Category: आमुख

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मेरी खुद्दारियां थकने लगी हैं #MerajFaizabadi

वसीम अकरम त्यागी ♦ उनकी कलम से निकले ये वो अल्फाज थे, जो अखबारों की सुर्खियां नहीं बन पाते, जिनको कहने की हिम्मत कोई मैराज फैजाबादी जैसा कलंदर ही कर सकता है। आज के दौर में जब इनाम पाने के लिए कवियों और साहित्यकारों की लंबी-लंबी कतार इस तरह लगी रहती है, जैसे अल्‍पसंख्यकों के कत्ल और…

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मोदी और हसन रूहानी में किसे चुनेगी “टाइम”

प्रकाश के रे ♦ 2012 के ‘टाइम 100’ के मतदान में नरेंद्र मोदी की लगातार बढ़त को लांघते हुए एनॉनमस ने भारी अंतर से पहला स्थान ले लिया था। यह करामात बस चंद घंटों में कर दिखाया गया था। 2012 के ‘वर्ष का व्यक्ति’ के मतदान में हैकरों ने मजा लेते हुए उत्तर कोरियाई तानाशाह किम जोंग उन को पहले स्थान पर ला दिया और साथ ही अगले 13 स्थान भी अपने हिसाब से निर्धारित कर दिये। कुछ रिपोर्टों में इस साल के अभी चल रहे मतदान में मिली साइरस की बढ़त के पीछे भी इनका हाथ माना जा रहा है लेकिन हमें यह भी याद रखना चाहिए कि साइरस पूरे साल भर चर्चा में रही हैं, जिसका लाभ उन्हें मिल सकता है।

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पहले लड़की से, अब साहस से बलात्‍कार कर रहे हैं

अरुधंती रॉय ♦ तरुण तेजपाल उस इंडिया इंक प्रकाशन घराने के पार्टनरों में से एक थे, जिसने शुरू में मेरे उपन्यास “गॉड ऑफ स्मॉल थिंग्स” को छापा था। मुझसे पत्रकारों ने हालिया घटनाओं पर मेरी प्रतिक्रिया जाननी चाही है। मैं मीडिया के शोर-शराबे से भरे सर्कस के कारण कुछ कहने से हिचकती रही हूं। एक ऐसे इंसान पर हमला करना गैरमुनासिब लगा, जो ढलान पर है, खास कर जब यह साफ साफ लग रहा था कि वह आसानी से नहीं छूटेगा और उसने जो किया है, उसकी सजा उसकी राह में खड़ी है। लेकिन अब मुझे इसका उतना भरोसा नहीं है। अब वकील मैदान में आ खड़े हुए हैं और बड़े राजनीतिक पहिये घूमने लगे हैं। अब मेरा चुप रहना बेकार ही होगा, और इसके बेतुके मतलब निकाले जाएंगे।

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यथार्थ के फेरों का “मंगलाष्टक Once More”

सारंग उपाध्‍याय ♦ मराठी फिल्‍में जीवन में घटते यथार्थ का जेरॉक्‍स होती हैं और पात्रों की संवेदना के साथ लंबे समय तक दर्शकों के मन पर छपी रहती हैं। वैसे जहां तक इस फिल्‍म की बात है, इसके दोनों ही मुख्‍य पात्र स्‍वप्‍निल जोशी और मुक्‍ता बर्वे, यह जोड़ी मराठी चैनल जी 24 ताश पर लंबे चले धारावाहिक “एक लग्‍ना ची दूसरी गोष्‍ठ” में दिखाई देती रही है। इस जोड़ी ने धारावाहिक के जरिये दांपत्‍य जीवन के खट्टे-मीठे पलों और सामाजिक जीवन के समानांतर चलने वाले यथार्थ को छोटे पर्दे पर बखूबी जीवंत किया है और इसे दर्शकों ने खूब सराहा है। फिलहाल यह जोड़ी इस फिल्‍म के साथ कुल तीसरी बार पर्दे पर है। जाहिर है जिन लोगों ने 2010 में निर्देशक सतीश राजवाडे की चर्चित मराठी फिल्‍म “पुणे मुंबई पुणे” देखी होगी, वे तो स्‍वनिल जोशी और मुक्‍ता बर्वे की इस रोमांटिक जोड़ी को दोबारा फिल्‍म “मंगलाष्‍टक वन्‍स मोर” में देखने जरूर पहुंचे होंगे।

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शहीद होने वाली मोहब्‍बत के फिल्‍मकार हैं भंसाली

जुगनू शारदेय ♦ वह प्रेम के अनेक रूपों को उजागर करना चाहते हैं। साथ साथ इस मान्यता में भी विश्वास रखते हैं कि सच्चे प्रेमी बिछड़ने के लिए ही मिलते हैं। लैला–मजनूं, शीरीं–फरहाद, सोहनी–महिवाल से ले कर रोमियो जुलिएट की भी यही परंपरा रही है। “खामोशी” में सुनने–बोलने में अक्षम पिता और उसकी पुत्री के संबंधों की कथा थी। भंसाली की दूसरी फिल्म “हम दिल दे चुके सनम” भी उसी परंपरा की फिल्म थी कि प्रेमी आपस में नहीं मिलते। लेकिन हिंदी फिल्मों की परंपरा बनी कि प्रेमी को आपस में मिलाने में ही व्यापारिक सफलता मिलती है। बहुत सारे फिल्मकारों ने कोशिश की, कुछ सफल भी हुए लेकिन अधिकांश विफल ही हुए। दूसरी तरफ हमारे यहां कि कुछ महागाथाओं में भी पति–पत्नी मिल कर भी नहीं मिलते। सीता को राम से बिछड़ना पड़ा। राधा भी कहां साथ रही कृष्ण के। कुछ लोगों की मान्यता है कि यह सूफियाना सोच है। लेकिन सीता राम का दर्शन सूफी से बहुत पहले का है।

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सत्‍या टू का न सिर है, न पैर! कोई क्‍यों देखे?

उत्‍पल पाठक ♦ सत्‍या टू में एक व्यापारी की हत्या के बाद एक निजी चैनल के मालिक की हत्या उपकरणों में विस्फोटक के माध्यम से की गयी है। जाहिर है उसे चैनल के किसी कर्मचारी ने वहां पहुंचाया और लगाया होगा। जहां तक मेरी जानकारी है, किसी भी टीवी चैनल के दफ्तर में सीसीटीवी कैमरे लगभग हर जगह लगे होते हैं। विशेष उपकरण तकनीकी विभाग के पास होते हैं और वहां सबको आने-जाने की अनुमति नहीं होती। जाहिर है चैनल में काम करने वाले किसी व्यक्ति ने नायक कि मदद की। तो क्या किसी चैनल का मालिक चाहे वो निजी जिंदगी में कितना भी अच्छा या बुरा हो, लेकिन उसके द्वारा कब ऐसी गलती की गयी थी जो उसके चैनल में काम करने वाला व्यक्ति ही उनकी जान लेने के लिए ‘स्लीपर सेल” बन गया?

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“इस व्‍यवस्‍था को एक दिन टूटना ही है”

अरुंधती रॉय ♦ जब पार्टियां बहुत छोटी होती हैं, जैसे कि सीपीआई (एमएल) और सीपीआई, तो आपके पास इंटिग्रिटी होती है। आप अच्छी पॉजिशंस और हाई मॉरल ग्राउंड (उच्च नैतिक आधार) ले सकते हैं। क्योंकि आप इतने छोटे होते हैं कि इससे आपको कोई फर्क नहीं पड़ता। लेकिन अगर आप सीपीएम जैसी बड़ी पार्टी हैं तो स्थिति दूसरी होती है। अगर हम केरल और बंगाल के संदर्भ में सीपीएम की बात करें तो दोनों जगह इसके अलग-अलग इतिहास रहे हैं। बंगाल में सीपीएम बिल्कुल दक्षिणपंथ की तरह हो गयी थी। वे हिंसा करने में, गलियों के नुक्कड़ों को कब्जाने में, सिगरेट वालों के खोमचे को कब्जाने में बिल्कुल दक्षिणपंथ जैसे थे। यह बहुत अच्छा हुआ कि जनता ने उनकी सत्ता को उखाड़ फेंका।

“साहेब चाहते हैं उस लड़की का सब कुछ उन्‍हें पता हो” 1

“साहेब चाहते हैं उस लड़की का सब कुछ उन्‍हें पता हो”

कोबरापोस्‍ट-गुलेल ♦ खोजी वेबसाइट गुलेल और कोबरा पोस्‍ट ने एक साझा स्टिंग में बीजेपी के पीएम उम्‍मीदवार नरेंद्र मोदी का दाहिना हाथ माने जाने वाले अमित शाह का एक कारनामा उजागर किया है। अमित शाह ने 2009 में एक आईपीएस अधिकारी जीएस सिंघल को माधुरी नाम की एक लड़की की जासूसी करने का मौखिक आदेश दिया। सिंघल वही अफसर है, जो इशरत जहां फर्जी इनकाउंटर मामले में जेल से इन दिनों जमानत पर रिहा है। सिंघल ने माधुरी की जासूसी के मामले में कई टेप सीबीआई को सौंपे हैं, जिनमें अमित शाह के साथ उसकी बातचीत भी शामिल है। इसमें अमित शाह किसी “साहेब” की इच्‍छा से माधुरी की जासूसी करने का आदेश सिंघल को दे रहे हैं। अब सीबीआई को इस यह पड़ताल करनी है कि आखिर यह “साहेब” कौन है।

समाज की समझ छीनता है सुपरमैन का सिनेमा 4

समाज की समझ छीनता है सुपरमैन का सिनेमा

डॉ विभावरी ♦ पिछले दिनों भारत द्वारा ‘मंगलयान’ के प्रक्षेपण से जुड़ी खबरें देखते हुए एक रोचक तथ्य जानने को मिला कि किसी भी सैटेलाइट के प्रक्षेपण से पूर्व इसरो के वैज्ञानिक ईश्वर की पूजा जरूर करते हैं। यह बात मेरी समझ से परे है कि दो धुर विरोधी अवधारणाओं पर एक साथ वे सामंजस्य कैसे बिठा पाते हैं? एक तरफ तर्क पर आधारित विज्ञान और दूसरी तरफ तर्कातीत धर्म! शायद यह हमारे देश में ही संभव है। खैर… आज के पूंजीवादी युग में जब बाजार हम पर हावी है और ‘सुपरहीरो’ पर आधारित फिल्मों की रिलीज से पहले उसके विडियो गेम्स, खिलौने जैसी चीजों का प्रॉपर कैंपेन चलाया जाता है ताकि इससे न सिर्फ फिल्म का प्रचार हो बल्कि ये फिल्म की कमाई का एक जरिया भी बन सकें, तो हमारा जनमानस इन बातों को समझते हुए भी बाजार की गिरफ्त में आ जाता है।

मोबाइल चोली में रखबू त सिम लॉक हो जाई 3

मोबाइल चोली में रखबू त सिम लॉक हो जाई

मनोज भावुक ♦ आज स्टेडियम में उमड़ी भीड़ की मनसा को भांप गये रवि बाबू … हर हर महादेव के बाद सुनाया … लहंगा उठा देब रिमोट से … मोबाइल चोली में रखबू त सिम लॉक हो जाई। जनता को क्या चाहिए … मनोरंजन। मनोरंजन हो रहा था। आयोजक खुश … जनता खुश … कलाकार खुश। और क्या चाहिए? मन गया छठ उत्सव … अब पता नहीं छठी मइया को ये गीत कैसे लगे? … मैं भीड़ को चीरते हुए बाहर निकला। कुछ लोग कह रहे थे … खूब जकवलस नू रवि किसनवा … फिर किसी और ने कहा – नास त देहलन। … किसी और ने फुसफुसाया … कुछ नया कइलन ह का? … सरसती पूजा में हिंदी गाना नइखे बाजत – तू चीज बड़ी है मस्त मस्त, चाहे चोली के पीछे क्या है? बोका कहीं का … ई कुल्हि ना होखी त भीड़े ना जूटी … भीड़ ना जुटी त नेते ना अइहें … फेर आयोजन केकरा खातिर? चलें है परवचन देने। … और वह आदमी फिर गुनगुनाने लगा – … मोबाइल चोली में रखबू त सिम लॉक हो जाई।