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Articles in the असहमति Category

असहमति, विश्‍वविद्यालय, शब्‍द संगत »

[13 Aug 2010 | 3 Comments | ]
लेखक समाज को वीएन राय का बहिष्‍कार करना चाहिए

मुकुल सरल ♦ मोहल्ला लाइव के संदर्भ में आपसे दो निवेदन करने थे। पहला तो ये कि वीएन राय मामले में आप जो अपनी खबरों-बयानों के साथ “छिनाल प्रकरण” शीर्षक की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं, मेरी समझ से उससे बचा जा सकता है। क्योंकि ये केवल अपमानजनक ही नहीं, असहनीय और पीड़ादायक भी है। इसकी जगह हम “राय प्रकरण” या “अभद्र-अशोभनीय टिप्पणी का मामला” जैसे शब्द इस्तेमाल कर सकते हैं। हम क्यों उसी शब्द को बार-बार दोहराएं, जिसको लेकर हमारा विरोध और आपत्ति है। मुझे लगता है इसे बदले जाने में कोई हर्ज नहीं है… वीएन राय मामले में मेरा पहले दिन से ही स्पष्ट मत है कि उन्होंने जो कहा, वो न केवल निंदनीय है बल्कि आपराधिक है और इसके लिए उनपर मुकदमा चलना चाहिए।

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[11 Aug 2010 | 16 Comments | ]
हितेंद्र पटेल चाहते हैं कि विष्‍णु खरे माफी मांगें

हितेंद्र पटेल ♦ विभूति नारायण राय ने तो माफी मांग ली अब देखना है विष्णु खरे क्या करते हैं। विभूति नारायण राय ने ‘छिनाल’ शब्द का आपत्तिजनक प्रयोग किया और उन्हें प्रतिवाद के सामने अंतत: माफी मांगनी पड़ी। जिसने भी वह इंटरव्यू ठीक से पढ़ा होगा उन्हें यह पता होगा कि उस टिप्पणी का एक संदर्भ था, लेकिन उनके वक्तव्य से युवा लेखिकाओं की भावना को ठेस लगती है इस आरोप के कारण ही राय को प्रतिवाद के सम्मुखीन होना पड़ा। इस तर्क को अगर माना जाए तो विष्णु खरे के लेख से तो हिंदी समाज के तमाम लोगों का ही अपमान करने की कोशिश की गयी है। जिस असभ्य तरीके से खरे ने पूर्वांचल के युवा लेखकों के बारे में एक आपत्तिजनक शब्द का प्रयोग किया है, उसकी जितनी भी भर्त्सना की जाए कम है।

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[7 Aug 2010 | 12 Comments | ]
जनपक्ष ने मोहल्‍ला लाइव से कहा : जबान पर लगाम रखो

अशोक कुमार पाण्‍डेय ♦ इन सबके बीच अपनी कलहप्रियता और बेनामी टीपों के माध्‍यम से अश्‍लील चरित्रहनन के लिए कुख्‍यात एक व्‍यावसायिक वेबसाइट मोहल्‍ला ने इस पूरे मुद्दे को व्‍यक्ति केंद्रित बनाने और इस बहाने अपनी टीआरपी बढ़ाने की कुत्सित कोशिशें लगातार जारी रखी हैं। आज इस वेबसाइट पर कवि बोधिसत्‍व के लिए जिस तरह की भाषा का उपयोग किया है, वह कोई मदांध लंपट ही कर सकता है। ज्ञातव्‍य है कि बोधिसत्‍व इस मसले पर हमारी राय से असहमत हैं और हमने इसका प्रतिकार भी फेसबुक और ब्‍लॉग्‍स पर किया है। लेकिन हमारा मानना है कि लोकतंत्र में सबको अपनी बात कहने का हक है और असहमतियों की अभिव्‍यक्ति भी शालीन भाषा में ही होनी चाहिए।

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[6 Aug 2010 | 33 Comments | ]
बहुत हुआ, अब वीएन राय को गरियाना बंद करें

सलीम अख्तर सिद्दीक़ी ♦ पिछले कुछ दिनों से देखा जा रहा है कि किसी न किसी बहाने वीएन राय पर कीचड़ उछाली जा रही है। वीएन राय ने सभी लेखिकाओं को छिनाल नहीं कहा था। जरा उनके शब्दों पर ध्यान दीजिए – ‘हिंदी में लेखिकाओं का एक वर्ग ऐसा है, जो अपने आप को बड़ा छिनाल साबित करने में लगा है’। उनके इस वक्तव्य के बाद यह पता लगाना बेहद मुश्किल है कि उनका इशारा किस ओर था। कुछ लेखिकाओं ने उनके बयान पर तल्ख टिप्पणियां की हैं। मैत्रेयी पुष्पा ने तो उन्हें सीधे-सीधे ‘लफंगा’ ही कह दिया है। वीएन राय ने तो किसी का नाम लेकर कुछ नहीं कहा था, लेकिन मैत्रेयी पुष्पा ने उन्हें लफंगा कहकर यह साबित कर दिया है कि साहित्यकारों में कहीं न कहीं संयम खोने की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है।

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[28 Jul 2010 | 23 Comments | ]
यह विचारों का लोकतंत्र नहीं, बौद्धिक तानाशाही है!

राजेंद्र यादव ♦ बुद्धिजीवियों का यह कौन सा आचरण है कि वे दूसरे पक्ष की बात सुनेंगे ही नहीं। यह विचारों का लोकतंत्र नहीं, बौद्धिक तानाशाही है। “मैं तुम्‍हारे विचारों को एक सिरे से खारिज करता हूं, मगर मरते दम तक तुम्‍हारे ऐसा कहने के अधिकार का समर्थन करूंगा।” यह कहा-बताया जाता है लोकतंत्र के पुरोधा वॉल्‍टेयर का। दूसरे को बोलने ही न दो, यह कैसा फासीवाद है? क्‍या हमारे तर्क इतने कमजोर हैं कि “दुश्‍मन” के सामने ठहर ही नहीं पाएंगे? इस वैचारिक तानाशाही का एक कुत्सित रूप कुतर्कों का पिंजड़ा खड़ा करना भी है। आप किसी भी विषय पर बात कीजिए, वे तर्क देंगे कि जब किसान हजारों की संख्‍या में आत्‍महत्‍याएं कर रहे हों, तब आप एसी कमरों में बैठकर एक फालतू मुद्दे पर मगजपच्‍ची कर रहे हैं – यह भयानक देशद्रोह है।

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[16 Jul 2010 | 6 Comments | ]
खुद को गाली दो और पाक-साफ हो जाओ

पंकज नारायण ♦ पत्रकारों द्वारा आयोजित और संपन्न इस कार्यक्रम में बदलाव की दिशा में विकल्पों से जुड़ी रचनात्मकता और उसकी धार की शक्ति को लेकर कुछ बातें हो सकती थी और पूंजीवाद की जगह इसे स्थापित करने के रास्ते ढूंढे जा सकते थे। लेकिन ऐसे कई सवाल वहां नहीं उठे, जबकि वो सवाल सीधे पत्रकारों या विकल्पों से जुड़े थे। हमने उन मुद्दों पर बात की, जिसका हम कुछ नहीं कर सकते। सिर्फ उसको घटित होते हुए अपने सामने देख सकते हैं और कभी-कभार अपने भीतर के आदमी को डोज देने के लिए खुद को गलिया सकते हैं। सवालों का जिंदा रहना जरूरी है, लेकिन कुछ इस तरह जहां कुछ बूढ़े सवाल मरें और नये सवाल पैदा हों। वह बहस अधूरी है, जो समस्या को महिमामंडित करके हमें उसकी शरण में ले जाती है।

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[5 Jul 2010 | 7 Comments | ]
अंग्रेजी मीडिया के कुएं में भांग पड़ी है!

दिलीप मंडल ♦ शाहूजी महाराज के कार्यों और उपलब्धियों के बारे में स्कूल में पढ़ायी जाने वाली किताबें में कितना कुछ लिखा है, यह शोध का विषय है। अगर स्कूलों में शाहूजी महाराज के बारे में पढ़ाया जाता है, तो इंग्लिश के अखबारों और वेबसाइट के पत्रकारों ने जो किया है, वह अक्षम्य है। और यदि स्कूल की किताबों में शाहूजी महाराज के बारे में कुछ भी नहीं लिखा है या नाम मात्र का लिखा है, तो इतिहास की किताबों के पुनर्लेखन की जरूरत है। देश के सबसे प्रतिष्ठित और नामी अखबार और उनकी साइट अगर शिवाजी के वंशज को दलित नेता या दलित प्रतीक (dalit icon) कहें तो इसे मामूली भूल कैसे कहा जा सकता है। वैसे भी भारत में किसी दलित के महाराजा होने की कल्पना कर पाने के लिए ढेर सारी कल्पनाशीलता की जरूरत होगी।

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[5 Jul 2010 | No Comment | ]
आप सिर्फ विरोध के लिए विरोध करना जानते हैं!

मयंक सक्‍सेना ♦ मुद्दा कुछ और था और मुद्दा बन गयी अनुराग की भाषा… कैसी भाषा चाहते हैं आप? जब अनुराग की फिल्म में आप किरदार के मुंह से गाली सुनते हैं तो ताली पीटते हैं। आपस में दोस्तों में गाली से ही बात करते हैं। गुस्सा आने पर भी मन में तो कम से कम गाली देते ही हैं… और आप लाख कसमें खाएं ये सच है। लेकिन अनुराग को इसके लिए गरियाते हैं। क्यों भई? आप क्या भाषा के ठेकेदार हो? हो तो आओ सामने देख लिया जाएगा… और हां, विदेशी साहित्य के उद्धरणों से कोई लेख महान नहीं बनता! कुछ करने का दम हो तो ही बात करें। सूर समर करनी करहिं, कहिं न जनावहुं आपु …भाषा की सभ्यता की दुहाई देने वालों की भाषा सीपी पर कन्याओं को देखते ही उधड़ जाती है।

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[4 Jul 2010 | No Comment | ]
एडिटर, एचटी को मारे गये पत्रकार की विधवा का पत्र

विनीता पांडे ♦ आपके समाचार पत्र में आज दिनांक 4 जुलाई 2010 को पहले पन्ने पर मेरे पति हेम चंद्र पांडे के बारे में आयी खबर में कई तथ्य पूरी तरह से गलत हैं। उसमें मेरे पति का नाम भी गलत लिखा गया है। आपकी खबर में हमारी शादी को लेकर भी सवाल उठाये गये हैं और भी कई तथ्यों के साथ तोड़ मरोड़ की गयी है। हमारी शादी 17 फरवरी 2002 को हमारे घर पिथौरागढ़ में हुई थी। इस बात की पुष्टि मेरे परिवार, रिश्तेदारों और दोस्तों से भी की जा सकती है। आपके अखबार ने शनिवार को प्रेस कल्ब में हुई प्रेस कांफ्रेंस में दिये गये मेरे वक्‍तव्‍य को गलत तरीके से छापा है। आपके अखबार ने मेरे हवाले से कहा है कि मैं आजाद की मौत की खबर सुनकर दुखी हुई थी। जबकि मैंने ऐसा कभी नहीं कहा।

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[22 Jun 2010 | 28 Comments | ]
हमारी फिल्‍मों के दलित चरित्र इतने निरीह क्‍यों हैं?

शीबा असलम फहमी ♦ हमारी फिल्मों में तो कल्पना भी नहीं की जाती एक ‘कम-जात’ के प्रतिभावान होने की! अगर इसके बर-अक्स आप को कोई ऐसी फिल्म याद आ रही हो, तो मेरी जानकारी में इजाफा कीजिएगा… हां खुदा न खासता अगर कोई प्रतिभा होगी तो तय-शुदा तौर पर अंत में वो कुलीन परिवार के बिछड़े हुए ही में होगी। ‘सुजाता’ याद है आपको? कितनी अच्छी फिल्म थी। बिलकुल पंडित नेहरु के जाति-सौहार्द को साकार करती! अछूत-दलित कन्या ‘सुजाता’ को किस आधार पर स्वीकार किया जाता है, और उसे शरण देनेवाला ब्राह्मण परिवार किस तरह अपने आत्म-द्वंद्व से मुक्ति पाता है? वहां भी उसकी औकात-जात का वर ढूंढ कर जब लाया जाता है, तो वह व्यभिचारी, शराबी और दुहाजू ही होता है, और कमसिन सुजाता का जोड़ बिठाते हुए, अविचलित माताजी के अनुसार ‘इन लोगों में यही होता है’।