Category: असहमति

0

गांधी के नाम का जाम! हे राम!! #GandhiBotBeer

एक अमेरिकी बीयर कंपनी ने न सिर्फ बापू के नाम पर बाजार में बीयर उतारा है बल्कि‍ कैन पर महात्मा गांधी की तस्वीर भी छाप रखी है। बीयर बनाने वाली न्यू इंग्लैंड ब्रूइंग कंपनी...

2

खुले वेब मंचों के खिलाफ सरकार, विरोध करें

भारत सरकार ने 32 वेबसाइट को बंद कर दिया है। सुरक्षा संबंधी चिंताओं का हवाला देते हुए। सरकार की दलील है कि इन वेबसाइट्स पर भारत विरोधी सामग्री परोसी जा रही थी। इन वेबसाइट्स...

6

इतिहास कोई फास्‍ट फूड नहीं है राजदीप सरदेसाई!

प्रकाश के रे ♦ राजदीप सरकारों को पीड़ितों को मरहम लगाने का सुझाव देते हैं। वे कहते हैं कि मोदी को अहमदाबाद के पीड़ितों के पास जाना चाहिए, उमर अब्दुल्ला को कश्मीरी पंडितों के पास जाना चाहिए, राहुल गांधी को सिख समुदाय के पास जाना चाहिए और अखिलेश सिंह को मुजफ्फरनगर के पीड़ितों से मिलना चाहिए। अगर कोई ललित निबंध होता तो मैं इन सुझावों पर ध्यान नहीं देता। लेकिन जब एक ऐसा वरिष्ठ पत्रकार अगर करता है, तो उसे गंभीरता से परखना चाहिए। सांप्रदायिकता एक विचारधारा है और उसके घोषित लक्ष्य होते हैं। कई बार राजनीतिक स्वार्थों की पूर्ति के लिए इसे एक हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। पंजाब से कश्मीर तक यही हुआ है। कश्मीर का जो हाल बनाया गया है, उसमें वहां के हर तबके को मोहरा बनाया गया है। इस हाल के लिए दोनों मुल्कों की सरकारें सबसे बड़ी दोषी हैं।

0

लंच बॉक्‍स VS द गुड रोड के बहाने शिकायती चिट्ठी-पत्री

डेस्‍क ♦ पिछले दिनों ऑस्‍कर के लिए द गुड रोड को भारत सरकार ने आधिकारिक रूप से चुन कर भेजा। किसी भी फिल्‍म को हर साल ऑस्‍कर के लिए नामित करने के जूरी के अपारदर्शी तरीके पर काफी टीका-टिप्‍पणी हुई। लगभग विवाद जैसा ही आलम रहा। इस विवाद से खिन्‍न फिल्‍म फेडरेशन ऑफ इंडिया ने लंच बॉक्‍स के निर्देशक रीतेश बत्रा को एक पत्र लिखा। ऐसा शायद पहली बार हुआ है, जब असहमत खेमे को FFI ने एड्रेस किया है। इस पत्र का जवाब रीतेश ने दिया है, जिसे हम यहां फाइट क्‍लब से उठा कर डाल रहे हैं।

देश को नमो युग में जाने से रोकें, दस्‍तखत करें 3

देश को नमो युग में जाने से रोकें, दस्‍तखत करें

As India heads towards another general election soon we, the undersigned, would like to warn the people of India about the rising danger of bigotry, communal divide, organised violence on and hatred for sections...

कार्टून से बौखलाये आसाराम के भक्‍त, बदतमीजी पर उतरे 9

कार्टून से बौखलाये आसाराम के भक्‍त, बदतमीजी पर उतरे

आसाराम अभी जोधपुर जेल में हैं। उन पर नाबालिग लड़की के यौन शोषण का आरोप है। मामला संगीन है और सबूत पुख्‍ता, लिहाजा पिछले हफ्ते कोर्ट ने उनकी जमानत भी खारिज कर दी। अपनी...

हम जिससे असहमत हैं, क्‍या वह हमारे लिए अपवित्र है? 0

हम जिससे असहमत हैं, क्‍या वह हमारे लिए अपवित्र है?

अपूर्वानंद ♦ हम किससे बात करें, किससे नहीं, यह हमारा फैसला है और इस पर किसी दूसरे का अख्तियार नहीं। लेकिन जब आप सार्वजनिक व्यक्तित्व की भूमिका ग्रहण करते हैं तो अनेक बार आप सार्वजनिक कर्तव्य के तहत ऐसे लोगों से भी बात करते हैं जिन्हें आप चाय पर कभी न बुलाएंगे। भारत में, जो अभी भी एक-दूसरे से बिलकुल असंगत विचारधाराओं और विचारों के तनावपूर्ण सहअस्तित्व वाला देश है, किसी विचार को चाह कर भी सार्वजनिक दायरे से अपवर्जित करना संभव नहीं है। उदार लोकतंत्र की यही खासियत है। यही कारण है कि इसकी जड़ में मट्ठा डालने के लिए वरवर राव जैसे लोग भी प्रायः स्वतंत्र हैं, स्वतंत्र ही नहीं राज्य पोषित संस्थानों से आजीविका की सुविधा भी उन्हें है ताकि निश्चिंत होकर वे क्रांतिकारी काम कर सकें।

“इनाम के लिए मैं अपने पात्रों की जबान नहीं काट सकता” 0

“इनाम के लिए मैं अपने पात्रों की जबान नहीं काट सकता”

राही मासूम रजा ♦ बड़े-बूढ़ों ने कई बार कहा कि गालियां न लिखो, जो ‘आधा गांव’ में इतनी गालियां न होतीं तो तुम्हें साहित्य अकादमी का पुरस्कार अवश्य मिल गया होता, परंतु मैं यह सोचता हूं कि क्या मैं उपन्यास इसीलिए लिखता हूं कि मुझे साहित्य अकादमी का पुरस्कार मिले? पुरस्कार मिलने में कोई नुकसान नहीं, फायदा ही है। परंतु मैं साहित्यकार हूं। मेरे पात्र यदि गीता बोलेंगे तो मैं गीता के श्लोक लिखूंगा। और वह गालियां बकेंगे तो मैं अवश्य उनकी गालियां भी लिखूंगा। मैं कोई नाजी साहित्यकार नहीं हूं कि अपने उपन्यास के शहरों पर अपना हुक्म चलाऊं और हर पात्र को एक शब्दकोश थमाकर हुक्म दे दूं कि जो एक शब्द भी अपनी तरफ से बोले तो गोली मार दूंगा। कोई बड़ा-बूढ़ा यह बताये कि जहां मेरे पात्र गाली बकते हैं, वहां मैं गालियां हटाकर क्या लिखूं?

भारतीय सिनेमा के पुरोधा दादा साहेब फालके हैं या तोरणे? 1

भारतीय सिनेमा के पुरोधा दादा साहेब फालके हैं या तोरणे?

अश्विनी कुमार पंकज ♦ भारत में सिनेमा के सौ साल का जश्न शुरू हो गया है। इसी के साथ 1970 के दिनों में फिरोज रंगूनवाला द्वारा उठाया गया सवाल फिर से उठ खड़ा हो गया है। सवाल है भारतीय सिनेमा का पुरोधा कौन है? दादासाहब फाल्के या दादासाहब तोर्णे? इस सवाल पर विचार करने से पहले यह जान लेना जरूरी होगा कि दुनिया की सबसे फिल्म किसने बनायी? क्योंकि यहां भी विवाद है। इस विवाद पर एक महत्वपूर्ण टिप्पणी है – दुनिया का पहला फिल्ममेकर कौन है, यह इस बात से तय होता है कि आप यूरोपियन हैं या कि अमेरिकन। भारत के संदर्भ में और यहां की सामाजिक-आर्थिक संरचना को ध्यान में रखते हुए इसे यूं कहा जा सकता है कि भारत में पहली फिल्म किसने बनायी।

कश्मीर का इतिहास भूगोल फिर से लिखेगा 1

कश्मीर का इतिहास भूगोल फिर से लिखेगा

♦ हिमांशु कुमार पूछा था, पंडितों से भी यही पूछा था मैंने। उन्होंने बताया कि जगमोहन जब गवर्नर थे तब सरकार ने कहा था कि हिंदू पंडित घाटी छोड़ कर बाहर आ जायें। फिर...