Category: मोहल्ला भोपाल

द हिंदू का दावा : भोपाल के दुख पर जेटली भी हंसे थे 3

द हिंदू का दावा : भोपाल के दुख पर जेटली भी हंसे थे

शेष नारायण सिंह ♦ 25 सितंबर को 2001 को कानून मंत्री के रूप में अरुण जेटली ने फाइल में लिखा था कि एंडरसन को वापस बुला कर उन पर मुकदमा चलाने का केस बहुत कमजोर है। जब यह नोट अरुण जेटली ने लिखा, उस वक्त उनके ऊपर कानून, न्याय और कंपनी मामलों के मंत्री पद की जिम्मेदारी थी। यही नहीं, उस वक्त देश के अटार्नी जनरल के पद पर देश की सर्वोच्च योग्यता वाले एक वकील, सोली सोराबजी मौजूद थे। सोराबजी ने अपनी राय में लिखा था कि अब तक जुटाया गया साक्ष्य ऐसा नहीं है, जिसके बल पर अमरीकी अदालतों में मामला जीता जा सके। अरुण जेटली के नोट में जो लिखा है, उससे एंडरसन बिलकुल पाक-साफ इंसान के रूप में सामने आता है।

हर शाख पे एंडरसन बैठा है… उर्फ कथा सोनभद्र की! 7

हर शाख पे एंडरसन बैठा है… उर्फ कथा सोनभद्र की!

आवेश तिवारी ♦ सोनभद्र से आठ नदियां गुजरती हैं, जिनका पानी पूरी तरह से जहरीला हो चुका है। यह इलाका देश में कुल कार्बन डाइऑक्साइड के उत्स्सर्जन का 16 फीसदी अकेले उत्सर्जित करता है। सीधे सीधे कहें तो यहां चप्पे चप्पे पर यूनियन कार्बाइड जैसे दानव मौजूद हैं, इसके लिए सिर्फ सरकार और नौकरशाही तथा देश के उद्योगपतियों में ज्यादा से ज्यादा पैसा कमाने के लिए मची होड़ ही जिम्मेदार नहीं है। सोनभद्र को ध्वंस के कगार पर पहुंचाने के लिए बड़े अखबारी घरानों और अखबारनवीसों का एक पूरा कुनबा भी जिम्मेदार है। कैसे पैदा होता है भोपाल, क्‍यों बेमौत मरते हैं लोग? अब तक वारेन एंडरसन के भागे जाने पर हो हल्ला मचाने वाला मीडिया कैसे नये नये भोपाल पैदा कर रहा है, आइए इसकी एक बानगी देखते हैं।

क्‍यों न राजीव गांधी से भारत रत्‍न छीन लिया जाए? 7

क्‍यों न राजीव गांधी से भारत रत्‍न छीन लिया जाए?

सुशांत झा ♦ हमें इस बात का जवाब चाहिए कि बीच के दौर में वीपी सिंह से लेकर वाजपेयी सरकार तक ने उस अमेरिकी हत्यारे को भारत न लाकर संविधान की किस धारा का उल्लंघन किया। कुछ लोगों की राय में राजीव गांधी तो दिवंगत हो चुके हैं, उनको जांच के दायरे में कैसे लाया जा सकता है? इसका जवाब ये है कि अगर जांच के बाद राजीव गांधी दोषी पाये जाते हैं, उनको दिये गये तमाम राष्ट्रीय सम्मान छीन लिये जाएं, जिनमें भारत रत्न भी शामिल है, और दूसरे जिंदा लोगों के पेंशन और सम्मान छीने जा सकते हैं। लेकिन मैं ये सवाल किससे कर रहा हूं? जब देश का पक्ष और विपक्ष ही इस नरमेघ में शामिल है तो फिर सवाल किससे और क्यों? शायद, मैं मूर्खों के स्वर्ग में रह रहा हूं!

कैसे पत्रकार थे, दर्द नहीं देह देख रहे थे! 9

कैसे पत्रकार थे, दर्द नहीं देह देख रहे थे!

विकास वश‍िष्‍ठ ♦ गजाला यहां के मीडिया के लिए ‘अहम किरदार’ हैं। जब भी भोपाल गैस त्रासदी का जिक्र आता है, हर मीडिया हाउस उनके पास पहुंच जाता है। ऊपर उनका छोटा सा परिचय देना इसीलिए जरूरी था। विधवा कॉलोनी यहां की ऐसी कॉलोनी है, जिसमें अधिकतर महिलाओं के शौहर गैस हादसे के शिकार हो गये थे और इस कॉलोनी का नाम विधवा कॉलोनी पड़ गया। इस पूरे घटनाक्रम के दौरान सीनियर रिपोर्टर महोदय कुछ असहज सी चुप्पी लगाये मुस्कुराते रहते हैं। लेकिन कुछ कहने की हिम्मत वह भी नहीं कर पाये। यह आज तक समझ में नहीं आया कि ओहदे में सीनियर होते हुए वह कुछ बोल क्यों नहीं पाये। आज भी यही सोच रहा हूं और उस वक्त भी यही सोच रहा था।

दैनिक भास्‍कर ने सर्वेक्षण में चालाकी से सवाल पूछे थे 7

दैनिक भास्‍कर ने सर्वेक्षण में चालाकी से सवाल पूछे थे

योगेंद्र यादव ♦ दैनिक भास्कर के सर्वेक्षण के जो अंश यहां उद्धृत हैं (मैंने इसके सिवा और कोई हिस्सा नहीं पढ़ा है और मेरी जानकारी अधूरी हो सकती है), उसमें कुछ सवाल और उनके उत्तर दिये गये हैं। कई बार ऐसा होता है कि सर्वेक्षण में सवाल कुछ और पूछा जाता है और उसे सामान्य पाठक के लिए पेश करते वक्त कुछ मसाला लगा कर लिख दिया जाता है। अगर भास्कर के डेस्क से ऐसा कुछ किया गया हो तो मैं कह नहीं सकता। लेकिन अगर सर्वेक्षण में शब्दश: वही सवाल पूछे गये थे जो अखबार की रपट में छपे हैं, तो यह कहना होगा कि सवाल निहायत एकतरफा झुकाव रखने वाले हैं और सर्वेक्षण की पद्धति के बुनियादी उसूलों का उल्लंघन करते हैं।

भोपाल मर रहा था, अर्जुन सिंह जहाज में उड़ रहे थे 5

भोपाल मर रहा था, अर्जुन सिंह जहाज में उड़ रहे थे

आनंद स्वरूप वर्मा ♦ तीसरी दुनिया के देशों को अपनी चारागाह बनाने वाले मौत के सौदागर अमरीकी साम्राज्यवादियों की मुनाफाखोरी को बढ़ाने के लिए इनके अनुग्रह पर पलने वाले मंत्रियों और अफसरों की सुविधालोलुपता ने हजारों बेगुनाहों को मौत के घाट उतार दिया। इस दुर्घटना में न तो अर्जुन सिंह की मौत हुई और न उनके किसी रिश्तेदार की, यह पिट्स विमान दुर्घटना जैसा कोई हादसा भी नहीं था जिसमें गांधी-नेहरू परिवार का कोई व्यक्ति मारा गया हो। सत्ता के शिखर पर बैठे लोगों को जनता के खून पसीने से तैयार सुरक्षा कवच हासिल है – इसलिए शताब्दी की इस सबसे दर्दनाक दुर्घटना पर न तो कोई राष्ट्रीय शोक मनाया गया, न सरकारी इमारतों पर लहरा रहे तिरंगे झुकाये गये।

पहले दैनिक भास्‍कर बताये कि उसकी जाति क्‍या है? 15

पहले दैनिक भास्‍कर बताये कि उसकी जाति क्‍या है?

जनहित अभियान ♦ यह सर्वे किन लोगों के बीच किया गया यह स्पष्ट नहीं है। भारत की सामाजिक विविधता का ध्यान इस तरह के सर्वे में न रखा जाए तो नतीजे गलत आएंगे। यह भास्कर की नीयत का सवाल नहीं है बल्कि सर्वे की वस्तुनिष्ठता का सवाल है। क्या इस सर्वे के लिए सैंपल चुनते समय इस बात का ध्यान रखा गया था कि इसमें दलित और पिछड़ी जाति के लोग, अल्पसंख्यक, आदिवासी और सवर्ण सभी अनुमानित संख्यानुपात में शामिल किये गये थे। यानी क्या इस सर्वे में जिनसे राय पूछी गयी, उनमें लगभग 24 फीसदी दलित-आदिवासी और लगभग 52 फीसदी पिछड़ी जातियों के लोग थे? या फिर भास्कर, जिसे देश की राय बताता है, वह सिर्फ सवर्णों की राय है?

भोपाल के बूचड़खाने में सब नंगे हैं 1

भोपाल के बूचड़खाने में सब नंगे हैं

राजेन तोडरिया ♦ न्‍यायपालिका आखिरी किला था जो भारतीय लोकतंत्र की वर्गीय पक्षधरता को संतुलित करता था। इसकी वर्गीय पक्षधरता भी उजागर होने के बाद किस मुंह से भारतीय राज्य खुद के लोकतंत्र होने का दावा कर सकेगा? भोपाल गैस कांड यह सवाल भी देश के लोकतंत्र से पूछ रहा है। पांच लाख से ज्यादा लोगों से उनके स्वाभाविक रूप से जीने का प्राकृतिक और संवैधानिक अधिकार छीनने के दोषी लोगों में से एक के खिलाफ भी कोई कार्रवाई न हो, ऐसा अंधेर तो इसी देश में संभव है। भोपाल के इस कारपोरेट बूचड़खाने में भारतीय कारपोरेट कंपनियां, कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका सब के सब नंगे खड़े हैं। ऐसे में भोपाल गैस कांड के पीड़ितों को न्याय के लिए शायद अगले जन्म का इंतजार करना होगा।

जिला अदालत, भोपाल 2010, 12 बजकर 5 मिनट! 7

जिला अदालत, भोपाल 2010, 12 बजकर 5 मिनट!

विकास वश‍िष्‍ठ ♦ यूनियन कार्बाइड कारखाने के सामने चिलचिलाती धूप में तपती उस औरत का वह स्टेच्यू आज जैसे अकेले ही अदालत के फैसले के इंतजार में था। यह स्टेच्यू हादसे के बाद बनाया गया था। जेपी नगर की सुबह आज कुछ ज्यादा अलग नहीं थी। रोजाना की तरह आज भी लोग अपने-अपने काम पर चले गये थे। लड़कों का झुरमुट जो शायद स्टेच्यू के पास वाली दुकान पर बैठने के लिए ही बना था, आज भी वैसे ही गपबाजी कर रहा था। वहीं पास में चौकड़ी लगाये कुछ आदमी ताशों के सहारे अपना वक्त काट रहे थे। लेकिन इन सबके बीच जेपी नगर की हवा में यूनियन कार्बाइड की 25 साल पुरानी वह गैस जैसे आज फिर से फैल रही थी।

…उससे ज्यादा जहर है सरकार की आस्तीन में! 5

…उससे ज्यादा जहर है सरकार की आस्तीन में!

राजेंद्र राजन ♦ मुनाफा उनका है
श्मशान अपना है
जहर उनका है
जहरीला आसमान अपना है
अंधे यमदूत उनके हैं
यमदूतों को नेत्रदान अपना है
हमारी आंखों में जिस विकास का अंधेरा है
उनकी आंखों में उसी विकास का सपना है