Category: मीडिया मंडी

पतनशील मीडिया के पत्रकार कॉमेडियन रीलीफ देते हैं 3

पतनशील मीडिया के पत्रकार कॉमेडियन रीलीफ देते हैं

पी साईंनाथ ♦ अब मीडिया हाउसेस रिपोर्टिंग पर खर्च कम करते जा रहे हैं। यही वजह है कि चैनलों पर टॉक शो की बाढ़ आ गयी है, क्योंकि इसमें खर्च कम है। संपादकों की जगह सीईओ, मैनेजिंग एडिटर, एक्जक्यूटिव एडिटर जैसे पदों का गठन पत्रकारिता के लिए दुर्भाग्यपूर्ण है। मीडिया हाउसेस और कॉरपोरेट हाउसेस के बीच होने वाली ‘प्राइवेट ट्रीटी’ पत्रकारिता की आजादी में बाधक है। जैसे-जैसे मीडिया घरानों के हित बाजार के हित के साथ जुड़ते जाएंगे, एक तरह का खतरनाक नेक्सस खबरों को दबाने, छिपाने और उन्हें विकृत करने में सक्रिय होता जाएगा। हाल के दिनों में इलेक्ट्रानिक मीडिया ने कोई बड़ी खबर ब्रेक की हो, इसके उदाहरण बेहद कम मिलते हैं। मीडिया के पतन के साथ पत्रकार ‘कॉमेडियन रिलीफ’ देने का काम करते नजर आते हैं।

मीडिया संस्थानों में तमाम अस्मिताओं का प्रतिनिधित्व हो 0

मीडिया संस्थानों में तमाम अस्मिताओं का प्रतिनिधित्व हो

पशुपति शर्मा ♦ सुभाष गाताडे ने कहा कि अस्मिताओं के संघर्ष का सवाल आज ज्यादा मौजूं है। 80-90 के दशक में दलित और स्त्री अस्मिता का उभार हुआ। हिंदी पट्टी के सबसे बड़े सूबे में मायावती अस्मिताओं के इस संघर्ष के बाद सत्ता पर काबिज हुईं। 90 के दशक में हिंदू अस्मिता का उभार हुआ। और अब आज के दौर में जब हम गुजरात दंगे बनाम विकास की बहस में उलझे हैं, अस्मिताओं से जुड़े ऐसे कई सवाल बार-बार सिर उठाते हैं। पत्रकारिता के ढांचे का जिक्र करते हुए सुभाष गाताडे ने कहा कि यहां अभी भी पुरुष वर्चस्व कायम है। पत्रकारिता संस्थानों में तमाम अस्मिताओं का प्रतिनिधित्व होना चाहिए। इस सिलसिले में उन्होंने 2006 में हुए एक सर्वे का जिक्र किया।

पत्रकार हरीश पाठक और आलोचक पल्‍लव को सम्‍मान-पुरस्‍कार 0

पत्रकार हरीश पाठक और आलोचक पल्‍लव को सम्‍मान-पुरस्‍कार

डेस्‍क ♦ महाराष्‍ट्र राज्‍य हिंदी साहित्‍य अकादमी का वर्ष 2011-12 के बाबूराव विष्णु पराड़कर पत्रकारिता पुरस्कार वरिष्‍ठ पत्रकार-कथाकार हरीश पाठक को दिया जाएगा। हरीश पाठक का चयन उनकी पुस्तक त्रिकोण के तीनों कोण (प्रभात प्रकाशन) के लिए किया गया। यह घोषणा 20 जून 2013 को की गयी। उनको यह पुरस्कार 14 सितंबर (हिंदी दिवस) को मुंबई में आयोजित एक समारोह में दिया जाएगा। हरीश पाठक इन दिनों राष्‍ट्रीय सहारा, गोरखपुर के संपादक हैं। उनके तीन कहानी संग्रह व पत्रकारिता पर तीन पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। मध्यप्रदेश सरकार का राजेंद्र माथुर फेलोशिप व उत्तर प्रदेश सरकार का गणेश शंकर विद्यार्थी पुरस्कार भी हरीश पाठक को मिल चुका है।

पुलिस और अखबार ने कलाकार को नक्‍सली बना दिया 0

पुलिस और अखबार ने कलाकार को नक्‍सली बना दिया

अश्विनी कुमार पंकज ♦ पांच साल पहले आंदोलन वाले अखबार ने एक निर्दोष संस्कृतिकर्मी जीतन मरांडी की फोटो फ्रंट पेज पर छापकर उसे फांसी के फंदे तक पहुंचा दिया था। झारखंड हाईकोर्ट ने उसे निर्दोष मानते हुए पिछले दिनों रिहा कर दिया। अब झारखंड के डीजीपी राजीव कुमार ने इस मामले की जांच का आदेश दिया है। जांच आईजी संपत मीणा करेंगी जिन्होंने सीआइडी के एसपी अमरनाथ मिश्रा के नेतृत्व में जांच टीम गठित कर दी है। यह टीम गलत अनुसंधान करने और एक निर्दोष को नक्सली साबित करनेवाले पुलिस अफसरों को चिन्हित करेगी। इस बीच झारखंड विशेष शाखा के एडीजीपी रेजी डुंगडुंग ने भी अपनी रिपोर्ट डीजीपी और गृह सचिव को दे दी है।

मौजूदा मीडिया परिदृश्‍य में दलितों का नजरिया गायब है 2

मौजूदा मीडिया परिदृश्‍य में दलितों का नजरिया गायब है

अरविंद दास ♦ किसान और मजदूरों से जुड़ी खबरों की तरह न ही वर्ष 1986 में और न ही वर्ष 2005 में विश्लेषण अवधि के दौरान दलितों और आदिवासियों से जुड़ी कोई खबर नवभारत टाइम्स की सुर्खी बनी। वर्ष 1986 में जहां दलित और आदिवासी से जुड़े पांच मुद्दे नवभारत टाइम्स में प्रकाशित हुए, जिसमें ‘आदिवासी गदर-केंद्र के लिए आजादी का अर्थ’ शीर्षक से एक संपादकीय अग्रलेख भी शामिल है, वहीं वर्ष 2005 में भी दलित और आदिवासी से जुड़े पांच मुद्दे प्रकाशित हुए, इसमें भी एक दिन ‘उनके दलित और हमारे’ शीर्षक से संपादकीय अग्रलेख शामिल है। वर्ष 1986 में ‘बांग्लादेश चकमा आदिवासी वापस लेगा’ शीर्षक से एक खबर दो कॉलम में पहले पन्ने पर प्रकाशित हुई।

हिंदी पत्रकारिता की भाषा नयी चाल में कब और कैसे ढली? 1

हिंदी पत्रकारिता की भाषा नयी चाल में कब और कैसे ढली?

अरविंद दास ♦ 80 के दशक में राजेंद्र माथुर, सुरेंद्र प्रताप सिंह और वरिष्ठ पत्रकार प्रभाष जोशी जैसे पत्रकारों ने हिंदी पत्रकारिता के क्षेत्र में ऐसी भाषा का प्रयोग शुरू किया था, जिसकी पहुंच बहुसंख्यक हिंदी पाठकों तक थी। बकौल प्रभाष जोशी, “हमारी इंटरवेंशन से हिंदी अखबारों की भाषा अनौपचारिक, सीधी, लोगों के सरोकार और भावनाओं को ढूंढने वाली भाषा बनी। हमने इसके लिए बोलियों, लोक साहित्य का इस्तेमाल किया।” लेकिन यही बात वर्तमान में सुर्खियों की भाषा के प्रसंग में नहीं कही जा सकती है। आज सुर्खियों की भाषा भले ही अनौपचारिक हो उसमें हिंदी की बोलियों के शब्दों की जगह तेजी से अंग्रेजी के शब्दों का प्रयोग बढ़ रहा है। मसलन, ओके, नो मोर, पेटेंट, अजेंडा, फोटोग्राफ, टेंशन, फ्री, बैन आदि।

बाजार ने करवट बदली, तो हिंदी में समाचार भी बदले 0

बाजार ने करवट बदली, तो हिंदी में समाचार भी बदले

अरविंद दास ♦ पूंजीवादी व्यापार के तौर-तरीकों और लाभ की प्रवृत्ति भूमंडलीकरण के बाद हिंदी अखबारों में तेजी से फैली है। विज्ञापनों पर अखबारों की निर्भरता बढ़ी है, फलतः उनकी नीतियों में बदलाव आया है। वर्तमान में विज्ञापनदाताओं को आकर्षित करने की मुहिम में हिंदी के अखबार ‘खबर’ और ‘मनोरंजन’ के बीच फर्क नहीं करते हैं। ऐसा नहीं कि 80 के दशक में हिंदी अखबारों में खेल या मनोरंजन की खबरें नहीं छपती थीं या उनके लिए अलग से पृष्ठ नहीं होता था। लेकिन वर्ष 1986 में खेल, विशेषकर क्रिकेट की खबरें पहले पन्ने की सुर्खियां बमुश्किल बना करती थीं। वर्तमान में क्रिकेट की खबरें धड़ल्ले से सुर्खियां बनायी जा रही हैं क्योंकि क्रिकेट के खेल में मनोरंजन के साथ-साथ ग्लैमर और काफी धन है। उदारीकरण के बाद बढ़ी उपभोक्तावादी संस्कृति के चलते हिंदी के अखबार पाठकों को हल्की-फुल्की, मनोरंजन जगत की ज्यादा खबरों को देकर उनकी ‘जिज्ञासाएं’ शांत कर रहे हैं।

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पुण्‍य प्रसून वाजपेयी ने कहा, ये मजदूर नहीं मवाली हैं!

सुनील कुमार ♦ मारूति सुजुकी मामले में एक ही झटके में हजारों मजदूरों को कातिल बना दिया गया और 150 के करीब मजदूरों को जेलो में बंद कर दिया गया और करीब 2300 मजदूरों की रोटी छीन ली गयी और इस खेल में शासन-प्रशासन, हरियाणा सरकार, केंद्र सरकार ने उसका पूरा साथ दिया। इसके पहले उत्तर प्रदेश के नोएडा और साहिबाबाद में गार्जियनो और निप्पोन के मजदूरों के साथ ऐसा हो चुका है, जिस पर कोई चर्चा नहीं होती। मीडिया में कोई बहस नहीं होती। 28-29 फरवरी को मजदूरों ने हड़ताल की और अपने दबे हुए गुस्से को मौका मिलते ही इजहार किया, तो भारत के ‘प्रतिष्ठित’ न्यूज चैनल आज तक में विख्यात मीडियाकर्मी पुण्य प्रसून बाजपेयी गला फाड़-फाड़ कर इन मजदूरों को हुड़दंगी और गुंडे बता रहे थे। ये मजदूरों की चेहरा दिखा कर उनकी आवाजों को सुना कर पुलिस से अपील कर रहे थे कि ‘ये सारे के सारे प्रदर्शनकारी नहीं गुंडे हैं, इनको पकड़ना चाहिए।’

मैं गाजियाबाद में रहता हूं, आपको कोई दिक्‍कत है? 12

मैं गाजियाबाद में रहता हूं, आपको कोई दिक्‍कत है?

♦ रवीश कुमार महानगरों में आपके रहने का पता एक नयी जाति है। दिल्ली और मुंबई जैसे बड़े शहरों में जाति की पहचान की अपनी एक सीमा होती है। इसलिए कुछ मोहल्ले नये ब्राह्मण...

खबर खरीदने का एक दिलचस्‍प खेल शुरू होने वाला है 3

खबर खरीदने का एक दिलचस्‍प खेल शुरू होने वाला है

♦ अरविंद दास अखबार एक ‘प्रोडक्ट’ (उत्पाद) है, जिसे संपादक की कम, ब्रांड मैनेजर की ज्यादा जरूरत है… इस बात की चर्चा अखबारों के दफ्तरों में 80 के दशक के उतरार्द्ध में शुरू हो...