Articles in the मीडिया मंडी Category
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अरुंधती राय ♦ माओवादियों द्वारा बिहार में बंधक बना कर उनकी हत्या करना उतना ही निंदनीय है, जितना कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट से मुठभेड़ का सच सामने आने के बाद आंध्र पुलिस के हाथों आजाद और हेमचंद्र पांडेय की हत्या।
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डेस्क ♦ बिहार के लखीसराय में माओवादियों ने अपने साथियों को छुड़ाने के एवज में तीन पुलिसकर्मियों को बंधक बना लिया। इनमें से एक की हत्या कर देने के बाद माओवादियों के अमानवीय किस्सों से पटी मीडिया की खबरों ने पूरे देश को हिला दिया। माओवादियों के इस कृत्य की चारों ओर निंदा हुई और हो रही है। ऐसे में लेखिका अरुंधती राय ने भी अपना बयान जारी किया है। अरुंधती के मुताबिक मीडिया की ओर से निंदा-बुलेटिन में बांट-बखरा नहीं होना चाहिए। मीडिया को फर्जी पुलिस मुठभेड़ में मारे जा रहे माओवादियों के बारे में भी ऐसी ही संवेदनशीलता से बातें करनी चाहिए।
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नॉट कनफर्म ♦ शुक्रवार को वीडियोकान टावर की आठवीं मंजिल पर दो घंटे तक चली टाप मैनेजमेंट की मीटिंग में प्राइम टाइम में आजतक की गिरती साख को सबसे बड़ी चिंता का विषय माना गया। नकवी को सख्त निर्देश देते हुए कहा गया कि यदि आजतक अपने प्राइम टाइम बैंड में प्रतिद्वंदी चैनल से बीस प्रतिशत ज्यादा का टाइम स्पैंड अर्जित नहीं करता है, तो इसका सीधा प्रभाव विज्ञापन उगाही पर आयेगा जिसे प्रबंधन स्वीकार नहीं करेगा। माना जा रहा है कि जीके के साथ-साथ अरुण पुरी ने भी इसका संज्ञान लेते हुए चिंता जतायी है। कहा जा सकता है कि आने वाला समय नकवी और उनकी टीम पर भारी है।
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अभिषक श्रीवास्तव ♦ ऑफिशियल सीक्रेट्स एक्ट के तहत सात महीने जेल में रहे कश्मीर टाइम्स के तत्कालीन ब्यूरो प्रमुख इफ्तिखार गिलानी के मामले में रिपोर्टिंग के स्तर पर न सिर्फ नीता शर्मा ने, बल्कि आज तक के दीपक चौरसिया और दैनिक जागरण आदि अखबारों ने भी गड़बड़ भूमिका अदा की। मन्निका चोपड़ा ने गिलानी से एक इंटरव्यू लिया था (जो अब भी सेवंती नैनन की वेबसाइट ‘द हूट’ पर मौजूद है), जिसमें गिलानी ने बताया था कि दीपक चौरसिया ने उनके घर से लाइव रिपोर्ट किया कि गिलानी फरार हो गये हैं, जबकि वह घर में ही थे। दीपक चौरसिया ने सनसनीखेज खबर दी कि पुलिस ने गिलानी के पास से एक लैपटॉप बरामद किया जिसमें अकाट्य सबूत हैं। गिलानी ने साक्षात्कार में कहा, मेरे पास लैपटॉप है ही नहीं।
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रुद्रप्रताप ♦ इस दौर में सबसे बड़ा सवाल यही है कि बाजार और विचार की दो नावों में चलना आखिर कैसे संभव हो सकता है? आपको या तो गजब का संतुलन साधना होगा या फिर इन सबसे दूर होकर मैदान छोड़ना होगा। अच्छा हुआ कि नागार्जुन जी ने मैदान छोड़ना श्रेयस्कर समझा किंतु उसी दिन कुंठाएं भी छोड़ देते तो बहोत अच्छा होता। कमअजकम आज आजतक के पतन का रोना नहीं रोते। कौन-सा आजतक पहले ही पत्रकारिता का भला करता फिर रहा था। इंडिया टीवी आने के पहले ही तो गू-लिपाई, गिरोहबंदी, सत्तासुख लूटने के सारे कुकर्म शुरू हो चुके थे। अच्छा होता कि आज किन्हीं निजों हितों को साधने के वशीभूत होकर आजतक की असफलताओं का ठीकरा नागार्जुन जी वहां के कर्ता-धर्ताओं पर नहीं फोड़ते बल्कि उन कुविचारों को कोसते जिसने लोकतंत्र के चौथे खंभे का भट्ठा बिठाकर रखा है।
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अज्ञेय ♦ 2003 के आसपास से ही टीम के बांध में रिसाव शुरू होने लगा। इसके कई कारण हैं। अरुण पुरी की चौकसी में कमी। ख्याति को कैश कराने की मुहिम और टीम – वर्क की जगह व्यक्तिगत आकांक्षाओं का पनपना इत्यादि। दिबांग ने एनडीटीवी से डील की और प्रसून-नग्मा-सिक्ता जैसे चेहरों और सुनील सैनी जैसे सिपाही आजतक से अलग हो गये। आजतक का टायटेनिक किसी हिम खंड से टकराया सा प्रतीत हुआ लेकिन शोहरत के ग्राफ में कोई कमी नहीं आयी। मोहभंग का सिलसिला कई और लायक लोगों की विदाई में भी दिखाई दिया लेकिन चैनल के तेवर वही रहे। यहां तक कि उदय का भी फेयरवेल हो गया। इसी टूट के बीच आजतक ने चैनल का चोला उतारकर ब्रांड की पोशाक पहनने का फैसला कर लिया।
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डेस्क ♦ इस हफ्ते की टीआरपी में एक बार फिर आजतक इंडिया टीवी से नीचे है और पिछले हफ्ते के मुकाबले वह प्वाइंट तीन फीसदी के नुकसान में है। लगातार आठवें हफ्ते आजतक के इस परिणाम से यह साफ है कि कभी नंबर वन रहा ये चैनल दम तोड़ रहा है। हमें लगता है कि उत्कर्ष के अवसान की पतन कथा को थोड़ा और बारीक घटनाओं-विश्लेषणों से हमें समझने की कोशिश करनी चाहिए। दूसरे चैनलों की अच्छी-बुरी चीजों पर वाकई बाद में चर्चा करते रहेंगे, जैसा कि नागार्जुन ने अपनी टिप्पणी में लिखा है और जिस टिप्पणी को हम यहां नीचे चिपका भी रहे हैं। बहरहाल, देखिए इस बार की टीआरपी और पिछले हफ्ते की टीआरपी से मिलान कीजिए।
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अज्ञेय ♦ ऐसे कई उदाहरण हैं लेकिन जिन्हें यहां लिखकर बात को लंबा करना निरर्थक लग रहा है। आशय मात्र यह है कि टेलीवीजन टीम-वर्क का माध्यम है। यह टीम-वर्क 2004 तक भरपूर तरीके से और बाद में यदा कदा दिखाई देता रहा। अब ये इतिहास की बातें हो गयी हैं। अब तो आजतक बकौल नागार्जुन जी कुछ हाथों का खिलौना बनकर रह गया है। बाकी सारे लोग वेतन की मजबूरी ओढ़कर कुंठाओं का कंपकंपा देनेवाला मौसम झेल रहे हैं। अगर कोई रिपोर्टर गलती से कोई खबर ले भी आता है तो समाचार संपादक की तस्दीक करने की ऑपरेशन टेबल पर उसको मरना ही पड़ता है। आश्चर्य होता है कि एलियंस की तस्दीक वह कैसे करते हैं, प्रलय आ जाएगी, इसकी तस्दीक का थर्मामीटर उन्हें कैसे मिलता है?
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नागार्जुन ♦ आजतक की पतन गाथा वास्तव में किसी एक संस्थान की पतन गाथा नहीं है। यह पूरे भारतीय टेलीविजन न्यूज इंडस्ट्री में आयी गिरावट का द्योतक है। कुछ कुछ भारत में हॉकी के खेल की बदहाली जैसा। घास के मैदान पर खेलने के अभ्यस्त खिलाड़ी दूसरे टर्फ पर कैसे खेलेंगे? आज सभी एक ही टर्फ पर न्यूज का धंधा कर रहे हैं। कई बार तो न्यूज रूम में सारे चैनलों को एक साथ देखने पर यह फर्क करना मुश्किल हो जाता है कि उनमें बुनियादी अंतर क्या है? और यह टर्फ इंडिया टीवी का टर्फ है। इसलिए इस खेल में आखिरकार जीत इंडिया टीवी की ही होगी। भले ही इंडिया टीवी नंबर वन रहे या नहीं रहे। जो नंबर वन होगा वो इंडिया टीवी का ही कोई क्लोन होगा।
मीडिया मंडी, मोहल्ला पटना »
डेस्क ♦ शनिवार को पटना में पेड न्यूज के खिलाफ हुए सम्मेलन में ये आम सहमति दिखी कि पेड न्यूज के कारोबार ने पत्रकारिता की साख को खत्म कर दिया है और ये लोकतंत्र के लिए भी खतरा बन गया है। अधिकांश वक्ताओं ने कहा कि पत्रकारों द्वारा बुलाया गया ये महासम्मेलन पेड न्यूज के खिलाफ एक छोटी मगर महत्वपूर्ण पहल है क्योंकि ये आवाज पत्रकारों की तरफ से उठायी जा रही है। पेड न्यूज के खिलाफ इस महासम्मेलन में मीडिया और सामाजिक वर्गों के अलावा प्रदेश के प्रमुख दलों के कई दिग्गज नेताओं ने भागीदारी की। इनमें लालू यादव, राम विलास पासवान, दीपंकर भट्टाचार्य, शाहनवाज हुसैन, जगन्नाथ मिश्र, प्रेमचंद मिश्र, गुलाम गौस और राजीवरंजन शामिल थे।




