Category: स्‍मृति

स्‍त्री रचनाशीलता के लिए शैलप्रिया स्‍मृति सम्‍मान 1

स्‍त्री रचनाशीलता के लिए शैलप्रिया स्‍मृति सम्‍मान

एक दिसंबर 1994 को झारखंड की सुख्यात कवयित्री और स्त्री-संगठनों से जुड़ी सामाजिक कार्यकर्ता शैलप्रिया का कैंसर की वजह से देहांत हो गया। तब वे 48 साल की थीं। उनके अपनों और उनके साथ सक्रिय समानधर्मा मित्रों और परिचितों का एक विशाल परिवार है, जो यह महसूस करता रहा कि अपने समय, समाज और महिलाओं के लिए वे जो कुछ करना चाहती थीं, वह अधूरा छूट गया है। उस दिशा में अब एक क़दम बढ़ाने की कोशिश हो रही है। उनके नाम पर बने शैलप्रिया स्मृति न्यास ने महिला लेखन के लिए 15,000 रुपये का एक सम्मान देने का निश्चय किया है। पहला शैलप्रिया स्मृति सम्मान उनके जन्मदिन पर 11 दिसंबर को रांची में दिया जाएगा।

आधी रात के उस पान ने प्राण की तकदीर बदल दी 0

आधी रात के उस पान ने प्राण की तकदीर बदल दी

प्रकाश के रे ♦ प्रसिद्ध लेखक वली मुहम्मद वली पान खाने उसी दुकान पर पहुंचे। उन्होंने युवक को सर से पांव तक निहारा। उन्हें एहसास हो गया था कि जिसकी तलाश वह कर रहे थे, वह मिल गया। वली साहिब एक पंजाबी फिल्म में खलनायक की भूमिका के लिए ऐसे ही नौजवान की तलाश में थे। वली साहिब, जो खुद भी खुमार में थे, ने उस लड़के से फिल्म में काम करने का प्रस्ताव रखा। लड़के ने इसे गंभीरता से न लेते हुए, वली साहिब से पूछा- ‘क्या मैं आपका नाम जान सकता हूं?’ वली साहिब ने कहा- ‘वली’। लड़का शरारत भरे अंदाज़ में हंसते हुए बुदबुदाया- ‘आधी रात को कुछ घूंट लेने के बाद हर कोई खुद को वली समझाने लगता है’।

बरखुदार, अभी थोड़ी देर और रह जाते तो क्‍या बिगड़ जाता? 0

बरखुदार, अभी थोड़ी देर और रह जाते तो क्‍या बिगड़ जाता?

कुमार सौवीर ♦ प्राण की एक नयी छवि बनायी सन 67 में बनी फिल्म उपकार ने। मनोज कुमार ने एक विकलांग और बेहाल शख्स की भूमिका के लिए प्राण को चुना और प्राण मंगल चाचा बन गये। उनके डॉयलॉग और इस गीत में प्राण की दार्शनिक शैली ने दर्शकों को बुरी तरह रुला डाला। दरअसल, इंदीवर ने “कसमें, वादे, प्यार, वफा, सब बातें हैं बातों का क्या…” मुखड़ा वाला गीत मन्ना डे से गवाया था। इंदीवर चाहते थे यह गीत मनोज कुमार पर फिल्माएं। लेकिन मनोज ने पारस को पहचान लिया और प्राण को यह जिम्मेदारी सौंप दी। इंदीवर इस पर भिड़े थे। मगर फिल्म आयी और इंदीवर दंडवत। उनका एक डॉयलॉग सुनिए : राशन पे भाषण है, पर भाषण पे राशन नहीं। उस समय देश भुखमरी की हालत में था और इस वाक्य से प्राण ने दर्शकों को झकझोर दिया।

मीडिया संस्थानों में तमाम अस्मिताओं का प्रतिनिधित्व हो 0

मीडिया संस्थानों में तमाम अस्मिताओं का प्रतिनिधित्व हो

पशुपति शर्मा ♦ सुभाष गाताडे ने कहा कि अस्मिताओं के संघर्ष का सवाल आज ज्यादा मौजूं है। 80-90 के दशक में दलित और स्त्री अस्मिता का उभार हुआ। हिंदी पट्टी के सबसे बड़े सूबे में मायावती अस्मिताओं के इस संघर्ष के बाद सत्ता पर काबिज हुईं। 90 के दशक में हिंदू अस्मिता का उभार हुआ। और अब आज के दौर में जब हम गुजरात दंगे बनाम विकास की बहस में उलझे हैं, अस्मिताओं से जुड़े ऐसे कई सवाल बार-बार सिर उठाते हैं। पत्रकारिता के ढांचे का जिक्र करते हुए सुभाष गाताडे ने कहा कि यहां अभी भी पुरुष वर्चस्व कायम है। पत्रकारिता संस्थानों में तमाम अस्मिताओं का प्रतिनिधित्व होना चाहिए। इस सिलसिले में उन्होंने 2006 में हुए एक सर्वे का जिक्र किया।

सन 75 से साल दर साल गहराता ही चला गया आपातकाल 2

सन 75 से साल दर साल गहराता ही चला गया आपातकाल

कौशल किशोर ♦ भारतीय राज्य सुरक्षाबलों को ऐसे कानूनी अधिकारों से लैस कर दिया है ताकि वे बेरोकटोक कार्रवाई कर सके और उनके अमानवीय कृत्य के लिए उनके विरुद्ध कोई कार्रवाई न हो सके। ‘आफ्सपा’ के प्रावधानों के तहत सेना व अर्द्धसैनिक बलों को ऐसा ही विशेषाधिकार प्राप्त है, जिसके अंतर्गत वह संदेह के आधार पर बगैर वारंट कहीं भी घुसकर तलाशी ले सकता है, किसी को गिरफ्तार कर सकता है तथा लोगों के समूह पर गोली चला सकता है। यही नहीं, यह कानून सशस्त्र बलों को किसी भी दंडात्मक कार्रवाई से बचाता है जब तक कि केंद्र सरकार उसके लिए मंजूरी न दे। देखा गया है कि जिन राज्यों में ‘आफ्सपा’ लागू है, वहां नागरिक प्रशासन दूसरे पायदान पर पहुंच गया है तथा सरकारों का सेना व अर्द्धसैनिक बलों पर निर्भरता बढ़ी है।

कुछ दुख होते हैं जिनके सामने सिर्फ पत्थर हुआ जा सकता है 7

कुछ दुख होते हैं जिनके सामने सिर्फ पत्थर हुआ जा सकता है

निवेदिता ♦ हमारी अंतिम मुलाकात अपूर्व के घर हुई थी। जब सीपीआई एमएल ने उसे सीवान में जाकर काम करने का जिम्मा दिया था। मां भी आयी हुई थी। इस बात से परेशान थी कि वह वहां काम नहीं करे। मां ने हमलोगों से कहा कि उसे समझाओ। सीवान में शहाबुद्दीन का आतंक था। आज भी उसका आतंक पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। हमलोगों ने कहा, तुम्हें अभी दिल्ली में ही काम करना चाहिए। तुम्हारी वहां जरूरत है। वह हमारी बातों से दुखी हो गया। उसने पूछा, क्या तुमलोग समझते हो शहाबुद्दीन के डर से हम काम करना छोड़ दें? क्या डर कर राजनीति की जा सकती है? हमलोगों ने समझाया कि डरने की बात कौन कर रहा है, पर लड़ाई लड़ने के पहले अपनी तैयारी करनी चाहिए। वह माना नहीं।

“मेरे पास बस शहद का एक कटोरा है!” 0

“मेरे पास बस शहद का एक कटोरा है!”

प्रकाश के रे ♦ समकालीन इतिहास की एक उल्लेखनीय विशेषता यह है कि इसमें विचारधारात्मक संकीर्णताएं रचनाकारों और रचनात्मकता को अक्सर निशाना बनाती रही हैं और इस प्रवृत्ति के शिकार न सिर्फ वे रचनाकार होते हैं, जो विचारधारा-विशेष के विरोधी होते हैं, बल्कि वे भी होते हैं जो उस विचारधारा के उत्कृष्ट एवं उद्दात आदर्शों के लिए हर तरह की कठिनाइयां उठाते रहते हैं। बीसवीं सदी के सबसे महत्वपूर्ण कवियों में शुमार नाजिम हिकमत के साथ भी उनके ही साथी कम्युनिस्टों ने कुछ ऐसा ही बर्ताव किया था। जबकि इस महाकवि को साम्यवादी विचारों के समर्थन और तुर्की में जनवादी संघर्षों से जुड़े होने के कारण बरसों जेल रहना पड़ा था, और अंततः देश छोड़ कर निर्वासन वरण करना पड़ा था।

वे ऐसी जगह थे, जहां बैठकर धूप में छांव का अनुभव होता था 2

वे ऐसी जगह थे, जहां बैठकर धूप में छांव का अनुभव होता था

कान में उजबक की तरह नजर आते हमारे सितारे

[20 May 2013 | Read Comments | ]

Sonam Kapur 365x114

डेस्‍क ♦ कांस फिल्‍म फेस्टिवल में हमारे सितारे जैसी हरकतें कर रहे हैं, उससे पता चलता है कि वे सच और सिनेमा का मिक्‍सचर हो चले हैं। टिप्‍पणीकार उन्‍हें एक बच्‍चे के जन्‍मदिन पार्टी में शामिल उत्‍साही मेहमान की संज्ञा दे रही हैं।

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ओम थानवी ♦ मेरे लिए बिक्रम जी ऐसी जगह थे, जहां बैठकर आप धूप में भी छांव अनुभव करते हैं। जहां अपने-आपको खाली करते हैं, भरते हैं। किसी गिरजे की तरह।
आदिवासी जीवन के पहले फिल्मकार थे ऋत्विक घटक 0

आदिवासी जीवन के पहले फिल्मकार थे ऋत्विक घटक

संजय कृष्ण ♦ घटक आदिवासी समाज को सत्यजीत रॉय की तरह नहीं देखते थे। उन्होंने ‘आदिवासी जीवन के स्रोत’ एवं ‘उरांव’ बनायी, तो आदिवासी समाज को, उनकी संस्कृति को निकट से देखने की कोशिश की। फिल्मकार मेघनाथ के शब्दों में, “वे आई-लेवल से देख रहे थे।” यानी, यह दृष्टि समानता की थी, संवेदना की थी। दोनों डाक्यूमेंट्री की शूटिंग रांची और आस-पास और नेतरहाट क्षेत्र में की गयी थी। ‘आदिवासी जीवन के स्रोत’ की जब शूटिंग कर रहे थे, तो बीच में अपनी व्यस्त दिनचर्या से थोड़ा समय निकालकर अपनी पत्‍नी को पत्र लिखते। एक पत्र 22 फरवरी 1955 का है। लिखा है, “उरांव-मुंडा के साथ सारा दिन बीत रहा है। इनके साथ रहकर मिट्टी की गंध मिल रही है। इनका अपूर्व गान हमें मदहोश कर दे रहा है।”

महादेवीजी का जीवन सुकरात के जहर पीने की कहानी है 0

महादेवीजी का जीवन सुकरात के जहर पीने की कहानी है

♦ ओम थानवी फ़िराक़ गोरखपुरी हिंदी को लेकर नुक्ताचीनी करते थे। हिंदी लेखकों के बारे में भी। लेकिन हिंदी ही देश की राष्ट्रभाषा हो सकती है, यह भी कहते थे। तुलसीदास को दुनिया का...