Articles in the पुस्तक मेला Category
नज़रिया, पुस्तक मेला, स्मृति »
शेष नारायण सिंह ♦ महात्मा फुले के चिंतन के केंद्र में मुख्य रूप से धर्म और जाति की अवधारणा है। वे कभी भी हिंदू धर्म शब्द का प्रयोग नहीं करते। वे उसे ब्राह्मणवाद के नाम से ही संबोधित करते हैं। उनका विश्वास था कि अपने एकाधिकार को स्थापित किये रहने के उद्देश्य से ही ब्राह्मणों ने श्रुति और स्मृति का आविष्कार किया था। इन्हीं ग्रंथों के जरिये ब्राह्मणों ने वर्ण व्यवस्था को दैवी रूप देने की कोशिश की। महात्मा फुले ने इस विचारधारा को पूरी तरह ख़ारिज़ कर दिया। फुले को विश्वास था कि ब्राह्मणवाद एक ऐसी धार्मिक व्यवस्था थी जो ब्राह्मणों की प्रभुता की उच्चता को बौद्घिक और तार्किक आधार देने के लिए बनायी गयी थी। उनका हमला ब्राह्मण वर्चस्ववादी दर्शन पर होता था।
पुस्तक मेला, मोहल्ला दिल्ली, शब्द संगत, समाचार »
डेस्क ♦ हिंदी की सुप्रसिद्ध आलोचक प्रो निर्मला जैन की पुस्तक दिल्ली शहर दर शहर छप गयी है। ये किताब राजकमल प्रकाशन से छपी है। इसका लोकार्पण समारोह 13 अक्टूबर को आयोजित किया गया है। लोकार्पण राजकलम प्रकाशन की पूर्व प्रबंध निदेशक शीला संधु के हाथों संपन्न होगा, जबकि समारोह की अध्यक्षता प्रख्यात पत्रकार प्रभाष जोशी करेंगे। 13 अक्टूबर की शाम 6 बजे साहित्य अकादेमी सभागार, फीरोजशाह रोड, मंडी हाउस, नयी दिल्ली में लोकार्पण होगा। इस मौक़े पर मशहूर शिक्षाशास्त्री और एनसीईआरटी के निदेशक प्रो कृष्ण कुमार और आलोचक प्रो पुरुषोत्तम अग्रवाल मुख्य वक्ता होंगे।
पुस्तक मेला, मोहल्ला मुंबई, शब्द संगत, समाचार »
प्रेस विज्ञप्ति ♦ विजयशंकर चतुर्वेदी के कविता संग्रह पर अपनी बात रखते हुए कवि बोधिसत्व ने कहा, “वर्ष में 100 के करीब कविता संग्रह छपते हैं लेकिन यह संग्रह उनसे भिन्न है। विजय की कविताओं में आलोचकों का दबाव नहीं है। ये कविताएं तुलसी से लेकर कबीर और बाबा नागार्जुन तक जुड़ती हैं। इनमें स्त्रियों के कई रूप हैं, जिनमें मां, बेटी, बहन का ज़िक्र बार-बार आता है। विषय भी इतने तरह के हैं, जो आजकल देखने को नहीं मिलते।” इस अवसर पर बोधिसत्व ने विजयशंकर की एक कविता “बेटी हमारी” का पाठ भी किया। इस अवसर पर प्रोफेसर ऋतुपर्ण ने जापान के साथ-साथ अपनी गयाना, फिजी, त्रिनिदाद, मॉरिशस और अन्य देशों की यात्राओं तथा रहिवास के रोचक अनुभव सुनाते हुए कहा कि आज हिंदी विश्वभाषा बन चुकी है।
पुस्तक मेला »
एस बिजेन सिंह ♦ आर्म्ड फोर्सेस स्पेशल पावर एक्ट 1958 के विरोध में आमरण अनशन पर बैठी मणिपुर की इरोम शर्मिला चनु पर लिखी किताब का लोकार्पण केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री अगाथा संगमा ने इंडिया हेबिटेट सेंटर के गुलमोहर हॉल में किया गया। पेंग्विन बुक्स से प्रकाशित इस किताब की लेखिका दीप्ति प्रिया महरोत्रा हैं। अंग्रेजी की यह किताब शर्मिला के साथ-साथ मणिपुर की संस्कृति और वहां की प्रतिरोध परंपरा को भी टटोलती है। शर्मिला पर लिखी यह किताब पूरे मणिपुर का चेहरा है, जो वहां की ज़िंदगी को दर्शाता है। जब शर्मिला 2007 में दिल्ली के राममनोहर लोहिया अस्पताल में दाखिल हुई, तो लेखिका उससे मिली। उनका हाल देख कर वह इतनी विचलित हुई कि बेसाख्ता गुस्से में उनके मुंह से निकला कि मैं आप पर किताब लिखूंगी। उससे पहले उन्हें अपने इस निर्णय के बारे में पता नहीं था।
असहमति, नज़रिया, पुस्तक मेला »
जगदीश्वर चतुर्वेदी ♦ गूगल सर्च में जब आप किताब खोजने जाते हैं तो किताब की जगह किताब आधी, अधूरी मिलती है। आप किताब पढ़ते हैं, और अचानक पाते हैं कि उसके कई पन्ने गायब हैं। यह वैसे ही है, जैसे पुस्तकालय से किसी किताब से कोई पाठक अपने काम के पन्ने फाड़कर ले जाए। फटी किताब, अधूरी किताब गूगल के ‘बुक सर्च’ का आम फिनोमिना है। हमें समझ में नहीं आता ये गूगल वाले अधूरी किताब, कटी, फटी किताब यूजर को क्यों देते हैं? गूगल की नेट लाइब्रेरी में अनेक किताबें ऐसी भी हैं जिनका गूगल ने अभी तक कॉपीराइट नहीं लिया है। प्रकाशक से कॉपीराइट नहीं लिया है। गूगल में सीमित पन्नों या आधी अधूरी शक्ल में नज़र आने वाली किताबें अवैध हैं। गूगल की इस जालसाज़ी का पर्दाफाश और प्रतिवाद किया जाना चाहिए।
पुस्तक मेला »
सुशांत झा ♦ अखिलेश अखिल की ये किताब एक तरह से उनकी पत्रकारीय डायरी है, जिसमें वक्त वक्त उनके द्वारा की गयी बेमिसाल रिपोर्टिंग है, जो विभिन्न अखबारों और पत्रिकाओं में छपी। अखिलेश अखिल की भाषाई धार और तल्ख रिपोर्टिंग का अंदाज़ इस पूरी किताब में साफ झलकता है। ये वहीं अखिलेश अखिल हैं जिन्होने लालू यादव के जलवाई शासनकाल में – जब चारा घोटाला का आरोप लालू पर लगा था – उस वक्त बंदर के हाथ में बिहार नाम का लेख विचार मींमांसा में लिखा था। उस लेख से आहत होकर लालू समर्थकों ने अखिल पर हमला भी किया था, जिसमें वे बुरी तरह घायल हो गये थे।
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अंतिका प्रकाशन ♦ जस देखा तस लेखा शिक्षा जगत और बच्चे से जुड़ी चिंताओं का जीवंत पिटारा है। यह एक ऐसे शिक्षक की डायरी है, जो बिहार के सुदूर ग्रामीण और शहरी प्राइमरी – माध्यमिक पाठशालाओं से कॉलेज और विश्वविद्यालय तक एक अरसे से पढ़ाते आ रहे हैं। इस डायरी के पन्ने में बदहाल बिहार के बच्चे और उसके विद्या मंदिर से संबद्ध जानकारियां ऐसे कथा-तत्वों से संपृक्त हैं कि इसे उपन्यास की तरह पढ़ा जा सकता है। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि हरेक समझदार शिक्षक और सचेत अभिभावक के लिए यह एक ज़रूरी किताब है।
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पुस्तक मेला »
अंतिका प्रकाशन ♦ अभिषेक रौशन ने इस पुस्तक में परिश्रम से अनुपलब्ध सामग्री का संचयन किया है और उसका विवेकपूर्ण मूल्यांकन भी किया है। उन्होंने हिंदी आलोचना के इतिहास में व्याप्त अनेक भ्रांतियों का शालीनता से निराकरण किया है। इस पुस्तक में उपलब्ध, प्रकाशित और अप्रकाशित सामग्री का संचयन, मनन और प्रतिपादन आवश्यक वैदुष्य के साथ किया गया है। भारतेंदुयुग के प्रसिद्ध लेखक और आलोचक बालकृष्ण भट्ट पर ऐसा काम पहले नहीं हुआ है इसलिए यह नया तो है ही महत्त्वपूर्ण भी है। अभिषेक ने भारतेंदु युग के विचारकों के संदर्भ में भी भट्ट जी की तार्किकता और वैचारिक दृढ़ता का विवेचन किया है।
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पुस्तक मेला »
अंतिका प्रकाशन ♦ वीरेन डंगवाल खासे कड़ियल कवि हैं इसलिए वे बुनियादी उम्मीद को नहीं छोड़ते और उसे फ्यूंली जैसे पहाड़ी फूल, वसंत के विनम्र कांटों, एक पुराने तोते, चिरौटे की मां, बकरियों, पुराने ज़माने की एक साइकिल, अपने जहाजी बेटे के नाम एक सन्देश और वास्तुशिल्पी लॉरी बेकर के बेजोड़ शिल्प में छिपी हुई हवा में पहचान कर अपनी तत्सम-तदभव-क्लासिक-देशज-व्यंग्य-विनोद-वक्रोक्ति की बांकी-तिरछी भंगिमाओं के मिश्रण से बनी उस भाषा में दर्ज कर लेते हैं, जो हिंदी कविता में उन्हें एक अलग-से रास्ते का चमकता हुआ कवि बनाती है।
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पुस्तक मेला »
अंतिका प्रकाशन ♦ सुरेंद्र चौधरी हिंदी कहानी-आलोचना के शीर्षस्थ आलोचक रहे हैं। आधुनिक हिंदी कहानी आलोचना का वास्तविक रूप में एक स्पष्ट प्रस्थान-बिंदु सुरेंद्र चौधरी की कथा-आलोचना से ही निश्चित होता है। मगर इसके आकलन और सम्मान की जैसी कोशिश होनी चाहिए, नहीं हो पायी। दरअसल इतिहास और वर्तमान में निबद्ध हमारी कथा का यथार्थ हमेशा से आधुनिकता के लिए चुनौती रहा। यह चुनौती जिस व्यवस्था के लिए बाधक रही वह कर्ज की व्यवस्था हमेशा उपभोक्ता-समाज को बढ़ावा देती रही। इस दुष्काल में प्रतिरोध में खड़े होने के लिए सुरेंद्र चौधरी की आलोचना निश्चय ही कारगर सिद्ध होगी।



