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Articles in the पुस्‍तक मेला Category

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[10 Feb 2010 | 20 Comments | ]
“जाति के सवाल पर विभूति का चेहरा उतर गया था”

हेमंत ♦ मैंने अपना सवाल पूछा। सवाल था, सांप्रदायिकता पर बहुत लिखा जा रहा है, लेकिन जातिवाद के नये चेहरे पर कलम क्यों नहीं चल रही है? मौजूदा दौर का जातिवाद अलग किसम का है। अब छुआछूत की समस्या नहीं है। जाति के आधार पर अवसरों से वंचित करने कि साजिश बड़ी समस्या है। उम्मीद थी कि श्री राय सवाल सुन कर खुश होंगे और विस्तार से जवाब देंगे। लेकिन सवाल का असर उल्टा हुआ। उनका चेहरा उतर गया। अनमने ढंग से उन्होंने मेरे सवालों के जवाब दिये। जातिवाद पर बोलने के बदले उन्होंने सांप्रदायिकता पर छोटा सा जवाब दिया। मैं मायूस हो गया। लगा कि शायद श्री राय मेरा सवाल नहीं समझ पाये। ऐसा उनके प्रति मेरी आस्था के कारण हुआ।

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[29 Jan 2010 | 2 Comments | ]
“प्रभाष जी गांधीवादी निर्भयता के आखिरी प्रवक्ता थे”

मोहल्‍ला लाइव संवाददाता ♦ अशोक वाजपेयी ने प्रभाषजी को याद करते हुए कहा कि प्रभाषजी उन गिने चुने पत्रकारों में थे, जिनकी आवाज साहित्यिक जगत तक में साफ सुनी जाती थी। उन्होंने राम मनोहर लोहिया और राजेंद्र माथुर के साथ प्रभाषजी की तुलना करते हुए कहा कि ये वे लोग थे, जिन्होंने हिंदी की नयी शैली विकिसत की और हिंदी वालों को उनका उचित सम्मान दिलाने में पूरी कोशिश की। उन्होंने ये भी कहा कि प्रभाषजी जैसा पत्रकार पैदा नहीं हुआ, जो हिंदीभाषी पूरे समाज का प्रवक्ता बन गया हो। वाजपेयी ने कहा कि प्रभाष जी संभवत: गांधीवादी निर्भयता के आखिरी प्रवक्ता थे।

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[16 Jan 2010 | 3 Comments | ]
भावुक की किताब आयी, कुलदीप को सम्‍मान मिला

डेस्‍क ♦ भोजपुरी संसार पत्रिका के दिल्ली एवं पूर्वाचल एक्सप्रेस के संपादक कुलदीप श्रीवास्तव को भोजपुरी पत्रकारिता के क्षेत्र में बहुमूल्य एवं अप्रतिम योगदान के लिए पूर्वांचल मंच ने भोजपुरी पत्रकारिता के गौरव सम्मान से सम्मानित किया है। उन्हें सम्मान प्रदान किया प्रख्यात लोक गायिका मालिनी अवस्थी ने। दूसरी ओर पूर्वांचल एकता मंच द्वारा दिल्ली में आयोजित विश्व भोजपुरी सम्मेलन में उतर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री एवं कांग्रेस सांसद जगदंबिका पाल के हाथों भोजपुरी साहित्यकार मनोज भावुक के गीत संग्रह चलनी में पानी का लोकार्पण हुआ। इस अवसर पर फिल्म अभिनेता शत्रुघ्‍न सिन्‍हा, महुआ चैनल के चेयरमैन पीके तिवारी, भोजपुरी सुरसम्राट मनोज तिवारी एवं लोकगायिका मालिनी अवस्थी जैसी हस्तियां मौजूद थीं।

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[9 Jan 2010 | 7 Comments | ]
खगेंद्र ठाकुर का फसाना : झूठ पर झूठ

गौरीनाथ ♦ असल बात यह है कि इन तमाम गढ़ी हुई बातों को परोस कर खगेंद्र जी अपने विश्‍वरंजन प्रेम और प्रमोद वर्मा स्मृति संस्थान वाले सरकारी आयोजन में अपनी सहभागिता के कारणों से लोगों का ध्यान हटाना चाहते हैं। ऐसा ही प्रयास खगेंद्र जी और उनके कुनबे के लोग सिंगूर और नंदीग्राम मामले में भी कर चुके हैं। उनसे इतना पूछने का मन करता है कि लंबे अरसे तक वे पटना के एमएलए फ्लैट में किस तिकड़म के तहत सरकारी लाभ भोग रहे थे? और विश्‍वरंजन के प्रति प्रेम को भक्ति की पराकाष्ठा तक पहुंचाने का क्या राज़ है?

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[31 Dec 2009 | 2 Comments | ]
रंगकर्मी ने कहानी पढ़ी, पाठकों ने कहानी सुनी

विनीत कुमार ♦ पाठकों का रचना से सीधा रिश्ता कायम हो, इस क्रम में यात्रा बुक्स और पेंग्विन इंडिया का प्रयोग सफल रहा। दिल्ली की कंपकंपा देनेवाली ठंड में भी इंडिया हैबिटेट सेंटर का गुलमोहर सभागार लगभग भरा हो तो आप अंदाजा लगा सकते हैं कि रचना पाठ को लेकर पाठक अब भी कितने उत्‍सुक हैं। एक प्रकाशक की हैसियत से यात्रा बुक्स और पेंग्विन इंडिया ने इस बात की पहल की है कि रचना और पाठक के बीच एक स्वाभाविक संबंध विकसित हो। एक ऐसा संबंध, जो कि अख़बारों की फॉर्मूलाबद्ध समीक्षाओं और आलोचकों की इजारेदारी के बीच विकल्प के तौर पर काम कर सके। यह संबंध पाठक की गरिमा को बनाये रखे, उसे विज्ञापनदार समीक्षा पढ़ कर ग्राहक बनने पर मजबूर न करे।

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[30 Dec 2009 | 3 Comments | ]
कुछ नया कुछ पुराना : आज इंडिया हैबीटैट सेंटर में

डेस्‍क ♦ पेंगुइन बुक्स इंडिया और यात्रा बुक्स की ओर से ‘कुछ नया, कुछ पुराना’ के तहत कुछ गद्य अंशों के नाट्य-पाठ का आयोजन किया गया है। वाचक होंगे प्रसिद्ध युवा रंगकर्मी सुमन वैद्य। कृतियां होंगी चंगेज़ का बयान (मोहसिन हामिद), ज़िंदगी ज़‍िंदादिली का नाम है (ज़किया ज़हीर), मार्था का देश (राजी सेठ), गेंद और अन्य कहानियां (चित्रा मुदगल) और आख़री मुग़ल/दि लास्ट मुग़ल (विलियम डेलरिंपल)। आज शाम सात बजे इंडिया हैबीटेट सेंटर, लोदी रोड, नयी दिल्ली के गुलमोहर सभागार में ये आयोजन है और इसके लिए तीन नंबर गेट से इंट्री‍ है। शुरू होने से आधा घंटा पहले पेंगुइन बुक्स इंडिया और यात्रा बुक्स ने दर्शकों के लिए चाय-पानी का भी इंतज़ाम किया हुआ है।

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[28 Dec 2009 | No Comment | ]
जनजातियों के ख़ि‍लाफ़ षड्यंत्र की अनोखी कहानी

विष्णु राजगढ़िया ♦ रणेंद्र का यह उपन्यास आधुनिक भारत में जनजातियों के लिए उत्पन्न अस्तित्व मात्र के संकट के साथ ही जनप्रतिरोध की विविध धाराओं के उदय एवं उनकी जटिलताओं की सांकेतिक रूपों में महत्वपूर्ण प्रस्तुति करता है। ग्लोबल देवताओं को खनिज की भूख है और उनकी भूख मिटाने के लिए जनजातियों को जमीन से बेदखल करना ज़रूरी है। भारत सरकार को भी जनजातियों से ज्यादा जरूरी भेड़िये को बचाना है। आदिवासियों के विस्थापन और इसके खिलाफ शांतिपूर्ण विरोध से लेकर हिंसक प्रतिरोध तक की स्थितियों को सामने लाने के लिए रणेंद्र ने असुर जनजाति को केंद्र में रखा है।

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[27 Dec 2009 | 4 Comments | ]
आइए, इन किताबों की रोशनी में हम अपना संसार देखें

आलोक श्रीवास्तव ♦ जिस समय यूरोप में फ्रांसीसी-क्रांति और औद्योगिक-क्रांति का ईंट-गारा इकट्ठा हो रहा था, भारत में 1757 के प्लासी-युद्ध को जीतने के बाद अंग्रेज़ी राज मज़बूत हो रहा था। यह इतिहास घट भारत में रहा था, पर निश्चित रूप से यूरोप में हुई पूंजीवादी क्रांति और उससे जनमे साम्राज्यवाद की परिणति था। फिर और आगे, 1848 में कम्युनिस्ट घोषणापत्र का प्रकाशन हुआ, पूरा यूरोप आसन्न क्रांति की लपटों से घिरा रहा और पेरिस कम्यून के रूप में एक क्रांति हुई। ठीक उसी कालखड में साम्राज्यवाद के विरुद्ध – किसी भी मायने में फ्रांसीसी-क्रांति से कम नहीं – एक महाविद्रोह भारत में हुआ।

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[24 Dec 2009 | 4 Comments | ]
मधुबाला की जीवनी का फिल्‍म्‍स डिवीज़न में लोकार्पण

डेस्‍क ♦ पूरब की वीनस कहलाने वाली अप्रतिम सौंदर्य की मलिका ने भारतीय सिनेमा जगत पर न केवल अपने सौंदर्य बल्कि अपने अभिनय की गहरी छाप छोड़ी। इसके बावजूद उन्हें न तो जीते जी और न ही उनके निधन के बाद वह सम्मान दिया गया, जिसकी वह हकदार थी। ऐसी ही कुछ बातें मधुबाला की जीवनी ‘मधुबाला – दर्द का सफर’ के लोकार्पण के मौके पर सामने आयीं। लोकार्पण समारोह में लोकसभा सांसद राशिद अल्वी, फिल्म प्रभाग के निदेशक एवं वृत्तचित्र निर्माता कुलदीप सिंह, दूरदर्शन के पूर्व निदेशक एवं फिल्म शोधकर्ता शरद दत्त, संगीत विशेशज्ञ डा मुकेश गर्ग, बीते जमाने के मशहूर संगीत निर्देशक हुस्नलाल की बेटी एवं गायिका प्रियंबदा वशिष्‍ठ तथा सखा संगठन के अध्यक्ष अमरजीत सिंह कोहली मौजूद थे।

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[22 Dec 2009 | One Comment | ]
इलाहाबाद में “मुन्नी मोबाइल” का लोकार्पण

डेस्‍क ♦ पत्रकार प्रदीप सौरभ के पहले उपन्यास मुन्नी मोबाइल का इलाहाबाद में लोकार्पण हुआ। आलोचक प्रो राजेंद्र कुमार ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय के निराला सभागार में लोकार्पण समारोह की अध्यक्षता की। इस मौके पर उन्होंने कहा कि भूमंडलीकरण समाज को जोड़ता नहीं बल्कि बांटता है। एक नहीं होने देता। और सांप्रदायिकता भी यही काम करती है। इन दोनों संदर्भों में प्रदीप सौरभ का उपन्यास मुन्नी मोबाइल काफी अहम है। यह उपन्यास सांप्रदायिकता और भूमंडलीकरण, दोनों के ख़तरों से लोगों को आगाह करता था। प्रोफेसर राजेंद्र कुमार ने यह भी कहा कि मीडिया में रहते हुए यथार्थ को सामने लाना किसी चुनौती से कम नहीं। वह भी तब जब कहा जा रहा हो कि मीडिया बज़ार की रखैल है।