Category: पुस्‍तक मेला

किताबों का प्रचार नहीं, किताबों की बात। अच्‍छी किताबें पढ़ें और पढ़ाएं। किताबें कुछ कहना चाहती हैं, तुम्‍हारे पास रहना चाहती हैं।

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एक जरूरी किताब को प्रकाशक चाहिए

♦ अश्विनी कुमार पंकज हिल कुली कोंता की कहानी। साल के इस आखिरी दिन। अपने पहले उपन्यास के बारे में बात कर रहा हूं। इसे लिखने की योजना आठ साल पहले बनायी थी और...

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बच्‍चे एक दिन यमलोक पर धावा बोलेंगे…

प्रकाश के रे ♦ आज से सौ साल पहले वह कलकत्ता से पानी के जहाज में बैठ कर एक अनजान सफर पर निकली थी। उस सफर में उसके साथ कोई अपना न था। वह अकेली थी। वह गर्भवती थी। ‘द क्लाइड’ नाम के उस जहाज पर जो उसके हमसफर थे, उन्हें भी मंजिल का पता न था।

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विजय चौक से टीवी मीडिया की लाइव कहानी

शिवेंद्र कुमार सिंह ♦ “राहत फतेह अली खान के कन्सर्ट पर लिखी गयी तुम्हारी स्टोरी को देखने के बाद जाने मेरे दिल में क्या हो गया। ऐसा लगा कि राहत की जगह मैं स्क्रीन से बाहर आकर तुम्हारे सामने घुटनों पर बैठकर अपने प्यार का इजहार कुछ इन शब्दों में कर दूं… लागी तुमसे मन की लगन, लगन लागी तुमसे मन की लगन। सुरभि मेरा यकीन करो, ये तो मैं नहीं जानता कि कब से लेकिन हां मैं तुम्हें पूरे दिल से प्यार करता हूं।” असिस्‍टेंट प्रोड्यूसर की लिखी चिट्ठी के इतने हिस्से को पढ़ने के बाद संपादक जी ने पहले सुरभि को अपने केबिन में बुलाया। क्या हुआ सुरभि, तुमने अमोल की शिकायत की है।

तब मेरी कलम युवा थी और उन्‍होंने उसे हड़प ली! 2

तब मेरी कलम युवा थी और उन्‍होंने उसे हड़प ली!

अविनाश ♦ एक दिन अचानक राजेंद्र सिंह ने मुझे अपने कमरे में बुलवाया। मैं गया तो मोहन श्रोत्रिय भी वहां बैठे थे। राजेंद्र सिंह ने मुझे कहा कि तुमने जो लिखा, वह हम छाप रहे हैं, लेकिन इन सभी किताबों पर नाम इनका (मोहन श्रोत्रिय का) छपेगा। मोहन श्रोत्रिय के सामने ही यह कहा गया था, जाहिर उनकी इसमें सहमति थी। मैं सन्न रह गया। ऐसा लगा जैसे मेरे कानों ने सिर्फ सन्नाटा सुना। यों भी सुनने, न सुनने से कोई फर्क नहीं पड़ता, क्‍योंकि मुझे पता था कि राजेंद्र सिंह अपने इरादों में अटल रहते हैं। मैं बिना कुछ कहे, बगैर कोई प्रतिवाद किए चुपचाप बाहर आ गया। लाचारी के दिन भी बहुत अजीब होते हैं। मैं कमरे में लौट कर लेट गया। बुखार-सा चढ़ आया था। उसी रात उम्‍मीद का एक अंतर्देशीय मैंने अनुपम जी को लिखा।

मौजूदा मीडिया परिदृश्‍य में दलितों का नजरिया गायब है 2

मौजूदा मीडिया परिदृश्‍य में दलितों का नजरिया गायब है

अरविंद दास ♦ किसान और मजदूरों से जुड़ी खबरों की तरह न ही वर्ष 1986 में और न ही वर्ष 2005 में विश्लेषण अवधि के दौरान दलितों और आदिवासियों से जुड़ी कोई खबर नवभारत टाइम्स की सुर्खी बनी। वर्ष 1986 में जहां दलित और आदिवासी से जुड़े पांच मुद्दे नवभारत टाइम्स में प्रकाशित हुए, जिसमें ‘आदिवासी गदर-केंद्र के लिए आजादी का अर्थ’ शीर्षक से एक संपादकीय अग्रलेख भी शामिल है, वहीं वर्ष 2005 में भी दलित और आदिवासी से जुड़े पांच मुद्दे प्रकाशित हुए, इसमें भी एक दिन ‘उनके दलित और हमारे’ शीर्षक से संपादकीय अग्रलेख शामिल है। वर्ष 1986 में ‘बांग्लादेश चकमा आदिवासी वापस लेगा’ शीर्षक से एक खबर दो कॉलम में पहले पन्ने पर प्रकाशित हुई।

हिंदी पत्रकारिता की भाषा नयी चाल में कब और कैसे ढली? 1

हिंदी पत्रकारिता की भाषा नयी चाल में कब और कैसे ढली?

अरविंद दास ♦ 80 के दशक में राजेंद्र माथुर, सुरेंद्र प्रताप सिंह और वरिष्ठ पत्रकार प्रभाष जोशी जैसे पत्रकारों ने हिंदी पत्रकारिता के क्षेत्र में ऐसी भाषा का प्रयोग शुरू किया था, जिसकी पहुंच बहुसंख्यक हिंदी पाठकों तक थी। बकौल प्रभाष जोशी, “हमारी इंटरवेंशन से हिंदी अखबारों की भाषा अनौपचारिक, सीधी, लोगों के सरोकार और भावनाओं को ढूंढने वाली भाषा बनी। हमने इसके लिए बोलियों, लोक साहित्य का इस्तेमाल किया।” लेकिन यही बात वर्तमान में सुर्खियों की भाषा के प्रसंग में नहीं कही जा सकती है। आज सुर्खियों की भाषा भले ही अनौपचारिक हो उसमें हिंदी की बोलियों के शब्दों की जगह तेजी से अंग्रेजी के शब्दों का प्रयोग बढ़ रहा है। मसलन, ओके, नो मोर, पेटेंट, अजेंडा, फोटोग्राफ, टेंशन, फ्री, बैन आदि।

बाजार ने करवट बदली, तो हिंदी में समाचार भी बदले 0

बाजार ने करवट बदली, तो हिंदी में समाचार भी बदले

अरविंद दास ♦ पूंजीवादी व्यापार के तौर-तरीकों और लाभ की प्रवृत्ति भूमंडलीकरण के बाद हिंदी अखबारों में तेजी से फैली है। विज्ञापनों पर अखबारों की निर्भरता बढ़ी है, फलतः उनकी नीतियों में बदलाव आया है। वर्तमान में विज्ञापनदाताओं को आकर्षित करने की मुहिम में हिंदी के अखबार ‘खबर’ और ‘मनोरंजन’ के बीच फर्क नहीं करते हैं। ऐसा नहीं कि 80 के दशक में हिंदी अखबारों में खेल या मनोरंजन की खबरें नहीं छपती थीं या उनके लिए अलग से पृष्ठ नहीं होता था। लेकिन वर्ष 1986 में खेल, विशेषकर क्रिकेट की खबरें पहले पन्ने की सुर्खियां बमुश्किल बना करती थीं। वर्तमान में क्रिकेट की खबरें धड़ल्ले से सुर्खियां बनायी जा रही हैं क्योंकि क्रिकेट के खेल में मनोरंजन के साथ-साथ ग्लैमर और काफी धन है। उदारीकरण के बाद बढ़ी उपभोक्तावादी संस्कृति के चलते हिंदी के अखबार पाठकों को हल्की-फुल्की, मनोरंजन जगत की ज्यादा खबरों को देकर उनकी ‘जिज्ञासाएं’ शांत कर रहे हैं।

आधुनिक हिंदी की पहली स्‍त्री-आत्‍मकथा का लोकार्पण 8

आधुनिक हिंदी की पहली स्‍त्री-आत्‍मकथा का लोकार्पण

हाल में नयी दिल्ली में संपन्न हुए विश्व पुस्तक मेले में राधाकृष्ण प्रकाशन द्वारा प्रकाशित, हिंदी आलोचना के शिखर प्रो नामवर सिंह ने अपने विश्वविद्यालय जेएनयू की पीएचडी की छात्रा नैया द्वारा संपादित पुस्तक...

स्त्रियां स्‍त्री-विमर्श से आगे का आकाश नापें, तो बात बने! 0

स्त्रियां स्‍त्री-विमर्श से आगे का आकाश नापें, तो बात बने!

दिल्‍ली का अंतर्राष्‍ट्रीय पुस्‍तक मेला बीत गया। बारह नंबर हॉल में बनी चौपाल में रोज कई साहित्यिक सेशन थे। एक दिन हिंदी की कई स्‍त्री कवियों (कवयित्रियों) ने अपनी कविताएं पढ़ीं। पहला खटका तो...

वाणी ने छापी दलित कवि सिद्धलिंगय्या की आत्‍मकथा 0

वाणी ने छापी दलित कवि सिद्धलिंगय्या की आत्‍मकथा

कवि सिद्धलिंगय्या समकालीन दलित राजनीति के सांस्कृतिक भावावेश को बनाये रखने की दिलचस्प कोशिश करते हैं और इस तरह वे दूसरों से अलग हैं। यह ऐसा लेखन है जो क्रोध को मनोरंजन बनाता है।...