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ओम थानवी ♦ कुछ अखबारों में आतंकवादियों की तरफ से मिलने वाली विज्ञप्तियां और आपत्तिजनक विज्ञापन प्रमुखता से छपने लगे। पंजाब सरकार ने अखबारों को एक धमकी भरी हिदायत जारी की। उसका असर पड़ा। इस पर आतंकवादियों ने नया दांव खेला। डॉ सोहन सिंह के नेतृत्व वाली पंथक कमेटी (जो पांच प्रमुख आतंकवादी गुटों का समूह थी) ने पूरे मीडिया के लिए एक ‘आचार संहिता’ जारी की। आतंकवादियों को खबरों में आतंकवादी, उग्रवादी आदि की जगह ‘मिलिटैंट, खालिस्तानी सेनानी या खालिस्तानी मुजाहिद्दीन’ लिखने का निर्देश था। इसी तरह, भिंडरावाले के नाम से पहले संत लिखना जरूरी था। पंथिक कमेटी के साथ पाकिस्तान स्थित लिखने की मनाही थी।
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दिलीप मंडल ♦ आमिर खान ने शहरी-इलीट-उच्च वर्ण की एक गंभीर समस्या की ओर उन लोगों का ध्यान खींचा है। इन समूहों को समाज सुधार की सख्त जरूरत है। जनगणना के आंकड़े बताते हैं कि आदिवासियों और दलितों का भ्रूण हत्या नाम की समस्या से साक्षात्कार कम ही हुआ है। ओबीसी के आंकड़े नहीं हैं क्योंकि सरकार उन्हें गिनती ही नहीं है। इसी तरह सती प्रथा भी उच्च वर्णीय समस्या थी, जिसके खिलाफ राममोहन राय ने अभियान चलाया था। भ्रूण हत्या और कन्या शिशु हत्या, गंभीर रूप में, शहरी-इलीट-हिंदू-सवर्ण समस्या है। आदिवासियों और मुसलमानों का इस समस्या से कोई लेना देना नहीं है, उनका जेंडर रेशियो ठीक है। दलितों में यह समस्या कम है, किसी भय की वजह से ओबीसी के आंकड़े सरकार नहीं जुटाती हैं।
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चंदन पांडेय ♦ जिनसे हम अपने आदर्श टीपते हैं, वो भी अपने समय में शायद ही बेदाग रहे हों। इसलिए मूल्यांकन का ‘एक’ तरीका यह भी होना चाहिए कि हम घटना दर घटना अपनी राय बनाएं। जिस विषय को सत्यमेव जयते की टीम ने उठाया, वह निस्संदेह राष्ट्रीय समस्या है (हालांकि कल अपनी वॉल पर एक चालू समाचार पत्रिका के संपादक, जिन्होंने अभी स्त्री अंग विशेष पर बड़ी खबर लगायी थी और मैं मूरख खल कामी उनका पक्ष भी ले बैठा था, ने इसे राष्ट्रीय समस्या मानने से इनकार किया है। उनका कहना है कि यह समस्या मुस्लिम, आदिवासी, दलित और ओबीसी समाज में नहीं है इसलिए यह राष्ट्रीय समस्या नहीं हैं। उनकी ही नयी नवेली कुतर्की परंपरा को अपना लें तो कहा जाएगा कि चूंकि ज्यादातर दंगों में हिंदू (अवर्ण सवर्ण सब) नहीं मारे जाते या कम मारे जाते हैं, इसलिए दंगे राष्ट्रीय समस्या नहीं हैं।
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कृति श्री ♦ हम अच्छी तरह से जानते हैं कि बाजार हर चीज से मुनाफा कमाने के फिराक में रहता है। और आमिर इस बाजार के ब्रांड एंबेसडर हैं। किसी भी वैल्यू को बाजार में कैसे कैश करना है, वह अच्छी तरह जानते हैं। आमिर यह जानते हैं कि अपने प्रोडक्ट की मार्केटिंग कैसे की जाए। ऐसे में कन्या भ्रूण हत्या का मसला भी बाजार में कैश किया जा सकता है। अल्ट्रासाउंड मशीनों की मार्केटिंग से जितना मुनाफा कंपनियों ने कमाया होगा और उससे कहीं ज्यादा आमिर खान के इस कार्यक्रम के प्रचार और प्रस्तुति से इसके प्रायोजक भी शायद कमा लें। इसमें आमिर के प्रति एपिसोड तीन करोड़ भी शामिल हैं। निश्चित रूप से आमिर की वजह से कार्यक्रम एवं चैनल की टीआरपी भी बहुत बढ़ेगी।
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डॉ अनुराग आर्य ♦ मेरे एक पढ़े लिखे दोस्त कहते हैं, इन सबसे कुछ नहीं बदलने वाला? मैंने कहा अगर वाकई इस यथार्थ में इतना यकीन रखते हो तो छोड़ दो कविताएं लिखना, किताबें पढ़ना? आखिर तुम भी क्रांतियों वाली कविताएं लिखते हो? मैं कहता हूं नहीं बदले कुछ, नहीं होती क्रांति इस प्रोग्राम से, पर एक दो या चार आदमी की सोच भी बदले तो बुरा क्या है? अगर इस प्रोग्राम से चैनलों में सरोकारी प्रोग्राम की भी होड़ लगे तो भी बुरा क्या है? बचपन के दूरदर्शन की कई कविताएं “एक चिड़िया अनेक चिड़िया”, “पढ़ना लिखना सीखो ओ मेहनत करने वालो” इतने साल बाद भी हमें याद है। हो सकता है आपको इसके लिखने वाले का नाम याद न हो। वो जरूरी भी नहीं। संदेश महत्वपूर्ण है।
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डेस्क ♦ अरसा बाद एक टीवी शो आया है, जो बड़े पैमाने पर देश के सजग नागरिकों का ध्यान अपनी ओर खींच रहा है। इसकी एक वजह ये है कि पिछले कई सालों से भारतीय टेलीविजन यह तय नहीं कर पा रहा था कि उसको सरोकारों पर बात करने के साथ आगे बढ़ना है या महज मनोरंजन ही उसकी प्रगति का अंतिम हथियार है। एक कद्दावर अभिनेता की पहल ने संवेदनशील ढंग से इस मसले को सुलझाया है कि आप अपने जीवनयापन और मनोरंजन के लिए कुछ भी करें, समाज के स्याह कोनों की अनदेखी आप नहीं कर सकते। ऐसा करते हैं, तो आने वाले वक्त में भी कोई कवि वीरेन डंगवाल कागज के पन्नों पर अफसोस करेगा कि पर हमने यह कैसा समाज रच डाला है, इसमें जो दमक रहा शर्तिया काला है।
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दिनेश अग्रहरि ♦ आशुतोष आंदोलन में जुटी भीड़ को देखकर पूरी तरह भावनाओं में बह जाते हैं क्योंकि यह भ्रष्टाचार को खत्म करने के लिए चलने वाला दूसरी आजादी का आंदोलन है। लेकिन खुद आशुतोष ने यह लिखा है कि आपातकाल के दौरान जेपी के आंदोलन को लेकर भाव प्रवण रिपोर्टिंग की गयी थी, लेकिन बाद में उसके बारे में आकलन काफी बदल गया था। हमने यह देखा है कि वीपी सिंह के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के दौरान किस तरह से देश के युवाओं ने उन्हें ‘राजा नहीं फकीर है’ के नारे के साथ सिर आंखों पर बिठा लिया था और बाद में इस आंदोलन का क्या हश्र हुआ? पत्रकार को किसी आंदोलन की धारा में न बहते हुए उसकी जमीनी हकीकत से रूबरू कराना चाहिए
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आनंद स्वरूप वर्मा ♦ मैं नहीं समझता कि मंगलेश ने कोई चूक की है। अगर किसी के दक्षिणपंथी अथवा वामपंथी/प्रगतिशील होने का मापदंड गोष्ठियों में जाने को ही बना लिया जाए न कि उसके जीवन और कृतित्व को तो यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण होगा। वैचारिक प्रतिबद्धता का निर्धारण इस तरह के सतही मापदंडों से नहीं होता कि कौन कहां जा रहा है अथवा किससे मिल रहा है। उदय प्रकाश का मामला इससे थोड़ा भिन्न था क्योंकि उन्होंने उस व्यक्ति के हाथों पुरस्कार लिया जो घोर कम्युनिस्ट विरोधी और प्रतिगामी विचारों का घोषित तौर पर पोषक है हालांकि इसे भी मुद्दा बनाने के पक्ष में मैं उस समय नहीं था। जिन दिनों हस्ताक्षर अभियान चल रहा था, मैंने यही कहा था कि एक बार उदय प्रकाश से पूछना चाहिए कि किन परिस्थितियों में ऐसा हुआ?
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ओम थानवी ♦ खरे जी के साथ मेरे आत्मीय संबंध रहे हैं। यह जानते हुए भी कि लोग उन्हें भरोसे का आदमी नहीं मानते। मोहल्ला लाइव पर उनके “पत्र” पर बात करते किसी ने लिखा है कि वे बेईमान भी हैं। फिर भी, मैं उनका आदर करता हूं। उनका पत्र मिला, तब मुझे दूर तक अंदेशा नहीं था कि यह पत्र भी अभिषेक-व्यालोक वाले पत्राचार की तरह अपनी डींग हांकने के लिए इस्तेमाल करने वाले हैं। वे शुरू में ही बता देते कि वह “पत्र” छपवाने का इरादा है, तो मैं भी (शायद) संभल कर जवाब लिखता और खुद कहता कि मेरा कथन भी साथ में दे दें! मैंने उनके पत्र को हल्के लिया और हल्के अंदाज में ही जवाब दे दिया। दो लोगों के बीच ऐसा ही होता है; पर आप चौराहे पर जिरह करना चाहते हैं, तो उसका मयार बदल जाता है।
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विष्णु खरे ♦ इलाचंद्रजी मुझसे मेरे छुटपन से ही कभी पढ़े नहीं गये। रही बात कृष्णा सोबती की तो मैं उनके लेखन को नकली, हिस्टीरियाई और ओवर-रेटेड मानता हूं। “उसका बचपन” को छोड़कर, जो ‘फ्लैश इन दि पैन’ का दर्जा रखता है, मैं कृष्ण बलदेव वैद के शेष लेखन को अपाठ्य समझता हूं। हिंदी कविता के उनके अंग्रेजी अनुवाद तो टूरिस्ट होटलों में वेल्कम ड्रिंक (स्वागत-रसरंजन – कितना जलील और बाजारू शब्द है यह ‘रसरंजन’, ‘बॉलीवुड’ जैसा) की तर्ज पर थाने में प्राथमिक कंबल-परेड के बाद अदालत में भारतीय दंड संहिता की कई सश्रम सजाओं को आकृष्ट करते हैं। आपने मुझे कुछ बताने का रेटोरिकल सवाल किया है। उपरोक्त के बाद, यदि वह उदाहरण नहीं बन सके, तो बताने के लिए बचता क्या है?


