Category: पुस्‍तक मेला

वेब मीडिया विश्वास का भी न्यू मीडिया है 0

वेब मीडिया विश्वास का भी न्यू मीडिया है

शिवप्रसाद जोशी | शालिनी जोशी शिवप्रसाद जोशी और शालिनी जोशी की लिखी किताब आयी है। किताब का नाम है वेब पत्रकारिताः नया मीडिया नये रुझान। राजकमल प्रकाशन से नवंबर 2012 में आयी इस किताब...

हिंदी साहित्य और नयी किताब “चौराहे पर सीढ़ियां” 0

हिंदी साहित्य और नयी किताब “चौराहे पर सीढ़ियां”

♦ नवनीत नीरव वर्त्तमान साहित्य के क्षेत्र में सफलता की परिपाटी क्या होती है? … मुझे नहीं मालूम। शायद देश की नामचीन पत्र-पत्रिकाओं में लगातार छपना। आपकी किसी नयी रचना या किताब के प्रकाशन...

राजशेखर व्‍यास की किताब में अमेरिका का बेबाक विश्‍लेषण 0

राजशेखर व्‍यास की किताब में अमेरिका का बेबाक विश्‍लेषण

♦ हरि जोशी ऊर्जावान एवं प्रतिभा संपन्‍न लेखक राजशेखर व्‍यास की सद्य: प्रकाशित कृति “आंखों देखा अमेरिका” अभी-अभी पूरी पढ़ी है। लेखक ने जिस अनूठी दृष्टि से अमेरिका को देखा है वह सचमुच मननीय...

वे प्रधानमंत्री थे, लेकिन पांच लोगों को नाश्‍ता नहीं करवा सके 6

वे प्रधानमंत्री थे, लेकिन पांच लोगों को नाश्‍ता नहीं करवा सके

अविनाश ♦ लैरिजेज होटल में, सौ साल के सिनेमा का उत्‍सव ओम बुक्‍स इंटरनेशनल ने मनाया। फिल्‍म पत्रकार जिया साहब ने एक किताब संपादित की है: हाउस फुल, उसी के विमोचन के बहाने हिंदी सिनेमा के “गोल्‍डेन एरा” पर एक पैनल डिस्‍कशन था। गुलजार साहब की बहुत साफ समझ थी कि सिनेमा और संगीत उस दौर से काफी आगे निकल आया है और उसने अपनी लैंग्‍वेज इधर बनानी शुरू की। महेश भट्ट ने मदर इंडिया को उस दौर का अपने सबसे पसंदीदा सिनेमा बताया, लेकिन गुलजार ने उसे मैलोड्रामा के खाते में डालते हुए “औरत” को उससे बेहतरीन रचना बताया, जिससे प्रेरित होकर मदर इंडिया बनायी गयी थी। ऐसे अनेक खुरपेंच मिश्रित संवादों के बीच गुलजार साहब ने उस जमाने का एक किस्‍सा सुनाया।

बनारस में तीन दिनों की पुस्‍तक प्रदर्शनी, पुस्‍तक चर्चा भी 2

बनारस में तीन दिनों की पुस्‍तक प्रदर्शनी, पुस्‍तक चर्चा भी

गौरीनाथ ♦ देश की सांस्कृतिक राजधानी बनारस में त्योहारों का मौसम बड़ी साहित्यिक हलचलों के साथ शुरू हो रहा है। अंतिका प्रकाशन साहित्य प्रेमियों के लिए समकालीन विषयों पर नवीनतम पुस्तकें लेकर आ रहा है। तीन दिनों तक शहर के प्रमुख विश्वविद्यालयों में पुस्तक-प्रदर्शनियों के साथ-साथ विमर्श, विमोचन और गोष्ठियों-चर्चाओं की धूम रहेगी। गत वर्ष से बढ़-चढ़ कर इस बार अंतिका प्रकाशन ने बनारस के साहित्य प्रेमियों की इच्छाओं का सम्मान करते हुए तीन दिनों का कार्यक्रम रखा है। कार्यक्रम की शुरुआत 27 सितंबर को दोपहर एक बजे काशी विद्यापीठ से हो रही है जहां दूधनाथ चतुर्वेदी सभागार में जैगम इमाम के नवीनतम उपन्यास “मैं मुहब्‍बत” का लोकार्पण वरिष्ठ कथाकार काशीनाथ सिंह करेंगे।

आज भी दो लोगों के बीच जाति एक भयावह उपस्थिति है 0

आज भी दो लोगों के बीच जाति एक भयावह उपस्थिति है

दीपाली शुक्‍ला ♦ यह किताब एक दस्‍तावेज है, जिसमें अंबेडकर अपने जीवन में मिली भेदभाव की पीड़ा को, तिरस्‍कार को बयान करते हैं। आज जब जातिगत भेदभाव एक विशाल पेड़ की तरह मजबूती से समाज में अपनी जड़ें जमाये हुए है, ऐसा बहुधा सुनने को मिलता है कि अब पहले जैसे स्थितियां नहीं रहीं। पर सच्‍चाई यह भी है कि जातियों के बीच असमानता और तिरस्‍कार का भाव साफ तौर पर वर्तमान में भी दिखाई देता है। आज के युवा जातियों को लेकर, आरक्षण के बारे में, निम्‍न जातियों के विरुद्ध किये जाने वाले अपराधों के बारे में क्‍या सोच रखते हैं। इन मुद्दों पर बातचीत के साथ भीमायन की शुरुआत होती है और फिर डॉ अंबेडकर के बचपन में, स्‍कूली शिक्षा के दौरान मिलने वाली पीड़ाओं की परतें खुलती हैं।

आशुतोष की किताब में फेसबुक पीढ़ी की भीड़ का आह्लाद है 8

आशुतोष की किताब में फेसबुक पीढ़ी की भीड़ का आह्लाद है

दिनेश अग्रहरि ♦ आशुतोष आंदोलन में जुटी भीड़ को देखकर पूरी तरह भावनाओं में बह जाते हैं क्योंकि यह भ्रष्टाचार को खत्म करने के लिए चलने वाला दूसरी आजादी का आंदोलन है। लेकिन खुद आशुतोष ने यह लिखा है कि आपातकाल के दौरान जेपी के आंदोलन को लेकर भाव प्रवण रिपोर्टिंग की गयी थी, लेकिन बाद में उसके बारे में आकलन काफी बदल गया था। हमने यह देखा है कि वीपी सिंह के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के दौरान किस तरह से देश के युवाओं ने उन्हें ‘राजा नहीं फकीर है’ के नारे के साथ सिर आंखों पर बिठा लिया था और बाद में इस आंदोलन का क्या हश्र हुआ? पत्रकार को किसी आंदोलन की धारा में न बहते हुए उसकी जमीनी हकीकत से रूबरू कराना चाहिए

हिंदी में अब क्‍यों नहीं लिखे जाते यात्रा वृत्तांत? 3

हिंदी में अब क्‍यों नहीं लिखे जाते यात्रा वृत्तांत?

अनिल यादव ♦ हम लोग क्रिश्चियन आंटी के मेहमान थे, जो छींटदार फ्रॉक, कानवेंट की अंग्रेजी और खुले दिमाग वाली महिला थीं, जिनके बच्चे बड़े होकर विदेश में नौकरियां कर रहे थे। यह सलीब, बाइबिल, गिटार, इस्टर के सचित्र अंडों और चर्च के सामने खिंचवायी तस्वीरों से सजा टिपिकल ईसाई घर था, जहां नाश्ते और डिनर के समय भूल गयी तहजीब को पहले याद करना फिर पूरा प्रयोग करना पड़ता था।

‘मीडिया कंट्रोल: बहुजन ब्रेन बैंक पर हमला’ लोकार्पित 8

‘मीडिया कंट्रोल: बहुजन ब्रेन बैंक पर हमला’ लोकार्पित

दिलीप मंडल ♦ फेसबुक में लिखने के कारण किसी सरकारी कर्मचारी (डॉक्टर मुसाफिर बैठा और अरुण नारायण) के निलंबन की देश में पहली और एकमात्र घटना के ठीक 30 दिन के अंदर 16 अक्टूबर, 2011 को पटना में 112 पेज की किताब “बिहार में मीडिया कंट्रोल : बहुजन ब्रेन बैंक पर हमला” का लोकार्पण संपन्न हुआ।

तीसरी योनी को लेकर समाज इतना बेरहम क्‍यों है? 9

तीसरी योनी को लेकर समाज इतना बेरहम क्‍यों है?

डॉ चंद्रप्रकाश द्विवेदी ♦ लैंगिक विकलांगता कितनी भयानक हो सकती है उसका रूप है – तीसरी ताली। एक परिवार एक मानसिक और शारीरिक रूप से विकलांग बच्चे को गर्व से स्वीकार कर लेता है, पर लैंगिक रूप से? प्रकृति का अन्याय पूरे जीवन भर भार की तरह उठाता है एक लैंगिक विकलांग। यहां तक कि मृत्यु पर भी छुपकर निकलती है उसकी शवयात्रा …