Home » Archive

Articles in the स्‍मृति Category

नज़रिया, फ फ फोटो फोटो, मोहल्ला दिल्ली, स्‍मृति »

[8 Mar 2010 | 4 Comments | ]
एक कोने में गुमसुम, रजिया सुल्‍तान का मजार

ब्रजेश कुमार झा ♦ चांदनी चौक के नजदीक तुर्कमान गेट से एक पतला रास्ता बुलबुली खान की तरफ जाता है। यही वह इलाका है जहां रजिया सुल्तान यानी इतिहास की पहली महिला सुल्तान को दफनाया गया था। आज इस कब्रगाह की हालत देखेंगे तो महिला दिवस का डंका बजाने वालों की हकीकत समझ में आएगी। देखिए, देश के सबसे बड़े ओहदे पर महिला है। सरकार के भी कान खींच-खींचकर फिलहाल उसे एक महिला ही चला रही है। उस पर से दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित का रुतबा देख लें। इनके राज में इल्तुतमिश की बेटी और एक जमाने की क्रांतिकारी महिला की कब्र उपेक्षित है। वह एक गौरवशाली इतिहास लिये लेटी है। अपनी कब्र पर एक छत को तरसती हुई।

मीडिया मंडी, स्‍मृति »

[21 Feb 2010 | 3 Comments | ]
निर्मल पांडे : एक को-एंकर की श्रद्धांजलि

डॉ प्रवीण तिवारी ♦ निर्मल पांडे सिर्फ टेलीविजन और फिल्म कलाकार ही नहीं थे बल्कि वो लाइव इंडिया के क्राइम शो ‘मेरी दीवानगी’ के एंकर होने के नाते न्यूज चैनल्स का हिस्सा भी थे। इस दुखद खबर को दर्शकों तक पहुंचाते हुए मेरी आंखों में आंसू आना बहुत स्वाभाविक था। निजी तौर पर मुझे भी निर्मल पांडे के साथ एंकरिंग करने का मौका मिला लेकिन उससे भी बढ़ कर हर बार शूट के बाद मुलाकात में उनकी जिंदगी के फलसफों और कामयाबी के किस्से सुनना भी जिंदगी की अहम यादों का हिस्सा है। मुझे बार-बार पिछली मुलाकात के दौरान उनसे हुई वो बातें याद आ रही थीं, जिसमें वो किसी बड़े प्रोजेक्ट का जिक्र कर रहे थे।

नज़रिया, शब्‍द संगत, स्‍मृति »

[14 Feb 2010 | 15 Comments | ]
वेलेंटाइन डे : अनूठी मोहब्‍बत के चंद अफसाने

चण्डीदत्त शुक्ल ♦ मंटो की निगाह में मोहब्बत का बयान भी अनूठा है… वो कहता है, “किसी लड़के को लड़की से इश्क हो जाए, तो मैं उसे जुकाम के बराबर अहमियत नहीं देता, मगर वह लड़का मेरी तवज्जो को अपनी तरफ जरूर खींचेगा, जो जाहिर करे कि उस पर सैकड़ों लड़कियां जान देती हैं, लेकिन असल में वह मुहब्बत का इतना ही भूखा है कि जितना बंगाल का भूख से पीड़ित बाशिंदा। इस बजाहिर कामयाब आशिक की रंगीन बातों में जो ट्रेजडी सिसकियां भरती होगी, उसको मैं अपने दिल के कानों से सुनूंगा और दूसरों को सुनाऊंगा।”

नज़रिया, मीडिया मंडी, मोहल्ला दिल्ली, स्‍मृति »

[29 Jan 2010 | 6 Comments | ]
पुरुष पंडितों ने सभा की, पंडित प्रभाष जोशी को याद किया

समरेंद्र ♦ दिल्ली के गांधी शांति प्रतिष्ठान में प्रभाष जोशी पर लिखी गयी पुस्तक का लोकार्पण हुआ। इसे आप महज संयोग कहेंगे या क्‍या कहेंगे कि उस लोकार्पण में जितने लोगों ने प्रभाष जोशी के बारे में अपनी राय रखी, उनमें से एक को छोड़ कर कोई भी गैर ब्राह्मण नहीं था। जो अकेला शख्‍स गैरब्राह्मण था, वो भी एक ऐसी जाति से ताल्लुक रखता था जो खुद को ब्राह्मण होने का दावा करती रही है। यहां तक कि हद से अनहद गये का प्रकाशक भी ब्राह्मण ही है। इसे भी आप महज संयोग कहेंगे या फिर क्‍या कहेंगे कि मंच पर आकर प्रभाष जोशी को महान बताने वालों में एक भी महिला नहीं थी।

पुस्‍तक मेला, मीडिया मंडी, मोहल्ला दिल्ली, स्‍मृति »

[29 Jan 2010 | 2 Comments | ]
“प्रभाष जी गांधीवादी निर्भयता के आखिरी प्रवक्ता थे”

मोहल्‍ला लाइव संवाददाता ♦ अशोक वाजपेयी ने प्रभाषजी को याद करते हुए कहा कि प्रभाषजी उन गिने चुने पत्रकारों में थे, जिनकी आवाज साहित्यिक जगत तक में साफ सुनी जाती थी। उन्होंने राम मनोहर लोहिया और राजेंद्र माथुर के साथ प्रभाषजी की तुलना करते हुए कहा कि ये वे लोग थे, जिन्होंने हिंदी की नयी शैली विकिसत की और हिंदी वालों को उनका उचित सम्मान दिलाने में पूरी कोशिश की। उन्होंने ये भी कहा कि प्रभाषजी जैसा पत्रकार पैदा नहीं हुआ, जो हिंदीभाषी पूरे समाज का प्रवक्ता बन गया हो। वाजपेयी ने कहा कि प्रभाष जी संभवत: गांधीवादी निर्भयता के आखिरी प्रवक्ता थे।

ख़बर भी नज़र भी, नज़रिया, स्‍मृति »

[28 Jan 2010 | 20 Comments | ]
ज्योति बाबू की राजनीतिक स्वीकार्यता अप्रतिम थी

अजीत कुमार ♦ जो लोग शार्ट टर्म फायदे के लिए पार्टी लाइन को छोड़ देते हैं या पार्टी पर दबाव बनाते हैं, उन्हें ज्योति बाबू के उस ऐतिहासिक कदम से सबक लेना चाहिए। आखिर 23 सालों से ज्यादा तक पार्टी में सर्वस्वीकार्यता उनके इसी व्यक्तित्व की ही तो देन रही। राजनीति में इतने लंबे अरसे तक न सिर्फ पार्टी और राज्य में बल्कि देश की राजनीति में स्वीकार्यता ही अकेले ज्योति बाबू को भारतीय राजनीति में महान बनाने के लिए पर्याप्त है। साथ ही यह भी याद रखना चाहिए कि राजनीतिक स्वीकार्यता के लिए न तो कूटनीति के दांव अनैतिक कहे जा सकते और न ही विकास के प्रतिमानों के आधार पर उसे झुठलाया जा सकता है।

नज़रिया, स्‍मृति »

[28 Jan 2010 | 5 Comments | ]
ज्‍योति बसु ने हमें आजादी के मायने समझाये

श्रीराम तिवारी ♦ कॉ ज्योति बसु ने भारतीय जन-गण और खास तौर से बंगाल की मेहनतकश जनता को वास्तविक आजादी से अवगत कराया। 1940 से ही वे परिपक्व कम्युनिस्ट विचारक के तौर पर विख्यात हो चुके थे। उन्होंने नैतिक मूल्यों को सम्मान दिलाते हुए, पूंजीवादी प्रजातंत्र के अंतर्गत ही एक राज्य विशष में कम्युनिस्ट पार्टी की अनवरत 23 साल तक सरकार चला कर विश्व कीर्ति मान स्थापित किया। उनके नेतृत्व में पश्चिम बंगाल सरकार ने वहां जो जो कार्य किये हैं उसकी जानकारी सभा को है फिर भी कुछ काम ऐसे हैं कि सारे देश और सारी दुनिया में प्रसिद्ध है।

ख़बर भी नज़र भी, नज़रिया, स्‍मृति »

[25 Jan 2010 | 9 Comments | ]
कोई देवता नहीं, कोई सबका कॉमरेड नहीं

दिलीप मंडल ♦ ज्योति बसु पर बात करने वालों की नीयत पर संदेह करने से कोई फायदा नहीं होगा। सीपीएम के हितैषियों के लिए ये बहुत महत्वपूर्ण कार्यभार है कि वो बताएं कि ज्योति बसु की पहली (1977) और दूसरी (1982) कैबिनेट में कोई दलित या आदिवासी मंत्री शामिल था। सोचकर देखिए। एक कैबिनेट बनायी जाती है, वो भी कैबिनेट उन पार्टियों की, जो देश को बेहतर देश बनाना चाहते हैं और पूरी कैबिनेट में एक भी दलित या आदिवासी मंत्री नहीं। जबकि पश्चिम बंगाल में लगभग 30 फीसदी आबादी दलितों और आदिवासियों की है। अगर ये संयोग है, तो बेहद दुखद और शर्मनाक संयोग है।

रिपोर्ताज, स्‍मृति »

[24 Jan 2010 | 3 Comments | ]
विकास का पहिया

ओम थानवी ♦ मुख्य सड़कों के समांतर बनी ये सड़कें लगभग आठ फुट चौड़ी होंगी। सड़कों पर तीन साइकिल सवार एक साथ गुजर सकते हैं। कार वाले साइकिल सवार के लिए अदब से रुक जाते हैं। साइकिल वाले पैदल चलने वाले के लिए। साइकिल पथ पर कई जगह अब लाल-हरी बत्तियां भी लगा दी गयी हैं। बत्तियों से पहले रेलिंग लगी हैं। इन पर लिखा है, ‘जनाब, यहां पांव रख कर सुस्ताएं। और शहर में साइकिल सवारी के लिए शुक्रिया।’ मुख्य सड़कों के हाशिये पर चौड़े से स्तंभ स्थापित हैं। इनमें लगा उपकरण पास से गुजरने वाली साइकिलों की गणना करता है। शहर के तापमान और वक्त के साथ आप देख सकते हैं कि उस रोज और महीने में अब तक कितने साइकिल सवार वहां से गुजर चुके हैं।

रिपोर्ताज, स्‍मृति »

[24 Jan 2010 | 5 Comments | ]
ऊबे हुए दुखी

ओम थानवी ♦ डेनमार्क में भ्रष्टाचार भी कम है। या कहें, ईमानदारी बहुत है। कहा जाता है, दुनिया में सबसे ज्यादा। इसका एक सुखद अनुभव मुझे भी हुआ। तड़के चार बजे हवाई अड्डे पहुंचा। टैक्सी वाले से पूछ लिया था कि कितना भाड़ा होगा। उसने कहा कि मीटर पर निर्भर है, पर अंदाजन ढाई सौ क्रोनर (ढाई हजार रुपये)। मैंने बताया कि मीटर ज्यादा बोला तो आपको बाकी यूरो लेने पड़ेंगे। वह राजी था। मैं रास्ते में सोचता रहा, पता नहीं कितने यूरो और देने होंगे। हवाई अड्डे पहुंच उसने बटन दबाकर मीटर देखा, मेरा सामान उतारा और बोला – दो सौ पच्चीस। मैंने सांस ली और ढाई सौ क्रोनर उसकी हथेली पर रख दिये – बाकी आपके। डेनमार्क में टिप का कायदा नहीं है। उसने कुछ झुक कर कहा – टक!