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Articles in the आमुख Category

आमुख, नज़रिया, मीडिया मंडी »

[14 Mar 2010 | 2 Comments | ]
मीडिया मैनेजमेंट: मेरा फन फिर मुझे बाजार में ले आया है

आईबीएन में छंटनी

[12 March 2010 | Read Comments | ]

IBN Lokmat front

डेस्‍क ♦ कुछ ही महीने पहले आवाज के ढाई सौ कर्मियों को सड़क का रास्‍ता दिखाने के बाद टीवी 18 ग्रुप ने अब लोकमत के 70 कर्मियों को निकाल दिया है।

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अखबार पर आरोप

[14 March 2010 | Read Comments | ]

sushma swaraj front

सुषमा स्‍वराज ♦ विदिशा सीट पर चुनाव अभियान के दौरान एक मीडिया संगठन ने मेरे पक्ष में खबरें छपवाने के लिए एक करोड़ रुपये का पैकेज मांगा था।

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ओम थानवी ♦ लेकिन ‘पेड न्यूज’ अकेली बीमारी नहीं है। नयी और ज्यादा मुखर जरूर है। कुछ चीजें और हैं। जैसे राजनीतिक दलों और व्यापारिक प्रतिष्ठानों के हाथों मीडिया के इस्तेमाल होने का कुचक्र।

आमुख, मीडिया मंडी »

[14 Mar 2010 | No Comment | ]
अखबार ने खबर के एवज में मांगे थे एक करोड़ : सुषमा

डेस्‍क ♦ गोष्ठी में सभी राजनीतिक वक्ताओं ने पैसे लेकर खबर छापने को एक गंभीर अपराध करार देते हुए मांग की कि इस पर रोक लगनी चाहिए। भाजपा-कांग्रेस दोनों ही पार्टियों के नेता सुषमा तथा मनीष तिवारी ने पिछले लोकसभा चुनावों में ऎसी पेशकश करने वाले मीडिया समूहों के नाम खोलने से बचते हुए कहा कि वे इसकी जानकारी सिर्फ निर्वाचन आयोग को ही दे सकते हैं। सुषमा स्वराज ने कहा कि विदिशा सीट पर चुनाव अभियान के दौरान कुछ मीडिया घरानों ने पैसे लेकर उनकी खबरें छापने की पेशकश की थी। उनके चुनाव अभियान के समय एक मीडिया संगठन ने मेरे पक्ष में खबरें छपवाने के लिए एक करोड़ रूपये का पैकेज मांगा था।

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[12 Mar 2010 | 4 Comments | ]
आईबीएन लोकमत से 70 मीडियाकर्मी निकाले गये

डेस्‍क ♦ अभी कुछ ही महीने पहले सीएनबीसी आवाज के ढाई सौ मीडियाकर्मियों को सड़क का रास्‍ता दिखा कर हड़कंप मचाने वाले टीवी 18 ग्रुप से एक और भयावह खबर आयी है। खबर ये है कि नागपुर में आईबीएन लोकमत के 70 मीडियाकर्मियों की सेवा समाप्‍त कर दी गयी है। टीवी 18 ग्रुप के इस मराठी चैनल में एक साथ इतने लोगों को बाहर निकाले जाने के एलान के बाद से कर्मचारियों में मायूसी छायी हुई है। इस चैनल के संपादक एक समय महानगर अखबार में बाल ठाकरे का बाजा बजाने वाले निखिल वागले हैं – लेकिन अपने ही कर्मियों के साथ इस वक्‍त वो खड़े नहीं हो पा रहे हैं।

आमुख, मीडिया मंडी, मोहल्ला रांची, समाचार »

[26 Nov 2009 | No Comment | ]
मधु कोड़ा के लिए मीडिया मैनेज कर रहे हैं अनुरंजन झा

डेस्‍क ♦ टीवी पत्रकार अनुरंजन झा के बारे में ख़बर है कि उन्‍हें झारखंड विधानसभा चुनाव में एक नया काम मिल गया है। वे इन दिनों रांची में हैं। स-दल-बल। मधु कोड़ा समर्थित प्रत्‍याशियों के मीडिया को मैनेज कर रहे हैं। ये ख़बर थोड़ा निराश इसलिए भी करती है कि मीडिया मेनस्‍ट्रीम में अच्‍छी-खासी जगह जमा चुके अनुरंजन को मधु कोड़ा का दामन थामना पड़ा। तब जबकि झारखंड का ख़ज़ाना खाली करने का आरोप मधु कोड़ा पर सार्वजनिक हो चुका है। माना जा रहा है कि अनुरंजन झा के साथ मधु कोड़ा ने अच्‍छी-खासी डील की है। डील के एवज़ में अनुरंजन झारखंड के मीडियाकर्मियों को लुभाएंगे और मधु कोड़ा के पक्ष में ख़बर लिखवाएंगे। टीवी चैनल्‍स को भी वे मधु कोड़ा के लिए मैनेज करेंगे।

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[7 Jun 2009 | 6 Comments | ]
साहित्यिक दुनिया का वर्तमान

इतने सालों हिन्दी में कविता लिखने के बाद अगर मैं अपने आप से सवाल करूं कि हिन्दी साहित्य क्या है? तो शायद आपको आश्चर्य होगा। हिन्दी साहित्य क्या वह है जो हिन्दी भाषा में लिखी जाकर इधर उधर पड़ी रहती है या वह, जो हिन्दी क्षेत्र में फैलती रहती है। अगर हिन्दी क्षेत्र में पढ़ी जाने वाली, फैलने वाली साहित्य भी हिन्दी साहित्य के निर्धारण का एक मानक है तो उसके विमर्श में उसके प्रसार को नियंत्रित करने वाली शक्तियां यथा, अखबार, प्रकाशक, आलोचक, पुरस्कारदाता, पाठक, ओपिनियन मेकर्स इत्यादि आएँगे ही। और अगर ये आएँगे तो साहित्यिक दुनिया के निर्माण में इनकी भूमिका होगी ही । अगर आक्टोवियो पॉज़ के शब्दों में अपने ‘साहित्यिक वर्तमान’ की खोज की कोशिश करुँ तो उसमें इनकी पदचाप, इनकी हिंसा, इनसे मिली प्रतिष्ठा, इनसे मिला अपमान, सब दिखाई पड़ेगा…
बद्रीनारायण का आलेख

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[6 Jun 2009 | 3 Comments | ]
हमारे देवी-देवताओं के जननेंद्रिय नहीं होते

जिस प्रेम से हमारी उत्पत्ति है, उसी के प्रति इतने निषेध भाव कभी-कभी मन में बड़ी वितृष्णा जगाते हैं। आखिर क्यों हम प्रेम और सेक्स पर बातें करने से हिचकते या डरते हैं? ऐसे में सच्छिदानंदन जी की बातें सच्ची लगती हैं कि हमारे देवी-देवताओं के जननेंद्रिय नहीं होते, और अब उन्हीं के अनुकरण में हमारे भी नही होते। आखिर हम उन्हीं की संतान हैं न। भले वेदों में उनके शारीरिक सौष्ठव का जी खोल कर वर्णन किया गया है और वर्णन के बाद देवियों को माता की संज्ञा दे दी जाती है, मानो माता कह देने से फिर से उनका शरीर, उनके शरीर के आकार-प्रकार छुप जाएंगे। वे सिर्फ एक भाव बनाकर रह जाएंगी।

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[6 Jun 2009 | One Comment | ]
अपनी पहचान तलाशती हिमाचली टोपी

♦ आदर्श राठौर

किसी जगह के नाम पर प्रचलित टोपियों का ज़िक्र कहीं भी होता है तो उसमें कश्मीरी टोपी और अफगानी टोपी के बाद हिमाचल प्रदेश का नाम आता है। हिमाचली टोपी के नाम से मशहूर ये टोपी हिमाचल की संस्कृति का अभिन्न हिस्सा है। हिमाचली टोपी मान-सम्मान के आदान-प्रदान का एक ज़रिया है। हालांकि आज के हिमाचली युवा इस टोपी को उतारकर स्टाइलिश और डिज़ाइनर कैप्स का रुख करने लगे हैं…

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[5 Jun 2009 | No Comment | ]
लोकतंत्र सरकार की विचारधारा नहीं होती

♦ अनिल चमड़िया
ताक़तवर देश ही तय करता है कि ग़रीब मुल्क का राष्ट्रवाद क्या है? यह तो अक्सर देखा जाने लगा कि अमेरिका जब चाहता है, पाकिस्तान और अफगानिस्तान के राष्ट्राध्यक्षों को बुला कर बताता है कि उन्हें अपने अपने राष्ट्र में क्या नहीं करना चाहिए और किस काम को किस तरह से करना है। यही नहीं, उनके राष्ट्र में उनके कौन कौन से दुश्मन हैं, उन्हें कैसे ख़त्‍म करना है। लोकतंत्र का मतलब ये भी होता है कि ग़रीब और कमज़ोर समझे जाने वाले मुल्क ताक़तवर देशों को हर वक्त अपने काम काज की रिपोर्ट दें। ऐसे में लोकतंत्र का मतदाता और उसका राष्ट्रवाद क्या कर सकता है?

आमुख, मोहल्ला मेरठ »

[5 Jun 2009 | 8 Comments | ]
“राममंदिर” सरीखा है मेरठ का “कमेला” मुद्दा

समस्या 90 के दशक से शुरू होती है। मेरठ से खाड़ी के देशों को मीट एक्सपोर्ट होने लगा। कमेले में बेहिसाब जानवरों को हलाल किया जाने लगा। देखते ही देखते कुरैशी बिरादरी के जो लोग ठेलियों पर फल आदि बेचकर गुजारा करते थे, लखपति, करोड़पति और अरबपति हो गए। पैसा आया तो राजनीति का चस्का भी लगा। 1993 के विधानसभा चुनाव में मीट कारोबारी हाजी अखलाक कुरैशी ने सपा के टिकट पर भाजपा के उम्मीदवार को शिकस्त दे दी। इसके बाद कुरैशी बिरादरी ने पीछे मुड़ कर नहीं देखा। मेयर, सांसद और विधायक इसी बिरादरी के चुने गये। भाजपा को यह नागवार गुजरा कि मेरठ की राजनीति पर एक वर्ग का एकाधिकार हो गया था। लिहाजा भाजपा ने कमेला मुद्दे को अपनी साम्प्रदायिक राजनीति से जोड़ लिया।

आमुख, ख़बर भी नज़र भी, बात मुलाक़ात, मोहल्ला मुंबई »

[4 Jun 2009 | 5 Comments | ]
थिएटर वाले सिनेमा का मुक़ाबला नहीं कर सकते

पीयूष मिश्रा से एक मुलाक़ात

पृथ्वी थियेटर पर अनुराग निर्मित पहला नाटक ‘स्केलेटन वुमन’ था और पीयूष वहीं बाहर दिख गए। मैंने थोड़ा जोश में आकर पूछ लिया कि आपका इंटरव्यू कर सकता हूं एक हिंदी ब्लॉग के लिए – साहित्य, राजनीति और संगीत पर बातें होंगी। उन्होंने ज़्यादा सोचे बिना कहा – परसों आ जाओ, यहीं, मानव (कौल) का प्ले है, उससे पहले मिल लो। बातचीत बहुत लंबी नहीं हुई पर पीयूष जितना तेज़ बोलते हैं, उस हिसाब से बहुत छोटी भी नहीं रही। बातचीत का अंतिम चरण आते आते उन्होंने खुद को बह जाने दिया और थियेटर-वाले पाले से भी बात की, जबकि बाकी के ज़्यादातर सवालों में वो यही यकीन दिलाते दिखे कि अब पाला बदल चुका है।