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Articles in the आमुख Category

आमुख, मीडिया मंडी »

[3 Sep 2010 | 23 Comments | ]
नीता शर्मा के अपराध पर बिछी एक पुरस्‍कार की चादर
बिजली-पानी मांगा तो वीसी ने कहा – मादरचोद!

[3 Sep 2010 | Read Comments | ]

वर्धा संवाददाता ♦ कुलपति वीएन राय के आदेश पर गुरुवार की शाम वर्धा विवि के छात्रों पर जमकर लाठीचार्ज किया गया। छात्र बिजली-पानी की मुश्‍कि‍लों से गुस्‍से में थे और नारेबाजी कर रहे थे।

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अभिषक श्रीवास्‍तव ♦ सिर्फ एचटी ने ही नहीं, गिलानी के रिहा होने पर कई पत्रकारों ने उनसे माफी मांगी, खेद जताया। सिर्फ नीता शर्मा उन्‍हें भूल गयीं और कामयाबी की सीढ़‍ियां चढ़ते हुए एनडीटीवी पहुंच गयीं।

आमुख, विश्‍वविद्यालय »

[3 Sep 2010 | 12 Comments | ]
बिजली-पानी मांगा, तो वीसी ने कहा – मादरचोद!

वर्धा संवाददाता ♦ महात्‍मा गांधी अंतरराष्‍ट्रीय हिंदी विश्‍वविद्यालय, वर्धा में कुलपति के आदेश पर गुरुवार की शाम गोरखपांडे छात्रावास के छात्रों पर लाठीचार्ज किया गया। लाठीचार्ज में कई छात्र घायल हो गये हैं। छात्र बिजली-पानी की मुश्‍कि‍लों से गुस्‍से में थे और नारेबाजी कर रहे थे। उनका गुस्‍सा विश्‍वविद्यालय में कई तरह की धां‍धलियों के साथ ही इस बुनियादी मसले पर था और वे कुलपति वीएन राय के पास अपनी बात रखने गये थे। लेकिन सूत्रों के मुताबिक नशे में धुत वीएन राय ने अपने जवानों को उन पर लाठीचार्ज का आदेश दे दिया। वहीं खड़े कवि आलोकधन्‍वा यह सब तमाशा देखते रहे। उन्‍होंने एक बार भी वीएन राय को ऐसा करने से मना नहीं किया।

आमुख, मीडिया मंडी, मोहल्ला रांची, समाचार »

[26 Nov 2009 | No Comment | ]
मधु कोड़ा के लिए मीडिया मैनेज कर रहे हैं अनुरंजन झा

डेस्‍क ♦ टीवी पत्रकार अनुरंजन झा के बारे में ख़बर है कि उन्‍हें झारखंड विधानसभा चुनाव में एक नया काम मिल गया है। वे इन दिनों रांची में हैं। स-दल-बल। मधु कोड़ा समर्थित प्रत्‍याशियों के मीडिया को मैनेज कर रहे हैं। ये ख़बर थोड़ा निराश इसलिए भी करती है कि मीडिया मेनस्‍ट्रीम में अच्‍छी-खासी जगह जमा चुके अनुरंजन को मधु कोड़ा का दामन थामना पड़ा। तब जबकि झारखंड का ख़ज़ाना खाली करने का आरोप मधु कोड़ा पर सार्वजनिक हो चुका है। माना जा रहा है कि अनुरंजन झा के साथ मधु कोड़ा ने अच्‍छी-खासी डील की है। डील के एवज़ में अनुरंजन झारखंड के मीडियाकर्मियों को लुभाएंगे और मधु कोड़ा के पक्ष में ख़बर लिखवाएंगे। टीवी चैनल्‍स को भी वे मधु कोड़ा के लिए मैनेज करेंगे।

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[7 Jun 2009 | 6 Comments | ]
साहित्यिक दुनिया का वर्तमान

इतने सालों हिन्दी में कविता लिखने के बाद अगर मैं अपने आप से सवाल करूं कि हिन्दी साहित्य क्या है? तो शायद आपको आश्चर्य होगा। हिन्दी साहित्य क्या वह है जो हिन्दी भाषा में लिखी जाकर इधर उधर पड़ी रहती है या वह, जो हिन्दी क्षेत्र में फैलती रहती है। अगर हिन्दी क्षेत्र में पढ़ी जाने वाली, फैलने वाली साहित्य भी हिन्दी साहित्य के निर्धारण का एक मानक है तो उसके विमर्श में उसके प्रसार को नियंत्रित करने वाली शक्तियां यथा, अखबार, प्रकाशक, आलोचक, पुरस्कारदाता, पाठक, ओपिनियन मेकर्स इत्यादि आएँगे ही। और अगर ये आएँगे तो साहित्यिक दुनिया के निर्माण में इनकी भूमिका होगी ही । अगर आक्टोवियो पॉज़ के शब्दों में अपने ‘साहित्यिक वर्तमान’ की खोज की कोशिश करुँ तो उसमें इनकी पदचाप, इनकी हिंसा, इनसे मिली प्रतिष्ठा, इनसे मिला अपमान, सब दिखाई पड़ेगा…
बद्रीनारायण का आलेख

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[6 Jun 2009 | 4 Comments | ]
हमारे देवी-देवताओं के जननेंद्रिय नहीं होते

जिस प्रेम से हमारी उत्पत्ति है, उसी के प्रति इतने निषेध भाव कभी-कभी मन में बड़ी वितृष्णा जगाते हैं। आखिर क्यों हम प्रेम और सेक्स पर बातें करने से हिचकते या डरते हैं? ऐसे में सच्छिदानंदन जी की बातें सच्ची लगती हैं कि हमारे देवी-देवताओं के जननेंद्रिय नहीं होते, और अब उन्हीं के अनुकरण में हमारे भी नही होते। आखिर हम उन्हीं की संतान हैं न। भले वेदों में उनके शारीरिक सौष्ठव का जी खोल कर वर्णन किया गया है और वर्णन के बाद देवियों को माता की संज्ञा दे दी जाती है, मानो माता कह देने से फिर से उनका शरीर, उनके शरीर के आकार-प्रकार छुप जाएंगे। वे सिर्फ एक भाव बनाकर रह जाएंगी।

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[6 Jun 2009 | One Comment | ]
अपनी पहचान तलाशती हिमाचली टोपी

♦ आदर्श राठौर

किसी जगह के नाम पर प्रचलित टोपियों का ज़िक्र कहीं भी होता है तो उसमें कश्मीरी टोपी और अफगानी टोपी के बाद हिमाचल प्रदेश का नाम आता है। हिमाचली टोपी के नाम से मशहूर ये टोपी हिमाचल की संस्कृति का अभिन्न हिस्सा है। हिमाचली टोपी मान-सम्मान के आदान-प्रदान का एक ज़रिया है। हालांकि आज के हिमाचली युवा इस टोपी को उतारकर स्टाइलिश और डिज़ाइनर कैप्स का रुख करने लगे हैं…

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[5 Jun 2009 | No Comment | ]
लोकतंत्र सरकार की विचारधारा नहीं होती

♦ अनिल चमड़िया
ताक़तवर देश ही तय करता है कि ग़रीब मुल्क का राष्ट्रवाद क्या है? यह तो अक्सर देखा जाने लगा कि अमेरिका जब चाहता है, पाकिस्तान और अफगानिस्तान के राष्ट्राध्यक्षों को बुला कर बताता है कि उन्हें अपने अपने राष्ट्र में क्या नहीं करना चाहिए और किस काम को किस तरह से करना है। यही नहीं, उनके राष्ट्र में उनके कौन कौन से दुश्मन हैं, उन्हें कैसे ख़त्‍म करना है। लोकतंत्र का मतलब ये भी होता है कि ग़रीब और कमज़ोर समझे जाने वाले मुल्क ताक़तवर देशों को हर वक्त अपने काम काज की रिपोर्ट दें। ऐसे में लोकतंत्र का मतदाता और उसका राष्ट्रवाद क्या कर सकता है?

आमुख, मोहल्ला मेरठ »

[5 Jun 2009 | 11 Comments | ]
“राममंदिर” सरीखा है मेरठ का “कमेला” मुद्दा

समस्या 90 के दशक से शुरू होती है। मेरठ से खाड़ी के देशों को मीट एक्सपोर्ट होने लगा। कमेले में बेहिसाब जानवरों को हलाल किया जाने लगा। देखते ही देखते कुरैशी बिरादरी के जो लोग ठेलियों पर फल आदि बेचकर गुजारा करते थे, लखपति, करोड़पति और अरबपति हो गए। पैसा आया तो राजनीति का चस्का भी लगा। 1993 के विधानसभा चुनाव में मीट कारोबारी हाजी अखलाक कुरैशी ने सपा के टिकट पर भाजपा के उम्मीदवार को शिकस्त दे दी। इसके बाद कुरैशी बिरादरी ने पीछे मुड़ कर नहीं देखा। मेयर, सांसद और विधायक इसी बिरादरी के चुने गये। भाजपा को यह नागवार गुजरा कि मेरठ की राजनीति पर एक वर्ग का एकाधिकार हो गया था। लिहाजा भाजपा ने कमेला मुद्दे को अपनी साम्प्रदायिक राजनीति से जोड़ लिया।

आमुख, ख़बर भी नज़र भी, बात मुलाक़ात, मोहल्ला मुंबई »

[4 Jun 2009 | 5 Comments | ]
थिएटर वाले सिनेमा का मुक़ाबला नहीं कर सकते

पीयूष मिश्रा से एक मुलाक़ात

पृथ्वी थियेटर पर अनुराग निर्मित पहला नाटक ‘स्केलेटन वुमन’ था और पीयूष वहीं बाहर दिख गए। मैंने थोड़ा जोश में आकर पूछ लिया कि आपका इंटरव्यू कर सकता हूं एक हिंदी ब्लॉग के लिए – साहित्य, राजनीति और संगीत पर बातें होंगी। उन्होंने ज़्यादा सोचे बिना कहा – परसों आ जाओ, यहीं, मानव (कौल) का प्ले है, उससे पहले मिल लो। बातचीत बहुत लंबी नहीं हुई पर पीयूष जितना तेज़ बोलते हैं, उस हिसाब से बहुत छोटी भी नहीं रही। बातचीत का अंतिम चरण आते आते उन्होंने खुद को बह जाने दिया और थियेटर-वाले पाले से भी बात की, जबकि बाकी के ज़्यादातर सवालों में वो यही यकीन दिलाते दिखे कि अब पाला बदल चुका है।

आमुख, पुस्‍तक मेला »

[3 Jun 2009 | 2 Comments | ]
नायपॉल के नापाक ख़यालात

नायपॉल ने तीसरी दुनिया के बारे में आम तौर पर और इस्‍लाम के बारे में ख़ास तौर पर झूठे बयान दिये हैं। नोबेल प्राइज़ वीनर डेरिक वालकोट के मुताबिक़ नायपॉल की हैसियत ऐसे द‍लाल की है, जिसने तीसरी दुनिया के हवाले से पश्चिम के निगेटिव ख़यालात को आम करने का ठेका ले रखा है।