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Articles in the ख़बर भी नज़र भी Category

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[7 Jul 2010 | 13 Comments | ]
मैं हार मानता हूं, आप जीते, आपकी बात आखिरी…

अनुराग कश्‍यप ♦ हमारे यहां वो नहीं हो सकता, जो यूरोप और अन्‍य देशों में हुआ है। हमारे देश में डेमोक्रेसी के मायने अलग हैं। हमारे यहां पिक्‍चरों में मोची, चमार, बार्बर, तेली जैसे शब्‍द काट दिये जाते हैं, क्‍योंकि उनके जो पॉलिटिकल रिप्रजेंटेटिव हैं, वो आई और बी मिनिस्‍ट्री पे चढ़ बैठते हैं, जो सेंसर बोर्ड पे चढ़ बैठता है। गुलाल में से सिर्फ दो शब्‍द सेंसर किये गये, जब पृथ्‍वी बना कहता है, सारे गोल चश्‍मे वाले ऐसे ही होते हैं, गांधी अंबेदकर। उनके चश्‍मे गोल थे, अंडरस्‍टैंडिंग भी गोल थी। गांधी और अंबेडकर काट दिया गया। वाक्‍य का मतलब क्‍या रहा? आपका आइडियलिज्‍म जो है, यहां के यथार्थ में रह कर इस्‍तेमाल करिए।

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[7 Jul 2010 | 46 Comments | ]
प्‍लीज, अनुराग कश्‍यप को कठघरे में खड़ा मत करिए!

मनोज बाजपेयी ♦ अनुराग कश्यप को बुलाकर उनके होने पर ही सवाल उठाकर आप क्या साबित करना चाहते हैं? जब अनुराग कश्यप, विशाल भारद्वाज, दिबाकर चटर्जी, नीरज पांडे जैसे युवा निर्देशक सामने आये तो उनकी संगत का भरपूर मजा लीजिए। न कि उनको कठघरे में खड़ा करना शुरू कीजिए। क्योंकि उन्होंने अपने सिनेमाई करियर की शुरुआत से लेकर अभी तक ऐसा कुछ नहीं किया है, जिसे लेकर उन्‍हें भड़कने पर मजबूर किया जाए। अनुराग कश्यप से समाज को बदलने की अपेक्षा क्यों रखी जाती है? अनुराग कश्यप अगर सिनेमाई भाषा की परिभाषा बदलने में लगे हैं तो उन्हें बधाई दीजिए। उनके साथ चाय पीजिए और उस याद को घर लेकर जाइए। दलितों पर फिल्म नहीं बनायी जा सकती है, एक अच्छी कहानी पर फिल्म बनायी जा सकती है।

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[7 Jul 2010 | 3 Comments | ]
दिनेश श्रीनेत की कहानी: विज्ञापन वाली लड़की

डेस्‍क ♦ विज्ञापन वाली लड़की। कानपुर से दिनेश श्रीनेत्र ने ये कहानी भेजी है। हालांकि ये दलित की कहानी नहीं है, फिर भी इसे आप सबसे साझा कर रहे हैं – क्‍योंकि ये इसी उद्देश्‍य से भेजी गयी है। यह कहानी सबसे पहले वागर्थ के अप्रैल 2006 के अंक में प्रकाशित हुई और सराही गयी थी। इसके बाद कहानी का उर्दू में अनुवाद हुआ और यह उर्दू आजकल में प्रकाशित हुई। उर्दू के पाठकों ने इसे इतना पसंद किया कि यह बाद में पाकिस्तान से आसिफ फारुकी के संपादन में निकलने वाली पत्रिका दुनियाजाद में प्रकाशित हुई। जैसा कि लेखक ने हमें जानकारी दी है, यह अब तक उनकी पहली और इकलौती प्रकाशित कहानी है। कहानी अभी और भी है, पढ़ते रहिए मोहल्‍ला लाइव। किसी भी कहानी पर फिल्‍म बनाने के लिए लेखक की अनुमति आवश्‍यक है।

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[6 Jul 2010 | 13 Comments | ]
इंदौर से आयी पहली कहानी : लुगड़ी का सपना

डेस्‍क ♦ लुगड़ी का सपना। इस शीर्षक से इंदौर में रहने वाले सत्‍यनारायण पटेल ने पहली कहानी भेजी है। भारत की वृहत्तर नागरिकता से अलग अजीब और अभिजात नायकों की कहानी कहने वाले हिंदी सिनेमा में आम आदमी की कहानी खोजने की यह एक कोशिश है। अनुराग ने कहा है कि मोहल्‍ले पर ऐसी कहानियों को सार्वजनिक किया जाए। उस पर बात होगी। बहस होगी। कहानी अगर झिंझोरने वाली होगी और सब उस कहानी के मर्म से घायल होंगे, तो अनुराग उस पर फिल्‍म बनाएंगे – उसके लिए पैसे जुटाएंगे। मोहल्‍ला लाइव के पास एक और स्‍टोरी-आइडिया की स्‍कैंड कॉपी आयी है। इसके बाद हम उसे सार्वजनिक करेंगे। किसी भी कहानी पर फिल्‍म बनाने के लिए लेखक की अनुमति आवश्‍यक है।

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[5 Jul 2010 | 12 Comments | ]
समाज बदलता है, तो फिल्में भी बदलती हैं अनुराग

दिलीप मंडल ♦ प्रधानमंत्री पिछले छह साल से कह रहे हैं कि वामपंथी उग्रवाद आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ी चुनौती है, लेकिन देश के सामने जो सबसे बड़ा सवाल है, उस पर हमारी फिल्में पक्ष या विपक्ष में क्या बोलती हैं। बोलती भी हैं या चुप रहती हैं? 9/11 की थीम के आसपास भारत में न्यूयॉर्क और माई नेम इज खान जैसी फिल्में बनती हैं, लेकिन भारतीय सवालों पर चुप्पी क्यों है? गुजरात दंगों पर फिल्म बनाने के लिए केंद्र में कांग्रेस की सरकार के आने का इंतजार क्यों होता है? औद्योगीकरण, मूलनिवासियों के विस्थापन और विकास के सवालों पर जेम्स कैमरोन अवतार जैसी फिल्म बनाते हैं और पैसे भी कमाते हैं। भारत में फिल्मों के लिए यह वर्जित विषय क्यों है? यह आप भी मानेंगे कि भारतीय समाज और सिनेमा की बहस में तो अभी सवाल भी ढंग से फ्रेम नहीं हुए हैं।

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[5 Jul 2010 | 8 Comments | ]
शालीनता का कंडोम बनाम अनुराग कश्‍यप की दुनिया

सौरभ द्विवेदी ♦ दोस्तों कोट बदला है, जिस्म नहीं। और इसके अंदर वही पगलाया सांड़ रहता है, जिसे खेत से खदेड़ दिया गया, जिसे चौराहे पर बैठने के अलावा कहीं ठौर नहीं मिला और अब जब तमाम कारों के, ख्यालों के रास्ते रुक रहे हैं, तो कोई हॉर्न बजा रहा है, कोई पुलिस को बुला रहा है और कोई ओह गॉड इतना भी सिविक सेंस नहीं बोल रहा है, तब यही सांड़ पूरी बेशर्मी और ईमानदारी के साथ, आंखें लाल किये पगुरा रहा है। अनुराग तुम्हारी भाषा से मुझे कोफ्त होती है। क्योंकि हम सब शालीनता का कंडोम चढ़ाये सेफ वैचारिक सेक्स की तमन्ना लिये बैठे हैं खुद को सहलाते।

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[4 Jul 2010 | One Comment | ]
अपनी इसी अदा से अनुराग मुझे प्‍यारे हैं: हंसल मेहता

डेस्‍क ♦ अनुराग कश्‍यप की बातों का बवंडर फेसबुक की दुनिया में भी पहुंचा। फिल्‍मकार हंसल मेहता ने अपने वॉल पर इस टैग के साथ अनुराग कि टिप्‍पणी छापी कि This is why I love Anurag Kashyap! यानी अपनी इसी अदा से अनुराग मुझे प्‍यारे हैं। वहां भी अनुराग के गुस्‍से और अनुराग के लहजे में ज्‍यादा लोग उलझे, कम ही थे जिनकी पकड़ में असल अर्थ आ रहे थे। लोगों की प्रतिक्रियाओं को अलग रखते हैं, तो हम देख रहे हैं कि एक ही समय के दो युवा फिल्‍मकार लहजे को लेकर कॉन्‍शस होने से ज्‍यादा इस बात को लेकर कॉन्‍शस हैं कि उनके निहितार्थ क्‍या होते हैं। शमशेर कहते थे, बात बोलेगी हम नहीं। हम कैसे भी हों, अश्‍लील-फूहड़-संस्‍कारी-रूपवान, हमारे विचारों की तासीर ही हमारी तकदीर तय करेगी।

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[4 Jul 2010 | 26 Comments | ]
समाज न बदल पाने की कुंठा सिनेमा पर न उतारिए

अनुराग कश्‍यप ♦ सिनेमा से समाज बदलना है, आंदोलन करना है, तो उतरिए और मदन मोहन मालवीय की तरह भीख मांगिए, पैसा जो‍ड़‍िए और बनाइए। फिल्‍म की तुलना साहित्‍य और पेंटिंग से न ही करें तो अच्‍छा है। और यदि नहीं कर सकते तो कृपया सिनेमा को अपने आंदोलनों से मुक्‍त करें। विमर्श करिए, बहस करिए, हाथ में बंदूक उठाइए और बदलिए समाज को। मेरी कोशिश बस इतनी है कि सिनेमा अगर एक इंच भी बदल सकूं तो बस उतनी जिम्‍मेदारी चाहिए, जो मैंने उठायी है। जो जिम्‍मेदारी आपने उठायी है, उसे आप निभाइए। अपनी जिम्‍मेदारी न निभा पाने का, समाज को न बदल पाने का फ्रस्‍ट्रेशन सिनेमा पर न उतारिए – अपना ही समय व्‍यर्थ करेंगे आप।

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[3 Jul 2010 | 33 Comments | ]
आप झिंझोड़ने वाली कहानी दीजिए, फिल्‍म मैं बनाऊंगा

अनुराग कश्‍यप ♦ क्‍या है आम आदमी की कहानी? एक दलित की ऐसी कौन सी कहानी है जो कहनी चाहिए? आपके पास शब्‍द हैं, ब्‍लॉग है, आप कहानी कहिए… ऐसी कहानी लिखिए, जो मजबूर कर दे मुझे कहने को… ऐसी कहानी जो झकझोर दे लोगों को… जो आपके मुद्दे को सर चढ़ के बोले… मैं फिल्‍म बनाऊंगा। कहानी यहां इस ब्‍लॉग पर लिखें… मैं आपसे उस पर बहस करूंगा। जब एक कहानी लिख दे कोई, जिस पर सब सहमत हों, मैं यहां मोहल्‍ला लाइव पर कह रहा हूं कि मैं उस पर बिना किसी देरी के फिल्‍म बनाऊंगा… आप लिखो, मैं पब्लिकली कह रहा हूं, मैं फिल्‍म बनाऊंगा।

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[3 Jul 2010 | 6 Comments | ]
कोई और नहीं बनाएगा हमारा सिनेमा

अब्राहम हिंदीवाला ♦ हिंदी सिनेमा का पूरा परिदृश्य बदल सकता है। बशर्ते हिंदी समाज यानी हिंदी प्रदेशों के दर्शक हिंदी फिल्मों में रुचि लें। वे सिनेमाघरों में फिल्में देखने जाएं। अपनी पसंद-नापसंद जाहिर करें। हिंदी प्रदेशों से निर्माता-निर्देशक आएं। वे अपने साथ हिंदी समाज की संवेदना और संस्‍कृति ला सकते हैं। ताजा उदाहरण है, ‘राजनीति’। फिल्में कलात्मक व्यवसाय हैं। एक प्रोडक्ट की तरह ही इनका निर्माण, वितरण और उपभोग होता है। हर निर्माता अपनी फिल्‍मों के ज्यादा से ज्यादा दर्शक चाहता है। बाजार में फिल्में एक ऐसा प्रोडक्ट है, जिसका एमआरपी सुनिश्चित नहीं है। मुंबई में आई हेट लव स्टोरीज के टिकट सप्ताहांत में 400 रुपये तक में बिकेंगे, जबकि यही फिल्म किसी छोटे शहर में 5 रुपये में देखी जाएगी।