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रामकुमार सिंह ♦ एक दौर था, जब बॉक्स ऑफिस पर कतार होती थी और फिल्म की रिलीज के बाद यह होता था कि पैसा रखें कहां, लेकिन अब हालत खराब है। वे याद करते हैं कि पिछले दो साल में उनके थिएटर में वांटेड ऐसी फिल्म थी, जिसके हाउसफुल शो रहे। ईद का मौका था और उन्हें अपने दर्शकों को वापस भेजना पड़ा क्योंकि सीट नहीं थी। फिलहाल थिएटर में करीब नौ सौ सीटें हैं, जिनमें सबसे नीचे ड्रेस सर्किल तो उन्होंने बंद ही कर रखा है। बालकनी और बॉक्स ही बेच रहे हैं। इतने ही दर्शक आते हैं आजकल। प्रकाशजी कहते हैं, छोटे शहरों के लोगों के लिए उस तरह की मनोरंजक फिल्में बनना बंद हो गयीं। आइ हेट लव स्टोरीज को चूरू जैसे शहर में पहले दिन शाम को शो बंद रखना पड़ा क्योंकि कोई देखने वाला ही नहीं था।
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अरविंद अरोरा ♦ अब छोटे शहरों और कस्बों के सिनेमाघर मालिकों के सामने एक ही रास्ता बचता है, जिसे वे हारकर अपनाते ही हैं। और वह रास्ता है, अपने थिएटर में सस्ती फिल्में करना जिनमें से 99 प्रतिशत लो बजट सी ग्रेड हिंदी सिनेमा होता है, और एक प्रतिशत दक्षिण का अंग प्रदर्शन से भरा हिंदी में डब किया हुआ सिनेमा, जिन्हें देखने सिनेमाघर जाने की सोचना तो दूर, उनके आसपास से निकलने में भी लोग हिचकते हैं कि कहीं कोई यह न सोचे कि ‘ऐसी वाली’ फिल्म देख कर आ रहे हैं। हालांकि यह प्रवृत्ति आखिरकार सिनेमा का ही नुकसान कर रही है, लेकिन हैरत की और उससे भी ज्यादा दु:ख की बात यह है कि ऐसी फिल्में प्रदर्शित करके भी सिनेमाघर बहुत अधिक लाभ कमाने की स्थिति में नहीं हैं।
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आशुतोष श्याम पोतदार ♦ इस फिल्म का फॉर्म अलग है। सटायर का मामला ऐसा ही होता है। और निर्देशक ने बखूबी से दिखाया है। उसके लिए उनका अभिनंदन करना जरूरी है। मुझे लगता है कि निर्देशक बहुत अंदर से जानते हैं मीडिया वालों का हंगामा। इनसाइडर का रोल अदा करते हुए वो आउटसाइड रहके भी देख सकते हैं। ये इसकी महत्वपूर्ण खूबी है। उसको सराहना चाहिए। आजकल जो अर्बन और रूरल में बढ़ती हुई दूरियां हैं, वो कॉम्प्लेक्सिटी से दिखाने का प्रयत्न करती है ये फिल्म। बट ये सिर्फ प्रयत्न कहूंगा। इस प्वाइंट को लेकर मुझे रिजर्वेशन है फिल्म के बारे में। रूरल खड़ा नहीं कर पाती है। सिर्फ हारमोनियम पर गाना गाने से या रूरल जियोग्राफी से रूरल नहीं आएगा। उसका कॉन्टेक्स्ट नहीं आता है। ये इस फिल्म की कमी है।
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डेस्क ♦ दिनकर कुमार हिंदी के उन कुछ नामों में से हैं, जो गैर हिंदी भाषी इलाके में रहते हुए लंबे अरसे से अभिव्यक्ति का अहम मोर्चा संभाले हुए हैं। वे नॉर्थ ईस्ट में रहते हैं। दैनिक सेंटीनल नाम के एक हिंदी अखबार के संपादक हैं। पिछले महीने मोहल्ला लाइव पर हिंदी सिनेमा में आम आदमी खोज करते हुए जब एक बहस चली, तो फिल्मकार अनुराग कश्यप ने सुझाव दिया कि इस वर्चुअल मंच पर कहानी पाठ किया जाए। उन पर बात हो। बात जमे, तो उस पर फिल्म बनाने के बारे में सोचा जाए। संसाधन के स्तर पर जो भी सरंजाम होगा, अनुराग उसको डील करेंगे। कुछ शुरुआती कहानियों में दिनकर जी की कहानी रेडियो राघोपुर हमारे पास आयी थी। तब उन्होंने कहानी की स्कैन कॉपी हमारे पास भेजी थी।
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संदीप कुमार ♦ सब ठीक है। बस एक बात समझ में नहीं आयी कि वो बाप इतना क्रूर क्यों है? एक मिनट का भी कोई ऐसा बैकग्राउंडर फिल्म में क्यों नहीं फिट किया गया, जिससे दर्शकों को समझ में आता कि इतनी क्रूरता क्यों? कौन बाप अपनी उम्मीदें अपने बेटे पर नहीं थोपता? लेकिन कौन बाप अपने बेटे की मजम्मत सिर्फ इसलिए करता है क्योंकि उसने सेक्स नहीं किया है? ध्यान रखिए यहां बेटा 17 साल का है। और बाप कोई सठियाया हुआ बुड्ढा भी नहीं है जो पोते-पोती की आस में बैठा है और उसे अपने विवाहित बेटे की मर्दानगी पर शक होने लगा हो। बाप रे बाप! हालांकि ऐसा नहीं है कि फिल्म में हर सीन के पीछे तर्क का ख्याल नहीं रखा गया है।
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अब्राहम हिंदीवाला ♦ मोहल्ला पर अनुराग कश्यप के प्रशंसकों और आलोचकों के लिए एक खबर है कि उनकी अप्रदर्शित फिल्म ‘द गर्ल इन यलो बूट्स’ इस साल वेनिस इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल और टोरंटो इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल के लिए चुनी गयी है। बतौर निर्माता उनकी फिल्म ‘उड़ान’ इस साल जून में कान फिल्म फेस्टिवल में अधिकृत रूप से चुनी गयी थी। स्वतंत्र फिल्मकारों के लिए यह प्रेरक खबर है, क्योंकि देश में बन रही सात-आठ सौ फिल्मों में से चंद फिल्में ही इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवलों के लिए चुनी जाती हैं। आलोचक पूछ सकते हैं कि विदेशी तमगों से इन फिल्मों को क्या फायदा होगा? फायदा तो होता है। इंटरनेशनल पहचान से कृति और रचना का भाव बढ़ जाता है। हम भारतीय उसे नए नजरिए से देखने लगते हैं।
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रामकुमार सिंह ♦ विक्रमादित्य मोटवानी की फिल्म ‘उड़ान’ देखते हुए वे करोड़ों युवा अपनी आत्मकथा के चुनिंदा अंश वहां से चुरा सकते हैं, जो अपने पिताओं की महत्वाकांक्षाओं के शिकार होने से बचने की कोशिश करते रहे। या इसे उल्टा भी कह सकते हैं कि विक्रमादित्य ने बहुत खूबसूरती से भारतीय युवाओं की आत्मकथाओं से किस्से चुराये हैं और उनका एक कोलाज बना दिया है… मुंबई की इंडस्ट्री में ऐसी फिल्मों का साथ दिया जाना इसलिए जरूरी है ताकि वह चौपड़ाओं, जौहरों और सितारों के आतंक से उबरे और नये रचनात्मक लोग कुछ काम करके दिखा सकें।
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चंद्र प्रकाश द्विवेदी ♦ हिंदी सिनेमा का मुंबई तक सीमित रहना उसके भविष्य के लिए सही नहीं है। यहां के निर्माता-निर्देशक मुनाफे और व्यवसाय की लीक पर चलते हैं। वे स्टारों पर आश्रित रहते हैं। अगर हिंदी प्रदेशों में सिनेमा विकसित होगा तो मुंबई का एकाधिकार टूटेगा और एकरसता भी खतम होगी। मुझे लगता है, तब भी हमारे समाज की कहानियां फिल्मों में आ पाएंगी। मुंबई के निर्माता-निर्देशकों ने अपने ऊपर यह बोझ ले लिया है कि उन्हें ज्यादा से ज्यादा दर्शकों को संतुष्ट करना है। उसकी वजह से ही स्टार सिस्टम बढ़ा है। अभी भोजपुरी सिनेमा का विकास दिख रहा है लेकिन वह भटकाव का शिकार है। अधिकांश भोजपुरी फिल्में हिंदी फिल्मों की भोंडी नकल हैं।
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कैलाश चंद चौहान ♦ “बताता हूं। शहर में एक लड़का काम करता था। उसे किसी ने बताया कि यहां एक बना बनाया प्लाट बिकाऊ है। इसमें तीन कमरे बने हुए थे। मालिक अपने लड़के को अमेरिका पढ़ाई के लिए भेजना चाहता था। मौका अच्छा था, मैं क्यों चूकता! कुछ जमीन गांव में घर के साथ वाली बेची, तीन बीघा खेत की जमीन थी, वह भी बेच दी। कुछ पैसा मैंने शहर में काम करके इकट्ठा किया हुआ था। शहर में हमारे कुछ रिश्ते थे, उन्होंने भी मेरी सहायता की। प्लॉट बेचने वाले भी सज्जन थे। वह भी कुछ पैसा किस्तों में लेने को तैयार हो गये। कहते हैं न जहां चाह, वहां राह।”
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मिहिर पंड्या ♦ किसी भी महिला किरदार की सचेत उपस्थिति से रहित फ़िल्म ‘उड़ान’ हमारे समय की सबसे फिमिनिस्ट फिल्म है। अनुराग की पिछ्ली फिल्म ‘देव डी’ के बारे में लिखते हुए मैंने कहा था – दरअसल मेरे जैसे (उत्तर भारत के भी किसी शहर, गांव कस्बे के ग्रेट इंडियन मिडिल क्लास से निकलकर आया) हर लड़के की असल लड़ाई तो अपने ही भीतर कहीं छिपे ‘देवदास’ से है। अगर हम इस दुनिया की बाकी आधी आबादी से बराबरी का रिश्ता चाहते हैं तो पहले हमें अपने भीतर के उस ‘देवदास’ को हराना होगा जिसे अपनी बेख्याली में यह अहसास नहीं कि पुरुष सत्तात्मक समाज व्यवस्था कहीं और से नहीं, उसकी सोच से शुरू होती है। ‘उड़ान’ के रोहन के साथ हम इस पूरे सफर को जीते हैं।



