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पुस्तक मेला, मोहल्ला रांची, शब्द संगत »
विष्णु राजगढ़िया ♦ रणेंद्र का यह उपन्यास आधुनिक भारत में जनजातियों के लिए उत्पन्न अस्तित्व मात्र के संकट के साथ ही जनप्रतिरोध की विविध धाराओं के उदय एवं उनकी जटिलताओं की सांकेतिक रूपों में महत्वपूर्ण प्रस्तुति करता है। ग्लोबल देवताओं को खनिज की भूख है और उनकी भूख मिटाने के लिए जनजातियों को जमीन से बेदखल करना ज़रूरी है। भारत सरकार को भी जनजातियों से ज्यादा जरूरी भेड़िये को बचाना है। आदिवासियों के विस्थापन और इसके खिलाफ शांतिपूर्ण विरोध से लेकर हिंसक प्रतिरोध तक की स्थितियों को सामने लाने के लिए रणेंद्र ने असुर जनजाति को केंद्र में रखा है।
नज़रिया, पुस्तक मेला, शब्द संगत »
आलोक श्रीवास्तव ♦ जिस समय यूरोप में फ्रांसीसी-क्रांति और औद्योगिक-क्रांति का ईंट-गारा इकट्ठा हो रहा था, भारत में 1757 के प्लासी-युद्ध को जीतने के बाद अंग्रेज़ी राज मज़बूत हो रहा था। यह इतिहास घट भारत में रहा था, पर निश्चित रूप से यूरोप में हुई पूंजीवादी क्रांति और उससे जनमे साम्राज्यवाद की परिणति था। फिर और आगे, 1848 में कम्युनिस्ट घोषणापत्र का प्रकाशन हुआ, पूरा यूरोप आसन्न क्रांति की लपटों से घिरा रहा और पेरिस कम्यून के रूप में एक क्रांति हुई। ठीक उसी कालखड में साम्राज्यवाद के विरुद्ध – किसी भी मायने में फ्रांसीसी-क्रांति से कम नहीं – एक महाविद्रोह भारत में हुआ।
पुस्तक मेला, मोहल्ला दिल्ली, शब्द संगत, सिनेमा »
डेस्क ♦ पूरब की वीनस कहलाने वाली अप्रतिम सौंदर्य की मलिका ने भारतीय सिनेमा जगत पर न केवल अपने सौंदर्य बल्कि अपने अभिनय की गहरी छाप छोड़ी। इसके बावजूद उन्हें न तो जीते जी और न ही उनके निधन के बाद वह सम्मान दिया गया, जिसकी वह हकदार थी। ऐसी ही कुछ बातें मधुबाला की जीवनी ‘मधुबाला – दर्द का सफर’ के लोकार्पण के मौके पर सामने आयीं। लोकार्पण समारोह में लोकसभा सांसद राशिद अल्वी, फिल्म प्रभाग के निदेशक एवं वृत्तचित्र निर्माता कुलदीप सिंह, दूरदर्शन के पूर्व निदेशक एवं फिल्म शोधकर्ता शरद दत्त, संगीत विशेशज्ञ डा मुकेश गर्ग, बीते जमाने के मशहूर संगीत निर्देशक हुस्नलाल की बेटी एवं गायिका प्रियंबदा वशिष्ठ तथा सखा संगठन के अध्यक्ष अमरजीत सिंह कोहली मौजूद थे।
पुस्तक मेला, मीडिया मंडी, शब्द संगत, समाचार »
डेस्क ♦ पत्रकार प्रदीप सौरभ के पहले उपन्यास मुन्नी मोबाइल का इलाहाबाद में लोकार्पण हुआ। आलोचक प्रो राजेंद्र कुमार ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय के निराला सभागार में लोकार्पण समारोह की अध्यक्षता की। इस मौके पर उन्होंने कहा कि भूमंडलीकरण समाज को जोड़ता नहीं बल्कि बांटता है। एक नहीं होने देता। और सांप्रदायिकता भी यही काम करती है। इन दोनों संदर्भों में प्रदीप सौरभ का उपन्यास मुन्नी मोबाइल काफी अहम है। यह उपन्यास सांप्रदायिकता और भूमंडलीकरण, दोनों के ख़तरों से लोगों को आगाह करता था। प्रोफेसर राजेंद्र कुमार ने यह भी कहा कि मीडिया में रहते हुए यथार्थ को सामने लाना किसी चुनौती से कम नहीं। वह भी तब जब कहा जा रहा हो कि मीडिया बज़ार की रखैल है।
पुस्तक मेला, शब्द संगत, समाचार »
एजेंसी ♦ पत्रकार प्रदीप सौरभ के पहले उपन्यास मुन्नी मोबाइल के लोकार्पण के मौके पर आज ढाई बजे से इलाहाबाद में इलाहाबाद विश्वविद्यालय के निराला सभागार, डेलीगेसी में भूमंडलीकरण और सांप्रदायिकता विषय पर चर्चा का आयोजन किया गया है। उपन्यास का लोकार्पण करेंगे कथाकार दूधनाथ सिंह। समारोह के विशिष्ट अतिथि के रूप में आमंत्रित हैं कथाकार मार्कंडेय। अध्यक्षता करेंगे आलोचक प्रो राजेंद्र कुमार। उपन्यास के आरंभ में सौरभ ने स्पष्ट लिखा है कि इस उपन्यास के नायकों-खलनायकों को वह काल्पनिक कहने का साहस नहीं जुटा पा रहे हैं। यह अपने आप में संकेत है कि यह उपन्यास यथार्थ के कितना करीब है।
पुस्तक मेला, मोहल्ला रांची, शब्द संगत »
विष्णु राजगढ़िया ♦ ज्ञानपीठ ने इसी महीने रणेंद्र का उपन्यास प्रकाशित किया है – ग्लोबल गांव के देवता। सिंगूर, लालगढ़, सलवा जुड़ुम और आपरेशन ग्रीन हंट के इस दौर में यह उपन्यास आधुनिक भारत में जनजातियों के लिए उत्पन्न अस्तित्व-मात्र के संकट के साथ ही जनप्रतिरोध की विविध धाराओं के उदय एवं उनकी जटिलताओं की सांकेतिक रूपों में प्रस्तुति करता है। ग्लोबल देवताओं को खनिज की भूख है और उनकी भूख मिटाने के लिए जनजातियों को ज़मीन से बेदखल करना ज़रूरी है। भारत सरकार को भी जनजातियों से ज़्यादा ज़रूरी भेड़िये को बचाना है। आदिवासियों के विस्थापन और इसके खिलाफ शांतिपूर्ण विरोध से लेकर हिंसक प्रतिरोध तक की स्थितियों को सामने लाने के लिए रणेंद्र ने असुर जनजाति को केंद्र में रखा है।
पुस्तक मेला, मोहल्ला भोपाल, समाचार »
उर्मिला शिरीष ♦ स्पंदन, भोपाल ने पिछले महीने की 26 तारीख़ को भोपाल के स्वराज भवन में कथाकार तेजेंद्र शर्मा की अब तक प्रकाशित संपूर्ण कहानियों के पहले खंड सीधी रेखा की परतें का लोकार्पण समारोह का आयोजन किया। इस अवसर पर तेजेंद्र शर्मा ने इस संग्रह से अपनी कहानी कैंसर का पाठ किया। कार्यक्रम की अध्यक्षता साहित्यकार, चिंतक तथा शिक्षाविद प्रो रमेश दवे ने की। मुख्य अतिथि के रूप में व्यंग्यकार ज्ञान चतुर्वेदी उपस्थित थे। कार्यक्रम में राजेश जोशी, हरि भटनागर, वीरेंद्र जैन, राजेंद्र जोशी, मुकेश वर्मा, स्वाति तिवारी, आशा सिंह तथा अल्पना नारायण भी उपस्थित थे।
पुस्तक मेला, मीडिया मंडी, मोहल्ला दिल्ली »
दुर्गानाथ स्वर्णकार ♦ प्रसिद्ध आलोचक डॉ नामवर सिंह ने बोलना तो है पुस्तक के विमोचन समारोह में कहा कि इक्कीसवीं सदी में उन्हीं चीज़ों का बाज़ार तेज़ी से फैल रहा है जो लिखने और पढ़ने से ज़्यादा बोलने और सुनने से जुड़ी हैं। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया इसकी उम्दा मिसाल है। पुरानी कहावत भी है कि बातन हाथी पांव – बातन हाथी पीठ। यानी आपकी उपलब्धि बहुत हद तक आपकी शैक्षिक योग्यता के साथ ही आपके बोलने और सुनने की तरीके पर निर्भर है। लेकिन हैरत की बात है कि ‘पढ़ो-लिखो’ की सीख देने वाले समाज में अब भी बोलने-सुनने की कला की व्यावहारिक और औपचारिक शिक्षा देने की कोई व्यवस्था नहीं है।
पुस्तक मेला »
डेस्क ♦ अपने समय की चिंताओं और परेशानियों से वाबस्ता शायर ज़ुबैरुल-हसन ग़ाफ़िल उर्दू अदब में उस तरह मशहूर भले न हों, मगर एक ज़रूरी और महत्त्वपूर्ण शख्सियत हैं। इनकी नज़्में हों या ग़ज़लें, उर्दू की उन तरक़्क़ीपसंद शायरों की परंपरा को आगे बढ़ाती हैं, जिनको पढ़ कर हमारी नयी पीढ़ी आगे बढ़ रही है। यहां ग़ालिब, मीर, फ़ैज़ से लेकर अली सरदार जाफरी तक की परंपरा से ग़ाफ़िल साहब का अदबी मुहब्बत और वैचारिक सरोकार सा़फ झलकता है। इस मुहब्बत और सरोकार के सबब को आगे बढ़ाने का बेहतर प्रयास भी यहां सा़फ दिखता है।
पुस्तक मेला, मीडिया मंडी, मोहल्ला दिल्ली, समाचार »
विनीत कुमार ♦ 1984 के सिख दंगे के बारे में जिसे कि मैं दंगा नहीं नरसंहार मानता हूं, देश के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कहीं कहा है कि हमें इसे भूल जाना चाहिए। मैं मानता हूं कि इतिहास भूलने की चीज़ नहीं होती। आज से पता नहीं कितने हज़ार साल पहले रावण ने ग़लती की और हम आज तक उसे जलाते हैं। 1984 में सिक्खों के साथ जो कुछ भी हुआ, वो आगे के जेनरेशन में भी जाएगा और ये शायद ज़्यादा ख़तरनाक रूप में जाए। इसलिए इसे करेक्ट करने की ज़रूरत है। सिर्फ जस्टिस के जरिये ही इतिहास की इस भूल को करेक्ट किया जा सकता है। जरनैल सिंह ने ये बातें अपने किताब के लोकार्पण के मौके पर ज़ुबान की प्रकाशक और चर्चित लेखिका उर्वशी बुटालिया से पूछे गये सवालों का जबाब देते हुए कहीं।




