Category: मोहल्ला अस्सी

डॉ काशीनाथ सिंह की किताब जोड़ डॉ चंद्रप्रकाश द्विवेदी का कैमरा बराबर मोहलला अस्‍सी। मोहल्‍ला लाइव पर एक एक्‍सक्‍लूसिव सीरीज।

आज जेएनयू आइए, इरफान से मिलिए, बात कीजिए 1

आज जेएनयू आइए, इरफान से मिलिए, बात कीजिए

डेस्‍क ♦ पान सिंह तोमर के बाद नये सिरे से चर्चा में आये इरफान खान आज अपनी रचना प्रक्रिया पर बात करेंगे। मोहल्‍ला लाइव की ओर से जेएनयू में आयोजित संवाद शृंखला की इस अहम कड़ी में इरफान खान के साथ बातचीत की शुरुआत करेंगे अविनाश और प्रकाश के रे। खुला संवाद का अंतराल लंबा होगा, जिसमें इरफान खान में दिलचस्‍पी रखने वाले लोग अपने सवाल इरफान से सीधे पूछ सकेंगे। शाम साढ़े चार बजे जेएनयू के केसी ओपन थिएटर में आयोजित होने वाले इस संवाद के लिए किसी तरह का कोई पास नहीं है। फ्री इंट्री है। इरफान खान हिंदी सिनेमा के उन कुछ सजग अभिनेताओं में से हैं, जिन्‍होंने जगह पाने में भले लंबा समय लगाया, लेकिन फौरी सफलता के लिए बॉलीवुड की सस्‍ती गली नहीं पकड़ी।

काशी कथा वाया मोहल्‍ला अस्‍सी | कॉपी पेस्‍ट, पत्रिका 2

काशी कथा वाया मोहल्‍ला अस्‍सी | कॉपी पेस्‍ट, पत्रिका

रामकुमार सिंह ♦ लेखक और निर्देशक के आपसी यकीन का आलम यह है कि फिल्म की पटकथा डॉ द्विवेदी ने लिखी है और काशीनाथ सिंह ने उसे पढ़ना भी जरूरी नहीं समझा। वे कहते हैं, इससे किसी निर्देशक की मेहनत का अपमान होता कि मैं उन पर भरोसा नहीं कर रहा। मैं मानता हूं कि उपन्यास में कंकाल तो मेरा है लेकिन उसको मांस मज्जा की सिनेमाई जरूरत से भरने का हक निर्देशक का ही है और उसमें कहानी के लेखक होने के नाते मुझे दखल नहीं देना चाहिए।

कहीं से भी छेड़ो, बनारस में कोई भी सुर बेसुरा नहीं होता! 9

कहीं से भी छेड़ो, बनारस में कोई भी सुर बेसुरा नहीं होता!

समर ♦ 2002 में इलाहाबाद से खेत होकर जेनयू को प्यारे हो जाने के बाद भी बनारस से मुठभेड़ें भी जारी रहीं और उन मुठभेड़ों से पैदा होने वाली तमाम खट्टी मीठी यादों का सिलसिला भी। पर इन व्यक्तिगत यादों के तमाम सिलसिले जब तब टकराते रहे ‘काशी का अस्सी’ से। हर बार लगता रहा कि अपने जाने हुए ‘अस्सी’ में कितना कुछ कम है ‘काशी’ के अस्सी से। सोचता रहा कि उनसे मिलूं, बनारस में मौजूद तमाम राजनीतिक, साहित्यिक और सामाजिक क्षेत्रों में काम कर रहे तमाम दोस्तों के काशी बाबा से संबंधों की वजह से यह कोई ख़ास मुश्किल काम भी नहीं था।

बनारस भारत का अदभुत शोकेस है! 13

बनारस भारत का अदभुत शोकेस है!

अजय ब्रह्मात्‍मज ♦ बनारस का उल्ले आते ही हमें बनारसी साड़ियों की याद आती है। लाल, हरी और अन्य गहरे रंगों की ये साड़ियां हिंदू परिवारों में किसी भी शुभ अवसर के लिए आवश्यक मानी जाती हैं। उत्तर भारत में अधिकांश बेटियां बनारसी साड़ी में ही विदा की जाती हैं। बनारसी साड़ियों की कारीगरी सदियों पुरानी है। जड़ी, बेलबूटे और शुभ डिजाइनों से सजी ये साड़ियां हर आयवर्ग के परिवारों को संतुष्ट करती हैं, उनकी जरूरतें पूरी करती हैं। सुहाग का प्रतीक मानी जाती हैं बनारसी साड़ियां।

काशी स्टेशन पर उस एक शॉट के लिए ढेर सारी बेचैनी थी! 9

काशी स्टेशन पर उस एक शॉट के लिए ढेर सारी बेचैनी थी!

अविनाश ♦ काशी स्टेशन पर ट्रेन की इंट्री का एक लांग शॉट लेना था और धीरे-धीरे ट्रेन की सूंढ़ को क्‍लोजअप में आना था। इस एक दृश्‍य को मैजिक लाइट में बेहतरीन तरीके से शूट करने के लिए सिनेमैटोग्राफर विजय अरोड़ा बदहवास थे। डॉक्‍टर साहब कॉडलेस माइक के सहारे भीड़ को डायरेक्‍ट कर रहे थे और उनकी पत्‍नी मंदिरा बेचैनी से इस एक पल के पूरा होने की प्रतीक्षा कर रही थीं। जिमी जिप कैमरे से पहले फ्रेम में काशी का साइन बोर्ड लिया गया, दूसरे फ्रेम में दूर आती ट्रेन, जो नजदीक आते आते जैसे कैमरे के चेहरे से टकराने वाली हो। और ये सीन जैसे ही ओके हुआ – सबके चेहरे पर संतोष की स्मित रेखाएं नजर आने लगीं।

हादसा होने ही वाला था, लेकिन हुआ नहीं, टल गया 1

हादसा होने ही वाला था, लेकिन हुआ नहीं, टल गया

अविनाश ♦ डॉ द्विवेदी की नाव मणिकर्णिका तरफ तेजी बढ़ी और ठीक उसी वक्‍त एक मृत देह आधे पानी में पड़ी थी। नाव मुर्दे से टकराने ही जा रही थी। सिनेमैटोग्राफर विजय अरोड़ा ने नाव का ब्रेक लगाया और एक मिनट के लगा कि हो क्‍या गया है। अजय जी ने बताया कि पहले भी दूसरी फिल्‍मों की शूटिंग के दौरान ऐसा कुछ हुआ है और यूनिट वाले मार खा चुके हैं। शूटिंग नहीं करने दी गयी है। लेकिन इस बार हादसे से पहले विजय जी की सूझबूझ ने संकट काल लगभग टाल दिया। लेकिन हमारी नाव के मोटर के पंखे में फंसा बोरा नहीं निकाला जा सका। डायरेक्‍टर और सिनेमैटोग्राफर की नाव अलग कर दी गयी। वे निकल गये और हमारी नाव मणिकर्णिका पर रह गयी।

सुन लीजिए, डॉ काशीनाथ सिंह एक छद्म कम्‍युनिस्‍ट हैं! 11

सुन लीजिए, डॉ काशीनाथ सिंह एक छद्म कम्‍युनिस्‍ट हैं!

अविनाश ♦ रामबचन पांडे ने जब होटल ब्रॉडवे के कमरा नंबर तीन सौ एक में तैश खाकर कहा कि डॉ काशीनाथ सिंह एक छद्म कम्‍युनिस्‍ट हें और यह भी कि डॉ काशीनाथ सिंह ने जीवित पात्रों का काशी का अस्‍सी में उतना ही इस्‍तेमाल किया है, जितना कमर्शियल खांचे में फिट वे पात्र फिट थे – तब भी काशीनाथ सिंह मुस्‍करा रहे थे। लेकिन गया सिंह उलट गये। उन्‍होंने हवा में हाथ लहराते हुए और दांत भींचते हुए कहा कि खामोश, गुरुदेव डॉ काशीनाथ सिंह सच्‍चे और निर्भीक कम्‍युनिस्‍ट हैं – रामबचन पांडे ने उन्‍हें स्‍यूडो कम्‍युनिस्‍ट कह कर ठीक नहीं किया।