Category: मोहल्ला लखनऊ

लखनऊ में कितनी अवधी? फिर भी शामे-अवध लखनऊ? 21

लखनऊ में कितनी अवधी? फिर भी शामे-अवध लखनऊ?

अमरेंद्र नाथ त्रिपाठी ♦ लखनऊ में कितनी है अवधी? उसके बाद भी शामे-अवध लखनऊ? एक खास तरीके का बासी एस्थेटिक्स कल्चर का मुलम्मा चढ़ा-चढ़ा के जीता है लखनऊ में! वैविध्य कहां? गति कहां? दृष्टि कहां? प्रतिरोध कहां? प्रतिकार कहां? लोक कहां? जन कहां? जनभाषा कहां? – क्या यह परंपराएं नहीं होनी चाहिए लखनऊ में?

लखनऊ में सिनेमा पर शानदार शान-ए-अवध 0

लखनऊ में सिनेमा पर शानदार शान-ए-अवध

डेस्‍क ♦ सिनेमा की संस्कृति और नये फिल्मकारों की फिल्मों को ज्यादा से ज्यादा प्रमोट करने के उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए पहला अंतर्राष्ट्रीय शान-ए-अवध फिल्म समारोह 18 नवंबर से 20 नवंबर तक लखनऊ के संगीत नाटक अकादमी में आयोजित किया गया। समारोह के पहले दिन नवाब मीर जाफर अबदुल्ला, नबाव मसूद, मशहूर फिल्म एडिटर असीम सिन्हा, दूरदर्शन के उप महानिदेश शशांत जैसे कई प्रतिष्ठित और चर्चित चेहरे मौजूद थे।

क्‍या दलित नाट्य समारोह रंगमंच को विभाजित करेगा? 13

क्‍या दलित नाट्य समारोह रंगमंच को विभाजित करेगा?

कौशल किशोर ♦ तीन दिनों तक चले इस नाट्य समारोह में दर्शकों की भागीदारी और प्रस्तुति की श्रेष्ठता का दबाव ही था कि लखनऊ के अधिकांश अखबारों द्वारा इस समारोह की उपेक्षा नहीं की जा सकी। भले ही इसकी रिपोर्ट छापने के साथ अपनी ओर से उन्होंने आयोजन पर सवाल करते हुए कुछ टिप्पणियां भी प्रकाशित की। इस मामले में अंग्रेजी दैनिक ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ के लखनऊ संस्करण की भूमिका गौरतलब है। इस अखबार ने नाटकों की कथावस्तु, निर्देशन, अभिनय, संगीत आदि विविध पक्षों पर एक शब्द नहीं लिखा तथा कोई रिपोर्ट या समीक्षा प्रकाशित नहीं की। बेशक अखबार के रिपोर्टर ने इस नाट्य समारोह को ‘स्टेजिंग ए नेम गेम’ शीर्षक से एक बड़ी-सी खबर जरूर प्रकाशित की। इसे खबर कहना उचित नहीं होगा क्योंकि यह मात्र लखनऊ के कुछ कलाकारों का दलित नाट्य समारोह का विरोध था।

बालेश्‍वर नहीं रहे, लोकसंगीत का एक चैप्‍टर खत्‍म हुआ 2

बालेश्‍वर नहीं रहे, लोकसंगीत का एक चैप्‍टर खत्‍म हुआ

डेस्‍क ♦ यूपी-बिहार के लोकरंग में बरसों से बालेश्‍वर यादव की छटा बिखरी रही है। वे अपने किस्‍म की अलग आवाज थे। भोजपुरी माटी के लोगों के दिलों में बालेश्‍वर की जगह एक ऐसी आवाज के रूप में मौजूद रही है, जो भिखारी ठाकुर और महेंदर मिसिर के बाद समाज की नब्‍ज समझता था। इन सबके गीतों में सामाजिक समस्‍याएं बड़ी वेदना से अभिव्‍यक्‍त होती रही हैं। आज जब बालेश्‍वर के निधन के बाद उनके बारे में ज्‍यादा जानने की इच्‍छा हुई, तो इंटरनेट पर कुछ भी नहीं मिला। जन्‍नत टाकीज और भोजपुरिया डॉट कॉम जैसी वेबसाइट्स पर उनके निधन की सूचना, श्रद्धांजलि की औपचारिकताओं के अलावा जिंदगी के उनके सफर का लेखाजोखा कहीं नहीं मिला। तस्‍वीर भी बस एकाध।

एक आदमी की जान जाती है, उनका कुछ नहीं होता 8

एक आदमी की जान जाती है, उनका कुछ नहीं होता

ईशा अग्रवाल ♦ दोस्तो, ये बात केवल इनामुल कि जिंदगी की नहीं बल्कि इनामुल जैसे न जाने कितने ही मजदूरों की जिंदगी की है, जो रोज मौत के घाट उतर रहे हैं। हमारी माननीय मुख्यमंत्री जी के पास इन मजदूरों की जिंदगी और मौत का कोई भी लेखा जोखा नहीं होगा क्योंकि वो तो व्यस्त हैं अरबों-करोड़ो की विकास योजनाओं को जमीन पर उतारने में। जहां सड़कों के निर्माण और सुधार में करोड़ो खर्च हो रहे हैं, वहीं उस निर्माण कार्य में जुटे हुए मजदूरों की सुरक्षा का कोई पुख्ता इंतजाम नहीं हैं। यह बात क्या हमारी मुख्यमंत्री जी के जहन में एक बार भी आ कर नहीं टिकती? और यदि वह यह कहती भी हैं कि इस दिशा में सुरक्षा इंतजाम किये जा रहे है तो वह इंतजाम कहीं दिखते क्यों नहीं?

गिरदा गये, जनता ने अपना कलाकार खो दिया 2

गिरदा गये, जनता ने अपना कलाकार खो दिया

जन संस्‍कृति मंच ♦ सुपरिचित गायक, कलाकार और संस्कृतिकर्मी गिरीश तिवाड़ी गिरदा के निधन पर जन संस्कृति मंच ने गहरा शोक प्रकट किया है और कहा है कि उनके निधन से जनता ने अपना गायक और कलाकार खो दिया है। गिरदा ऐसे संस्कृतिकर्मी हैं, जिनका कला संसार जन आंदोलनों के बीच निर्मित होता है। गिरदा का निधन 22 अगस्त को हुआ। उनके निधन पर जन संस्कृति मंच की लखनऊ ईकाई के संयोजक कौशल किशोर ने शोक प्रकट करते हुए कहा कि 80 के दशक में उत्तराखंड में जो लोकप्रिय आंदोलन चला, गिरदा उसके अभिन्न अंग थे। इसी दौर में जन सांस्कृतिक आंदोलन को भी संगठित करने के प्रयास तेज हुए, जिसकी परिणति नैनीताल में ‘युवमंच’ तथा हिंदी-उर्दू प्रदेशों में जन संस्कृति मंच के गठन में हुई।

पटना से लेकर लखनऊ तक फूटे विरोध के स्‍वर 7

पटना से लेकर लखनऊ तक फूटे विरोध के स्‍वर

संजय कुमार ♦ छिनाल प्रकरण पर देर से ही सही, बिहार की राजधानी से विरोध के स्वर फूटे हैं। महिला लेखिकाओं के खिलाफ अपशब्द बोलने को लेकर बिहार के मीडिया में लेखकों का बयान आया। लखनऊ जसम के मुताबिक राय का यह स्त्री विरोधी रूप अचानक प्रकट होने वाली कोई घटना नहीं है। पिछले दिनों बतौर कुलपति श्री राय ने जिस दलित विरोधी सामंती सोच का परिचय दिया है, ‘नया ज्ञानोदय’ में महिला लेखिकाओं पर उनकी टिप्पणी उसी का विस्तार है। वक्ताओं ने ‘नया ज्ञानोदय’ के संपादक की भी आलोचना की। उनका कहना था कि समाज व जीवन के ज्वलंत व जरूरी सवालों व सरोकारों से साहित्य को दूर ले जाकर उसे मात्र मसालेदार बनाने की दिशा में रवींद्र कालिया काम कर रहे हैं।

भोपाल मर रहा था, अर्जुन सिंह जहाज में उड़ रहे थे 5

भोपाल मर रहा था, अर्जुन सिंह जहाज में उड़ रहे थे

आनंद स्वरूप वर्मा ♦ तीसरी दुनिया के देशों को अपनी चारागाह बनाने वाले मौत के सौदागर अमरीकी साम्राज्यवादियों की मुनाफाखोरी को बढ़ाने के लिए इनके अनुग्रह पर पलने वाले मंत्रियों और अफसरों की सुविधालोलुपता ने हजारों बेगुनाहों को मौत के घाट उतार दिया। इस दुर्घटना में न तो अर्जुन सिंह की मौत हुई और न उनके किसी रिश्तेदार की, यह पिट्स विमान दुर्घटना जैसा कोई हादसा भी नहीं था जिसमें गांधी-नेहरू परिवार का कोई व्यक्ति मारा गया हो। सत्ता के शिखर पर बैठे लोगों को जनता के खून पसीने से तैयार सुरक्षा कवच हासिल है – इसलिए शताब्दी की इस सबसे दर्दनाक दुर्घटना पर न तो कोई राष्ट्रीय शोक मनाया गया, न सरकारी इमारतों पर लहरा रहे तिरंगे झुकाये गये।

कोडरमा की “निरुपमा” और मेरठ की “श्रुति” के सबक 3

कोडरमा की “निरुपमा” और मेरठ की “श्रुति” के सबक

सलीम अख्तर सिद्दीकी ♦ आजकल चल यह रहा है कि आधुनिकता की होड़ में पहले तो लड़कियों को पूरी आजादी दी जाती है। लड़कियों से यह नहीं पूछा जाता कि उन्होंने भारतीय लिबास को छोड़कर टाइट जींस और स्लीवलेस टॉप क्यों पहनना शुरू कर दिया है। आप ऐसे लिबास पहनने वाली किसी लड़की के मां-बाप से यह कह कर देखिए कि आपकी लड़की का यह लिबास ठीक नहीं है तो वे आपको एकदम से रूढ़ीवादी और दकियानूसी विचारधारा का ठहरा देंगे। मां-बाप कभी अपनी बेटी का मोबाइल भी चैक नहीं करते कि वह घंटों-घंटों किससे बतियाती रहती है। जब इन्हीं मां-बाप को एक दिन पता चलता है कि उनकी लड़की प्रेम कर रही है तो उनके पैरों के नीचे से जमीन खिसकती नजर आती है।

HCL Infosystems Ltd में ये क्‍या फर्जीवाड़ा हो रहा है? 3

HCL Infosystems Ltd में ये क्‍या फर्जीवाड़ा हो रहा है?

योगेंद्र सिंह ♦ अक्टूबर 2009 में स्टेट इंफोर्मेटिक्स अधिकारी ने वीडियो कांफ्रेसिंग के जरिये कहा था कि दो साल तीन महीने के बाद दोगुनी तनख्वाह मिलेगी। लेकिन इसमें कोई बढ़ोत्तरी नहीं की गयी। एनआईसी और एचसीएल इंफोसिस्टम लिमिटेड के निर्देशों के अनुसार मेरी ड्यूटी सातों दिन चौबीसो घंटे है। इसमें कोई छुट्टी भी नहीं है। भारत सरकार के आदेश और नेशनल इंफोर्मेटिक यूनिट दिल्ली के अनुसार एनआईसी हेडक्वाटर में न्यूनतम वेतन 13551 रुपये प्रतिमाह है। इसलिए मैं विन्रमतापूर्वक कहना चाहता हूं कि एचसीएल और एनआईसी, लखनऊ दोनों संस्थान अपने अभियंताओं का मानसिक और शारीरिक शोषण कर रहे हैं।