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Articles in the पुस्‍तक मेला Category

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[12 Jun 2010 | 4 Comments | ]
सनसनी फैलाने का कोई मौका नहीं छोड़ते राजकिशोर

डेस्‍क ♦ चारों तरफ चर्चा पा चुके समाजवादी पत्रकार राजकिशोर की एक किताब अभी वाणी प्रकाशन से छप कर आयी है, स्‍वीमिंग पुल पर टॉपलेस। इस संग्रह में उन कुछ लेखों का संकलन है, जो वे विभिन्‍न अखबारों में लिखते रहते हैं। किताब का शीर्षक संबंधी लेख महिला मुद्दे के एक खास पक्ष को बहुत बारीकी और न्‍याय के साथ सामने लाता है – लेकिन पूरी किताब इसी एक मुद्दे पर नहीं है। इस लिहाज से देखा जाए, तो उन्‍होंने स्‍त्री देह के प्रति सजग और लोलुप पाठकों को लुभाने के लिए इस किताब का ये शीर्षक दिया है। वरना इस किताब का शीर्षक हो सकता था – राजकिशोर के स्‍फुट विचार या विचारों के बगीचे में माली राजकिशोर।

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[10 Jun 2010 | 9 Comments | ]
वे पहले रेलवे में स्‍टेनों थीं, बाद में चीफ जस्टिस बनीं

उमेश चतुर्वेदी ♦ विक्रम सेठ की मां लीला सेठ की “घर और अदालत” नाम से आयी यह आत्मकथा छह साल पहले अंग्रेजी में ऑन बैलेंस के नाम से प्रकाशित हो चुकी है। तब इसे अंग्रेजी में हाथोंहाथ लिया गया था। लेकिन अदालती नियुक्तियों की राजनीति से हिंदी पाठकों का दस्तावेजी साबका अब जाकर पड़ा है, जब पेंगुइन-यात्रा ने यह किताब हिंदी में अनूदित करके प्रकाशित की है। इस राजनीति को जानने और समझने के लिए पाठकों को किताब के शब्दों से गुजरना होगा, जिसमें लीला सेठ ने बेबाकी से लिखा है कि राजनीति के चलते वे सुप्रीम कोर्ट की जज नहीं बन पायीं और सुप्रीम कोर्ट की पहली महिला जस्टिस होने का गौरव केरल की जस्टिस फातिमा बीवी हासिल करने में सफल रहीं।

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[7 May 2010 | No Comment | ]
“आया मिजबान” में बुंदेली लोककथाएं

दीपाली शुक्‍ला ♦ ग्रामीण अंचलों में किस्‍से और कहानियों का आमजीवन से बहुत गहरा रिश्‍ता होता है। ऐसी कहानियां जो एक पीढ़ी से होते हुए दूसरी पीढ़ी और उसके बाद भी आने वाली कई पीढि़यों तक चली आ रही हैं। लेकिन उनमें जो अपनापन है, जो खट्टे-मीठे-तीखे स्‍वाद हैं, वो ऐसे हैं कि जब इनका दौर शुरू होता है, तो सभी इनकी ओर सहज ही आकृष्‍ट हो जाते हैं। लेकिन ठेठ बोलियों की ये रसीली कहानियां कम ही सुनने को मिलती हैं। जहां पर इन कहानियों को सुना-सुनाया जाता है, केवल उस सीमित क्षेत्र के लोगों को ही इसके बारे में जानकारी होती है। कहने का तात्‍पर्य यह है कि इनका दायरा सिमट गया है और एक बड़ा वर्ग वर्तमान में इससे वंचित हो गया है।

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[19 Apr 2010 | 12 Comments | ]
गांधी पर एक और गदहपचीसी : जेड एडम्‍स की किताब

आवेश तिवारी ♦ एडम्स ने अपनी किताब में कहा है कि एक बेहद असामान्य यौन जीवन जीने वाले, खुद नग्न महिलाओं के साथ सोकर, नवविवाहित जोड़ों को अलग अलग सोकर ब्रह्मचर्य का उपदेश देने वाले गांधी नेहरु के शब्दों में “अप्राकृतिक और असामान्य” थे, वहीं आजादी के पूर्व आखिरी ब्रिटिश प्रधानमंत्री के शब्दों में “एक बेहद खतरनाक, अर्ध-दमित और असामान्य यौन व्यवहार” वाले व्यक्ति थे। सवाल सिर्फ ये नहीं है कि जेड एडम्स के द्वारा गांधी जी के सेक्सुअल जीवन की मीमांसा में सच कितना है और झूठ कितना बल्कि सवाल ये भी है कि इस उपन्यास के द्वारा जेड एडम्स हिंदुस्तान को और गांधीजी को जानने वालों को क्या कहना चाहते हैं। इस उपन्यास की जानकारी मुझे विश्व हिंदू परिषद से जुड़े मोहन गुप्ता ने दी।

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[10 Feb 2010 | 20 Comments | ]
“जाति के सवाल पर विभूति का चेहरा उतर गया था”

हेमंत ♦ मैंने अपना सवाल पूछा। सवाल था, सांप्रदायिकता पर बहुत लिखा जा रहा है, लेकिन जातिवाद के नये चेहरे पर कलम क्यों नहीं चल रही है? मौजूदा दौर का जातिवाद अलग किसम का है। अब छुआछूत की समस्या नहीं है। जाति के आधार पर अवसरों से वंचित करने कि साजिश बड़ी समस्या है। उम्मीद थी कि श्री राय सवाल सुन कर खुश होंगे और विस्तार से जवाब देंगे। लेकिन सवाल का असर उल्टा हुआ। उनका चेहरा उतर गया। अनमने ढंग से उन्होंने मेरे सवालों के जवाब दिये। जातिवाद पर बोलने के बदले उन्होंने सांप्रदायिकता पर छोटा सा जवाब दिया। मैं मायूस हो गया। लगा कि शायद श्री राय मेरा सवाल नहीं समझ पाये। ऐसा उनके प्रति मेरी आस्था के कारण हुआ।

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[29 Jan 2010 | 2 Comments | ]
“प्रभाष जी गांधीवादी निर्भयता के आखिरी प्रवक्ता थे”

मोहल्‍ला लाइव संवाददाता ♦ अशोक वाजपेयी ने प्रभाषजी को याद करते हुए कहा कि प्रभाषजी उन गिने चुने पत्रकारों में थे, जिनकी आवाज साहित्यिक जगत तक में साफ सुनी जाती थी। उन्होंने राम मनोहर लोहिया और राजेंद्र माथुर के साथ प्रभाषजी की तुलना करते हुए कहा कि ये वे लोग थे, जिन्होंने हिंदी की नयी शैली विकिसत की और हिंदी वालों को उनका उचित सम्मान दिलाने में पूरी कोशिश की। उन्होंने ये भी कहा कि प्रभाषजी जैसा पत्रकार पैदा नहीं हुआ, जो हिंदीभाषी पूरे समाज का प्रवक्ता बन गया हो। वाजपेयी ने कहा कि प्रभाष जी संभवत: गांधीवादी निर्भयता के आखिरी प्रवक्ता थे।

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[16 Jan 2010 | 3 Comments | ]
भावुक की किताब आयी, कुलदीप को सम्‍मान मिला

डेस्‍क ♦ भोजपुरी संसार पत्रिका के दिल्ली एवं पूर्वाचल एक्सप्रेस के संपादक कुलदीप श्रीवास्तव को भोजपुरी पत्रकारिता के क्षेत्र में बहुमूल्य एवं अप्रतिम योगदान के लिए पूर्वांचल मंच ने भोजपुरी पत्रकारिता के गौरव सम्मान से सम्मानित किया है। उन्हें सम्मान प्रदान किया प्रख्यात लोक गायिका मालिनी अवस्थी ने। दूसरी ओर पूर्वांचल एकता मंच द्वारा दिल्ली में आयोजित विश्व भोजपुरी सम्मेलन में उतर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री एवं कांग्रेस सांसद जगदंबिका पाल के हाथों भोजपुरी साहित्यकार मनोज भावुक के गीत संग्रह चलनी में पानी का लोकार्पण हुआ। इस अवसर पर फिल्म अभिनेता शत्रुघ्‍न सिन्‍हा, महुआ चैनल के चेयरमैन पीके तिवारी, भोजपुरी सुरसम्राट मनोज तिवारी एवं लोकगायिका मालिनी अवस्थी जैसी हस्तियां मौजूद थीं।

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[9 Jan 2010 | 7 Comments | ]
खगेंद्र ठाकुर का फसाना : झूठ पर झूठ

गौरीनाथ ♦ असल बात यह है कि इन तमाम गढ़ी हुई बातों को परोस कर खगेंद्र जी अपने विश्‍वरंजन प्रेम और प्रमोद वर्मा स्मृति संस्थान वाले सरकारी आयोजन में अपनी सहभागिता के कारणों से लोगों का ध्यान हटाना चाहते हैं। ऐसा ही प्रयास खगेंद्र जी और उनके कुनबे के लोग सिंगूर और नंदीग्राम मामले में भी कर चुके हैं। उनसे इतना पूछने का मन करता है कि लंबे अरसे तक वे पटना के एमएलए फ्लैट में किस तिकड़म के तहत सरकारी लाभ भोग रहे थे? और विश्‍वरंजन के प्रति प्रेम को भक्ति की पराकाष्ठा तक पहुंचाने का क्या राज़ है?

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[31 Dec 2009 | 3 Comments | ]
रंगकर्मी ने कहानी पढ़ी, पाठकों ने कहानी सुनी

विनीत कुमार ♦ पाठकों का रचना से सीधा रिश्ता कायम हो, इस क्रम में यात्रा बुक्स और पेंग्विन इंडिया का प्रयोग सफल रहा। दिल्ली की कंपकंपा देनेवाली ठंड में भी इंडिया हैबिटेट सेंटर का गुलमोहर सभागार लगभग भरा हो तो आप अंदाजा लगा सकते हैं कि रचना पाठ को लेकर पाठक अब भी कितने उत्‍सुक हैं। एक प्रकाशक की हैसियत से यात्रा बुक्स और पेंग्विन इंडिया ने इस बात की पहल की है कि रचना और पाठक के बीच एक स्वाभाविक संबंध विकसित हो। एक ऐसा संबंध, जो कि अख़बारों की फॉर्मूलाबद्ध समीक्षाओं और आलोचकों की इजारेदारी के बीच विकल्प के तौर पर काम कर सके। यह संबंध पाठक की गरिमा को बनाये रखे, उसे विज्ञापनदार समीक्षा पढ़ कर ग्राहक बनने पर मजबूर न करे।

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[30 Dec 2009 | 3 Comments | ]
कुछ नया कुछ पुराना : आज इंडिया हैबीटैट सेंटर में

डेस्‍क ♦ पेंगुइन बुक्स इंडिया और यात्रा बुक्स की ओर से ‘कुछ नया, कुछ पुराना’ के तहत कुछ गद्य अंशों के नाट्य-पाठ का आयोजन किया गया है। वाचक होंगे प्रसिद्ध युवा रंगकर्मी सुमन वैद्य। कृतियां होंगी चंगेज़ का बयान (मोहसिन हामिद), ज़िंदगी ज़‍िंदादिली का नाम है (ज़किया ज़हीर), मार्था का देश (राजी सेठ), गेंद और अन्य कहानियां (चित्रा मुदगल) और आख़री मुग़ल/दि लास्ट मुग़ल (विलियम डेलरिंपल)। आज शाम सात बजे इंडिया हैबीटेट सेंटर, लोदी रोड, नयी दिल्ली के गुलमोहर सभागार में ये आयोजन है और इसके लिए तीन नंबर गेट से इंट्री‍ है। शुरू होने से आधा घंटा पहले पेंगुइन बुक्स इंडिया और यात्रा बुक्स ने दर्शकों के लिए चाय-पानी का भी इंतज़ाम किया हुआ है।