Category: Forward Press

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‘जाति न पूछो साधु के बरक्स आलोचना के लोचन का संकट’

संजय कुमार ♦ प्रो चैथीराम यादव और आलोचक वीरेंद्र यादव किसी परिचय के मोहताज नहीं है। दयानंद पांडेय ने उनकी योग्यता को जाति से जोड़ कर देखा। अक्सर द्विजवादी ऐसा करते हैं। साहित्य हो या मीडिया, दलित-पिछड़े की भागीदारी के सवाल को लेकर जब-जब सवाल उठता है, तब-तब दयानंद पांडेय जैसे द्विज योग्यता को लेकर सवाल खड़े करते हैं? उन्हें अयोग्य द्विज नहीं दिखता? प्रो चैथी राम यादव को दयानंद पांडेय कुंजी लेखक बताते हैं। वहीं संस्थान ने डॉ सरला शुक्ला और डॉ सूर्य प्रसाद दीक्षित को पुरस्कृत किया, जिनकी एकमात्र योग्यता हिंदी आध्यापक और द्विज होना है। ऐसे में दयानंद पांडेय की न्याय चेतना कहां सो रही थी?

महिषासुर : ब्राह्मणवादी संस्कृति के प्रतिकार का बढ़ता कारवां 1

महिषासुर : ब्राह्मणवादी संस्कृति के प्रतिकार का बढ़ता कारवां

अरुण कुमार ♦ ‘महिषासुर’ का मिथक बहुजन नायक के रूप में देश के विभिन्न हिस्सों में विमर्श के केंद्र में है। इस साल से उत्तर भारत के कई क्षेत्रों में महिषासुर की शहादत पर नये आयोजन आरंभ हो रहे हैं, जिनका मुख्य उद्देश्‍य पिछड़े व आदिवासी समाज के लोगों को यह बताना है कि महिषासुर इस देश के बहुजन समुदाय के न्यायप्रिय राजा थे, जिनकी दुर्गा द्वारा छलपूर्वक हत्या की गयी थी। ज्ञातव्य है कि महिषासुर को लेकर बहुजनों के बीच दो तरह के मत हैं। एक धड़ा मानता है कि महिषासुर गोवंश पालक समुदाय के राजा थे, जबकि दूसरा धड़ा उन्हें असुर जनजाति से जोड़ते हुए आदिवासी समाज का राजा बताता है।

“गुजरात के मुसलमान नरेंद्र मोदी को वोट देंगे” 0

“गुजरात के मुसलमान नरेंद्र मोदी को वोट देंगे”

डेस्‍क ♦ गुजरात हज कमेटी व राज्य भाजपा अल्पसंख्यक मोर्चे के अध्यक्ष महबूब अली बावा ने फॉरवर्ड प्रेस से कहा कि गुजरात के मुसलमान नरेंद्र मोदी से खुश हैं और वे बीजेपी को ही वोट करेंगे। आश्‍चर्यजनक रूप से इस इंटरव्‍यू में 2002 के दंगों का जिक्र नहीं है, उनके पुनर्वास से जुड़ी अनियमितताओं का जिक्र नहीं है और न ही फर्जी इनकाउंटर को लेकर राज्‍य सरकार के रुख का जिक्र है। गुजरात के मुसलमानों की बेहतर आर्थिक सेहत का श्रेय जिस तरह नरेंद्र मोदी को इस इंटरव्‍यू में दिया गया है, बावा को क्रॉस करना चाहिए था कि नरेंद्र मोदी से पहले गुजरात में मुसलमानों की स्थिति क्‍या थी। या स्‍पष्‍ट आंकड़े बावा के सामने रखने चाहिए थे। बिना किसी तैयारी के इस इंटरव्‍यू का मकसद जो भी रहा हो, यह सीधे सीधे एक पीआर एक्‍सरसाइज दिख रहा है।

अछूत समस्‍या से छूटने के लिए धर्म खोज रहे थे अंबेडकर 4

अछूत समस्‍या से छूटने के लिए धर्म खोज रहे थे अंबेडकर

गेल आम्वेट ♦ अंबेडकर और सिक्ख नेता मास्टर तारा सिंह के बीच मतभेद पैदा हो गये। तारा सिंह, निस्‍संदेह, अंबेडकर के राजनीतिक प्रभाव से भयभीत थे। उन्हें डर था कि अगर बहुत बड़ी संख्या में अछूत सिक्ख बन गये तो वे मूल सिक्खों पर हावी हो जाएंगे और अंबेडकर, सिक्ख पंथ के नेता बन जाएंगे। यहां तक कि, एक बार अंबेडकर को 25 हजार रुपये देने का वायदा किया गया परंतु वे रुपये अंबेडकर तक नहीं पहुंचे बल्कि तारा सिंह के अनुयायी, मास्टर सुजान सिंह सरहाली को सौंप दिए गये। इस प्रकार, अपने जीवन के मध्यकाल में अंबेडकर का सिक्खों और उनके नेताओं से मेल-मिलाप बढ़ा और वे सिक्ख धर्म की ओर आकर्षित भी हुए। यह जानना महत्वपूर्ण है कि अंततः उन्होंने सिक्ख धर्म से मुख क्यों मोड़ लिया।

एक आंदोलन, जिसकी ओर मीडिया ने देखा तक नहीं! 3

एक आंदोलन, जिसकी ओर मीडिया ने देखा तक नहीं!

प्रमोद रंजन ♦ दिल्ली के जंतर-मंतर पर अन्ना ने 29 जुलाई से अनशन शुरू किया था। यह अनशन ठीक उस जगह के बगल में हो रहा था, जहां भगाना के बहिष्कृत दलित लगभग एक पखवाड़े से धरना पर बैठे थे। अनशन के पहले ही दिन तंवर अन्ना के आंदोलन को अपना समर्थन देने हिसार से चलकर आये थे। उस दिन शाम में उनका फोन आया, ‘भाई साहब, आप मीडिया वालों को अन्ना टीम का समर्थन नहीं करना चाहिए। मैं बहुत दुःखी होकर यहां से लौट रहा हूं। अन्ना के मंच पर (जाट) ‘खाप पंचायतें’ बैठी हैं। ये सिर्फ बड़े लोगों की बात करने वाले लोग हैं। यह अरविंद केजरीवाल खुद हिसार का है, लेकिन दलितों के ऊपर जुल्म पर ये लोग एक शब्द भी बोलने को तैयार नहीं है’।

Forward Press : Vacancy in Ad department 1

Forward Press : Vacancy in Ad department

Forward Press has advertised two vacancies of Advertisement Executive / Ad Representative for its Delhi office. Attractive salary and commission will be paid to the appointees.

हम दोनों हैं अलग अलग :-) हम दोनों हैं जुदा जुदा :-) :-) 11

हम दोनों हैं अलग अलग :-) हम दोनों हैं जुदा जुदा :-) :-)

प्रेमकुमार मणि ♦ वाजपेयी को मसीहा मानने वाले नीतीश कुमार ने तब किस राजधर्म का पालन किया था? नरेंद्र मोदी की आज वे चाहे जितनी तौहीन कर लें, उन्हें यह नहीं भूलना चाहिए कि उस वक्त रेलमंत्री वही थे और गोधरा कांड रेल में ही हुआ था। उसके पूर्व गाइसल ट्रेन दुर्घटना में नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए रेल मंत्री पद से त्यागपत्र देने वाले (हालांकि त्यागपत्रित सरकार से) नीतीश गोधरा हादसे के निरीक्षण के लिए भी प्रस्तुत नहीं हुए। आश्चर्य है कि यह आदमी भी आज नरेंद्र मोदी को नसीहत दे रहा है और वह भी दंगों को लेकर। नरेंद्र मोदी और नीतीश कुमार दोनों गोधरा मामले में दूध के धुले नहीं हैं। दोनों ने, और फिर दोनों के दादागुरु वाजपेयी ने भी तब राजधर्म का पालन नहीं किया था।

ओबीसी साहित्‍य : जिनकी सत्ता, उनका साहित्‍य 3

ओबीसी साहित्‍य : जिनकी सत्ता, उनका साहित्‍य

हरे राम सिंह ♦ वीरेंद्र कहते हैं‍ कि “ओबीसी साहित्य की परिकल्पना विवादास्पद और जोखिम भरा है।” हिंदी के बौद्धिकों में साहस की इतनी कमी क्यों है? हिंदी का पिछली एक सदी का इतिहास बताता है कि जोखिम नहीं उठाने के कारण ही हिंदी का विमर्श क्षेत्र सिकुड़ता गया है। समय ने “ओबीसी साहित्य” को जन्म दिया है। उसे रोकने का साफ मतलब यह हुआ कि हम हिंदी साहित्य के विकास को किसी न किसी रूप में रोक रहे हैं क्योंकि हमारे भीतर सवर्ण मानसिकता का “अहंकार” बैठा है। ओबीसी साहित्य को वर्ग के आधार पर और विषय वस्तु के आधार पर देखना अलग बात है। वीरेंद्र यादव यह पहले से ही कैसे अनुमान लगा बैठे कि ओबीसी साहित्य की पहचान जाति विशेष की पहचान तक सीमित होगी ?

किसकी “जादूई गोलियों” ने ली बिहार के कसाई की जान? 4

किसकी “जादूई गोलियों” ने ली बिहार के कसाई की जान?

नवल किशोर कुमार ♦ ब्रह्मेश्वर सिंह चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहा था। इसके लिए उसने प्रतिबंधित रणवीर सेना से जुड़े संगठन राष्ट्रवादी किसान संगठन को फिर से जीवित करना शुरू कर दिया था। उनकी नजर वर्ष 2014 में होने वाले लोकसभा चुनाव पर थी। वह बिहार में सत्ताधारी एनडीए के साथ रहकर चुनावी राजनीति करना चाहता था। लेकिन बथानी टोला नरसंहार मामले में पटना हाईकोर्ट के फैसले के विरोध में राज्य सरकार द्वारा सुप्रीम कोर्ट जाने की बात को लेकर एनडीए से नाराज हो गया था। उसके बाद आरा, गया, औरंगाबाद, पटना और भोजपुर के अनेक स्थानों पर राष्ट्रवादी किसान संगठन के बैनर तेल जनसभाओं को संबोधित करने के दौरान उसने सरकार के खिलाफ आवाज उठानी शुरू कर दी थी।

मुखिया ने कहा था, हिंसा का उत्‍तर हिंसा ही हो सकता है 11

मुखिया ने कहा था, हिंसा का उत्‍तर हिंसा ही हो सकता है

ब्रह्मेश्‍वर मुखिया ♦ देखिए जब इंसान पर किसी तरह का आफत या विपत्ति आती है और विशेषकर जब संत प्रवृत्ति वाले इंसान के अंदर प्रतिशोध की भावना जगती है, वह बहुत कठोर होती है। केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री जयराम नरेश का आज बयान आया है कि नक्‍सलवाद को राजनीतिक प्रक्रियाओं के जरिये दूर किया जा सकता है, पूरी तरह बेबुनियाद है और बचपना भरा है। सरकार किसानों को उनकी उपज का लाभकारी मूल्य दे। किसान स्वत: ही मजदूरों को जायज मजदूरी देने लगेंगे। हिंसा का उत्तर हिंसा ही हो सकता है। यदि केपीएस गिल ने पंजाब में इस सिद्धांत को अपनाया होता, तो पंजाब में कभी अमन-चैन स्थापित नहीं हो पाता।