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Articles in the मोहल्ला दिल्ली Category

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[30 Aug 2010 | No Comment | ]
ऊंझा आत्मदाह मामले में बीईए की जांच रिपोर्ट आज

डेस्‍क ♦ गुजरात के ऊंझा में एक आत्मदाह के मामले में दो पत्रकारों पर खुदकुशी के लिए उकसाने के आरोप में दर्ज प्राथमिकी को गंभीरता से लेते हुए ब्रॉडकास्ट एडीटर्स एसोसिएशन ने एक जांच कमिटी बनायी थी। टीम को जांच करके यह तय करने की जवाबदेही दी गयी थी कि क्या आत्मदाह के इस मामले में सवालों के घेरे में आये दोनों पत्रकार किसी भी तरह से दोषी हैं और अगर हैं तो वह पेशेवर लापरवाही थी या आपराधिक दोष। धीमंत पुरोहित के नेतृत्व में गुजरात में काम कर रहे टीवी पत्रकारों की इस टीम ने घटनास्थल पर जाकर तमाम बिंदुओं की जांच की है और अपनी रिपोर्ट एसोसिएशन को सौंप दी है।

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[21 Aug 2010 | 10 Comments | ]
पाठक ही खुदा है महाशय, अपना एरोगेंस छोड़‍िए…

मनीषा ♦ सिर्फ बाजार को कोसने से काम नहीं चलने वाला, बाजार ने अगर हमको खरीदार बनाया है तो हमारे अपने ही इसको बेचकर मुनाफा भी तो कमा पा रहे हैं। यह क्यों नहीं याद रखा जाना चाहिए कि बड़े-बड़े मॉल्स में कितने अधकचरे शिक्षितों को दिहाड़ी या मासिक रोजगार मिला है। सडक़ के किनारे मामूली सा प्री-पेड कार्ड बेचने वाला अनपढ़ ग्रामीण भी दाल-रोटी भर का कमीशन निकाल ही लेता है। बिग बाजार के जरिये भारी मुनाफा कमाने वाले किशोर बियानी ने 71 शहरों/कस्बों में अपने स्टोर खोले हैं तो 65 ग्रामीण इलाकों में भी वे मौजूद हैं, जहां हजारों-हजारों अर्धशिक्षितों को रोजगार मिला हुआ है। गांव में रहने वाले वे सत्तर फीसदी लोग भी बड़ा बाजार बना रहे हैं।

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[20 Aug 2010 | 9 Comments | ]
पत्रकार फूंकेंगे पेड न्यूज के खिलाफ बिगुल

मुकेश कुमार ♦ बिहार और झारखंड के पत्रकारों ने पेड न्यूज के खिलाफ कमर कस ली है। पत्रकारों और पत्रकारिता की साख को चौपट करने वाली इस बीमारी का विरोध करने के लिए वे एकजुट हो रहे हैं और आगामी 28 अगस्त को बाकायदा अपनी आवाज भी बुलंद करेंगे। पत्रकारों ने पेड न्यूज को रोकने की दिशा में सक्रिय हस्तक्षेप करने की गरज से एंटी पेड न्यूज फोरम का गठन किया है। ये संगठन पेड न्यूज के कारोबार पर नजर रखेगा और इस तरह की तमाम गतिविधियों को लोगों के सामने लाने की कोशिश भी करेगा। संगठन में कोई भी पद नहीं रखा गया है। केवल एक कोर कमेटी होगी, जो सबसे सलाह-मशवरा करके काम करेगी। पेड न्यूज पर लगाम लगाने की दिशा में एंटी पेड न्यूज फोरम 28 अगस्त को महासम्मेलन करने जा रहा है।

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[19 Aug 2010 | 3 Comments | ]
“दलितों को अपना सौंदर्यशास्‍त्र खुद गढ़ना होगा”

मिथिलेश कुमार ♦ हमारे देश में दो तरह की संस्कृति है। एक सत्ता संस्कृति और दूसरी शोषित संस्कृति। सत्ता संस्कृति में देश के नेता और नौकरशाह हैं जबकि शोषित संस्कृति में देश के किसान, मजदूर, कामगार हैं। अगर बारीकी से चीजों को समझें तो वास्तव में देश को शोषित संस्कृति ने ही बचाया है क्योंकि वह अनाज उगाता है, कारखानों में काम करता है, मैला साफ करता है। जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के सामाजिक विज्ञान संस्थान में आयोजित एक परिचर्चा में दलित चिंतक ओमप्रकाश वाल्मीकि ने ये विचार व्यक्त किये। वे सूरज बड़त्या की शोध पुस्तक “सत्ता संस्कृति और दलित सौंदर्यशास्त्र” के लोकार्पण अवसर पर बोल रहे थे। उन्होंने कहा, जीवन का सरोकार ही दलित कविताओं का केंद्रीय भाव है।

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[18 Aug 2010 | 20 Comments | ]
साहित्‍य हाशिये पर, क्‍योंकि उसकी गली वनवे हो गयी

मनीषा ♦ कुछ बुनियादी सवाल पत्रकार और विचारक मनीषा ने उठाये। उन्‍होंने कहा कि साहित्‍य हाशिये पर क्‍यों चला गया, क्‍योंकि साहित्‍य का गलियारा वन वे हो गया है। लेखक ये समझना ही चाहते कि पाठकों के मन में क्‍या है। वो क्‍या चाहता है? उन्‍होंने कहा कि टेलीविजन पर हमने सास-बहू के सीरियल को खूब गाली दी – लेकिन एकता कपूर के उसी सीरियल को लाखों लोगों ने देखा। उसने रिकॉर्ड तोड़ टीआरपी दी, क्‍योंकि एकता कपूर को पता था कि दर्शक क्‍या चाहता है। हमारे लेखकों को भी पाठक की सुध लेनी होगी। उन्‍होंने यह भी कहा कि नये मीडिया माध्‍यमों में ये सुविधा है कि वहां पाठक जैसे चाहे, जब चाहे रिएक्‍ट कर सकता है और उसका रिएक्‍शन दर्ज भी हो सकता है लेकिन पुराने माध्‍यमों के साथ ये सुविधा नहीं है।

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[17 Aug 2010 | 3 Comments | ]
हिंदी की साहित्‍य‍िक पत्रकारिता के पतन पर आज बहस

डेस्‍क ♦ आमतौर पर हिंदी की ज्‍यादातर साहित्यिक पत्रिकाएं उन सामाजिक मुद्दों से बहुत दूर होती हैं, जो सीधे जीने की बुनियादी शर्तों से जुड़े होते हैं। हमने पिछले पांच सालों में एक भी ऐसी पत्रिका नहीं देखी, जिसमें महंगाई के खिलाफ कुछ क्रिएटिव आइटम हो। सर्जक आपत्ति कर सकते हैं कि कविता-कहानी में आपको झांकना चाहिए था, संभवत: कुछ मिल जाता। हो सकता है, लेकिन जिस तरह प्रेम और बेवफाई के शाश्‍वत संदर्भ को महंगाई और माओवाद के घनघोर समय में भी समझाने की जबरन कोशिश की जाती है, इसने हिंदी की साहित्यिक पत्रकारिता के सरोकार को अश्‍लीलता से जोड़ दिया है। हमने इस बार अपनी बहसतलब को साहित्‍य की इन्‍हीं पतनशील प्रवृत्तियों पर केंद्रित किया है।

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[17 Aug 2010 | 21 Comments | ]
जेएनयू कैंपस से कवि को निकालने का फरमान

नीलांबुज ♦ जेएनयू कैंपस में रहने वाले और बहुत से बाहर रहने वाले साथी भी विद्रोही जी से वाकिफ होंगे। कुछ दोस्तों से पता चला कि जेएनयू प्रशासन ने जनकवि विद्रोही को कैंपस निकाला दे दिया है। यह कुछ दक्षिणपंथी छात्र संगठनों की कारस्तानी है। विद्रोही जी हमेशा से प्रगतिशील आंदोलन के पक्षधर रहे हैं। विद्रोही जी पर आरोप है कि वो खुलेआम गालियां बकते हैं। ये सब लोग जानते हैं कि विद्रोही जी कभी कभार सन्निपात के शिकार हो जाते हैं लेकिन आज तक होश में कभी भी उन्होंने किसी को कोई अपशब्द नहीं कहा। उनके खिलाफ षड्यंत्र करने वाले वही लोग हैं, जो किसी पुलिसिया कुलपति द्वारा पूरे हिंदी और गैर हिंदी लेखिकाओं को दी गयी गालियों पर खुश होते हैं।

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[14 Aug 2010 | 7 Comments | ]
इस्‍लामिक हिंसा के बरक्‍स मैं राज्‍य की हिंसा का समर्थक हूं

विभूति नारायण राय ♦ राज्य अलोकतांत्रिक होता है। ये कल्पना करना कि राज्य इतना उदार होगा कि अपने अस्तित्व को ख़तरे में डाल कर हथियारबंद लोगों को खड़े होने की इजाजत देगा, भोलापन है। मैं राज्य की हिंसा का समर्थक नहीं हूं। लेकिन यहां कश्मीर का सवाल उठाया गया है। मुझे नहीं लगता कि आपमें से किसी ने वैसी हिंसा देखी है, जो हिंसा मैंने देखी है। मैं साफ तौर पर कह सकता हूं कि कश्मीर में इस्लामिक आतंकवाद और भारतीय राज्य के बीच मुकाबला है। और मैं हमेशा राज्य की हिंसा का समर्थन करुंगा। राज्य की हिंसा से हम मुक्त हो सकते हैं। इस्लामिक आतंकवाद से हम मुक्त नहीं हो सकते। वहां पर जो भी लोग उनसे असहमति रखते थे, उन सबको आतंकवादियों ने धीरे-धीरे मार दिया।

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[13 Aug 2010 | 6 Comments | ]
“कवन ठगवा नगरिया लूटल हो…”

कलियुगी वेदव्यास ♦ अब क्या कहूं महाराज, इसकी पीठिका तो आप खुद ही बनाकर गये थे। आपकी ही देख-रेख में पीठ के प्रकाशन में आपके परम मित्र वर्धा नरेश ने स्त्री सेना के विरुद्ध एक अनर्गल टिप्पणी कर दी और आप तो जानते ही हैं महाराज इस कलिकाल में स्त्री-सेना से घातक कोई सेना नहीं है। उस पर हमला तो छोड़‍िए, हल्का सा कटाक्ष भी यमराज को आमंत्रण देने सरीखा है। बस, फिर क्या था, युद्ध की स्थितियां बदल गयीं। अब यह युद्ध मात्र कुरुवंश का युद्ध नहीं रहा, संपूर्ण आर्यावर्त का युद्ध हो गया। तमाम देशों के विद्वान धनुर्धर आपके और वर्धा नरेश के विरुद्ध लक्ष्यभेदी बाण चलाने लगे। कवि-महर्षि दुर्वासा ने भी अपना धनुष उठा लिया और चिर-परिचित अंदाज में लगे चहुंओर विध्वंस करने।

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[8 Aug 2010 | 14 Comments | ]
लेखकों ने “लंपट” वीसी के खिलाफ मुहिम तेज की

डेस्क ♦ दिल्‍ली के कॉफी हाउस में लेखकों ने बैठक की, जिसमें सभी ने एक स्वर में एलान किया कि जब तक वीएन राय को महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के कुलपति पद से हटाया नहीं जाएगा, वो विरोध जारी रखेंगे। विरोध की रणनीति के तहत अब विभूति के खिलाफ हस्ताक्षर अभियान में गैर हिंदी भाषी साहित्यकारों को भी शामिल किया जाएगा। इस हस्ताक्षर अभियान पर उमाशंकर सिंह, अल्पना मिश्र और कुमार मुकुल नजर रखेंगे। इसके अलावा 13 अगस्त को 11.30 बजे मानव संसाधन मंत्रालय के सामने प्रदर्शन किया जाएगा। सरकार पर दबाव बढ़ने के साथ अदालत का दरवाजा भी खटखटाने का फैसला लिया गया है। इसी के मद्देनजर एक पीआईएल दाखिल करने की तैयारी है।