Category: मोहल्ला लखनऊ

दस मिनट में मैगी, तो सेक्‍स टू मिनट नूडल्‍स की तरह क्‍यों? 3

दस मिनट में मैगी, तो सेक्‍स टू मिनट नूडल्‍स की तरह क्‍यों?

उमेश पंत ♦ इस नाटक की नकारात्मक चर्चाएं लोगों में ज्यादा हो रही हैं… कि नाटक वल्गर है, अश्लील है। लेकिन उस ऑडिटोरियम में मेरे ठीक आगे एक वाकया हुआ। एक बुजुर्ग दंपती नाटक के बीच में आये और मुझसे ठीक आगे खाली पड़ी सीट पर बैठ गये। पत्नी ने पति से कहा, अच्छा किया कि यहां आ गये। लेकिन मंच पर बात हो रही थी कि किस तरह से रुटीन की तरह सेक्स करना रिश्तों को बासी करता है… अगर ऑफिस के काम में, खाना बनाने में… हर जगह हम नये तरीके अपनाते हैं तो सेक्स में क्यूं नहीं। अब तो लोग मैगी बनाने में भी 10 मिनट लेते हैं फिर सेक्स टू मिनट नूडल्स की तरह क्यूं?

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लखनऊ में अब भी बचा है थोड़ा सा लखनऊ

उमेश पंत ♦ कैमरे की नजर से देखें तो यहां सबकुछ खूबसूरत है। उस खूबसूरत नजर को लेकर निकलो तो गांव बड़े अच्छे लगने लगते हैं। शहरों से कहीं ज्यादा सुंदर लगने लगते हैं और सच्चे भी। खबर के लिए भटकते हुए, हाइवे पे चलते हुए अचानक आपकी नजर उस मटर के ढेर पे जाती है जो आपके ठीक बायीं तरफ, बगल के खेत में तोड़े जा रहे हैं। आप बायें मुड़ते हैं और पगडंडी पकड़ लेते हैं, उतरते हैं, कैमरा निकालते हैं और चाची की उम्र की महिला से ऐसे बात करने लगते हैं, जैसे वो रिश्ते में आपकी चाची ही हों, आप फोटो खींचते खींचते अपना परिचय देने लगते हैं, पीछे मुड़ते हैं तो आपको एक लड़का दिखाई देता है, सर पे मटर का बोरा लिये, आप उसकी फोटो खींचते हैं, उसकी फोटो खींचते हुए दूर कहीं फ्रेम में एक बिजूका नजर आता है, आप उस दूरी को तय कर लेते हैं, बिजूका को क्लिक करते हुए पीछे कई औरतें दिखती हैं…

गांव कनेक्‍शन: अखबार नहीं, एक आंदोलन की शुरुआत 0

गांव कनेक्‍शन: अखबार नहीं, एक आंदोलन की शुरुआत

♦ उमेश पंत इन दिनों लखनऊ में हूं। लखनऊ से सीतापुर की तरफ जाने वाली हाईवे से एक पतली सी सड़क कुनौरा नाम के एक छोटे से गांव की तरफ जाती है। इस गांव...

बकरीद के दिन लखनऊ फिल्‍म फेस्टिवल, तारीख पर सवाल 5

बकरीद के दिन लखनऊ फिल्‍म फेस्टिवल, तारीख पर सवाल

लखनऊ जन संस्‍कृति मंच के संयोजक कौशल किशोर जी ने मेल से पांचवें लखनऊ फिल्‍म समारोह के बारे में सूचित किया। पिछले कुछ सालों उत्तर भारत के कुछ शहरों में जन संस्‍कृति मंच ने...

देश की सत्ता को खुफिया विभाग ने टेकओवर कर रखा है 1

देश की सत्ता को खुफिया विभाग ने टेकओवर कर रखा है

अविनाश कुमार चंचल ♦ आज देश को खुफिया विभाग ने टेकओवर कर रखा है। देश के खुफिया विभाग को कोई जनतांत्रिक सरकार नहीं चलाती बल्कि ये सीआईए, मोसाद और इंटरपोल से सीधे संचालित होने लगी हैं और सुरक्षा संबंधी आंतरिक नीतियों को वैसे ही नियंत्रित करने लगी हैं। जिसका नजारा बारबार हम कोडनकुलम, छतीसगढ़, झारखंड से लेकर नर्मदा घाटी में देख सकते हैं। तब यह मांग उठना जायज ही है कि इन खुफिया एजेंसियों को मिलने वाले आर्थिक लाभ की भी जांच होनी चाहिए। भारतीय मीडिया भले पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई को व्यवस्‍था बिगाड़ू चरित्र का बताती हो, सच्चाई ये है कि खुद भारतीय खुफिया एजेंसियां भी उसी चरित्र की हैं।

ये एटीएस वाले मुसलमानों को आखिर समझते क्‍या हैं? 2

ये एटीएस वाले मुसलमानों को आखिर समझते क्‍या हैं?

राजीव यादव ♦ साइमा खातून अपनी तीन साल की बेटी उम्म-ए-ऐमन के साथ जब हमसे मिलने के लिए आयीं, तो बहुत देर तक हमारे बीच खामोशी बनी रही। पर जब बात शुरू हुई, तो एक-एक कर चार महीनों से चल रही गैरकानूनी पुलिसिया पूछताछ की जो दास्तान हमारे सामने आयी, उसने सपा सरकार के पूरे चुनावी घोषणा पत्र को धता बताते हुए यूपी में मुस्लिम समाज की घुटन भरी जिंदगी के दरवाजे खोल दिये। पिछली 19 मई को साइमा अपनी पति की बेगुनाही के सबूत लेकर ‘नये मुख्यमंत्री’ अखिलेश यादव के दरबार में भी जा चुकी हैं। बेगुनाह मुस्लिम नौजवानों को छोड़ने के एजेंडे के साथ सत्ता में आयी ‘सपा के राज’ में 12 मई की सुबह 8 बजे के तकरीबन जब साइमा के पति मो शकील गायब हो गये।

कौन लौटाएगा रिफत और सज्‍जाद के चार साल का विरह? 1

कौन लौटाएगा रिफत और सज्‍जाद के चार साल का विरह?

राजीव यादव ♦ पुलिस के अनुसार सज्जादुर्रहमान ने ही लखनऊ की कचहरी में विस्फोटकों से भरा बैग रखा था। पुलिस ने सज्जादुर्रहमान के खिलाफ देशद्रोह, षड्यंत्र रचने, हत्या का प्रयास करने और विस्फोट अधिनियम के तहत मामला दर्ज किया था। लेकिन पुलिस के सामने दिये गये बयान के अलावा उसके खिलाफ कोई सुबूत नहीं था। इसके चलते आरोपियों के वकील और मानवाधिकार कार्यकर्ता एडवोकेट मो शुएब ने कोर्ट में डिस्‍चार्ज की याचिका दायर की। इस याचिका पर सुनवाई करते हुए अदालत ने 14 अप्रैल को सज्जादुर्रहमान को लखनऊ की कचहरी में हुए विस्फोट के मामले से बरी कर दिया। यहां यह सवाल उठाना लाजिमी है कि जिन आरोपियों में सज्जादुर्रहमान ने चार साल का समय जेल में गुजारे, उसका दोषी कौन है?

बगावत के शायर अदम गोंडवी आखिर चले ही गये! 11

बगावत के शायर अदम गोंडवी आखिर चले ही गये!

डेस्‍क ♦ सुबह पांच बज कर दस मिनट पर जनकवि अदम गोंडवी ने लखनऊ के पीजीआई हॉस्‍पीटल में आखिरी सांसें ले ही लीं। तब, जबकि उनकी सेहत में सुधार की खबरें लगातार आ रही थीं, इस मनहूस खबर ने सबको चौंका दिया है। इस बीच उनकी मदद के लिए आगे आये लोगों का शुक्रिया। कविता कोश पर उनके बारे में चंद वाक्‍य छपे हुए हैं, जो उनके जीवन और उनकी शायरी के बारे में एक संक्षिप्‍त परिचय देते हैं।

अदम गोंडवी को बचाना बगावत की कविता को बचाना है! 3

अदम गोंडवी को बचाना बगावत की कविता को बचाना है!

कौशल किशोर ♦ अदम गोंडवी के जीवन को बचाना बगावत की कविता को बचाना है, जनता की संघर्षशील परंपरा को बचाना है। विद्रोह का यह स्वर हमारी फिजां में गूंजे, इसके लिए जरूरी है कि अदम हमारे बीच रहें, वे दीर्घायु हों। यह हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है कि हम देखें कि अदम के इलाज में कोई कमी न रह जाए।

अदम जनता के कवि हैं, उन्‍हें बचाने के लिए आगे आएं 8

अदम जनता के कवि हैं, उन्‍हें बचाने के लिए आगे आएं

कौशल किशोर ♦ उनकी चेतना जब भी वापस आती है, वे अपने भतीजे दिलीप कुमार सिंह को सख्त हिदायत देते हैं कि मेरे इलाज के लिए अपनी तरफ से किसी से सहयोग मत मांगो। जैसे कहना चाहते हैं कि सारी जिंदगी संघर्ष किया है, अपनी बीमारी से भी लड़ेगे। उसे भी परास्त करेंगे। वे जब भी आंख खोलते हैं, चारों तरफ अपने साथियों को पाते हैं।