Category: मोहल्ला मेरठ

17 साल बाद फिर दंगे और कर्फ्यू से घिरा मेरठ 2

17 साल बाद फिर दंगे और कर्फ्यू से घिरा मेरठ

आखिरकार मेरठ हिंसा से बच नहीं सका। 17 साल बाद एक बार फिर मेरठ कर्फ्यू का दंश झेलने के लिए मजबूर हो गया। लेकिन यह तय है कि यह हिंसा साम्प्रदायिक बिल्कुल नहीं है। हां, साम्प्रदायिक रुप देने की कोशिश गयी और आगे भी की जा सकती है। उल्लेखनीय है कि शाहिद अखलाक अपने चुनाव प्रचार में यह दावा करते थे कि मैं कभी शहर में दंगा नहीं होने दूंगा। हुआ भी ऐसा ही था। मेरठ में जब-जब हालात खराब हुए, तब-तब शाहिद अखलाक ने जनता और प्रशासन के सहयोग से शहर को बचाया। इस लोकसभा के चुनाव प्रचार के दौरान भी उन्होंने बार-बार यह कहा कि मेरे सांसद रहते शहर में दंगा नहीं हो सकता। सिर्फ में ही शहर को दंगे से बचा सकता हूं। यानि उनके कहने का मतलब था कि यदि मुझे हरा दिया तो शहर में दंगा होगा।

मजबूर आदमी जूझता नहीं, भागता है 6

मजबूर आदमी जूझता नहीं, भागता है

जबतक मैं घर नहीं आयी थी तबतक मेरे ख्याल में बस दो ही बातें थीं। घर वालों से मिलने की खुशी और यह सवाल कि क्यों बेच दिया था मुझे? गुरु के अड्डे पर रहते हुए कई बार जब मुझे किन्नर लाइफ से चिढ़ होती, तो गुस्से में बार-बार एक सवाल मन में चकरघिन्नी की तरह घूमता – ‘क्या छह इंच का औजार ही इंसान की निशानी है। नहीं तो बाकी तो सबकुछ था ही मेरे पास।’

मैं पूछने लगी, अम्मी आपने मुझे क्यों बेच दिया था। अम्मी बोली, बेटे बहुत गरीबी थी। हरियाणे में मज़दूरी, दिहाड़ी करके मैं और तुम्हारे अब्बा किसी तरह तुम भाई-बहनों का पेट पाल रहे थे। तुम्हारी छह बहनें थीं और तीन छोटे-छोटे भाई। हालत ऐसी नहीं थी कि उस कमाई में तुम सभी जी पाते। हमने तुम्हें बेचा नहीं था, वो उठा ले गये। गुनाह इतना है कि हम रोक न सके थे।

“राममंदिर” सरीखा है मेरठ का “कमेला” मुद्दा 12

“राममंदिर” सरीखा है मेरठ का “कमेला” मुद्दा

समस्या 90 के दशक से शुरू होती है। मेरठ से खाड़ी के देशों को मीट एक्सपोर्ट होने लगा। कमेले में बेहिसाब जानवरों को हलाल किया जाने लगा। देखते ही देखते कुरैशी बिरादरी के जो लोग ठेलियों पर फल आदि बेचकर गुजारा करते थे, लखपति, करोड़पति और अरबपति हो गए। पैसा आया तो राजनीति का चस्का भी लगा। 1993 के विधानसभा चुनाव में मीट कारोबारी हाजी अखलाक कुरैशी ने सपा के टिकट पर भाजपा के उम्मीदवार को शिकस्त दे दी। इसके बाद कुरैशी बिरादरी ने पीछे मुड़ कर नहीं देखा। मेयर, सांसद और विधायक इसी बिरादरी के चुने गये। भाजपा को यह नागवार गुजरा कि मेरठ की राजनीति पर एक वर्ग का एकाधिकार हो गया था। लिहाजा भाजपा ने कमेला मुद्दे को अपनी साम्प्रदायिक राजनीति से जोड़ लिया।

23 साल पहले: मलियाना में पीएसी का तांडव 4

23 साल पहले: मलियाना में पीएसी का तांडव

सलीम अख्तर सिद्दीकी

23 मई 1987 को मेरठ के मलियाना कांड हुए 23 साल हो गए हैं। एक पीढ़ी बुढ़ापे में कदम रख चुकी है तो एक पीढ़ी जवान हो गयी है। लेकिन मलियाना के लोग आज भी उस दिन का टेरर भूले नहीं है। और न ही पीड़ितों को अब तक न्याय और उचित मुआवजा मिल सका है। 23 मई 1987 की सुबह बहुत अजीब और बैचेनी भरी थी। रमजान की 25वीं तारीख थी। दिल कह रहा था कि आज सब कुछ ठीक नहीं रहेगा।