Category: बात मुलाक़ात

अपने समय पर असर डालने वाले उन तमाम लोगों से हमारी गुफ्तगू यहां होती है, जिनसे और मीडिया समूह भी बात करते रहते हैं।

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भारत एक नवउपनिवेशवादी देश है

नवगठित नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी माओवादी के संयोजक कॉमरेड नेत्रा बिक्रम चंद ‘बिप्लव’ से विष्णु शर्मा की बातचीत पहले पुष्प कमल दहाल (प्रचंड) के नेतृत्व वाली एनेकपा (माओवादी) का विभाजन हुआ और मोहन बैद्य (किरण)...

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चोखे-चोखे बाड़े नयना कोर रे बटोहिया

♦ अनिमेष कुमार वर्मा काल्हु रात के हम इंटरनेट पे आखर पर आ फेसबुक पे लोग के एक से बढ़के एक पोस्ट पढ़त रहनी। केतना चीजु नया जाने के, सुने के मिलल। हमरा याद...

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दुनिया का मैक्डोनाल्डीकरण गलत है

स्टैनफोर्ड के सालाना यात्रा संभाषण सत्र 2001 के विशिष्ट मेहमान के तौर पर बिल ब्राइसन अपने लेखन और यात्राओं के बारे में अपने ढाई हजार प्रशंसकों से बात करने के लिए लंदन पधारे थे।...

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“इस व्‍यवस्‍था को एक दिन टूटना ही है”

अरुंधती रॉय ♦ जब पार्टियां बहुत छोटी होती हैं, जैसे कि सीपीआई (एमएल) और सीपीआई, तो आपके पास इंटिग्रिटी होती है। आप अच्छी पॉजिशंस और हाई मॉरल ग्राउंड (उच्च नैतिक आधार) ले सकते हैं। क्योंकि आप इतने छोटे होते हैं कि इससे आपको कोई फर्क नहीं पड़ता। लेकिन अगर आप सीपीएम जैसी बड़ी पार्टी हैं तो स्थिति दूसरी होती है। अगर हम केरल और बंगाल के संदर्भ में सीपीएम की बात करें तो दोनों जगह इसके अलग-अलग इतिहास रहे हैं। बंगाल में सीपीएम बिल्कुल दक्षिणपंथ की तरह हो गयी थी। वे हिंसा करने में, गलियों के नुक्कड़ों को कब्जाने में, सिगरेट वालों के खोमचे को कब्जाने में बिल्कुल दक्षिणपंथ जैसे थे। यह बहुत अच्छा हुआ कि जनता ने उनकी सत्ता को उखाड़ फेंका।

“मैं अभी तक फिल्म को धंधे के तौर पर नहीं ले पाता…” 3

“मैं अभी तक फिल्म को धंधे के तौर पर नहीं ले पाता…”

शाहरुख खान ♦ किसी ने कहा है कुछ लोग जन्मजात बड़े होते हैं। कुछ लोग जिंदगी में महानता हासिल करते हैं और कुछ लोगों के पास अच्छे पीआर मैनेजर रहते हैं। मैं तो यही कहूंगा कि तीसरे पर मत जाना। धारणाओं पर मत जीओ। सुबह शीशे में खुद को देख कर सच्चाई टटोल लो। कई बार मेरी फिल्में नहीं चलती हैं। अखबारों में कुछ-कुछ लिख दिया जाता है, लेकिन सुबह आईना देखता हूं तो खुद को ठीक ही पाता हूं। लोग मुझसे कहते हैं कि तुम बड़े यंग दिखते हो। दरअसल मैं सोचता ही नहीं हूं। मेरा मन साफ है तो कोई कुछ भी कहे। अभी तो पंद्रह मिनट की प्रसिद्धि सबको मिल जाती है। 22 साल की प्रसिद्धि सभी को नहीं मिलती। कुछ लोग पंद्रह मिनट की प्रसिद्धि को पंद्रह साल खींचना चाहते हैं।

“मैं इंसानों के लिए खुद को प्रतिबद्ध मानता हूं!” 0

“मैं इंसानों के लिए खुद को प्रतिबद्ध मानता हूं!”

सत्‍यजीत रे ♦ मैं एक ऑब्जर्वर की भूमिका में रहा हूं, बहुत ही एकांतवासी। जो लोग मेरी फिल्मों में मेरे साथ काम करते हैं, मेरे नजदीक हैं, परंतु मैं ऐसे किसी समूह का हिस्सा नहीं रहा हूं, जिन्हें मैंने पर्दे पर दिखाया है। फिल्में बनाने से पहले जब मैं एडवरटाइजिंग के क्षेत्र में था, तो उस समय मेरे कुछ मित्र थे जो राजनीतिक तौर पर बहुत सक्रिय थे और सोवियत यूनियन के हिमायती थे, परंतु बाद के वर्षों में मैंने देखा कि वह अब एडवरटाइजिंग फर्मों में बड़े ओहदों पर हैं। वह 1940 के दशक के अपने राजनीतिक रुझान पर बात नहीं करते, और यदि करते भी हैं तो इस सिस्टम में अपने करियर के विकास को सही ठहराते हुए। मैं बतौर एक कलाकार सक्रिय था, जो मेरे लिए काफी है, हालांकि लोग कहते हैं कि मैं प्रतिबद्ध नहीं हूं। प्रतिबद्धता किसके साथ?

इस पागल दुनिया में सच्‍चा सरल आदमी ही पागल लगता है 3

इस पागल दुनिया में सच्‍चा सरल आदमी ही पागल लगता है

किशोर कुमार ♦ दिलीप कुमार के बाद मैं सबसे ज्यादा कमाई कराने वाला हीरो था। उन दिनों मैं इतनी फिल्में कर रहा था कि मुझे एक सेट से दूसरे सेट पर जाने के बीच ही कपड़ने बदलने होते थे। जरा कल्पना कीजिए। एक सेट से दूसरे सेट तक जाते हुए मेरी शर्ट उड़ रही है, मेरी पैंट गिर रही है, मेरा विग बाहर निकल रहा है। बहुत बार मैं अपनी लाइनें मिला देता था और रुमानियत वाले दृश्य में गुस्सा दिखता था या तेज लड़ाई के बीच रुमानियत। यह बहुत बुरा था और मुझे इससे नफरत थी। इसने स्कूल के दिनों के दुस्वप्न जगा दिये। निर्देशक स्कूल टीचर जैसे ही थे। यह करो। वह करो। यह मत करो। वह मत करो। मुझे इससे डर लगता था। इसीलिए मैं अक्सर भाग जाता था।

“इनाम के लिए मैं अपने पात्रों की जबान नहीं काट सकता” 0

“इनाम के लिए मैं अपने पात्रों की जबान नहीं काट सकता”

राही मासूम रजा ♦ बड़े-बूढ़ों ने कई बार कहा कि गालियां न लिखो, जो ‘आधा गांव’ में इतनी गालियां न होतीं तो तुम्हें साहित्य अकादमी का पुरस्कार अवश्य मिल गया होता, परंतु मैं यह सोचता हूं कि क्या मैं उपन्यास इसीलिए लिखता हूं कि मुझे साहित्य अकादमी का पुरस्कार मिले? पुरस्कार मिलने में कोई नुकसान नहीं, फायदा ही है। परंतु मैं साहित्यकार हूं। मेरे पात्र यदि गीता बोलेंगे तो मैं गीता के श्लोक लिखूंगा। और वह गालियां बकेंगे तो मैं अवश्य उनकी गालियां भी लिखूंगा। मैं कोई नाजी साहित्यकार नहीं हूं कि अपने उपन्यास के शहरों पर अपना हुक्म चलाऊं और हर पात्र को एक शब्दकोश थमाकर हुक्म दे दूं कि जो एक शब्द भी अपनी तरफ से बोले तो गोली मार दूंगा। कोई बड़ा-बूढ़ा यह बताये कि जहां मेरे पात्र गाली बकते हैं, वहां मैं गालियां हटाकर क्या लिखूं?

“सिनेमा यथार्थवादी होगा, तो उसमें गालियां भी होंगी” 1

“सिनेमा यथार्थवादी होगा, तो उसमें गालियां भी होंगी”

अनुराग कश्‍यप ♦ क्या आपको लगता है कि मैंने अपनी फिल्मों के लिए गालियों को ईजाद किया? क्या आप, हम या कोई भी आम इंसान अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में गुस्से में या प्यार से गालियों का उपयोग नहीं करता है? तमाम ऐसी गंदी गालियां हैं, जिन्हें हर इंसान अपने दोस्तों के साथ बातचीत के दौरान बोलता है। इसी वजह से हर फिल्म में गाली का इस्तेमाल होता आया है। हमने हर फिल्म में फिल्म की बैकग्राउंड के अनुरूप ही सारे संवाद रखे हैं। सभी गालियां समाज से ही ली गयी हैं। सिनेमा में समाज का कुछ न कुछ हिस्सा रहता है। राह चलते, ट्रेन में, बस में, यहां तक कि ऑफिस के अंदर भी गालियां सुनाई पड़ती हैं। आप सिनेमा को जिंदगी से अलग-थलग नहीं कर सकते। जब यथार्थवादी सिनेमा बनेगा, तो जीवन की बोलचाल के शब्द भी होंगे ही होंगे।

अकादमिक दुनिया ऐसे लोगों से आबाद क्यों नहीं है? 0

अकादमिक दुनिया ऐसे लोगों से आबाद क्यों नहीं है?

दिल्‍ली विश्‍वविद्यालय में संजय चौहान के साथ संवाद पटकथाकार और संवाद लेखक संजय चौहान इन दिनों दिल्‍ली में हैं। एनसीईआरटी के छात्रों के साथ एक वर्कशॉप में स्‍क्रिप्‍ट लेखन की बारीकियां बताने के लिए...