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Articles in the मोहल्ला भोपाल Category

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[14 Jan 2010 | 4 Comments | ]
कनफ्यूजन हुआ, गलती हुई, माफी : मनीषा पांडेय

मनीषा पांडेय ♦ उस दिन जब आपने सच्‍चाई का खुलासा किया, तो मैंने कहा था, सॉरी, आई गेस, कोई कनफ्यूजन हो गया है। ये बात सिर्फ आपके और मेरे बीच हुई। मैंने सॉरी कहा था, लेकिन कोई टेपरिकॉर्डर तो है नहीं और न ही कोई कानूनी प्रमाण पत्र। लेकिन मेरे मुंह से ये शब्‍द जरूर निकले थे। कोई टेपरिकॉर्डर तो है नहीं और न ही कोई कानूनी प्रमाण पत्र। आपको खुद को बड़ा या छोटा कुछ भी समझने की जरूरत नहीं है। आप अच्‍छा लिखती हैं। अखबार में क्‍या छपेगा, ये तय करना मेरा काम नहीं है। ये घटना कतई इस निष्‍कर्ष तक नहीं पहुंचाती कि मेरी सोच ऐसी है, जो बड़े ब्रांड वालों को बड़ा लेखक मानती है। इससे ज्‍यादा सफाई देने की कोई जरूरत नहीं। कनफ्यूजन हुआ, गलती हुई, माफी।

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[13 Jan 2010 | 46 Comments | ]
सुनो मनीषा पांडेय, मैं मृणाल पांडे नहीं, मृणाल वल्लरी हूं!

मृणाल वल्‍लरी ♦ मनीषा जी ने फोन ऐसे काटा जैसे किसी बहुत ही घृणित व्यक्ति से बात कर ली हो। यक़ीन नहीं हुआ कि ये वही महिला हैं, जो पहले इतना मीठा बोल रही थीं। अगर मनीषा जी के पास सही जानकारी नहीं थी, तो अपमान मैं क्यों झेलूं। क्या एक फीचर संपादक का यही व्यवहार होता है कि उसे एक साधारण महिला से सॉरी बोलने में शर्म महसूस हुई। उन्होंने यह बताने की ज़रूरत भी नहीं समझी कि उन्होंने मुझे मृणाल पांडे क्यों समझा। समझ नहीं आ रहा कि मनीषा के व्यवहार पर दुखी होऊं या अपने नाम के साथ मृणाल जुड़ा होने के कारण।

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[16 Dec 2009 | No Comment | ]
भोपाल में तेजेंद्र शर्मा का रचना पाठ एवं पुस्तक लोकार्पण

उर्मिला शिरीष ♦ स्पंदन, भोपाल ने पिछले महीने की 26 तारीख़ को भोपाल के स्वराज भवन में कथाकार तेजेंद्र शर्मा की अब तक प्रकाशित संपूर्ण कहानियों के पहले खंड सीधी रेखा की परतें का लोकार्पण समारोह का आयोजन किया। इस अवसर पर तेजेंद्र शर्मा ने इस संग्रह से अपनी कहानी कैंसर का पाठ किया। कार्यक्रम की अध्यक्षता साहित्यकार, चिंतक तथा शिक्षाविद प्रो रमेश दवे ने की। मुख्य अतिथि के रूप में व्यंग्यकार ज्ञान चतुर्वेदी उपस्थित थे। कार्यक्रम में राजेश जोशी, हरि भटनागर, वीरेंद्र जैन, राजेंद्र जोशी, मुकेश वर्मा, स्वाति तिवारी, आशा सिंह तथा अल्पना नारायण भी उपस्थित थे।

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[3 Dec 2009 | No Comment | ]
हवा में मौत के बीज

ओमप्रकाश सारस्‍वत ♦ असफलता ने उपलब्धि को शर्मिंदा कर दिया…
मौन ने मौत को ज़‍िंदा कर दिया…
सारी दुनिया हैरान थी
कि यह सब कैसे हो गया?
वह कौन-सा
आततायी था
जो हवा में
मौत के बीज बो गया?

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[3 Dec 2009 | No Comment | ]
आख़िर कब मिलेगा गैस पीड़ितों को इंसाफ़?

राजकुमार केसवानी ♦ मेरा दुर्भाग्य है कि 28 साल पहले मेरे मन में यह आशंका पैदा हुई थी और कोशिश की थी कि अपने शहर और लोगों की मौत को रोक सकूं। वर्ष 1981 के दिसंबर महीने में कार्बाइड प्लांट में कार्यरत मोहम्मद अशरफ़ की फ़ास्जीन गैस की वजह से मौत हो गई। मैं चौंक गया। वहां पहले भी दुर्घटनाएं हुई थीं और वहां के मज़दूर और आसपास के लोग प्रभावित हुए थे। मैंने एक पत्रकार के नाते इसे पूरी तरह जान लेना ज़रूरी समझा कि आख़िर ऐसा क्या होता है इस प्लांट में। नौ महीने की जी-तोड़ कोशिशों के नतीजे में साफ़ साफ़ दिखाई दे गया कि यह कारखाना एक बिना ब्रेक की गाड़ी की तरह चल रहा है। सुरक्षा के सारे नियमों की धज्जियां उड़ाता हुआ।

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[3 Dec 2009 | One Comment | ]
काल को भी नहीं पता

सुधीर सक्‍सेना ♦ सिर्फ़ कम्प्यूटर ही रख सकता है हिसाब-किताब
कि कितनों से दूर हुई लोरियां
कि कितनों के चटक गये चटकीले धागे,
कि कितनों के सपनों ने ली अचानक हिचकी।
सब कुछ बता सकता है कम्प्यूटर
फ़क़त यह छोड़
कि किसने किया गुनाह
और किसने पायी अनकिये गुनाह की सज़ा?

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[3 Dec 2009 | One Comment | ]
कुछ दिनों बाद…

राजेश जोशी ♦ कुछ दिनों बाद वहां घास उग आएगी
कुछ दिनों बाद मिट्टी कड़ी हो जाएगी वहां
नमक और फास्फोरस की मात्रा बढ़ जाएगी
जहां दफनाए गये थे
दो दिसंबर की रात मारे गये लोग।
दुख पर धीरे-धीरे धूल की कई तहें
जम जाएंगी और यादों पर
कई और दुखों की।

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[3 Dec 2009 | 2 Comments | ]
क्रूरता का काला इतिहास

मृणाल वल्लरी♦ इस हादसे की शिकार महिलाओं को पुरुषों से ज़्यादा भुगतना पड़ा। गैस पीड़ित महिलाओं ने जो स्त्री शरीर का दुख झेला है, उसका उदाहरण शायद इतिहास में भी नहीं मिले। जिन महिलाओं के पेट में बच्चा था, वह विकलांग पैदा हुआ। जो लड़की अभी बच्ची थी, उसका शरीर इस लायक नहीं रह गया कि वह कभी बच्चे को जन्म दे सके। प्रभावित क्षेत्र की महिलाओं के लिए गर्भपात एक आम समस्या बन गयी। महिलाओं के लिए उनका महिला होना ही सबसे बड़ा अभिशाप बन गया। जिन नयी ब्याहताओं ने अपना पति खोया, वे फिर कभी अपना घर नहीं बसा सकीं। महिलाओं को स्तन कैंसर से जूझना पड़ा, जो सिर्फ एक शारीरिक नहीं, सामाजिक बीमारी थी। स्तन कैंसर के इलाज के बाद जब वे सपाट छाती के साथ अपनी ससुराल पहुंचीं, तो उन्हें इस “अधूरे” शरीर के कारण घर से निकाल दिया गया।

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[3 Dec 2009 | No Comment | ]
भोपाल गैस त्रासदी : जनविज्ञान के सवाल

दीपाली शुक्‍ला ♦ 2/3 दिसंबर 1984 की उस काली रात को जो भी हुआ, उससे भोपाल शहर में हाहाकार मच गया। हज़ारों ज़‍िंदगियां मौत के आगोश में सो गयीं। जो जीवित बचे, उनको शारीरिक तक़लीफ़ों का अंतहीन सिलसिला मिला। वो आज भी संघर्ष कर रहे हैं। इस त्रासदी के साथ अनगिनत सवाल जुड़े हैं। जिनमें से बहुत से सवालों के जवाब आज तक नहीं मिल पाये हैं। इन्‍हीं सवालों को लेकर अध्‍ययन केंद्र, एकलव्‍य शोध एवं नवाचार संस्‍थान, होशंगाबाद, मध्‍यप्रदेश द्वारा एक पोस्‍टर प्रदर्शनी गैसकांड के बाद लगायी गयी थी। प्रदर्शनी में न केवल इस पूरे घटनाक्रम से जुड़े हर छोटे-बड़े तथ्‍यों के बारे में बताया गया था बल्कि औद्योगिक विकास के नाम पर इंसानी ज़‍िंदगी के साथ चल रहे फरेब पर भी प्रकाश डाला गया था।

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[2 Dec 2009 | No Comment | ]
वो तो एक क़ातिल रात थी…

परशुराम नागर ♦ सड़क पर आदमी, औरत और बच्चों के काफिले थे। कोई अपने बच्चे को संभाल रहा था, तो कोई अपने बूढ़े मां-बाप। मेरा घर कार्बाइड कारखाने के ठीक सामने ही है। पर पता नहीं था कि कारखाने की गैस रिस गयी है। लोग भागे चले जा रहे थे। सड़कों पर उल्टियां करते लोग। हर किसी को अपनी जान बचाने की पड़ी हुई थी। भागदौड़ में मेरा साथ गंगा से कब छूट गया, पता ही नहीं चला। मुझे लगा कि मेरे भाई का बेटा संतोष सड़क पर गिर गया है। भगदड़ में कहीं वह दब न जाए, यह सोच कर मैं उसके ऊपर लेट गया। पत्नी और परिवार के अन्य सदस्य मेरे चारों बच्चों शोभा, संगीता, दीपक और सरिता को लेकर आगे निकल गये। भाई का बेटा संतोष कब बिछड़ गया पता ही नहीं चला।