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Articles in the शब्‍द संगत Category

नज़रिया, शब्‍द संगत »

[3 Sep 2010 | 3 Comments | ]
निजता का सम्‍मान करें, सस्‍ती लोकप्रियता से बचें

पंकज झा ♦ खबर यह है कि एक फिल्म में केवल बाबा रामदेव का एक बार जिक्र आ जाने पर निर्माता को सेंसर बोर्ड ने यह आदेश दिया कि वे रामदेव से अनापत्ति प्रमाण पत्र लाएं। यह शर्त पूरी करने के बाद ही फिल्म को सेंसर ने पास किया। उसी खबर से यह भी पता चला कि क़ानूनन यह जरूरी है कि फिल्मों में संबंधित व्यक्ति की अनापत्ति के बाद ही आप किसी जीवित व्यक्ति का नाम ले सकते हैं। तो अगर फिल्म, जो विशुद्ध कथात्मक माध्यम है, वहां बिना अनुमति के किसी का नाम भी लेना निषिद्ध है, वहीं जबरदस्त आपत्ति के बावजूद किसी महिला के फोटो का उपयोग एक तथ्यात्मक माध्यम में करना कहां तक जायज है?

शब्‍द संगत »

[29 Aug 2010 | 3 Comments | ]
वैद ने भी अपनी किताबें ज्ञानपीठ से वापिस लीं…

जानकी पुल ♦ कुलपति-ज्ञानोदय विवाद में अपने विरोध को और सख्‍त रूप देते हुए हिंदी के वरिष्ठतम लेखकों में एक कृष्ण बलदेव वैद ने भी भारतीय ज्ञानपीठ से अपनी किताबें वापिस ले ली हैं। वैद इस समय अमेरिका में हैं और वहां से ज्ञानपीठ के न्यासी आलोक जैन को लिखे एक पत्र में उन्होंने संस्था से पूर्ण असहयोग करने और वहां से प्रकाशित अपनी दोनों पुस्तकें वापिस लेने की सूचना दी है। उन्‍होंने लिखा है कि जब तक भारतीय ज्ञानपीठ लेखकों के प्रतिरोध का संतोषप्रद जवाब नहीं देती, मेरा उससे पूर्ण असहयोग रहेगा। इस असहयोग में यह भी शामिल है कि मैं ज्ञानोदय के लिए कुछ नहीं लिखूंगा और ज्ञानपीठ से प्रकाशित अपनी दो पुस्तकें – संशय के साये और डुबोया मुझको होने ने – मैं वापिस ले रहा हूं।

शब्‍द संगत »

[28 Aug 2010 | 8 Comments | ]
नामवर-मैनेजर का बाहूबली के साथ मंच साझा करने से इनकार

बिनीत राय ♦ हिंदी के दो सर्वाधिक प्रतिष्ठत आलोचकों नामवर सिंह और मैनेजर पांडे ने बिहार के कुख्यात बाहुबली नेता के साथ एक मंच पर बैठने से इनकार कर दिया। इन दोनों के ‘नेशनल बुक ट्रस्ट’, नयी दिल्ली द्वारा आयोजित भोजपुरी पुस्तक ‘पूर्वी के थाह’ के लोकार्पण में जाने से इनकार करने पर आयोजकों को कार्यक्रम की रूपरेखा बदलनी पड़ी। पुस्तक के लेखक थे जौहर शफीहाबादी। यह पुस्तक भोजपुरी भाषा में लिखी गयी है। हिंदी साहित्य के इन दोनों नामचीन शख्‍सीयतों का कार्यक्रम कल छपरा में आयोजित किया गया था। आयोजकों का तर्क था कि प्रभुनाथ सिंह ने भोजपुरी के लिए आवाज उठाया है। एनबीटी के आयोजकों ने प्रभुनाथ सिंह का कार्यक्रम रद्द तो नहीं किया लेकिन उन्हें दूसरे सत्र में बुलाया जिसमें ये दोनों उपस्थित नहीं थे।

मीडिया मंडी, शब्‍द संगत »

[27 Aug 2010 | 21 Comments | ]
बिक जाने के आरोप पर राजकिशोर ने दिया बयान

राजकिशोर ♦ सुना है, मैं बिक गया हूं। यह पहली बार सुनने को मिला है, इसलिए कुछ विचित्र-सा अनुभव हो रहा है। आरोप मेरे लिए नये नहीं हैं। कई बार सुनने को मिल चुका है कि मैं बेहद कनफ्यूज्ड हूं। यह जान कर हर बार मुझे अच्छा लगा है। जीवन और जगत के बारे में जिनके विचार निश्चित और अडिग हैं, उनका हश्र सभी देख रहे हैं। फिर भी ये निश्चयवादी अपने बारे में पुनर्विचार करने के लिए तैयार नहीं हैं। इन्हें लगता है, ये नहीं भटके हैं, जनता ही भटक गयी है। सिद्धांतों के बजाय मूल्यों में मेरी ज्यादा आस्था है। जब सिद्धांत और मूल्य के बीच टकराव होता है, तो मैं मूल्य को चुनता हूं। मेरा विचार है, सिद्धांत मूल्यों पर आधारित होना चाहिए। इसलिए तर्क की मांग पर अपना मत बदलने में मुझे कभी दुविधा नहीं हुई।

विश्‍वविद्यालय, शब्‍द संगत »

[25 Aug 2010 | 6 Comments | ]
राय, कालिया और मिश्र के खिलाफ क्रिमिनल नोटिस

डेस्‍क ♦ वर्धा जिला न्यायालय के फर्स्ट क्लास मजिस्ट्रेट, धनंजय निकम ने भारतीय ज्ञानपीठ की पत्रिका “नया ज्ञानोदय” में छपे विभूति नारायण राय के साक्षात्कार में लेखिकाओं को दी गयी गाली मामले में राय, रवींद्र कालिया और साक्षात्कारकर्ता राकेश मिश्र के खिलाफ क्रिमिनल नोटिस जारी की है। 23 अगस्त के अपने ऑर्डर में निकम ने कहा कि सभी कागजात देखने के बाद तथा शिकायतकर्ता की दलीलें सुनाने के बाद यह मामला प्रथमदृष्टया ऐसा लगता है कि इस प्रकरण से महिला लेखिकाओं का अपमान हुआ है। अतः तीनों आरोपियों को आईपीसी की धारा 499, 500, 501 तथा 509 के तहत नोटिस किया जा सकता है। कालिया, राय और मिश्र को 20 सितंबर तब अपना जवाब रखना है।

शब्‍द संगत, स्‍मृति »

[25 Aug 2010 | 4 Comments | ]
यह विशाल भूखंड आज जो दमक रहा है, मेरी भी आभा है इसमें!

सत्यानंद निरूपम ♦ 12 दिसंबर 1980 को विजय बहादुर सिंह को नागार्जुन ने इलाहाबाद से एक चिट्ठी लिखी थी – “अपने बारे में मित्रों एवं अमित्रों के मंतव्य सभी को सुनने पड़ते हैं… किसने, कब, कहां मेरे प्रसंग में क्या कहा? … वामपंथी एवं वामगंधी बंधुओं के परामर्श, चेतावनियां, शीतोष्ण उपदेश … यह सब मेरे इन कानों तक पहुंचते रहे हैं… परंतु सर्वाधिक परवाह जिस तत्व की मैं करता हूं वह कोई और तत्व है। जिस शक्ति से मैं ऊर्जा हासिल करता हूं, वह कोई और शक्ति है… मुझे संघर्षशील जनता का विपन्न बहुलांश ही शक्ति प्रदान करता है। कोटि-कोटि भारतीयों के वे निरीह, पिछड़े हुए, अकिंचन, दुर्बल समुदाय जो चाहने पर भी अपना मतपत्र नहीं डाल पाये, मेरी चेतना उनकी विवशताओं से ऊर्जा हासिल करेगी।”

मोहल्ला लखनऊ, शब्‍द संगत, स्‍मृति »

[24 Aug 2010 | 2 Comments | ]
गिरदा गये, जनता ने अपना कलाकार खो दिया

जन संस्‍कृति मंच ♦ सुपरिचित गायक, कलाकार और संस्कृतिकर्मी गिरीश तिवाड़ी गिरदा के निधन पर जन संस्कृति मंच ने गहरा शोक प्रकट किया है और कहा है कि उनके निधन से जनता ने अपना गायक और कलाकार खो दिया है। गिरदा ऐसे संस्कृतिकर्मी हैं, जिनका कला संसार जन आंदोलनों के बीच निर्मित होता है। गिरदा का निधन 22 अगस्त को हुआ। उनके निधन पर जन संस्कृति मंच की लखनऊ ईकाई के संयोजक कौशल किशोर ने शोक प्रकट करते हुए कहा कि 80 के दशक में उत्तराखंड में जो लोकप्रिय आंदोलन चला, गिरदा उसके अभिन्न अंग थे। इसी दौर में जन सांस्कृतिक आंदोलन को भी संगठित करने के प्रयास तेज हुए, जिसकी परिणति नैनीताल में ‘युवमंच’ तथा हिंदी-उर्दू प्रदेशों में जन संस्कृति मंच के गठन में हुई।

शब्‍द संगत »

[24 Aug 2010 | 11 Comments | ]
झूठ-प्रपंच से बना है हमारा साहित्यिक समाज!

डेस्‍क ♦ यह युवा कवि, रंगकर्मी मृत्‍युंजय की कविता है। हिंदी कविता में मृत्‍युंजय का नाम अपेक्षाकृत कम पहचाना नाम है – उसी तरह जैसे सच्‍ची मेधा बड़बोली न होने के चलते पार्श्‍व में रह जाती है। जो कविता आप पढ़ने जा रहे हैं, यह उन्‍होंने कुछ साल पहले लिखी थी। इसमें एक किरदार है और उस किरदार के बहाने मृत्‍युंजय हिंदी के साहित्यिक तिलिस्‍म को समझाने की कोशिश कर रहे हैं। यह पता नहीं है कि इसे उन्‍होंने कहीं छपने के लिए दी थी या नहीं – दी थी तो कहीं छपी या नहीं – लेकिन मोहल्‍ला लाइव की फाइल में यह कविता रखी थी। हम अमूमन कविताएं नहीं छापते, लेकिन कभी छापते भी हैं – तो प्रसंग समझ कर, अपने तईं असर समझ कर। यह कविता आज सार्वजनिक कर रहे हैं, क्‍योंकि इसके अर्थ अब ज्‍यादा खुलेंगे।

विश्‍वविद्यालय, शब्‍द संगत »

[24 Aug 2010 | 15 Comments | ]
महिलाओ, पहले राजकिशोर-आलोकधन्वा का सत्कार करो!

राजीव कुमार सुमन ♦ खबर है कि राजकिशोर विश्वविद्यालय की छात्राओं से विभूति के पक्ष में हस्ताक्षर करवा रहे हैं। क्या कोई व्यक्ति 25 हजार रुपये के दबाव में इतना गिर सकता है। यह तो बाद में पता चलेगा कि विश्वविद्यालय में विभूति और उसके कारिंदों तथा महिला छात्रावास की वार्डेन से त्रस्त छात्राएं इस हस्ताक्षर अभियान में कितना साथ देती हैं। हां, डर कर, एक छोटे विश्वविद्यालय में अत्यल्प संख्या में छात्राओं के बीच अपनी विभूति विरोधी छवि उजागर न हो जाने के भय से भले ही उन्हें हस्ताक्षर के लिए विवश होना पड़े। कवि आलोकधन्‍वा भी विश्वविद्यालय में कुछ ऐसा ही माहौल तैयार कर रहे हैं। दुखद है कि क्रांतिकारी कविताओं से जनप्रियता हासिल करने वाला रचनाकार एक सामंत की बेशर्म चापलूसी में लगा है।

विश्‍वविद्यालय, शब्‍द संगत »

[24 Aug 2010 | 3 Comments | ]
सारा देश लज्जित है, अभी तक उसे हटाया क्‍यों नहीं?

रघुवंश प्र सिंह ♦ महात्मा गांधी अंतर्राष्‍ट्रीय विश्वविद्यालय है, उसके वाइस चांसलर हैं वीएन राय। क्‍या लिखा है उन्होंने और महिला लेखकों के प्रति उनकी क्‍या टिप्‍पणी है? मैं लज्जित हूं उस शब्द का सदन में उच्चारण करने में कि उन्होंने क्‍या कहा। … ((व्यवधान)) … सारा देश लाज्जित है। देश भर के 150 लेखकों ने एक साथ कहा कि उसको हटाया जाए। अभी तक सरकार ने क्‍यों नहीं हटाया है? महिला लेखिका के प्रति किन शब्दों का उच्चारण किया है? एक वाइस चांसलर ने ऐसा किया और क्‍यों उस पर अभी तक कार्रवाई नहीं हुई है? हम यह पहला सवाल उठाते हैं। ये कहते हैं कि महिला का सशक्‍तीकरण कर रहे हैं और कहते हैं कि सभी ऊंचे पदों पर महिलाओं को बैठाएं। सरकार इसका जवाब दे कि क्‍यों नहीं उसे हटाया गया।