Category: ख़बर भी नज़र भी

जिन ख़बरों के बारे में आमतौर पर हम और आप जानते हुए भी अनजान रहते हैं। ये कोना सौ में सत्तर आदमी का कोना है।

सिनेमा की मनोहर कहानी से अलग है ‘शिप ऑफ थीसियस’ 1

सिनेमा की मनोहर कहानी से अलग है ‘शिप ऑफ थीसियस’

श्‍याम आनंद झा ♦ सिनेमा के ज्यादातर ज्ञानियों के लिए सिनेमा की समझ मनोहर कहानी में छ्पी कहानियों की नाप तौल से ज्यादा नहीं होती। वे आपको बताएंगे कि अमुक फिल्म की कहानी में अमुक सूत्र को बीच में छोड़ दिया गया, अमुक सूत्र का विकास ठीक से नहीं हो पाया, नाटकीयता का स्तर ये था या वो था, पात्र के हिसाब से परिवेश नहीं था या परिवेश के हिसाब से पात्र। संवाद में प्रभावोत्पादकता थी (या नहीं थी)। थोडा ज्यादा गंभीर गुरु बताएंगे कि अभिनय कैसा था, संगीत कैसा था। और जो गुरु घंटाल आलोचक हैं, वो आप को कभी-कभी सेट और कैमरा मूवमेंट के बारे में एक-दो बातें ऐसी कर देंगे कि आपको उनके ज्ञानी होने का आभास दूर से ही लग जाए। ऐसे गुरु घंटालों के बारे में प्राय: किंवदंतियां चलती हैं कि फिल्म तो इनका शौक है…

मिल्खा ने जब अपने बेटे जीव मिल्‍खा को दौड़ने से रोका! 0

मिल्खा ने जब अपने बेटे जीव मिल्‍खा को दौड़ने से रोका!

ब्रज मोहन सिंह ♦ मैंने चंडीगढ़ में जब पहले दिन यह फिल्म देखी, मेरी आंखें थिएटर में उन बुजुर्ग लोगों पर टिकी थीं, जो अकेले में बैठकर फिल्म के हर मूवमेंट को गौर से निहार रहे थे। लग रहा था कि वह इस फिल्म में कुछ तलाश रहे हों। फिल्म खत्म हुई तो 84 साल के एक सरदार जी मिले, जो अपनी उम्र को धता बताकर फिल्म देखने आ गये थे। मैंने उन्हें सहारा देने की कोशिश की, तो उनकी आंखों में शुक्रिया कहने का भाव था लेकिन उनका हर एक कदम आत्मविश्वास भरा था। शायद उस पीढ़ी ने ऐसे ही अपनी तकदीर लिखी थी, मिहनत, लगन और आग से। कभी सोचता हूं, कैसा रहा होगा वह समय जब लोग एक दूसरे के खून के प्यासे थे, और फिर नया मुल्क बना, नया संविधान बना। हिंदुस्तान और पाकिस्तान के बीच बराबरी का रिश्ता कायम हुआ। लेकिन दिल पर लगे जख्मों का क्या, जो कहीं न कहीं मौजूद है।

बरखुदार, अभी थोड़ी देर और रह जाते तो क्‍या बिगड़ जाता? 0

बरखुदार, अभी थोड़ी देर और रह जाते तो क्‍या बिगड़ जाता?

कुमार सौवीर ♦ प्राण की एक नयी छवि बनायी सन 67 में बनी फिल्म उपकार ने। मनोज कुमार ने एक विकलांग और बेहाल शख्स की भूमिका के लिए प्राण को चुना और प्राण मंगल चाचा बन गये। उनके डॉयलॉग और इस गीत में प्राण की दार्शनिक शैली ने दर्शकों को बुरी तरह रुला डाला। दरअसल, इंदीवर ने “कसमें, वादे, प्यार, वफा, सब बातें हैं बातों का क्या…” मुखड़ा वाला गीत मन्ना डे से गवाया था। इंदीवर चाहते थे यह गीत मनोज कुमार पर फिल्माएं। लेकिन मनोज ने पारस को पहचान लिया और प्राण को यह जिम्मेदारी सौंप दी। इंदीवर इस पर भिड़े थे। मगर फिल्म आयी और इंदीवर दंडवत। उनका एक डॉयलॉग सुनिए : राशन पे भाषण है, पर भाषण पे राशन नहीं। उस समय देश भुखमरी की हालत में था और इस वाक्य से प्राण ने दर्शकों को झकझोर दिया।

“मैं अभी तक फिल्म को धंधे के तौर पर नहीं ले पाता…” 3

“मैं अभी तक फिल्म को धंधे के तौर पर नहीं ले पाता…”

शाहरुख खान ♦ किसी ने कहा है कुछ लोग जन्मजात बड़े होते हैं। कुछ लोग जिंदगी में महानता हासिल करते हैं और कुछ लोगों के पास अच्छे पीआर मैनेजर रहते हैं। मैं तो यही कहूंगा कि तीसरे पर मत जाना। धारणाओं पर मत जीओ। सुबह शीशे में खुद को देख कर सच्चाई टटोल लो। कई बार मेरी फिल्में नहीं चलती हैं। अखबारों में कुछ-कुछ लिख दिया जाता है, लेकिन सुबह आईना देखता हूं तो खुद को ठीक ही पाता हूं। लोग मुझसे कहते हैं कि तुम बड़े यंग दिखते हो। दरअसल मैं सोचता ही नहीं हूं। मेरा मन साफ है तो कोई कुछ भी कहे। अभी तो पंद्रह मिनट की प्रसिद्धि सबको मिल जाती है। 22 साल की प्रसिद्धि सभी को नहीं मिलती। कुछ लोग पंद्रह मिनट की प्रसिद्धि को पंद्रह साल खींचना चाहते हैं।

हम उनके रक्षक नहीं, तो कम से कम जल्लाद तो न बनें! 0

हम उनके रक्षक नहीं, तो कम से कम जल्लाद तो न बनें!

मर्लन ब्रांडो ♦ इस वक्त आप खुद से यह कह रहे होंगे कि इन सारी बातों का एकेडमी अवार्डों से क्या लेना-देना है? यहां खड़ी यह औरत क्यों हमारी शाम बर्बाद कर रही है, हमारी जिंदगियों में ऐसी बातों के साथ दखल दे रही है जिनका हमसे कोई सरोकार नहीं है और न ही हम जिनके बारे में कोई परवाह करते हैं। यह हमारा वक्त और पैसा बर्बाद कर रही है और हमारे घरों में घुसपैठ कर रही है। मुझे लगता है कि इन नहीं पूछे गये सवालों का जवाब यह है कि मोशन पिक्चर कम्युनिटी (फिल्म उद्योग) इंडियनों की दुर्दशा के लिए समान रूप से जिम्मेदार है और यह इंडियनों के चरित्रों का मजाक उड़ाता रहा है। उन्हें पशुओं, विरोधियों और शैतानों के रूप में दिखाता रहा है। इस दुनिया में बच्चों के लिए बड़ा होना काफी मुश्किल है।

वीसी शुक्‍ला के साथ दफन हो गया किस्‍सा कुर्सी का राज़ 0

वीसी शुक्‍ला के साथ दफन हो गया किस्‍सा कुर्सी का राज़

हम चिल्‍लाते रहे, लेकिन आपका दिल नहीं पसीजा

[26 June 2013 | Read Comments | ]

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ग्‍लैडसन डुंगडुंग ♦ जब से उत्तराखंड में लालची लोगों द्वारा निर्मित आपदा आयी है, जिसे प्राकृतिक संसाधनों को डॉलर के भाव से सौदा कर मौज-मस्ती करने वाले लोग प्राकृतिक आपदा कह रहे हैं, तब से मैं बहुत खुश हूं।

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अमृत नाहटा ♦ मेरी फिल्‍म “किस्‍सा कुर्सी का” के खिलाफ यह पूरा ऑपरेशन क्रूरता, जबरदस्ती, और गैरकानूनी गतिविधियों से भरा था और ऐसी ही घटनाओं से इमरजेंसी का पूरा काल सराबोर रहा है।
रंगभेद के खिलाफ ऑस्कर ठुकराने वाले मार्लोन को सलाम 0

रंगभेद के खिलाफ ऑस्कर ठुकराने वाले मार्लोन को सलाम

अश्विनी कुमार पंकज ♦ सौ साल के सिनेमा को भारत के दलित, आदिवासी और स्त्री उसी तरह से खारिज करते हैं, जिस तरह से मार्लोन ब्रांडो ने अमेरिकन आदिवासियों के साथ हो रहे भेदभाव के खिलाफ ऑस्कर अवार्ड ठुकराते हुए रंगभेदी हॉलीवुड को खारिज किया था। ‘द गॉडफादर’ (1972) के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का खिताब जीतने वाले मार्लोन ब्रांडो ने यह कहते हुए ऑस्कर ठुकरा दिया था कि अमेरिका में आदिवासियों के साथ जो व्यवहार हो रहा है, वह अमानवीय है। उसने कहा कि हॉलीवुड में अमेरिकन आदिवासियों को गलत ढंग से चित्रित किया जा रहा है, जिसका वे विरोध करते हैं। 27 मार्च 1973 को आयोजित 45वें ऑस्कर अवार्ड समारोह में मार्लोन का यह संदेश आदिवासी अभिनेत्री और ‘नेशनल नेटिव अमेरिकन एफरमेटिव इमेज कमिटी’ की अध्यक्षा साशीन लिटिलफेदर ने पढ़ा था।

सत्ता के कुत्ते लोकतंत्र का नाम लेने की योग्‍यता नहीं रखते! 0

सत्ता के कुत्ते लोकतंत्र का नाम लेने की योग्‍यता नहीं रखते!

गुड्सा उसेंडी ♦ 17 मई को बीजापुर जिले के एड़समेट्टा गांव में तीन मासूमों समेत आठ लोगों की जब पुलिस व अर्द्धसैनिक बलों ने हत्या की तब क्या इनको ‘लोकतंत्र’ की याद नहीं आयी? जिस कांड को खुद कांग्रेस के स्थानीय नेताओं को भी मजबूरन ‘नरसंहार’ बताना पड़ा था, उस पर इन नेताओं के मुंह पर ताले क्यों लग गये थे? एक मई को नारायणपुर जिले के मड़ोहनार गांव के फूलसिंह और जयसिंह नामक दो आदिवासी भाइयों को पुलिस थाना बुलाकर हरी वर्दियां पहना कर गोली मारकर जब ‘मुठभेड़’ की घोषणा की गयी थी, तब क्या इनका ‘लोकतंत्र’ खुश था? 20-23 जनवरी के बीच बीजापुर जिले के पिड़िया और दोड्डि तुमनार गांवों पर हमले कर 20 घरों में आग लगाकर, जनता द्वारा संचालित स्कूल तक को जला देने पर क्या इनका ‘लोकतंत्र’ फलता-फूलता रहा?

इस पागल दुनिया में सच्‍चा सरल आदमी ही पागल लगता है 3

इस पागल दुनिया में सच्‍चा सरल आदमी ही पागल लगता है

किशोर कुमार ♦ दिलीप कुमार के बाद मैं सबसे ज्यादा कमाई कराने वाला हीरो था। उन दिनों मैं इतनी फिल्में कर रहा था कि मुझे एक सेट से दूसरे सेट पर जाने के बीच ही कपड़ने बदलने होते थे। जरा कल्पना कीजिए। एक सेट से दूसरे सेट तक जाते हुए मेरी शर्ट उड़ रही है, मेरी पैंट गिर रही है, मेरा विग बाहर निकल रहा है। बहुत बार मैं अपनी लाइनें मिला देता था और रुमानियत वाले दृश्य में गुस्सा दिखता था या तेज लड़ाई के बीच रुमानियत। यह बहुत बुरा था और मुझे इससे नफरत थी। इसने स्कूल के दिनों के दुस्वप्न जगा दिये। निर्देशक स्कूल टीचर जैसे ही थे। यह करो। वह करो। यह मत करो। वह मत करो। मुझे इससे डर लगता था। इसीलिए मैं अक्सर भाग जाता था।

कान में उजबक की तरह नजर आते हमारे सितारे 0

कान में उजबक की तरह नजर आते हमारे सितारे

डेस्‍क ♦ कांस फिल्‍म फेस्टिवल में हमारे सितारे जैसी हरकतें कर रहे हैं, उससे पता चलता है कि वे सच और सिनेमा का मिक्‍सचर हो चले हैं। टिप्‍पणीकार उन्‍हें एक बच्‍चे के जन्‍मदिन पार्टी में शामिल उत्‍साही मेहमान की संज्ञा दे रही हैं। अभी पिछले दिनों हिंदी सिनेमा के एक मशहूर अभिनेता का मानना था कि असल कलाकार वह है, जो जाती जिंदगी में भी और फौरी मुलाकातों में भी बनावटी नहीं दिखता। हिंदी सिनेमा के सौ साल पर कान में हमारी जगहंसाई के ये नजारे आप समझ सकें, इसलिए कान फेस्टिवल की साइट से इसे हम हू-ब-हू उतार रहे हैं।