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Articles in the ख़बर भी नज़र भी Category

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[11 Mar 2010 | 4 Comments | ]
बज्‍ज की बालकनी में टंगी गम और खुशी की दो चादर

दिलीप मंडल ♦ अगर कहूंगा कि ये सभी महिलाएं (ऊपर की तस्वीर में दोनों – सुषमा और वृंदा जी और नीचे की तस्वीर में चारों – सुषमा, वृंदा, नजमा और माया जी) किस क्लास या कास्ट से हैं, तो आप कहेंगे कि जातिवाद फैला रहा हूं। इस शहर में कुछ है जो सड़ रहा है! भारत के ह्यूमन डेवलपमेंट इंडेक्स में दुनिया में 134वें नंबर पर होने के कारणों की शिनाख्त करने की कोशिश कर रहा हूं।

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[10 Mar 2010 | 13 Comments | ]
बज्‍ज पर महिला आरक्षण के बाजे में कुछ ‘कंकड़’ भी थे

अच्‍छी फिल्‍म, बुरे दर्शक

[11 March 2010 | Read Comments | ]

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मधुकर पांडेय ♦ इस बेहतरीन फिल्‍म के साथ जैसा दुर्व्‍यवहार हो रहा है, वह अफसोसनाक है। मेरे हिसाब से इस फिल्‍म को पूरे देश में करमुक्‍त कर देना चाहिए।

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दून में शब्‍द मेला

[10 March 2010 | Read Comments | ]

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डेस्‍क ♦ देहरादून में यात्रा, पेंग्विन और दून लाइब्रेरी मिल कर अप्रैल के पहले हफ्ते में एक साहित्‍य मेला लगाने जा रहा है, जिसमें शब्‍दजीवियों का जमघट लगेगा।

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दिलीप मंडल ♦ अगर महिला आरक्षण को सही मायने में विशेष अवसर का सिद्धांत साबित होना है, तो इस बात की अनदेखी नहीं की जा सकती कि वो अगड़ी महिला हैं, वो दलित महिला हैं और वो अल्पसंख्यक महिला हैं।

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[8 Mar 2010 | 22 Comments | ]
सवर्णों के इस देश में महिला आरक्षण बिल

अजय यादव ♦ सभी को पता है कि मौजूदा महिला आरक्षण लागू हो जाने पर संसद में किस तबके और कौन से और धर्म की महिलाएं ज्यादा चुन कर आएंगी और वे महिला हितों की लड़ाई को कितना आगे ले जाएंगी। मनुवादियों का वर्गीय चरित्र महिलाओं को अपनी पार्टियों का माउथपीस बना देगा और वे भी सोच के मामले में उतनी ही अभिशप्त होंगी, जितनी कि ये पार्टियां हैं। यहां पर मेरे कहने का मतलब यह नहीं है कि इस आरक्षण व्यवस्था में दलित-पिछड़ी-आदिवासी-अल्पसंख्यक महिलाओं की हिस्सेदारी तय होने पर संसद में कोई सुर्खाब के पर लग जाएंगे। बात बस एक बड़े तबके की महिलाओं के वाजिब अधिकारों का गला घोंटने की है और ऐसा भारतीय ‘लोकतंत्र’ में खुलेआम हो रहा है।

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[7 Mar 2010 | One Comment | ]
इस देश में आहत भावनाओं की सियासत होती है जनाब!

साजिद रशीद ♦ कैसी विडंबना है कि भावनाओं के आहत होने के प्रश्न पर कट्टरपंथी मुसलमानों और फासीवादी हिंदुओं के साथ मार्क्सवादी भी खड़े नजर आते हैं। खैर, यहां मार्क्सवादियों पर बहस इसलिए नहीं करना चाहूंगा कि वे अब कांग्रेसियों का एक शिष्ट रूप धारण कर चुके हैं। पश्चिम बंगाल में तसलीमा नसरीन के साथ उन्होंने जो सलूक किया, उसके बाद तो उनके चेहरे से सारे नकाब उतर गये हैं। दरअसल, उन्हें भी सत्ता की राजनीति का खेल रास आ गया है और अब वे सिद्धांतों और राजनीतिक मूल्यों की बहस में पड़ना नहीं चाहते हैं।

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[7 Mar 2010 | 4 Comments | ]
हुसैन लीला का उत्तर कांड

अशोक वाजपेयी ♦ अनेक राजनीतिक दलों ने हुसेन की वापसी की गुहार अब लगायी है। इसमें वे भी शामिल हैं, जिन्होंने हुसेन के खिलाफ अभियान चलाया और उसे शह दी। क्यों नहीं अब सब दल मिलकर हुसेन के बारे में एक संयुक्त बयान जारी करते? क्यों भारत सरकार दोहरी नागरिकता पर बनने वाले और स्थगित कानून को पास कराके हुसेन की भारतीय नागरिकता बनी रहने का जतन नहीं करती? क्यों नहीं भारत सरकार हुसेन को भारत रत्न से सम्मानित करती? सौ से अधिक कलाकारों-लेखकों-बुद्धिजीवियों ने तीन बरस पहले इसके लिए राष्ट्रपति को ज्ञापन दिया था। क्यों नहीं राज्य सरकारों को हिदायत दी जाती कि वे हुसेन को मारने या घायल करने की सार्वजनिक धमकियां देने वालों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई करें?

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[7 Mar 2010 | One Comment | ]
वक्त को छोड़ कर हुसेन के पास सब कुछ इफरात में है

विष्‍णु खरे ♦ हुसेन ने कतर की नागरिकता क्यों स्वीकार की? क्या उन्होंने इसके लिए कोई अर्जी-दरख्वास्त दी या आरजू मिन्नत की या वह उन्हें एकतरफा मेहरबानी में अता की गयी? यह तो सभी को मालूम है कि जब हिंदुस्तान का कोई मुसलिम नागरिक किसी भी हलके में अंतरराष्ट्रीय ख्याति अर्जित कर लेता है तो सारा इस्लाम उस पर सही फख्र करने लगता है और सारे मुसलिम देशों और शासकों की सरहदें और दर उसके लिए ठीक ही खुल जाते हैं – आखिर भारतीय हिंदू क्या ऐसा नहीं करते? शेख हम्माद और शेखा मोजा भी हुसेन के जाती दोस्त और सरपरस्त हैं। शायद उन्हें जब ऐसा लगा होगा कि उनका दोस्त अपने मुल्क में ही मुसीबत में है, तो उसे अपनी बादशाहत में पनाह देना उन्होंने गैर-मुनासिब न समझा।

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[6 Mar 2010 | 31 Comments | ]
नामालूमो, मकबूल फिदा हुसैन को यहां से देखो

अशोक भौमिक ♦ हुसैन आजादी के बाद के भारतीय कलाकारों में सबसे महत्‍वपूर्ण कलाकारों में से एक हैं। उन्होंने आधुनिक भारतीय कला को एक सुस्पष्ट दिशा दी है जो दुर्भाग्य से पिछले चार दशकों से विकसित होते बाजारवाद के अंधेरे में आम जनता के लिए लगभग ओझल ही रही है। कलाप्रेमियों के लिए भी उनके चित्रों को मूलरूप से देख पाना निरंतर अस भव सा होता रहा है। “कल्पनां पत्रिका और असंख्‍य साहित्यिक कृतियों के आवरणों पर हुसैन कभी-कभार दिखाई देते थे। पर वहां भी अब खामोशी है। एक ऐसी लंबी खामोशी के बाद अचानक हुसैन के चित्र आम लोगों की चर्चा के केंद्र में आ गये हैं।

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[6 Mar 2010 | 22 Comments | ]
या हुसैन वा हुसैन… तस्लीम[A] कर या न कर!

शहरोज़ ♦ तीन वर्गों में विभक्त लोगों से क्या स्वस्थ्य वाद-विवाद संभव है!!! दो से तो ऐसी कल्पना करना फ़िज़ूल है। इन्हें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तब तक ही भली लगती है कि उन पर या उनके धर्म पर किसी तरह की आंच न आये। एक ग्रुप, जो हुसैन के समर्थन में है, उसे रश्दी और तसलीमा से उतना ही दुराव है और जिन्हें तसलीमा और रश्दी या वह कार्टूनिस्ट सब से बड़ा मुक्तिबोध नज़र आता है, उन्हें हुसैन से ओसामा लादेन की हद तक नफ़रत है। ऐसी दोहरी मानसिकता या दोहरे मापदंड… पूछने की कोई ज़रुरत नहीं है कि यार तुम्हारी पोलिटिक्स क्या है?

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[6 Mar 2010 | 11 Comments | ]
अश्‍लीलता हुसैन में नहीं, आपकी आंखों में है

पंकज श्रीवास्‍तव ♦ भावनाओं के भड़कने और न भड़कने की सीमा रेखा कौन तय करेगा। जिन्हें पुराणों की इस बात पर भरोसा है कि पृथ्वी शेषनाग के फन पर है, उनकी भावना तो कक्षा छह की विज्ञान की किताब से ही भड़क जाएगी, जो सौरमंडल और उसमें पृथ्वी की मौजूदगी के बारे में बिलकुल उलट बात बताती है। बमुश्किल डेढ़ सौ साल पहले स्वामी दयानंद सरस्वती ने ‘सत्यार्थ प्रकाश’ लिखकर मूर्तिपूजा के खिलाफ जबरदस्त मुहिम शुरू की थी। लेकिन किसी मूर्तिपूजक ने भावना के आहत होने का सवाल उठा कर उन पर हमला नहीं किया। यही नहीं, 1867 के हरिद्वार कुंभ में उन्होंने ‘पाखंड खंडिनी पताका’ फहरायी थी। लेकिन कोई हंगामा नहीं हुआ।

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[5 Mar 2010 | 9 Comments | ]
बताओ हुसैन, तुम्‍हारी पॉलिटिक्‍स क्‍या है?

भूपेन सिंह ♦ क्या हुसैन इसलिए महान है कि उनकी पेंटिग्स करोड़ों रुपये में बिकती हैं। बाज़ार ने उन्हें एक महंगे और महान चित्रकार के तौर पर स्थापित किया है। ऐसे में एक कलाकार के तौर पर हुसैन से क्यों न पूछा जाए कि पार्टनर, तुम्हारी पॉलिटिक्स क्या है? फोर्ब्स जैसी अमीरों की पत्रिका उन्हें भारत का पिकासो घोषित करती है। लेकिन पिकासो की गुएर्निका या वैन गॉग के पोटेटो ईटर जैसी कितनी पेंटिग्स हैं जो हुसैन के वैचारिक मान्यताओं को दुनिया के सामने रखती हैं। जो युद्ध, भुखमरी या गैरबराबरी के ख़िलाफ़ हों। ये हमारे समाज की दिक़्क़त है कि जिसकी पेंटिग के दाम जितने ज़्यादा मिलें उसे उतना ही बड़ा पेंटर मान लिया जाता है।