Category: ख़बर भी नज़र भी

क्‍या अमिताभ बच्‍चन को कायदे की हिंदी नहीं आती है? 1

क्‍या अमिताभ बच्‍चन को कायदे की हिंदी नहीं आती है?

डेस्‍क ♦ इन कुछ दिनों में तमाम सोशल नेटवर्किंग जगहों पर अमिताभ बच्‍चन के प्रति भारतीय जनमानस की कृतज्ञता देखी जा सकती है। लोगों ने लिखा है कि सिर उठाने का मौका दिया है अमिताभ बच्‍चन ने। कई अखबारों ने हिंदी को लेकर अमिताभ बच्‍चन की सदाशयता पर संपादकीय भी प्रकाशित किये हैं। गर्व और उत्‍सव के इस माहौल में यह कहना कि Festival De Cannes 2013 में अमिताभ बच्‍चन ने हिंदी में बोलकर हिंदी की थोड़ी फजीहत भी करवायी है, आफत मोल लेना होगा। और-और की वजह से वाक्‍य को लंबा करने पर उन्‍हें बरी भी कर दिया जाए, लेकिन लिंग की जो गड़़बड़ी उन्‍होंने कर दी, उस पर उन्‍हें कैसे बरी किया जा सकता है। आखिर वो हिंदी सिनेमा के अप्रतिम अभिनेता हैं और मशहूर कवि हरिवंश राय बच्‍चन के सुपुत्र भी।

माधोगढ़ के बीहड़ में हम जब निर्भय गूजर से मिलने पहुंचे! 0

माधोगढ़ के बीहड़ में हम जब निर्भय गूजर से मिलने पहुंचे!

शंभुनाथ शुक्‍ल ♦ रास्ता और भी बीहड़ व खाई खंदक वाला होता जा रहा था। जरा सी भी आहट हमें चौंका देती। वहां डकैतों के साथ-साथ जंगली जानवरों का भी खतरा था। हम करीब आधा मील चले और एक ऊंचे कगार पर ठहर गये। वहां बबूल का एक घना जंगल था। यही निर्भय का डेरा है, पोरवाल ने हमें बताया। हम आगे बढ़े तो देखा कि जगह-जगह पर बबूल के कांटों की बाड़ लगाकर रास्ता रोक रखा गया है। पोरवाल ने हमें वहीं रोक दिया। उसने फुसफुसाते हुए कहा कि निर्भय यहीं है। निर्भय के वहीं होने की खबर से हम रोमांचित हो गये। सब दम साधे खड़े थे। किसी के मुंह से बोल नहीं फूट रहा था।

सफेदपोशों की शह पर चलती है रेल, अवाम अवाक रहती है! 2

सफेदपोशों की शह पर चलती है रेल, अवाम अवाक रहती है!

उमेश पंत ♦ रेल की इस रेलमपेल से इतर इन आठ दिनों में मुंबई को किसी बीच के स्टेशन में एक अनिश्चित समय के लिए ठहरे हुए किसी यात्री की नजर से देखा है। मुंबई का असल फील अब अंधेरी के यारी रोड में कॉस्टा कॉफी से ब्रू वर्ड कैफे के बीच मौजूद उस सड़क के इर्द-गिर्द वाले इलाके में ही आता है। वर्सोवा के समुद्री तट के किनारे बसे उस इलाके में कई जाने-पहचाने चेहरे जो नजर आते हैं। कुछ चेहरे जिन्हें कभी टीवी पे तो कभी फिल्मों में देखा होगा, कुछ चेहरे जिनके साथ पढ़ाई की है, कुछ चेहरे जिनके साथ काम के सिलसिले में जुड़े हैं। मुंबई में रिहाइश के इस अरसे में अब तक प्रोफेशनल होना नहीं सीखा है।

कामों का बोझा बढ़ाने से बेहतर है एक ही चीज साधें 0

कामों का बोझा बढ़ाने से बेहतर है एक ही चीज साधें

पओलो कार्डिनी ♦ आप कभी वेनिस गये हो? छोटी गलियों में खुद को खोना कितना खूबसूरत है उस द्वीप पर। लेकिन हमारी मल्टीटास्किंग दुनिया कुछ अलग है। हजारों सूचनाओं से भरी। ऐसे में कैसा रहेगा फिर से अपनी साहस की किशोर भावना को पाना? मैं जानता हूं कि मोनो-टास्किंग के बारे में बात करना अजीब है, जब हमारे पास इतने सारे विकल्प हैं। लेकिन मैं फिर आपको कहता हूं केवल एक काम पर ध्यान दो या अपनी डिजिटल भावनाओं को बंद ही कर दो। ताकि आजकल, सब अपनी मोनो चीज बना सकें। क्यूं नहीं? तो अपनी मोनोटास्क वाली जगह ढूंढ लो… इस मल्टीटास्किंग दुनिया में।

दवा उद्योग हमारे स्वास्थ्य का दोस्त नहीं दुश्मन है 0

दवा उद्योग हमारे स्वास्थ्य का दोस्त नहीं दुश्मन है

♦ ओम थानवी बेटे डॉ मिहिर ने एक विडियो भेजा है, 15 साल दवा उद्योग में काम कर चुकी ग्वेन ओल्सन का। ओल्सन बेबाकी से बताती हैं कि कैसे दवा उद्योग हमारे स्वास्थ्य का...

वे प्रधानमंत्री थे, लेकिन पांच लोगों को नाश्‍ता नहीं करवा सके 6

वे प्रधानमंत्री थे, लेकिन पांच लोगों को नाश्‍ता नहीं करवा सके

अविनाश ♦ लैरिजेज होटल में, सौ साल के सिनेमा का उत्‍सव ओम बुक्‍स इंटरनेशनल ने मनाया। फिल्‍म पत्रकार जिया साहब ने एक किताब संपादित की है: हाउस फुल, उसी के विमोचन के बहाने हिंदी सिनेमा के “गोल्‍डेन एरा” पर एक पैनल डिस्‍कशन था। गुलजार साहब की बहुत साफ समझ थी कि सिनेमा और संगीत उस दौर से काफी आगे निकल आया है और उसने अपनी लैंग्‍वेज इधर बनानी शुरू की। महेश भट्ट ने मदर इंडिया को उस दौर का अपने सबसे पसंदीदा सिनेमा बताया, लेकिन गुलजार ने उसे मैलोड्रामा के खाते में डालते हुए “औरत” को उससे बेहतरीन रचना बताया, जिससे प्रेरित होकर मदर इंडिया बनायी गयी थी। ऐसे अनेक खुरपेंच मिश्रित संवादों के बीच गुलजार साहब ने उस जमाने का एक किस्‍सा सुनाया।

नॉन बजट की छोटी फिल्‍में ही सिनेमा का भविष्‍य है #Mami 3

नॉन बजट की छोटी फिल्‍में ही सिनेमा का भविष्‍य है #Mami

उमेश पंत ♦ इन फिल्मों की अच्छी बात ये थी कि इनमें पूरी मासूमियत थी। क्यूंकि ये फिल्में लगभग न के बराबर बजट में बनी फिल्में थीं, इसीलिए इनमें तकनीकी दिखावा नहीं था। बेहद कम समय और कम संसाधनों में अपने ज्यादा से ज्यादा सिनेमाई ज्ञान को प्रदर्शित करती ये फिल्में संभावना जगाती फिल्में थी। प्रेरणा देती फिल्में थी। और उससे भी बढ़कर सिनेमा के माध्यम से अपने परिवेश को समझने की कोशिश करती फिल्में थी। इन फिल्मों में मुंबई के भीतरखानों की अच्छी झलकें देखने को मिली। मुंबई डाईमेंशन कैटेगरी की एक शॉर्ट फिल्म लोकल दिखाती है कि कैसे लोकल ट्रेन के तेज शोर को नयी नयी शादी करके चॉल में रहने आये पति-पत्नी अंतरंग लम्‍हे बिताने के लिए एक टूल की तरह प्रयोग करते हैं।

आमोर और पांच अध्‍याय से इलेक्ट्रिक चिल्‍ड्रन तक #Mami 1

आमोर और पांच अध्‍याय से इलेक्ट्रिक चिल्‍ड्रन तक #Mami

उमेश पंत ♦ इलैक्ट्रिक चिल्‍ड्रन में एक मां अपने टीन एजर बच्चों को कहानियां सुनाया करती है। एक दिन उसकी लड़की को पता चलता है कि वो प्रेग्नेंट है। इसी बीच वो एक ऑडियो टेप सुनती है और उसे महसूस होता है कि उस टेप में जिसकी आवाज उसने सुनी है, वही उसके पेट में पल रहे बच्चे का पिता है। उस अजनबी, अनजान आदमी को वो भगवान का कोई दूत समझ कर उसकी खोज में घर से भागकर एक शहर की ओर निकल जाती है। शहर में उसकी मुलाकात उसी की उम्र के लड़के-लड़कियों के एक ग्रुप से होती है। कैसे वो और उसका भाई शहर में इस ग्रुप के साथ घुलते-मिलते हैं, कैसे लड़की अपने बच्चे के पिता की जगह अपने पिता को खोज लेती है, घर लौटती है तो वहां उसकी शादी करने का प्रयास किया जाता है और आखिरकार कैसे शहर से उस ग्रुप में मौजूद लड़का, जो उसे पसंद करता है, कस्बे में आकर शादी के इस जंजाल से निकाल कर उसे अपने साथ ले जाता है।

फिल्‍मी दिन-रात में रमना भूख भी बिसार देता है #Mami 2

फिल्‍मी दिन-रात में रमना भूख भी बिसार देता है #Mami

उमेश पंत ♦ इतवार की सुबह सुबह सायान के सिनेमेक्स सिनेमाहॉल में ऑडिटोरियम के बाहर 12 बजकर 45 मिनट पर लगने वाली फिल्म गॉडस हौर्सेज बिना किसी पूर्व सूचना के कैंसल कर दी गयी। स्क्रीनिंग हॉल के बाहर दूर दूर से फिल्म देखने आने वाले लोग इंतजार करते रहे पर वहां उन्हें बताने वाला भी कोई नहीं था कि फिल्म किस वजह से ऐसे अचानक टाल दी गयी है। 60-62 साल की एक बुजुर्ग महिला, जो उससे पहले दिन भी फिल्म देखने आयी थी, निराश थी। कह रही थी कि इतने बड़े लेवल पे फेस्टिवल करवा तो दिया, पर इतनी गैरत भी नहीं है कि कैंसल होने वाली फिल्म के बारे में पहले से जानकारी दे दें। वर्सोवा के सिनेमैक्स से आया एक लड़का 45 मिनट ट्रेन का सफर करके सायान पहुंचा और पूरे एक घंटे से फिल्म का इंतजार करता रहा।

80 की उम्र, 60 साल का फिल्‍मी जीवन… और क्‍या चाहिए 2

80 की उम्र, 60 साल का फिल्‍मी जीवन… और क्‍या चाहिए

प्रकाश के रे ♦ कुल अस्सी साल की उम्र में से यश जी ने साठ साल सिनेमा को दिये, जिसके शुरुआती पन्ने बड़े दिलचस्प हैं, जिन्हें यश जी को याद करते हुए पलटना रोमांचक अनुभव है। जलंधर में 1950 में बीए की पढ़ाई पूरी करने के बाद बंबई आये। बीआर उन्हें इंजीनियरिंग की पढ़ाई के लिए लंदन भेजना चाह रहे थे, लेकिन यश जी को बंबई का माहौल बहुत रास आ गया था और वे फिल्मों से जुड़ना चाहते थे। बीआर उन दिनों शोले (1953) बना रहे थे, जिसकी यूनिट के साथ यश जी को भी रख लिया गया। बड़े भाई का मानना था कि वे किसी और के साथ फिल्मों के बारे में अधिक सीख सकेंगे। यह सोचकर उन्होंने यश जी को आईएस जौहर के साथ लगा दिया। लेकिन कुछ समय बाद प्रसिद्ध चरित्र अभिनेता जीवन ने बीआर को सलाह दी कि वे यश चोपड़ा को अपने साथ ही रख कर सिखाएं।