Category: Forward Press

वर्णसंकर (शूद्र- अतिशूद्र) जातियों का उद्भव 3

वर्णसंकर (शूद्र- अतिशूद्र) जातियों का उद्भव

प्रमोद रंजन ♦ रूस की एक जिला स्तरीय अदालत में गीता को अतिवादी साहित्य घोषित कर प्रतिबंधित करने की मांग की गयी थी। 19 और 20 दिसंबर को भारतीय संसद में इस पर हंगामा हुआ। इस दौरान हुई बहस में सामाजिक न्याय का हवाला देने वाले राजनीतिक दलों में गीता की महत्त्ता का बखान करने की होड़ लगी रही।

ब्राह्मणों की हत्‍या के लिए यदुवंशी ने क्षत्रिय को उकसाया था! 50

ब्राह्मणों की हत्‍या के लिए यदुवंशी ने क्षत्रिय को उकसाया था!

पंकज झा ♦ जहां तक जाति आदि का सवाल है तो यह जानना दिलचस्प होगा कि कौरव पक्ष की तरफ ही तो द्रोणाचार्य और कृपाचार्य आदि के रूप में कई ब्राह्मण खड़े थे, जिन्हें मारने के लिए ‘क्षत्रिय’ अर्जुन को ‘यदुवंशी’ कृष्ण प्रेरित कर रहे थे। यह भी साथ ही पढ़ लीजिए कि रामायण में भी ‘ब्राह्मण’ रावण का ही संहार ‘क्षत्रिय’ राम ने किया था।

अब गीता ही ब्राह्मणवादियों की नयी मनुस्‍मृति है! 13

अब गीता ही ब्राह्मणवादियों की नयी मनुस्‍मृति है!

प्रमोद रंजन ♦ हिंदुत्ववादी ताकतों के ‘श्रीराम’ को 1990 के दशक में भले ही हिंदू अन्य पिछड़ा वर्ग का समर्थन हासिल हो गया था लेकिन बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद इस समर्थन का ग्राफ गिरता गया। यह वाम विचारधारा वाले इतिहासकारों व अन्य बुद्धिजीवियों द्वारा चलाये गये अभियान का प्रतिफल था, लेकिन उससे कहीं ज्यादा व्यापक पैमाने पर यह काम मंडल की राजनीति ने किया।

साहित्‍य में श्रेणी को नौकरियों में आरक्षण की तरह मत देखिए 10

साहित्‍य में श्रेणी को नौकरियों में आरक्षण की तरह मत देखिए

प्रेमकुमार मणि ♦ सवाल जाति का नहीं, विचारधारा का है। इसे नौकरियों में आरक्षण की तरह मत देखिए। साहित्य पर विचार करने के पूर्व स्वयं को उसके अनुकूल बनाइए। हां, यह स्वीकार करने में मुझे कोई परेशानी नहीं है कि आज जो ओबीसी साहित्य की बात उठ रही है, उसके पीछे दलित साहित्य की संकीर्णतावादी सोच है।

मुख्यधारा बने साहित्य की बहुजन अवधारणा 6

मुख्यधारा बने साहित्य की बहुजन अवधारणा

कंवल भारती ♦ जिस तरह दलित साहित्य की एक पहचान है — उसके मूल में जोतिबा फुले, डा. आंबेडकर, बुद्ध और कबीर–रैदास का दर्शन है, वर्ण व्यवस्था और अस्पृश्यता का खंडन उसकी मुख्य वैचारिकी है, उस प्रकार ओबीसी साहित्य का दर्शन क्या होगा? दलित साहित्य ने दलित वर्गों के नायकों को अपनाया है, जिनमें पिछड़ी जातियों के नायक भी शामिल हैं। क्या ओबीसी साहित्य ऐसा करेगा? क्या वह आंबेडकर से दूरी बनाएगा और फुले-बुद्ध को अपनाएगा?

“हमने इतिहास की धूल झाड़ने की कोशिश की है…” 5

“हमने इतिहास की धूल झाड़ने की कोशिश की है…”

फारवर्ड प्रेस ♦ भारत में एक साथ कई संस्‍क़तियां और परंपराएं रही हैं। कबीर, जोतिबा फूले, पेरियार, अम्‍बेडकर, धर्मानन्‍द कोशांबी जैसे लोगों के लेखन ने विजेता शक्तियों के मिथकों, परंपराओं का पुनर्पाठ कर वंचित तबकों के नायकों की तलाश की। एकलव्‍य, शंबूक, बलिराजा आदि अनेक गुमनाम पराजित नायकों की प्राण प्रतिष्ठिा इसी का परिणाम है।

हिंदुओं के त्‍योहार बहुजन नायकों की हत्‍याओं के जश्‍न हैं 32

हिंदुओं के त्‍योहार बहुजन नायकों की हत्‍याओं के जश्‍न हैं

एआईबीएसएफ ♦ ‘लार्ड मैकाले और महिषासुर : एक पुनर्पाठ’ नाम से आयोजित इस कार्यक्रम को संबांधित करते हुए प्रसिद्ध दलित चिंतक कंवल भारती ने कहा कि पराजितों का भी अपना इतिहास होता है, उसकी नये तरीके से व्‍याख्‍या की जरूररत है। महिषासुर न्‍यायप्रिय और प्रतापी राजा थे, जिनका वध आर्यों ने छल से करवाया था।