते हैं
जो सोने की तैयारी में हैं
अपनी कमसिन उम्र में मैंने चाहा था
और मैं खुश हूं कि
मेरी चाहत अब भी बची हुई है
कि किताबें जूता बन जाएं
चलने के पहले हर आदमी के पैर कसने का
आदमी के बदलने से
आदमीयत से भरोसा अभी भी नहीं उठा “विभूति नारायण”
कई लोगों के जीने की वजह बहुत मामूली होती है
जबकि मामूली चीजें कई पीढियों तक हल नहीं होतीं
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चण्डीदत्त शुक्ल ♦ मंटो की निगाह में मोहब्बत का बयान भी अनूठा है… वो कहता है, “किसी लड़के को लड़की से इश्क हो जाए, तो मैं उसे जुकाम के बराबर अहमियत नहीं देता, मगर वह लड़का मेरी तवज्जो को अपनी तरफ जरूर खींचेगा, जो जाहिर करे कि उस पर सैकड़ों लड़कियां जान देती हैं, लेकिन असल में वह मुहब्बत का इतना ही भूखा है कि जितना बंगाल का भूख से पीड़ित बाशिंदा। इस बजाहिर कामयाब आशिक की रंगीन बातों में जो ट्रेजडी सिसकियां भरती होगी, उसको मैं अपने दिल के कानों से सुनूंगा और दूसरों को सुनाऊंगा।”
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♦ सूरज प्रकाश कथा समय 2010 का उदघाटन 29 जनवरी की शाम सुप्रसिद्ध कथाकार सेरा यात्री ने किया। इस सत्र की अध्यक्षता विभूति नारायण राय ने की, जबकि बीज वक्तव्य असग़र वजाहत ने दिया। कार्यक्रम का संचालन राकेश श्रीवास्तव ने किया और साहित्य विद्यापीठ के डीन सूरज पालीवाल ने स्वागत भाषण में इस संगोष्ठी की रूपरेखा प्रस्तुत की। इस अवसर पर विभूति नारायण राय ने तेजेंद्र शर्मा के कहानी संकलन का लोकार्पण किया। इसी मौक़े पर हिंदी विश्वविद्यालय वर्धा के कुलपति विभूति नारायण राय की सराहना करते हुए कहा तेजेंद्र शर्मा ने कहा कि उनके प्रयासों से यहां साहित्यिक सांस्कृतिक गतिविधियों को नया आयाम मिला है।
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वर्धा मेल ♦ यह कथा का समय है। अक्सर कई पाप करने के बाद ब्रहमणों की व सवर्णों की यह आदत होती है कि वे कथा सुन लेते हैं और पाप से मुक्त हो जाते हैं। राय साब यानि दरोगा जी ने अपने थाने में कथा रखी है और आप जैसे पंडितों को आमंत्रित किया है ताकि उन्हें कई कुकर्मो के बाद एक सुकर्म करके थोड़ी मुक्ति का एहसास हो। इस तरह की कथा वे अक्सर विश्वविद्यालय में करवाते रहते हैं, जिनके विषय से आपको लगेगा कि क्रांति अब हुई कि तब… और कई बार माईक पर क्रांति करते भी हैं। अक्सर छद्म प्रगतिशील यही करते हैं। यह उनका पीआरओ प्रोग्राम है, जिसमें वे साहित्यिक बुद्धिजीवियों के बीच अपनी साख मजबूत करते हैं।
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उपेंद्र चौहान ♦ 2008 में बिहार में जो भयानक बाढ़ आयी थी, उसमें गौरीनाथ सपरिवार फंसे हुए थे। उनकी पत्नी ने खगेंद्र जी को फोन पर इसकी जानकारी दी थी और मैं देख रहा था कि खगेंद्र जी गौरीनाथ और उसके परिवार को बाढ़ से उबारने के लिए कितने बेचैन थे। खगेंद्र जी ऐसे बेचैन हो गये थे, जैसे गौरीनाथ उनका अपना सगा हो। उद्विग्नता में जाबिर हुसेन, प्रेम कुमार मणि से लेकर जिलाधिकारी तक को फोन घुमाया था। इससे गौरीनाथ को कितनी मदद मिली, ये तो वही बता सकते हैं, लेकिन खगेंद्र जी ने कोशिश बहुत की थी।


