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Articles in the बात मुलाक़ात Category

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[4 Mar 2010 | 17 Comments | ]
“नागरिकता है क्‍या? सिर्फ काग़ज़ का एक टुकड़ा है”

डेस्‍क ♦ हुसैन के बहाने राष्‍ट्रीयता और नागरिकता और अभिव्‍यक्ति की आजादी की हद और अनहद पर हो रही तमाम बहसों के बीच आइए हम हुसैन का इंटरव्‍यू पढ़ते हैं। ये इंटरव्‍यू एनडीटीवी के लिए जुझारू युवा पत्रकार बरखा दत्त ने लिया है। इस इंटरव्‍यू में हुसैन ने बताया कि चाक्षुष कला की दुनिया के रंग कितने बहुआयामी होते हैं। उन्‍हें कोई एक राजनीतिक लाइन या सामाजिक संवेदना मिटा नहीं सकती। उससे असहमत जरूर हो सकती है। इसी इंटरव्‍यू में हुसैन ने बताया है कि टैक्‍स की मुश्किलों के चलते सृजन की अपार संभावनाओं को किस कदर मौतें नसीब होती हैं और यह भी इसी वजह से दुनिया के कई कलाकारों को कई कई बार अपनी जमीन छोड़नी पड़ी।

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[3 Mar 2010 | 3 Comments | ]
देश ने मुझे खारिज कर दिया : एमएफ हुसैन

एमएफ हुसैन ♦ मैं अभी भी भारत से प्रेम करता हूं। लेकिन भारत को मेरी जरूरत नहीं है। मैं यह बात अपने भीतर की गहरी पीड़ा के साथ कह रहा हूं। भारत मेरी मातृभूमि है। मैं अपनी मातृभूमि से घृणा नहीं कर सकता। लेकिन भारत ने मुझे खारिज कर दिया। ऐसे में मुझे भारत में क्यों रहना चाहिए? जब संघ परिवार ने मेरे ऊपर हमला किया तो उस समय सभी चुप्पी साधे रहे। राजनीतिक नेतृत्व, कलाकारों या बुद्धिजीवियों में से किसी ने भी मेरे पक्ष में आवाज नहीं उठायी। लेकिन मैं इस सच्चाई को जानता हूं कि भारत की 90 प्रतिशत जनता मुझे प्यार करती है। वे सभी मेरे साथ हैं। कुछ राजनेताओं सहित केवल 10 प्रतिशत लोग मेरे खिलाफ हैं।

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[21 Feb 2010 | 21 Comments | ]
कारुण्‍यकारा ने ब्राह्मणों को गाली दी : विभूति

विभूति नारायण राय ♦ उस दिन जो जुलूस निकला, उसमें जातिवादी नारे लगाये गये। हमारा जो कर्मचारी संघ का अध्यक्ष है, वो बड़ा उत्तेजित हो कर आया। वो ब्राह्मण है। उसने कहा कि देखिए ये मां-बहन की गालियां दे रहे हैं। तो मैंने कारुण्यकारा से कहा कि भई आप प्रोफेसर हो… ऐसा स्टूडेंट या बाहर के एलिमेंट आकर कर रहे थे तो समझ में आता है… लेकिन आप प्रोफेसर हो और आप भी इसमें शरीक हो गये? ये मैंने एक तरह से उनको वार्न किया कि भविष्य में जहां इस तरह के प्रोवोकेटिव नारे लगाये जाएं, तो वहां किसी प्रोफेसर को नहीं जाना चाहिए।

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[8 Feb 2010 | 30 Comments | ]
अनिल चमड़‍िया को निकाल कर गलती सुधार ली

विभूति नारायण राय ♦ आपको यह तथ्य नहीं मालूम है कि नागपुर में हाईकोर्ट में अनिल चमड़िया के ख़िलाफ़ एक रिट है। एक सज्जन जो कि… आशुतोष मिश्रा नाम के एक सज्जन हैं, जो उसी इंटरव्यू में आये थे, जिनका सलेक्शन नहीं हुआ था। तो आशुतोष मिश्रा ने एक रिट कर रखी है हाईकोर्ट में। उन्होंने कहा है कि भाई साहब 2002 या फिर 2001… अब आप कह रहे हैं कि 2000 तो यूजीसी की 2000 वाली गाइडलाइंस का यूनिवर्सिटी ने उल्लंघन किया है। यह विश्वविद्यालय को अधिकार नहीं था। यह ईसी के बैठक से पहले की बात है। हफ़्ते-दस दिन पहले की बात। जब हमने अपना पक्ष रखा, तो हमने स्वीकार कर लिया था कि हमसे ग़लती हो गयी थी। और हम इस ग़लती को सुधार कर आपके पास आएंगे।

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[31 Dec 2009 | 12 Comments | ]
इंटरव्‍यू के बीच से उठ कर चल दिये एनडी तिवारी

मिलिंद खांडेकर ♦ आंध्र प्रदेश के पूर्व राज्यपाल नारायण दत्त तिवारी बुधवार को स्टार न्यूज पर चल रहे अपने लाइव इंटरव्यू को बीच में ही छोड़कर उठ गये। तिवारी से उन पर लगे सेक्स स्कैंडल के आरोपों को लेकर जब कुछ सवाल पूछे गये तो वो गुस्से में उठ कर चले गये। स्टार न्यूज के नेशनल अफेयर्स एडीटर दीपक चौरसिया के साथ खास बातचीत में 84 वर्षीय तिवारी ने कहा कि वो उम्र के आखिरी पड़ाव में हैं और ऐसे समय में इन आरोपों से उन्हें तकलीफ हुई है। उन्होंने कहा कि उनकी मौत इन आरोपों का जवाब देगी। इंटरव्यू छोड़ने से पहले तिवारी ने कहा कि सेक्स स्कैंडल के आरोप सच्चाई से कोसों दूर हैं।

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[1 Dec 2009 | 2 Comments | ]
देखते-देखते गुज़र गये 25 साल! कैसा भयानक मंज़र था!!

बृजेश सिंह ♦ लोगों को भागते देख मैंने भी वहां से निकलने का मन बनाया। पत्नी और बच्चों को घर में छोड़ मैं शहर में निकल गया। चौराहों पर पुलिस के जवान लोगों से वापस घर में जाने की अपील कर रहे थे। वो लाउडस्पीकर पर चिल्ला रहे थे कि आप लोग डरे नहीं गैस का रिसना बंद हो गया है और अब कोई ख़तरा नहीं है। श्याम बताते हैं कि मैं एक पुलिस गाड़ी में सवार हो गया जो प्रभावित इलाकों का दौरा कर रही थी और लोगों से घर में वापस आने की अपील कर रही थी। जब जीप छोला इलाके में पहुंची, तो उस मंज़र को देखकर सबकी आंखें फटी की फटी रह गयीं। सड़क पर लाशों का अंबार लगा था।

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[17 Nov 2009 | No Comment | ]
डीयू में यश मालवीय से होगा आमना-सामना

राकेश कुमार सिंह ♦ सफ़र की अनियमित शृंखला आमने-सामने में इस दफ़ा गीतकार यश मालवीय अपने कुछ गीत सुनाएंगे और फिर कवयित्री अनामिका के सान्निध्‍य में श्रोता उनसे सीधी बातचीत करेंगे। सफ़र द्वारा पिछले साल आरंभ किया गया यह कार्यक्रम नायाब है। इसलिए कि इसके तहत कोई भी रचनाकार न केवल समय‍ निकाल कर फुर्सत से अपनी पसंदीदा रचनाएं सुनाते हैं और लोगों को उनसे उनकी रचनाओं के साथ-साथ उनके रचना कर्म और जीवन के विभिन्‍न पहलुओं पर भी बातचीत करने का मौक़ा होता है। कोशिश यह है कि इसके जरिये लोग न केवल रचनाओं की मार्फ़त उन्हें जानें बल्कि उनके व्‍यक्तित्‍व और व्‍यवहार को भी जानें।

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[14 Oct 2009 | One Comment | ]
अमिताभ आज भी रेखा से मिलते हैं, लेकिन छुप कर!

सुस्मिता दासगुप्‍ता ♦ एक टीवी प्रोग्राम में मैंने हाल ही में देखा कि रेखा को अपनी सीट की तरफ आता देख अमिताभ वहां से उठ कर चले गये। वह देख कर मुझे लगा कि दोनों के बीच कोई चक्‍कर है। अचानक उठना और चल देना वास्‍तव में मुंह छिपाने की तरह है। रेखा से भागने की तरह है… अगर आपके अंदर कोई चोर नहीं है, तो आप ऐसा क्‍यों करेंगे? मुझे लगता है कि अमिताभ पहले दिन से ही रेखा को लेकर गंभीर नहीं थे। इसके अलावा वे बहुत ही ज़्यादा क्‍लास कंशस भी हैं।

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[13 Oct 2009 | One Comment | ]
अमिताभ के वजूद का मतलब है जया की समाप्ति

सुस्मिता दासगुप्‍ता ♦ जया मेरे लिए गाड़‍ियों का इंतजाम करती थीं कि मैं लोगों से जाकर मिल सकूं। मेरे लिए लजीज़ खाने भिजवाती थीं। मैं उन्‍हें उस बात की याद कैसे दिला सकती थी, जो उनके खिलाफ़ जाती थी। मैंने अमिताभ और रेखा के बारे में पढ़ा था। अमिताभ ने अपने अहं की तुष्टि के लिए रेखा का इस्‍तेमाल किया। वे देखना चाहते थे कि कोई औरत उनके लिए किस हद तक जा सकती है। साथ ही वे यह भी जानना चाहते थे कि औरतों पर उनका क्‍या प्रभाव है। लेकिन रेखा ने सब कुछ खो दिया। वह अमिताभ के लिए खूबसूरत बनी, लेकिन अमिताभ के प्रेम ने रेखा को हमेशा के लिए दासी बना दिया।

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[12 Oct 2009 | One Comment | ]
आपके सामने जो है, वो एक अमिताभ नहीं है

सुस्मिता दासगुप्‍ता ♦ उनकी एक आदत है कि वे एक खोल से निकलकर दूसरे खोल में घुस जाते हैं। व्‍यक्तित्‍व बदल लेते हैं। अमिताभ एक नहीं है। वे अपनी खोल से निकल कर एक साथ कई व्‍यक्ति बन जाते हैं। आप के सामने एक अमिताभ का एक शरीर खड़ा रहता है, लेकिन मानसिक स्‍तर पर कई अमिताभ वहां होते हैं। और किस समय कौन से अमिताभ आप के सामने हैं… आप नहीं जान सकते। मैंने महसूस किया कि पति-पत्‍नी के बीच के तार टूटे हुए हैं। उन दिनों बेटे से भी उनका अधिक जुड़ाव नहीं था। मुझे लगा कि बच्‍चे मां के अधिक करीब हैं…