Articles in the शब्द संगत Category
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शेखर मल्लिक ♦ ऐसे देश में जहां भगतसिंह और मार्क्स को पढ़ना अनपढ़ या अल्पपढ़ सत्ता की आंखों में अपराध है, खूंखार नक्सली साहित्य रखने और नक्सलियों को गुपचुप मदद करने जैसी संदिग्ध गतिविधियों में लिप्त होने के पर्याप्त सबूत पुलिस उसके ठिकाने से उगाह चुकी थी। वह पुस्तिका भी, जिसके जलते हर्फे थे, “… की रात लांगो गांव मौत की काली चादर ओढ़े थी… बड़ी बेरहमी से कत्ल किया गया था जनता की वीर संतान … का। कुछ अक्षरों में उन वीर शहीदों की जीवन गाथा समाप्त नहीं हो सकती। सिद्दो-कान्हू-बिरसा-तिलका की परंपरा से अनुप्राणित ये योद्धा शोषणमुक्त समाज तैयार करने के लक्ष्य में अपनी जिंदगी के अंत तक काम करते रहे…
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डेस्क ♦ लिखावट की ओर से आरके पुरम में कथाकार हृषीकेश सुलभ ने अपनी चर्चित कहानी बसंत के हत्यारे का पाठ किया। आमतौर पर कविता के सहज और अनौपचारिक आयोजनों के लिए जाने जानेवाले इस मंच (लिखावट) पर कहानी की उपस्थिति ने एक नयी तरह आत्मविश्वास आयोजकों को दिया। हर पांच मिनट पर हवाई जहाज के शोर के बीच सुलभ जी ने किस्सागो शैली में अपने नये संग्रह बसंत के हत्यारे में इसी शीर्षक से संग्रहित कहानी का पाठ किया। कहानी पटना के एक रंगकर्मी की हत्या और उसके विरोध में निकले प्रतिरोध मार्च पर आधारित है। इस कहानी में राजनीति के लंपट चेहरे से लेकर कविता के खोखले चेहरे तक बेनकाब होते हैं।
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शिवानी खरे ♦ जहां शब्दों से भाव मूर्त होते हैं वहीं लकीरें चित्र को मूर्त बनाती हैं और उन चित्रों में रंग भरे जा सकते हैं। यह बात केंद्रीय मानव संसाधन मंत्री कपिल सिब्बल ने विश्वजीत की कविता पुस्तक कुछ शब्द कुछ लकीरें के लोकार्पण समारोह में कही। विश्वजीत का सीधा जुड़ाव राजनीति से है और राजपथ पर चलते चलते अक्सर वे कविता की पगडंडी पर चलने लगते हैं। कपिल सिब्बल ने कहा कि आजकल तो सारे नेता कवि बनते जा रहे हैं। फिर सिब्बल ने विश्वजीत के साथ अपनी दोस्ती की यादें ताजा कीं और कहा कि उनकी कविताओं को पढ़कर और उनकी रेखाओं को समझकर उन्हें और उनकी राजनीतिक यात्रा और अनुभव से और गहराई से जुड़ने का मौका मिलेगा।
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भीष्म पितामह ♦ हस्तिनापुर विद्यापीठ की सत्ता अब मथुरा के एक पंडे के हाथ में आ गयी है। उसने मेरे ही जमाता को आचार्य पद पर प्रतिस्थापित नहीं होने दिया। एक समय मैं खुद पदवियां बांटा करता था। अब असहाय हूं। अब गोष्ठियों की अध्यक्षता करने के सिवा मेरे पास कोई काम नहीं बचा है। कुरुवंश के साहित्य का मैं शो-पीस बनकर रह गया हूं। पुरानी तथाकथित प्रतिबद्धता और प्रतिष्ठा के कारण खाये-अघाये क्रांतिकारी और अफसर अब भी मेरे पास आते हैं, मदिरा सेवन कराते हैं और अपने ऊपर प्रायोजित गोष्ठियों की अध्यक्षता कराते हैं। अब तुम तो जानते हो पुत्र कि इस आयु में मदिरा सेवन के पश्चात मैं भावुक हो जाता हूं और इन खाये-अघाये क्रांतिकारी अफसरों को देखकर मुझे निराला और मुक्तिबोध याद आने लगते हैं।
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डेस्क ♦ जैसा कि लेखक ने हमें बताया है कि यह दलित कथा नहीं है और फिल्म बनाने के वास्ते भी नहीं है। झिंझोड़ने का मुगालता भी नहीं है। पैसे और तकनीक से सहज सुलभ उन्मादों और कुंठाओं के आनंद से इतराते इस समय में इतने हाई परफार्मेंस वाले “शाक एब्जार्वर” आ चुके हैं कि कोई भी झटका पर्याप्त कंपन पैदा नहीं कर पाता। दलितों के अलावा और भी लोग हैं, जो खामोशी से अपने-अपने नरक जी रहे हैं। यह कहानी कथाक्रम पत्रिका के जुलाई-सितंबर 2003 अंक में छपी और अब मोहल्ला लाइव में छपने के लिए आयी है।
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अविनाश ♦ मैंने उनसे फिर पूछा कि आप साहित्यकारों, फिल्मकारों, पत्रकारों, सामाजिक और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के नाम ले रहे हैं – इनमें से कोई सत्ता-राजनीति से जुड़ा नाम क्यों नहीं है। उन्होंने कहा कि दिल्ली आशीर्वाद समारोह में एक भी राजनेता बुलाया नहीं गया था। अशोक गहलोत को भी नहीं। जयपुर में आये थे, क्योंकि उनसे बत्तीस साल पुराना नाता है। उन्होंने कहा कि राजनेताओं से रिश्ते रहे हैं, लेकिन उनसे एक दूरी भी रही है। उन्होंने यह भी सूचना दी कि बेटी की शादी के वक्त भी दिल्ली में IIC में हुए आशीर्वाद समारोह में राजनेता बाहर रखे गये थे। जिनसे रिश्ते थे, उन्हें कहा था कि आना है तो दूरस्थ बीकानेर में शादी पर आ जाइए; सुविधाजनक दिल्ली में नहीं।
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कलियुगी वेदव्यास ♦ धृतराष्ट्र : आखिर कुमार ऐसा क्यों कर रहे हैं? इस पूरे आर्यावर्त में उन जैसा वीर पुरुष तो मेरी दृष्टि में कोई दूसरा है नहीं। संजय : आपकी दृष्टि? खैर छोड़िए… आप तो जानते हैं कि बंग प्रदेश उनकी मातृभूमि है और फिर वे इन दिनों सनातन बाबू का दांपत्य छोड़ एक सुकुमारी कवयित्री के प्रेम में पड़ गये हैं और रास-रंग में लीन हैं। धृतराष्ट्र : ओह, उन्हें फौरन फोन लगाओ और कहो कि युद्धकाल में रास-रंग शास्त्रोचित नहीं है। संजय : उनका फोन स्विच ऑफ आ रहा है महाराज। लगता है कि वे रंगशाला में हैं। धृतराष्ट्र : ऐसे में कौरव सेना का नेतृत्व कौन कर रहा है वत्स? संजय : युद्ध का नेतृत्व कुमार दुर्योधन के प्रिय ‘अंग देश’ के मित्र नरेश सूतपुत्र कर्ण कर रहे हैं महाराज।
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डेस्क ♦ लंदन के हाउस ऑफ कॉमन्स में सोलहवां अंतर्राष्ट्रीय इंदु शर्मा कथा सम्मान लेने के बाद कथाकार हृषिकेश सुलभ ने कहा कि उनके लिए लिखना जीने की शर्त है। बिहार की जिस जमीन से वे आते हैं, वहां एक एक सांस के लिए संघर्ष करना पड़ता है। उन्होंने कहा कि हमारी साझा संस्कृति को राजनीति की नजर लग गयी है। हम लेखक उसे बचाने की लड़ाई लड़ रहे हैं। न्याय का सपना अभी भी अधूरा है और वंचित के पक्ष में खड़ा होना लेखक की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है। ब्रिटेन में भारत के उच्चायुक्त नलिन सूरी ने ब्रिटिश संसद के हाउस ऑफ कॉमन्स में हिंदी लेखक हृषिकेश सुलभ को उनके कथा संकलन ‘वसंत के हत्यारे’ के लिए ‘सोलहवां अंतर्राष्ट्रीय इंदु शर्मा कथा सम्मान’ प्रदान किया।
नज़रिया, शब्द संगत »
दिलीप मंडल ♦ इन तमाम बयानों के बीच ही हमने नामवर सिंह, माफ कीजिएगा ठाकुर नामवर सिंह के बयान भी देखे। ठाकुर नामवर सिंह इन दिनों शानदार संगत में हैं। वे एक ऐसे आंदोलन से जुड़ गये हैं, जहां उनके साथ मंच पर प्रवीण तोगड़िया, मोहन भागवत, मुरलीमनोहर जोशी, सीआईआई से जुड़े उद्योगपति और सबड़े बड़े पूंजीपति खड़े हैं। सोमनाथ चट्टोपाध्याय का समर्थन भी उन्हें मिल गया है। इस मंच से ठाकुर नामवर सिंह हिंदुस्तान के साहित्यकारों को उनकी ऐतिहासिक भूमिका की याद दिला रहे हैं। तो योद्धाओ, तैयार हो जाओ। रणभूमि पुकार रही है। साहित्यकार आगे आएं और “संतों के साथ” मिलकर जाति गणना के “दुष्चक्र को तोड़ें” और ठाकुर नामवर के सपनों को पूरा करें।




