Articles in the बात मुलाक़ात Category
ख़बर भी नज़र भी, बात मुलाक़ात, मोहल्ला मुंबई, सिनेमा »
चंद्र प्रकाश द्विवेदी ♦ हिंदी सिनेमा का मुंबई तक सीमित रहना उसके भविष्य के लिए सही नहीं है। यहां के निर्माता-निर्देशक मुनाफे और व्यवसाय की लीक पर चलते हैं। वे स्टारों पर आश्रित रहते हैं। अगर हिंदी प्रदेशों में सिनेमा विकसित होगा तो मुंबई का एकाधिकार टूटेगा और एकरसता भी खतम होगी। मुझे लगता है, तब भी हमारे समाज की कहानियां फिल्मों में आ पाएंगी। मुंबई के निर्माता-निर्देशकों ने अपने ऊपर यह बोझ ले लिया है कि उन्हें ज्यादा से ज्यादा दर्शकों को संतुष्ट करना है। उसकी वजह से ही स्टार सिस्टम बढ़ा है। अभी भोजपुरी सिनेमा का विकास दिख रहा है लेकिन वह भटकाव का शिकार है। अधिकांश भोजपुरी फिल्में हिंदी फिल्मों की भोंडी नकल हैं।
बात मुलाक़ात, मीडिया मंडी, मोहल्ला दिल्ली »
डेस्क ♦ गांधी शांति प्रतिष्ठान, नयी दिल्ली में 20 जुलाई की शाम नवगठित समूह जर्नलिस्ट फॉर पीपुल के बैनर तले एक सभा हुई, जिसमें देश में अघोषित आपातकाल को कई घटनाओं के जरिये समझने की कोशिश की गयी। साथ ऐसे वक्त में पत्रकारों की भूमिका क्या हो सकती है, इस पर चर्चा की गयी। सामाजिक कार्यकर्ता स्वामी अग्निवेश ने कहा कि आज ही नहीं, हमेशा से देश में आपातकाल जैसी स्थितियां रही हैं। स्वतंत्र पत्रकार हेमचंद्र पांडेय और भाकपा (माओवादी) के प्रवक्ता कॉमरेड आजाद की कथित मुठभेड़ में की गयी हत्या पर सवाल उठाते हुए अग्निवेश ने कहा कि किसी भी कीमत साहस और सच का साथ नहीं छोड़ना है।
ख़बर भी नज़र भी, बात मुलाक़ात, मोहल्ला दिल्ली, मोहल्ला लाइव, सिनेमा »
विनीत कुमार ♦ इस बीच चार घंटे कैसे बीते, पता तक नहीं चला। पार्किंग तक में आधे घंटे से ऊपर हो गया, कई बार एक-दूसरे ने आपस में कहा कि सुबह निकलना भी तो है… लेकिन फिर कुछ छिड़ जाता… फिर, फिर… अच्छा तो अब फाइनली विदा लेते हैं, फिर मिलते हैं, कुछ बड़ा करते हैं, जल्द ही मिलते हैं, संपर्क में रहेंगे। आपके पास मोहल्लालाइव का लिंक तो है न, बहस यहां भी होगी देखिएगा। अरे हां, सच में बहुत दिनों के बाद मजा आएगा, ये शाम याद रहेगी। कुछ-कुछ वैसे ही इमोशनल हुए जैसे माल रोड, निजामुद्दीन, नयी दिल्ली पर सीनियर को सीऑफ करते हुए। सीनियर से मिलना ऐसे ही तो होता है।
ख़बर भी नज़र भी, बात मुलाक़ात, मोहल्ला दिल्ली, मोहल्ला लाइव, सिनेमा »
मिहिर पंड्या ♦ हमें अपनी फिल्म के साथ बिठाकर अनुराग ‘बहसतलब’ की ओर निकल गये थे। सुना वहां हमेशा की तरह काफी दंगा-दंगल हुआ। वैसे मुनासिब भी है, ‘आम आदमी’ की बात करते हुए अक्सर हम खास आदमियों के बीच तलवारें खिंच जाया करती हैं। वहां से निकलकर दोस्त लोग जब साथ आये, तो बातें फिर लोकतंत्र के तकाजे के तहत कई अराजक रास्तों पर चलीं। अजय ब्रह्मात्मज, विनीत कुमार, स्वप्निल दीक्षित, गौरव सोलंकी, रेणु कश्यप, अविनाश, समरेंद्र, मिहिर और अनुराग थे साथ। कुछ छूटी बातें दोस्त ‘बहसतलब’ से साथ बांध लाये थे, कुछ देर वही चलीं। मजेदार था ये अनुभव, हम अनुराग को देख हतप्रभ थे, और अनुराग नामवर सिंह से मिलकर हतप्रभ थे। इससे हम और हतप्रभ थे!
नज़रिया, बात मुलाक़ात, मोहल्ला रांची »
अविनाश ♦ बाबूलाल न तो सरकार बनाएंगे, न किसी को समर्थन देंगे। झारखंड की राजनीति में अपनी हैसियत को लेकर विनम्रता के साथ उन्होंने कहा कि हमारे बिना भी कांग्रेस शिबू के साथ आगे बढ़ सकती है। यानी माइनस बीजेपी और माइनस जेविएम प्रजातांत्रिक भी झारखंड में सरकार बन सकती है और कांग्रेस और शिबू दोनों ही इस पर विचार कर रहे होंगे। बाबूलाल के कहने का ये भी मतलब था कि न तो बीजेपी 25 मई का इंतजार कर रही होगी, न ही गुरुजी हफ्ता काटने के मूड में होंगे। वही हुआ। रविवार की देर रात बीजेपी ने समर्थन वापसी का एलान कर दिया। मतलब बाबूलाल मरांडी को झारखंड की राजनीति में शिबू सोरेन के वैचारिक राजनीतिक आयामों की जितनी समझ है, बीजेपी शिबू सोरेन को उतना नहीं जानती।
बात मुलाक़ात, रिपोर्ताज »
अनुपमा ♦ रांची से पचास किलोमीटर दूर बुंडू में रह रही रेशमा दत्ता का नाम आज भले फाइन आर्ट्स की दुनिया में एक अनचीन्हा नाम है – पर इनकी सधी हुई उंगलियां मिट्टी में जान फूंक देती हैं। शांति निकेतन से फाइन आर्ट्रस में बैचलर की डिग्री, महाराजा सेगीराव से मास्टर की डिग्री व जापान से फेलोशिप करने के बाद रेशमा लौटकर सीधे अपने गांव बुंडू पहुंची थीं। इन उम्दा जगहों पर प्रशिक्षण लेने के बाद रेशमा के सामने कई विकल्प थे। वह कहीं भी जा सकती थीं। घर की आर्थिक हालत भी ऐसी थी कि इन्हें कहीं बाहर रहकर अपना काम करने में आर्थिक परेशानी नहीं आती लेकिन रेशमा ने अपने काम के लिए चुना तो अपने दादा की उस पुरानी लाह फैक्ट्री के खंडहर मकान को, जो एक तरीके से भूत बंगला ही हो चुका था।
ख़बर भी नज़र भी, नज़रिया, बात मुलाक़ात »
डेस्क ♦ 14 अप्रैल की रात एक इंटरव्यू अरुंधति रॉय ने सीएनएन आईबीएन पर सागरिक घोष को दिया। 12 अप्रैल को खबर आयी कि दंतेवाड़ा के जंगलों में दो हफ्ते बिताने और उन बिताये गये दिनों-पलों का पूरा हिसाब आउटलुक पत्रिका में लिखने और माओवादियों के साथ बैठ कर नमक रोटी खाने के चलते उन पर कार्रवाई हो सकती है। 13 अप्रैल की सुबह रायपुर से एक सज्जन ने खबर दी कि कार्रवाई की प्रक्रिया शुरू की जा चुकी है। ऐसे में आमतौर पर लेखक-सर्जक क्या करते हैं। वे सरहद छोड़ देते हैं। देश से भाग जाते हैं। तसलीमा बांग्लादेश से भागीं और हुसैन हिंदुस्तान से। लेकिन अरुंधति कहीं नहीं जाएंगी, ऐसा उन्होंने सागरिका घोष को सीएनएन आइबीएन पर इंटरव्यू के दौरान बताया।
बात मुलाक़ात, शब्द संगत »
अखिलेश ♦ हम दावा करते हैं कि एक पढ़ा-लिखा व्यक्ति ही कलाकार होगा! यह गंभीर समस्या है, समझना चाहिए। विचार करना चाहिए। इस समस्या के कारण हमने अपने देश की कलाओं को दोयम दर्जे का ठहरा रखा है। हमारी गुलाम मानसिकता आज भी उन्हें स्वीकारने को तैयार नहीं है। हम भी उसे वैसे ही देखते-समझते-मानते हैं, जैसा अंगरेजों ने हमारे बारे में लिखा। दरअसल, दो लोक कलाकारों या कला रूपों के फर्क को दो मनुष्यों या समुदायों के बीच के फर्क की तरह ही देखना चाहिए। दोनों मनुष्यों के देखने का अपना ढंग है। उसे एक कैसे मान सकते हैं? दो गोंड कलाकार एक जैसा चित्र क्यों बनाएंगे? यह सब कुछ एक जैसा ही बनने लगा, तब वह इतना उबाऊ होगा कि हम शायद चित्र देखना ही बंद कर दें।
नज़रिया, बात मुलाक़ात, मीडिया मंडी »
डेस्क ♦ धर्म कर्म की दुकान चैनलों पर चकाचक रहती है। कई बाबाओं पर पिछले दिनों गाज गिरी। कोई सेक्स स्कैंडल में घिरा, तो किसी पर सरकारी जमीन पर कब्जे के आरोप लगे। बाबा रामदेव का बयान आया कि साधु समाज के खिलाफ गहरी साजिशों का दौर है ये। ऐसे में स्टार न्यूज के एंकर किशोर अजवानी आज रविशंकर का इंटरव्यू ले रहे हैं। जैसे कि उन्होंने अपने ब्लॉग पर डाली संक्षिप्त सूचना में बताया है, ये इंटरव्यू लाइव होगा। आप सवाल उनके ब्लॉग पर जाकर डाल सकते हैं। ये खयाल रहे कि आपके सवाल को वे क्रेडिट नहीं देंगे।
ख़बर भी नज़र भी, नज़रिया, बात मुलाक़ात »
डेस्क ♦ हुसैन के बहाने राष्ट्रीयता और नागरिकता और अभिव्यक्ति की आजादी की हद और अनहद पर हो रही तमाम बहसों के बीच आइए हम हुसैन का इंटरव्यू पढ़ते हैं। ये इंटरव्यू एनडीटीवी के लिए जुझारू युवा पत्रकार बरखा दत्त ने लिया है। इस इंटरव्यू में हुसैन ने बताया कि चाक्षुष कला की दुनिया के रंग कितने बहुआयामी होते हैं। उन्हें कोई एक राजनीतिक लाइन या सामाजिक संवेदना मिटा नहीं सकती। उससे असहमत जरूर हो सकती है। इसी इंटरव्यू में हुसैन ने बताया है कि टैक्स की मुश्किलों के चलते सृजन की अपार संभावनाओं को किस कदर मौतें नसीब होती हैं और यह भी इसी वजह से दुनिया के कई कलाकारों को कई कई बार अपनी जमीन छोड़नी पड़ी।



