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Articles in the स्‍मृति Category

स्‍मृति »

[4 Sep 2010 | One Comment | ]
कोई ऐसा हो जिससे मैं यह सब कह सकूं…

अर्चना झा ♦ अब जब भी कोई अच्‍छे-अच्‍छे उसूलों की बात करता है, तो अंदर से हंसी और गुस्सा दोनों आते हैं कि पता नहीं खुद ये कितनी कोशिश करते होंगे, कितना प्रोसेस चलाते होंगे, कितना स्त्री सम्मान जैसी अवधारणाएं मन में होती होंगी। “बहनचोद” जैसी गाली आम है एक पढ़े-लिखे बुद्धिजीवी व्यक्ति के लिए, जो अपने संस्कारों से निकलने के “प्रोसेस” में है। “बहन की लौंड़ी” – इस शब्द का मतलब मुझे नहीं पता, पर सुन लेती हूं क्योंकि कर्म ऐसे होते हैं और जब क्रोध इस सीमा तक आ जाए तो प्रिय बहनों को लेकर दी गयी ये गालियां भावों की अभिव्यक्ति बन जाती हैं। घटिया आदि तो आम बात है। मैं चाहूं तो सब कुछ सही चल सकता है। प्रतिरोध करना बंद कर दूं, अच्छी सुघड़ गृहिणी बन जाऊं, पति के पैर पूजूं…

नज़रिया, स्‍मृति »

[3 Sep 2010 | 12 Comments | ]
“जब लगेगा थक गयी, आराम का रास्ता चुन लूंगी”

मृणाल वल्‍लरी ♦ क्यों किसी लडकी को अर्चना जैसी स्थिति का सामना करना पड़ता है? कहने को तो कॉलेज, विश्वविद्यालय के परिसर, सभा-गोष्ठियों में छात्र-छात्राएं पिछले दो दशकों से नारीवाद पर गंभीरतापूर्वक विचार करते नजर आएंगे। अपने साथ के पुरुष मित्रों को नारीवादी विषयों पर गंभीरतापूर्वक बातचीत करते देख लड़कियों के दिल में एक उम्मीद की किरण जगती है। उसे लगता है कि इन प्रगतिशील विचारों वाले लड़कों के साथ अपनी अस्मिता अपने विचारों के साथ समझौता नहीं करना पड़ेगा और जीवन सहज रूप से चलेगा। शायद ऐसा ही अर्चना ने भी सोचा होगा लेकिन यथार्थ कुछ और रूप में सामने आया। उसे भी इस तरह की शादी से एक दोयम दर्जे की जिंदगी ही नसीब हुई।

शब्‍द संगत, स्‍मृति »

[25 Aug 2010 | 4 Comments | ]
यह विशाल भूखंड आज जो दमक रहा है, मेरी भी आभा है इसमें!

सत्यानंद निरूपम ♦ 12 दिसंबर 1980 को विजय बहादुर सिंह को नागार्जुन ने इलाहाबाद से एक चिट्ठी लिखी थी – “अपने बारे में मित्रों एवं अमित्रों के मंतव्य सभी को सुनने पड़ते हैं… किसने, कब, कहां मेरे प्रसंग में क्या कहा? … वामपंथी एवं वामगंधी बंधुओं के परामर्श, चेतावनियां, शीतोष्ण उपदेश … यह सब मेरे इन कानों तक पहुंचते रहे हैं… परंतु सर्वाधिक परवाह जिस तत्व की मैं करता हूं वह कोई और तत्व है। जिस शक्ति से मैं ऊर्जा हासिल करता हूं, वह कोई और शक्ति है… मुझे संघर्षशील जनता का विपन्न बहुलांश ही शक्ति प्रदान करता है। कोटि-कोटि भारतीयों के वे निरीह, पिछड़े हुए, अकिंचन, दुर्बल समुदाय जो चाहने पर भी अपना मतपत्र नहीं डाल पाये, मेरी चेतना उनकी विवशताओं से ऊर्जा हासिल करेगी।”

मोहल्ला लखनऊ, शब्‍द संगत, स्‍मृति »

[24 Aug 2010 | 2 Comments | ]
गिरदा गये, जनता ने अपना कलाकार खो दिया

जन संस्‍कृति मंच ♦ सुपरिचित गायक, कलाकार और संस्कृतिकर्मी गिरीश तिवाड़ी गिरदा के निधन पर जन संस्कृति मंच ने गहरा शोक प्रकट किया है और कहा है कि उनके निधन से जनता ने अपना गायक और कलाकार खो दिया है। गिरदा ऐसे संस्कृतिकर्मी हैं, जिनका कला संसार जन आंदोलनों के बीच निर्मित होता है। गिरदा का निधन 22 अगस्त को हुआ। उनके निधन पर जन संस्कृति मंच की लखनऊ ईकाई के संयोजक कौशल किशोर ने शोक प्रकट करते हुए कहा कि 80 के दशक में उत्तराखंड में जो लोकप्रिय आंदोलन चला, गिरदा उसके अभिन्न अंग थे। इसी दौर में जन सांस्कृतिक आंदोलन को भी संगठित करने के प्रयास तेज हुए, जिसकी परिणति नैनीताल में ‘युवमंच’ तथा हिंदी-उर्दू प्रदेशों में जन संस्कृति मंच के गठन में हुई।

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[24 Aug 2010 | 4 Comments | ]
एक बार फिर गरज उठो तुम गिरदा

पलाश विश्‍वास ♦ गिराबल्लभ, तुम हमेशा से अराजक रहे हो। हुड़का धारण किया तो कुलीन बामहण बाप ने तज दिया। शांत तो कभी थे नहीं तुम। इतनी खामोशी क्या तुम्हें शोभा देती है? तुम तो हमेशा खामोशी के खिलाफ ठैरे। नैनीताल समाचार की वे तूफानी बहसें याद हैं? जब कर्नल सैब बंदूक उठा लेते थे? परेशान पवन राकेश और हरुआ दाढ़ी की गालियां भूल गये? हिमपात की वे गरजती रातें याद हैं? तुम्हारी, राजीव, शेखर वगैरह की नीलामी के खलाफ गिरफ्तारी की वारदात याद है? जब 14 नवंबर 1978 को छात्रों ने विरोध में नैनीताल खिलाफ फूंक दिया था? हिंसा अहिंसा की तूफान बहसें याद हैं, जब तुम सारी दलीलें खारिज करते हुए कह दिया करते थे, जन आंदोलन की दिशा जनता तय करती है, तुम स्साले कौन होते हो?

शब्‍द संगत, स्‍मृति »

[23 Aug 2010 | No Comment | ]
“गिर्दा” का होना पहाड़ में एक गूंज का होना था

चंद्रिका ♦ गिरीश तिवाड़ी “गिर्दा” का न होना उत्तराखंड के पहाड़ों में एक आलाप का समापन है। हल्‍द्वानी में उन्होंने अन्तिम सांस ली। शायद इस अंतिम सांस में भी अनगिनत कविताओं का विलोप रहा होगा। “गिर्दा” उत्तराखंड जनकाव्य के एक अहम हस्ताक्षर थे। उन्होंने धनुष यज्ञ, नगाड़े खामोश हैं जैसे महत्वपूर्ण नाटक लिखे और अंधायुग, मोहिल माटी, थैंक्यू मिस्टर ग्लाड जैसे कई नाटकों का निर्देशन भी किया। उन्होंने कुमाऊंनी काव्य को जनता के संघर्षों के साथ जोड़ा और खुद संघर्षों के बीच जीते हुए घटनाओं को काव्य की जीवंतता प्रदान की। 1945 में अल्मोड़ा के ग्राम ज्योली में जन्मे “गिर्दा” ने एक आंदोलनकारी के रूप में उत्तराखंड के लगभग जन संघर्षों में हिस्सा लिया।

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[22 Aug 2010 | 7 Comments | ]
जनकवि “गिरदा” नहीं रहे, हमने उनको संजोया ही नहीं

विनीत कुमार ♦ गिरदा के बारे में न तो हमें बहुत अधिक जानकारी है और न ही वो जो अब तक गाते आये हैं, उसकी कोई गहरी समझ। कविता और गीत के प्रति एक नकारात्मक रवैया शुरू से रहा है, इसलिए इसकी जानकारी मं शुरू से बाधा आती रही है। सुबह के विमर्श और तीन घंटे के लिए मसूरी से लौटने के बाद पेट में हायली रिच खाना गया तो न तो कुछ और सुनने की इच्छा हो रही थी और न ही कुछ कहने की। हम कुर्सी में धंसकर सोना चाहते थे, बैठना नहीं। तभी गिरदा दूसरे सत्र में मंच पर होते हैं। ये वो सत्र रहा, जिसमें गिरदा सहित बाकी लोगों ने उत्तराखंड के लोगों के दर्द को गाकर या कविता की शक्ल में हमसे साझा किया। गिरदा ने जब गाना शुरू किया, तो लगातार भीतर से आत्मग्लानि का बोध होता रहा।

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[29 Jul 2010 | One Comment | ]
बात केवल करार दिये जाने की है

ओम थानवी ♦ कई लेखक-आलोचक हैं, जिनके विचार अज्ञेय से नहीं मिलते थे, पर उनके साहित्य की वे आज भी बड़ी कद्र करते हैं। केदारनाथ सिंह इनमें अव्वल हैं। राजेंद्र यादव और विजयमोहन सिंह दोनों का कहना है कि रवींद्रनाथ ठाकुर के बाद भारतीय साहित्य में अज्ञेय से बड़ा व्यक्तित्व नहीं हुआ। विष्णु खरे ने अज्ञेय की मृत्यु पर ‘नवभारत टाइम्स’ में जो संपादकीय लिखा, वह आज भी याद किया जाता है। राजेश जोशी की हाल में प्रकाशित कृति ‘समकालीनता और साहित्य’ की भूमिका कविता पर अज्ञेय के उद्धरण से शुरू होती है। और अज्ञेय के काव्य की धुरंधर आलोचना करने वाले नामवर सिंह ने कुछ ही समय पहले ‘अकार’ में अज्ञेय की खुले गले से तारीफ की और ‘शेखर: एक जीवनी’ को हिंदी के पांच महान उपन्यासों में एक बताया।

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[28 Jul 2010 | 6 Comments | ]
चीनी कम्युनिस्‍ट पार्टी के छद्म ने चारू बाबू की हत्‍या की

विश्‍वजीत सेन ♦ चीनी कम्युनिस्‍ट पार्टी की छद्मक्रांतिकारिता के शिकार हुए चारू बाबू। उनमें ईमानदारी की कमी नहीं थी, लेकिन धीरज की कमी अवश्य थी। ‘पार्टी’ बनाने में उन्होंने जरूरत से ज्यादा जल्दबाजी की, इस बात को उनके प्रशंसकों ने भी स्वीकारा। पश्चिम बंगाल के एक छोटे से कस्बे से उठकर भारत जैसे देश की कम्युनिस्ट पार्टी का सर्वमान्य नेता बनने के लिए जितनी सलाहियत की आवश्यकता होती है, वह उनमें नहीं थी। देखते ही देखते उनकी कम्युनिस्ट पार्टी असंख्य गुटों में तब्दील गयी, जो एक दूसरे के खून के प्यासे थे। हर गुट, दूसरे को ‘वर्ग दुश्मन’ समझने लगा और खुद को क्रांतिकारी। आज भारत में कितने नक्सलपंथी गुट हैं, इसकी गिनती करना भी मुश्किल है।

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[28 Jul 2010 | No Comment | ]
आते दृश्‍य जाते दृश्‍य

ओम थानवी ♦ जब थोड़े सफर, थोड़े नाश्ते और कुछ गंभीर बातों से लोग सुस्त-से दीखने लगे, वात्स्यायनजी ने ताली बजाकर सबका ध्यान खींचा। फिर सबसे आगे, दरवाजे तक चले गये। मुड़े तो एक बाजीगर की-सी चंचलता और फुर्ती उनके चेहरे पर चढ़ चुकी थी। बोले, हमारे दौर के अनेक कवियों को सुनने का आपको मौका न पड़ा होगा। आपको उनकी कुछ झलक दिखलाये देते हैं। और वे दरवाजे के साथ दीवार से निकले मेज-नुमा फट्टे पर चढ़ बैठे। ये मेजें कुर्सीयान में सबसे आगे की पंक्ति के मुसाफिरों की सुविधा के लिए बनी होती हैं। एक-एक कर उन्होंने कुछ कवियों के पाठ की ‘सस्वर’ नकल उतारी। सबसे मजेदार, सही शब्दों में हंसा-हंसा कर लोटपोट कर देने वाली नकल भगवतीचरण वर्मा के गीत की थी।