Articles in the असहमति Category
असहमति, ख़बर भी नज़र भी, मोहल्ला मुंबई, शब्द संगत »
जलेसं, मुंबई ♦ विजयशंकर चतुर्वेदी पिछले डेढ़ दशक से अभद्र आचरण और घटिया हरकतों में लिप्त रहे हैं। शराब पीकर रात-बेरात फोन करना, स्त्रियों को गाली देना और बकवास करना, लोगों से झगड़ा मार-पीट करना, इनके लिए आम बात है। कई बार ऐसा लगता है कि इस तरह के व्यवहार के लिए श्री विजयशंकर चतुर्वेदी स्वयं को गर्वित महसूस करते हैं। ये बातें नज़रअंदाज़ की जा सकती थीं, बल्कि इतने वर्षों तक प्राय: की जाती रही हैं, लेकिन विजयशंकर खुद को लेखक समाज का हिस्सा मानते हैं। विडंबना यह है कि वे लेखकीय गरिमा और दायित्व का रत्तीभर भी ख्याल नहीं रखते। नशे में तो प्राय: उद्दंड हो जाते हैं। इसी आचरण के चलते एक दशक पहले वे अपने पारिवारिक जीवन को धू-धू जलता देख चुके हैं।
असहमति, ख़बर भी नज़र भी, नज़रिया, मीडिया मंडी »
सलीम अख्तर सिद्दीकी ♦ लोकतंत्र एक अच्छी चीज़ है। लेकिन क्या लोकतंत्र में भी तानाशाही मौजूद नहीं हैं? मिसाल के तौर पर क्या गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने लोकतंत्र का चोला पहनकर तानाशाही नहीं चलायी? नक्सली किसी एक पुलिस अधिकारी का गला रेत दें तो बहुत बड़ा जुर्म होता है। आशुतोष जैसे लोग नक्सली विचारधारा को सर कलम करने की विचारधारा कहने लगते हैं। लेकिन एक मुख्यमंत्री हजारों लोगों को मरवा दे, वह फिर भी न केवल मुख्यमंत्री बना रहता है, बल्कि उसे दोषी भी नहीं माना जाता। क्या आशुतोष नरेंद्र मोदी को सर कलम करने वाला मुख्यमंत्री कहने की जुर्रत कर सकते हैं?
असहमति »
अजित वडनेरकर ♦ यह आयोजन एक बार स्थगित हो चुका है। हमने अपना आरक्षण भी करा लिया था आने-जाने का। उसकी चपत हमें लग चुकी है क्योंकि जिस व्यक्ति को आरक्षण रद्द कराने का ज़िम्मा दिया, उसने अभी तक मुद्रा नहीं लौटायी है। खैर, आयोजन की तारीखों में हमारा दिल्ली जाने का कार्यक्रम तय हो चुका है, बहुत पहले से। आपका आग्रह था कि इलाहाबाद के दो दिवसीय कार्यक्रम में किसी एक दिन ज़रूर आने का प्रयास किया जाए। हमने हर तरह से गुणआ-भाग लगा लिया। इलाहाबाद होकर दिल्ली जाने से हमारा अपना कार्यक्रम चौपट हो रहा है। दो दिन की छुट्टी अधिक लेनी पड़ रही है। अन्य दिक्कतें अलग। सो हमारा आना भी संभव नहीं हो पा रहा है। आमंत्रण के लिए आभारी हूं।
असहमति, ख़बर भी नज़र भी, नज़रिया, समाचार »
अनुज शुक्ल ♦ देश का ऐसा कौन-सा शिक्षण संस्थान है, जिसका पूरा का पूरा ढांचा प्रगतिशील है? जेएनयू जैसे प्रगतिशील संस्थानों में भी भगवा बिग्रेड सक्रिय है, जहां सरस्वती और दुर्गा पूजन जैसे धार्मिक आयोजन किये गये हैं। इस आधार पूरे जेएनयू के चरित्र को फासिस्ट ठहराना कहां तक जायज़ होगा? हिंदी विश्वविद्यालय के महिला छात्रावास में जो हवन, कीर्तन और चंदा आधारित सुंदरकांड की बात कही गयी है, वह सत्य है, पर यह भी सत्य है कि इसमें छात्रावास की कुछ छात्राओं की ही सहभागिता रही। अब इसे विश्वविद्यालय या छात्रावास का प्रायोजित कार्यक्रम ठहराना कितना न्यायसंगत है?
असहमति, ख़बर भी नज़र भी, नज़रिया, मोहल्ला भोपाल, शब्द संगत »
काशीनाथ ♦ प्रलेस किसी एक की जागीर तो नहीं है कि जो हो रहा है देखो सुनो और चुप रहो। न जाने कितने नौजवानों और कितनी ही पीढ़ी ने इसको खड़ा करने में अपना योगदान दिया है। जो सत्ता के दलाल और सुविधाभोगियों के आगे डर से बाहर चले जाएं और इनको छुट्टा सांड की तरह उत्पात मचाने के लिए छोड़ दें, ऐसा भी नहीं होगा। जब जागे तब सबेरा की तर्ज पर अब जरूरी है की एक बार कचरा साफ़ कर ही लिया जाए। समय भी सही है। देश भर में दीपावली के समय घरों घर सफाई होगी। लगे हाथ हम भी प्रलेस के घर में सफाई पुताई कर लें और प्रेमचंद की आत्मा को शांति दें। आमीन।
असहमति, नज़रिया, शब्द संगत »
विभा रानी ♦ छम्मकछल्लो को लगता है, इससे अच्छे तो हिंदी फिल्म इंडस्ट्री है। भाई लोग पूरी की पूरी फिल्म नकल कर के बना डालते हैं, सेट दर सेट, संवाद दर संवाद, संगीत दर संगीत, मगर लोग उसे “इंस्पायर्ड बाइ” बोलते हैं। “इंस्पायर्ड बाइ” भी बोल दिया तो बड़ी बात हो गयी। अभी हॉलीवुड में बॉलीवुड की बहार है। उसे भी लोग “इंस्पायर्ड बाइ” कहते हैं। ना कहें तो क्या घमासान मचाएं? मचा कर फायदा? मगर शायद मोहल्ला लाइव को है, लोगों को है। आखिर, धींगा मुश्ती देखने का मज़ा ही कुछ और है ना! किसी के दिल के तेल में अपने घर का भी दिया जला लो भाई!
असहमति, ख़बर भी नज़र भी, नज़रिया, शब्द संगत »
हस्तक्षेप ♦ देश की खस्ताहाल हो चुकी अर्थव्यवस्था में कभी “नयी जान” फूंकने का दावा करने वाले अर्थशास्त्री और अपनी दूसरी पारी खेल रहे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को? नव उदारवाद के ये अभिजात्य चेहरे भाजपा सरकार से संबद्ध नहीं हैं लेकिन इनमें और फ़ासीवादी विचारधारा के खूंखार नुमाइंदों मसलन नरेंद्र मोदियों, शिवराज सिंह चौहानों और रमन सिंहों में क्या फ़र्क़ है? आपने कहा है कि “याद रखना होगा कि अपनी-अपनी तरह से हत्यारी नीतियां छत्तीसगढ़ की ही नहीं अन्य भाजपा शासित राज्यों की भी हैं।” क्या आपको नहीं लगता है कि एक ज़िम्मेदार लेखक और सबसे बढ़कर एक हस्तक्षेपधर्मी नागरिक की हैसियत से आप भारतीय राज्य सत्ता के बर्बर चरित्र के बारे में बेहद बौना और रत्ती भर का आकलन कर रहे हैं?
असहमति, ख़बर भी नज़र भी, नज़रिया, मोहल्ला भोपाल, शब्द संगत »
कमला प्रसाद ♦ आज की परिस्थितियों में जिस तरह सांप्रदायिक शक्तियों का जाल देश में फैल रहा है, समूची मानवीय संस्कृति का बाजारीकरण हो रहा है, मूल्यों को तहस-नहस करने की साजिश है, उस समय अपने-अपने संगठन को अधिक क्रांतिकारी अथवा व्यक्तिगत रूप से स्वयं को अतिशुद्ध सिद्ध करने की कोशिश सांस्कृतिक आंदोलन की एकजुटता खंडित करेगी। मर्यादाएं टूटने के बाद आंदोलन छूट जाएगा और लोग व्याक्तिगत हमलों पर उतर आएंगे। माना कि अब लेखकों के संगठन प्रेमचंदकालीन नहीं हैं, हो भी नहीं सकते। पर आज की परिस्थितियों में जो संभव है – हो रहा है। जरूरत पड़ने पर इनका जुझारू रूप देखा जा सकता है।
असहमति, ख़बर भी नज़र भी, शब्द संगत, समाचार »
कृष्णकांत निलोसे ♦ मैं विगत चालीस वर्षों से प्रलेस से जुड़ा रहा एवं एक ज़िम्मेदार कार्यकर्ता की भूमिका निबाही है। प्रलेस में समय-समय पर असहमतियों का भी सम्मान किया जाता रहा है लेकिन कुछ वर्षों से असहमतियों को न सिर्फ़ नज़रअंदाज़ किया जा रहा है, अपितु अनुशासनहीनता, अभद्रता और अराजकता माना जा रहा है। मेरा मानना है कि प्रलेस अपनी मूल विचारधारा से भटक गया है। इसका वरिष्ठ नेतृत्व भाजपा के मंत्रियों के साथ शामिल होने में, और उनकी किताबों के विमोचन में अपना गौरव महसूस करते हैं। मैं वर्तमान परिदृश्य को समझते हुए, पूरी तरह सोच-समझ कर प्रलेस से अपनी प्राथमिक सदस्यता से निवृत्त होता हूं।
असहमति, ख़बर भी नज़र भी, नज़रिया, मोहल्ला भोपाल, मोहल्ला लाइव, शब्द संगत »
श्री सत्यनारायण पटेल के एक पत्र और आरोपों पर मप्र प्रलेसं की कार्यकारिणी में विस्तार से, यानी लगभग ढाई घंटे, चर्चा हुई। उनके ‘वसुधा’ पर लगाये गये आरोप को छोड़कर, शेष आरोपों से मेरी ही नहीं, वहां उपस्थित किसी की सहमति नहीं थी। श्री पटेल के खिलाफ कोई वोटिंग नहीं हुई और न ही मैंने उनके खिलाफ कोई वोट दिया है। उनके खिलाफ आम राय से जो कार्यवाही प्रस्तावित की गयी है वह वहां बैठक में उनके अनवरत अराजक व्यवहार और अपमानजनक भाषा के इस्तेमाल की वजह से हुई है। मैं व्यक्तिगत तौर पर भी उनके उस कुल व्यवहार से आहत हूं और किसी स्थिति में उसका समर्थन कभी नहीं कर सकता।


