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Articles in the सिनेमा Category

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[11 Mar 2010 | 5 Comments | ]
रोड टू संगम : एक अच्‍छी फिल्‍म की अकाल मौत

मधुकर पांडेय ♦ इस फिल्म को सारे देश में मनोरंजन कर से मुक्त कर देना चाहिए था। लेकिन न तो यूपी में ऐसा हुआ और न ही गांधी को अपनी व्यक्तिगत विरासत मानने वाली कांग्रेस ने उसके द्वारा शासित किसी भी राज्य में इसे मनोरंजन कर मुक्ति की सुविधा प्रदान की। बेसिरपैर एवं वाहियात फिल्मों के दौर में इस फिल्म का विषय सोचना तथा इसका बनना एक बहुत बड़ी सुखद घटना है। अफ़सोस है कि लोग विदेशों में अपने को “खान” एवं अमेरिकी राष्ट्रभक्त नागरिक साबित करने वाली फिल्मों पर 80-90 करोड़ खर्च कर देते हैं लेकिन अपने ही देश में इस संवेदनशील फिल्म का वो शायद नाम भी नहीं जानते होंगे।

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[8 Mar 2010 | No Comment | ]
‘द हर्ट लॉकर’ जिंदाबाद, छह ऑस्‍कर झटके

कैथरीन बिग्लो ने ऑस्कर में सर्वश्रेष्ठ निर्देशक का पुरस्कार जीतकर इतिहास रच दिया है। उन्हें फ़िल्म द हर्ट लॉकर के लिए ये पुरस्कार दिया गया है। 82वें ऑस्कर समारोह में द हर्ट लॉकर ने कुल छह पुरस्कार जीते जबकि ऑस्कर की बड़ी दावेदार माने जाने वाली अवतार की झोली में तीन ऑस्कर गए। ऑस्कर पुरस्कारों के इतिहास में अभी तक सिर्फ़ चार महिलाओं को सर्वश्रेष्ठ निर्देशक श्रेणी में नामांकन मिला था लेकिन पहली बार ऑस्कर जीतने का गौरव मिला है कैथरीन बिग्लो को। हॉलीवुड के कोडक थिएटर में हुए समारोह में सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का पुरस्कार जेफ़ ब्रिजिज़ के नाम रहा है. उन्होंने ये अवॉर्ड फ़िल्म क्रेज़ी हार्ट के लिए जीता. वहीं सेंड्रा बुलोक सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री बनीं ( फ़िल्म द ब्लाइंड साइड)।

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[7 Mar 2010 | No Comment | ]
ऑस्‍कर के लिए ‘अवतार और ‘द हर्ट लॉकर’ में होगा युद्ध

मिहिर पंड्या ♦ यह ऑस्कर कीभविष्यवाणियां नहीं हैं। सभी को मालूम है कि इस बार के ऑस्कर जेम्स कैमेरून द्वारा रचे जादुई सफ़रनामे ‘अवतार’ और कैथेरीन बिग्लो की युद्ध-कथा ‘दि हर्ट लॉकर’ के बीच बंटने वाले हैं। मालूम है कि मेरी पसंदीदा फ़िल्म ‘डिस्ट्रिक्ट 9′ को शायद कोई पुरस्कार तक न मिले। लेकिन मैं इस बहाने इन तमाम फ़िल्मों पर कुछ बातें करना चाहता हूं। नीचे आई फ़िल्मों के बारे में आप आगे बहुत कुछ सुनने वाले हैं। कैसा हो कि आप उनसे पहले ही परिचित हो लें, मेरी नज़र से…

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[3 Mar 2010 | 4 Comments | ]
लांछित होने के बावजूद बच्‍चन की लालसा

अब्राहम हिंदीवाला ♦ आप सभी जानते हैं कि मुंबई मिरर में छपी ऐश्‍वर्या राय से संबंधित एक खबर से बच्‍चन परिवार नाराज है। वे चाहते हैं कि मुंबई मिरर माफी मांगे। उस खबर को लेकर आहत अमिताभ बच्‍चन और अभिषेक बच्‍चन ने ब्‍लॉग और ट्विटर पर लिखा कि कोई आपकी मां, बहन या बीवी के बारे में ऐसी बातें लिखे, तो आप क्‍या करेंगे? मुझे लगा कि हर वर्ग और समाज में औरतों को कमतर माना जाता है। पुरुष सदस्‍य अपने समाज की स्त्रियों की संरक्षा और सुरक्षा को नैतिक जिम्‍मेदारी मानते हैं। झूठी खबर के खिलाफ यह लड़ाई ऐश्‍वर्या राय अकेले भी लड़ सकती थीं। लेकिन नहीं, बच्‍चन बाप-बेटे ने इसे अपना कर्तव्‍य समझा और हमें बताया कि ऐश्‍वर्या राय की ब्रांड वैल्‍यू जो भी हो, वह हैं एक अबला औरत।

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[12 Jan 2010 | 14 Comments | ]
बेईमान मुल्‍क में एक की बेईमानी पर हंगामा क्‍यों?

सुशांत झा ♦ आप भारत के टॉप के दस उद्योगपतियों की लिस्ट निकालिए और बताइये कि इसमें से कौन-सा व्यक्ति अपने आविष्कार की वजह से दौलतमंदों की इस सूची में आया है। आपको पता लग जाएगा कि कोई लोहा बेच रहा है तो कोई तेल… कोई फोन बेच रहा है तो कोई फ्लैट। ये सब ठेकेदार हैं, जिन्‍हें देश की अकूत संपदा – मानव और प्राकृतिक दोनों ही – थाली में परोसकर दे दी गयी है और मोनोपॉली के तहत ये इतने बड़े रईस बन गये हैं। ऐसे में अगर विधु विनोद चोपड़ा ने किसी लेखक की किताब ही मार ली तो हमें खुजली क्यों होती है? यहां तो हर दिन कोई न कोई दबंग किसी न किसी के हिस्से का निबाला मार जाता है।

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[7 Jan 2010 | 2 Comments | ]
जब सब तालियां बजाने लगें तो मामला गड़बड़ समझो

फीता राम ♦ फिल्म के बारे में लोगों के विचार उन लोगों की ‘स्थिति’ के बारे में ज्‍यादा बताते हैं। यह सब पर लागू होता है। जब मुझे ‘lays चिप्स’ बहुत स्वादिष्‍ट लगने लगते हैं तो यह सोचने पर मजबूर हो जाता हूं कि क्यों यह इतने स्वादिष्‍ट बनाये गये है। फिर यह सोचता हूं कि स्वाद आलू में है या पैकेट में या जहां से खरीदा है, वहां या फिर सैफ अली खान के प्रोमो में – आखिर कहां? लेकिन इन सब के बावजूद ‘स्वाद’ और ‘सत्य’ में फर्क तो है। ज़रूरी नहीं कि जो चीज़ मुझे स्वादिष्‍ट लगे वो मेरे हित में भी हो। सुना है कि बहुत से ख़तरनाक ज़हर बहुत मीठे होते हैं। जिस तरह की विषमताएं हमारे समाज में हैं यह कहना कि फिल्म ‘सबको’ पसंद आयी है क्योंकि इसने इतने दिनों में इतने करोड़ कमा लिये हैं, एक भद्दा और अश्लील व्यंग्य है।

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[7 Jan 2010 | 2 Comments | ]
सिस्टम के थ्री इडियॉटिक बागी

रवीश कुमार ♦ शिक्षा व्यवस्था से भागने के रास्ते को लेकर कई फिल्में बनी हैं। भागने के कई रास्ते भी हैं। थ्री इडियट्स फिल्म पूंजीवादी सिस्टम को रोमांटिक बनाने का प्रयास करती है। काबिलियत पर ज़ोर से ही कामयाबी का रास्ता निकलता है। काबिल होना पूंजीवादी सिस्टम की मांग है। रणछोड़ दास का विकल्प भी किसी अमेरिकी कंपनी की कामयाबी के लिए डॉलर पैदा करने की पूंजी बन जाता है। कामयाबी के बिना ज़िंदा रहने का रास्ता नहीं बताती है यह फिल्म। शायद ये किसी फिल्म की ज़िम्मेदारी नहीं होती। उसका काम होता है जीवन से कथाओं को उठाकर मनोरंजन के सहारे पेश कर देना। ताकि हम तनाव के लम्हों में हंसने की अदा सीख सकें।

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[3 Jan 2010 | 25 Comments | ]
क्‍या संदीप चौधरी में भाषाई शऊर नहीं है?

विनीत ♦ मुद्दा में ज़ोर-शोर से बहस चल रही है। चेतन भगत नॉर्मल अंदाज़ में अपनी बात रख रहे हैं। इसी बीच संदीप चौधरी ने दूसरी ही तान छेड़ दी। हैलो फिल्म जब आयी थी तब भी आपको क्रेडिट नहीं दिया गया था, तब तो आप चुप थे लेकिन अब आप हल्ला कर रहे हैं। क्या 3 इडियट्स फिल्म अगर इतनी पॉपुलर नहीं होती तब भी आप ऐसा ही करते। मुझे याद आ रहा कि संदीप ने शायद ये भी कहा, पक्का नहीं कह सकता लेकिन भाव यही थे कि तब भी आप इसी वाल्यूम में बात करते। इसी के जवाब में चेतन ने कहा कि मैं कौन-सा छत पर जाकर चिल्ला रहा हूं। एक लेखक को अपनी बात रखने का हक़ है। लेकिन संदीप उन्‍हें सुनते ही नहीं, चिल्लाते हैं, अपनी ही रौ में बहे चले जाते हैं। सवाल ये है कि संदीप चौधरी या फिर देश का कोई भी मीडियाकर्मी जिस अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की बात करता है, क्या उसमें लेखक को अपनी बात रखने की आज़ादी शामिल नहीं है।

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[24 Dec 2009 | 4 Comments | ]
मधुबाला की जीवनी का फिल्‍म्‍स डिवीज़न में लोकार्पण

डेस्‍क ♦ पूरब की वीनस कहलाने वाली अप्रतिम सौंदर्य की मलिका ने भारतीय सिनेमा जगत पर न केवल अपने सौंदर्य बल्कि अपने अभिनय की गहरी छाप छोड़ी। इसके बावजूद उन्हें न तो जीते जी और न ही उनके निधन के बाद वह सम्मान दिया गया, जिसकी वह हकदार थी। ऐसी ही कुछ बातें मधुबाला की जीवनी ‘मधुबाला – दर्द का सफर’ के लोकार्पण के मौके पर सामने आयीं। लोकार्पण समारोह में लोकसभा सांसद राशिद अल्वी, फिल्म प्रभाग के निदेशक एवं वृत्तचित्र निर्माता कुलदीप सिंह, दूरदर्शन के पूर्व निदेशक एवं फिल्म शोधकर्ता शरद दत्त, संगीत विशेशज्ञ डा मुकेश गर्ग, बीते जमाने के मशहूर संगीत निर्देशक हुस्नलाल की बेटी एवं गायिका प्रियंबदा वशिष्‍ठ तथा सखा संगठन के अध्यक्ष अमरजीत सिंह कोहली मौजूद थे।

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[22 Dec 2009 | 4 Comments | ]
कौन कहता है कि “पा” अमिताभ बच्‍चन की फिल्‍म है?

अनुराग अन्‍वेषी ♦ इंटरनैशनल मेकअप आर्टिस्ट कर्स्टन टिंबल और डोमिनिक ने अपने कौशल से अमिताभ बच्चन को बिग बी के करेक्टर से बाहर कर दिया है। यह एक बड़ी वजह है कि औरो की भूमिका में दर्शकों को अपने अमिताभ का चेहरा नहीं दिखता। रही सही कसर खुद बिग बी ने पूरी कर दी अपनी वाइस मॉड्यूलेशन से। यह फिल्म सिर्फ औरो की कहानी नहीं है। यह विद्या के संघर्ष की कहानी है। अमोल आम्टे की महत्वाकांक्षा की भी कहानी है। मीडिया की नासमझी-नादानी की भी दास्तां है। तिसपर चारों कहानियां एक साथ चल रही हैं और ऊबने नहीं देतीं। स्क्रिप्ट की बुनावट इतनी सधी और कसी हुई कि इन कहानियों को आप एक-दूसरे से अलग नहीं कर सकते।